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New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....

Tuesday, December 2, 2014

आज भी गुलाम हैं हम: ३० वर्ष बाद ३ दिसंबर को भोपाल त्रासदी के पीड़ितों के लिए दो बूँद आंसू।



1984 में हुई दुनिया की सबसे घातक औद्योगिक दुर्घटनाओं में से एक भोपाल की यूनियन कार्बाइड गैस त्रासदी में तीन हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे। 2-3 दिसंबर 1984 की मध्यरात्रि को कीटनाशी बनाने वाले संयंत्र में एक रासायनिक अभिक्रिया के चलते जहरीली गैसों का रिसाव हो गया, जो कि आसपास फैल गई।
मध्य प्रदेश सरकार ने इसके कारण कुल 3,787 मौतों की पुष्टि की थी। गैर सरकारी आकलन का कहना है कि मौतों की संख्या 10 हजार से भी ज्यादा थी। पांच लाख से ज्यादा लोग घायल हो गए थे, बहुतों की मौत फेफड़ों के कैंसर, किडनी फेल हो जाने और लीवर से जुड़ी बीमारी के चलते हुई।
एंडरसन दुर्घटना के चार दिन बाद भोपाल पहुंचे थे परंतु नई दिल्ली से एक फोन आने के बाद तुरंत सरकारी देख-रेख में फरार हो गये। उसके बाद भारत सरकार ने उन्हें भारतीय कानून के दायरे में लाने की नाटक करती रही। भारत सरकार की ओर से एंडरसन के प्रत्यर्पण के लिए कई अनुरोध किए थे और आधिकारिक तौर पर उन्हें भगौड़ा भी घोषित किया था। द टाईम्स ने कहा कि अमेरिकी सरकार के समर्थन के चलते वह प्रत्यर्पण से बच गए।
हादसे को लेकर यूनियन कार्बाइड के चेयरमैन वॉरेन एंडरसन के खिलाफ हर किसी में जबर्दस्त गुस्सा था। सभी यही मानते थे कि वही हजारों लोगों का कातिल है। हर तरफ से एंडरसन की गिरफ्तारी की मांग जोर पकड़ रही थी। धरना-प्रदर्शनों के बाद 3 दिसंबर की शाम हनुमानगंज थाने में एंडरसन के खिलाफ प्रकरण दर्ज कर लिया गया।
डॉन कर्जमैन की लिखी किताब 'किलिंग विंड' के मुताबिक, एंडरसन अपने अन्य सहयोगियों के साथ 7 दिसंबर को सुबह साढ़े नौ बजे इंडियन एयरलाइंस के विमान से भोपाल पहुंचा, हवाईअड्डे पर तत्कालीन पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी और जिलाधिकारी मोती सिंह मौजूद थे। दोनों एंडरसन को एक सफेद एंबेस्डर कार में कार्बाइड के रेस्ट हाउस ले गए और वहीं उन्हें हिरासत में लिए जाने की जानकारी दी।
कर्जमैन आगे लिखते हैं कि दोपहर साढ़े तीन बजे एंडरसन को पुलिस अधिकारी द्वारा बताया जाता है कि हमने आपको भोपाल से दिल्ली जाने के लिए राज्य सरकार के विशेष विमान की व्यवस्था की है, जहां से आप अमेरिका लौट सकते हैं। कुछ जरूरी कागजात पर दस्तखत करने के बाद एंडरसन दिल्ली के लिए निकल गया। हजारों इंसानों का कातिल फिर कभी भोपाल नहीं आया, वहीं से उसे अमेरिका भेज दिया गया।
इधर भोपाल में उसे दोषी ठहराने की लड़ाई जारी रही। 1 दिसंबर 1987 को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने एंडरसन के खिलाफ मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया। 9 फरवरी 1989 को सीजेएम की अदालत ने एंडरसन के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी किया, मगर वह नहीं आया। आखिरकार 1 फरवरी 1992 को अदालत ने एंडरसन को भगोड़ा घोषित कर दिया।
एंडरसन के भोपाल न आने के बावजूद न्यायिक लड़ाई जारी रही। 27 मार्च 1992 को सीजेएम अदालत ने एंडरसन के खिलाफ गैरजमानती वारंट जारी कर गिरफ्तार कर पेश करने के आदेश दिए। साथ ही एंडरसन के प्रत्यार्पण के लिए केंद्र सरकार को निर्देश जारी किए, मगर जून 2004 में यूएस स्टेट एंड जस्टिस डिपार्टमेंट ने एंडरसन के प्रत्यार्पण की भारत की मांग खारिज कर दी।
नारा लगा था - "तुम हमें एंडरसन दो, हम तुम्हें ओसामा देंगे।"
भोपाल की सीजेएम अदालत ने 7 जून 2010 को सात भारतीय अधिकारियों को दो-दो साल की सजा सुनाई और जमानत पर रिहा कर दिया। एंडरसन के प्रत्यार्पण को लेकर यूएस स्टेट एंड जस्टिस डिपार्टमेंट के निर्णय का मामला अभी भी सीजेएम अदालत में विचाराधीन है। इस बीच खबर आई कि 29 सितंबर, 2014 को 92 वर्षीय यूनियन कार्बाइड के पूर्व प्रमुख वॉरेन एंडरसन का अमेरिका के फ्लोरिडा के एक नर्सिग होम में में निधन हो गया।भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के संयोजक अब्दुल जब्बार कहते हैं कि सरकारों की दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव में एंडरसन का प्रत्यपर्ण नहीं हो पाया। भोपाल वासियों के साथ तो तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने विश्वासघात किया था, उसके बाद वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी वही कर रहे हैं। कोई फर्क ही नहीं दिखता।

Thursday, November 27, 2014

महाराजा कामेश्वर सिंह बहादुर, राज दरभंगा के १०७वे जयंति पर श्रद्धांजलि:


महाराजा कामेश्वर सिंह बहादुर, राज दरभंगा के १०७वे जयंति पर श्रद्धांजलि :
महाराजा साहेब का जन्म २८ नवम्बर, १९०७ को हुआ था और वे १९२९ से १९४७ तक दरभंगा का राज (परमानेंट सेटलमेंट के तहत लगभग ६२०० वर्ग किलोमीटर की वृहत जमींदारी) के सरकार थे।

दरअसल राज दरभंगा से हमारे परिवार का वर्षों का सम्बन्ध है। मुरहो एस्टेट राज दरभंगा के अंतर्गत ही छोटी जमींदारी थी।

दरभंगा महाराजा सर लक्ष्मेश्वर सिंह बहादुर निःसंतान थे और उनकी मृत्यु के उपरांत उनके भाई महाराजा रामेश्वर सिंह बहादुर १८९८ से अपनी मृत्यु १९२९ तक राज दरभंगा के शासक थे। वे सिविल सेवा में होने के कारण भागलपुर में पदस्थापित भी थे जो उस समय मधेपुरा का मुख्यालय था। बिहार लैन्डहोल्ड्र्स एशोसिएशन और कांग्रेस में सक्रिय होने और गोपाल कृष्ण गोखले से मिलने जुलने के दौरान मुरहो के जमींदार बाबू रासबिहारी लाल मंडल का उनसे संपर्क हुआ। महाराजा ने अपने दरबार में आमंत्रित किया और दरबारियों ने अनुमान लगाया की रासबिहारी बाबू किसी बड़े रियासत के राजा हैं। खैर राजमाता ने रासबिहारी बाबू को अंग्रेज़ों को चुनौती देने की हिम्मत रखने पर "मिथिला का शेर" कह कर सम्बोधित किया था।

रासबिहारी बाबू के सबसे छोटे पुत्र स्व बी पी मंडल की शिक्षा राज दरभंगा हाईस्कूल के आवासीय व्यवस्था में हुआ था।

महाराजा कामेश्वर सिंह १९४० में ब्रिटेन के प्रधान मंत्री विंस्टन चर्चिल की भतीजी और एक मंजी हुई कलाकार कलेर शेरिडन से महात्मा गांधी की एक बुत बनवाया था। वे बड़े दिलदार व्यक्तित्व थे। उस समय एयर फ़ोर्स को तीन फाइटर प्लेन तौफे में दिया था। उनसे सहायता पाने वालों में महात्मा गांधी, बाबू राजेन्द्र प्रसाद, नेताजी सुभाष चन्द्र बॉस आदि शामिल थे। उन्होंने अपने शासकीय क्षेत्र में अनेक जूट, कॉटन, लोहा और स्टील, अखबार आदि अनेक उद्योग लगवाये। बी एच यू, अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय सहित अनेक विश्वविद्यालय को लाखो रुपये दान दिए।



बिहार और हिंदुस्तान के इस विभूति को उनके १०७ वे जयंति पर हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि।

Wednesday, October 29, 2014

छठ पर्व की शुरुआत ?


भगवान राम सूर्यवंशी थे और इनके कुल देवता सूर्य देव थे। इसलिए भगवान राम और सीता जब लंका से रावण वध करके अयोध्या वापस लौटे तो अपने कुलदेवता का आशीर्वाद पाने के लिए इन्होंने देवी सीता के साथ षष्ठी तिथि का व्रत रखा और सरयू नदी में डूबते सूर्य को फल, मिष्टान एवं अन्य वस्तुओं से अर्घ्य प्रदान किया।

सप्तमी तिथि को भगवान राम ने उगते सूर्य को अर्घ्य देकर सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त किया। इसके बाद राजकाज संभालना शुरु किया। इसके बाद से आम जन भी सूर्यषष्ठी का पर्व मनाने लगे।

महाभारत का एक प्रमुख पात्र है कर्ण जिसे दुर्योधन ने अपना मित्र बनाकर अंग देश यानी आज का भागलपुर का राजा बना दिया। भागलपुर बिहार में स्थित है।

अंग राज कर्ण के विषय में कथा है कि, यह पाण्डवों की माता कुंती और सूर्य देव की संतान है। कर्ण अपना आराध्य देव सूर्य देव को मानता था। यह नियम पूर्वक कमर तक पानी में जाकर सूर्य देव की आराधना करता था और उस समय जरुरतमंदों को दान भी देता था। माना जाता है कि कार्तिक शुक्ल षष्ठी और सप्तमी के दिन कर्ण सूर्य देव की विशेष पूजा किया करता था।

अपने राजा की सूर्य भक्ति से प्रभावित होकर अंग देश के निवासी सूर्य देव की पूजा करने लगे। धीरे-धीरे सूर्य पूजा का विस्तार पूरे बिहार और पूर्वांचल क्षेत्र तक हो गया।

छठ पर्व को लेकर एक कथा यह भी है कि साधु की हत्या का प्रायश्चित करने के लिए जब महाराज पांडु अपनी पत्नी कुंती और मादरी के साथ वन में दिन गुजार रहे थे।

उन दिनों पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महारानी कुंती ने सरस्वती नदी में सूर्य की पूजा की थी। इससे कुंती पुत्रवती हुई। इसलिए संतान प्राप्ति के लिए छठ पर्व का बड़ा महत्व है। कहते हैं इस व्रत से संतान सुख प्राप्त होता है।

कुंती की पुत्रवधू और पांडवों की पत्नी द्रापदी ने उस समय सूर्य देव की पूजा की थी जब पाण्डव अपना सारा राजपाट गंवाकर वन में भटक रहे थे।

उन दिनों द्रौपदी ने अपने पतियों के स्वास्थ्य और राजपाट पुनः पाने के लिए सूर्य देव की पूजा की थी। माना जाता है कि छठ पर्व की परंपरा को शुरु करने में इन सास बहू का भी बड़ा योगदान है।

पुराण की कथा के अनुसार प्रथम मनु प्रियव्रत की कोई संतान नहीं थी। प्रियव्रत ने कश्यप ऋषि से संतान प्राप्ति का उपाय पूछा। महर्षि ने पुत्रेष्ठि यज्ञ करने को कहा। इससे उनकी पत्नी मालिनी ने एक पुत्र को जन्म दिया लेकिन यह पुत्र मृत पैदा हुआ। मृत शिशु को छाती से लगाकर प्रियव्रत और उनकी पत्नी विलाप करने लगी। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी।

एक ज्योतियुक्त विमान पृथ्वी की ओर आता दिखा। नजदीक आने पर सभी ने देखा कि उस विमान में एक दिव्याकृति नारी बैठी है। देवी ने प्रियव्रत से कहा कि मैं ब्रह्मा की मानस पुत्री हूं। संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वालों संतान प्रदान करती हूं। देवी ने मृत बालक के शरीर का स्पर्श किया और बालक जीवित हो उठा।

महाराज प्रियव्रत ने अनेक प्रकार से देवी की स्तुति की। देवी ने कहा कि आप ऐसी व्यवस्था करें कि पृथ्वी पर सदा हमारी पूजा हो। राजा ने अपने राज्य में छठ व्रत की शुरुआत की। ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी छठ व्रत का उल्लेख किया गया है।


छठ पर्व की शुरुआत नहाय खाय के साथ हो चुकी है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व का आज दूसरा दिन है। इस दिन व्रती चावल और गुड़ का खीर बनाकर छठी मैया को प्रसाद अर्पित करते हैं।

व्रती इसी प्रसाद को खाते हैं और यही प्रसाद लोगों में बांटा भी जाता है। इस प्रसाद को खाने के बाद अगले दो दिनों तक व्रती कुछ भी नहीं खाएंगे। इसलिए सूर्य षष्ठी व्रत को बड़ा ही कठिन और सभी व्रतों में सबसे उत्तम माना गया है।

इस व्रत में चावल और गुड़ का खीर बनाने की परंपरा के पीछे धार्मिक और वैज्ञानिक कारण दोनों ही शामिल है। धार्मिक कारण यह है कि शास्त्रों में बताया गया है कि सूर्य की कृपा से ही फसल उत्पन्न होते हैं, इसलिए सूर्य को सबसे पहले नए फसलों का प्रसाद अर्पण करना चाहिए।

छठ पर्व के समय चावल और गन्ना तैयार होकर घर आता है इसलिए गन्ने से तैयार गुड़ और नए धान के चावल का प्रसाद सूर्य देव को भेंट किया जाता है।

गुड़ को चीनी से शुद्घ माना गया है। यही कारण है कि छठ पर्व में चीनी की बजाय गुड़ की खीर बनाई जाती है।

जबकि वैज्ञानिक कारण यह है कि गुड़ की तासीर गर्म होती है और यह सुपाच्य होता है। इसलिए गुड़ का उपयोग औषधि बनाने में भी किया जाता है। गुड़ के सेवन से व्रती को अंदर से उर्जा और उष्मा प्राप्त होती है जिससे दो दिनों के व्रत को पूरा करने का बल मिलता है।

Saturday, September 20, 2014

हम दो हमारे दो :


इस सदी के अंत में दुनिया की जनसंख्या 9.6 से 12.3 अरब के बीच पहुंच जाएगी। सबसे ज्यादा आबादी अफ्रीका में बढ़ेगी। एशिया की जनसंख्या में 2050 के बाद गिरावट आने लगेगी।
जहां तक भारत की जनसंख्या का सवाल है, यह 2028 में यह चीन के बराबर हो जाएगी।

दुनिया की जनसंख्या में बढ़ोतरी मुख्यत: अफ्रीकी देशों के अलावा इंडोनेशिया, पाकिस्तान, फिलीपींस और अमेरिका से होगी।
अमेरिका की जनसंख्या में दूसरे देशों से आकर बसने वाले इजाफा करेंगे। अमेरिका में अगले चार दशकों में 10 लाख लोग सालाना जाएंगे।
पूर्व अमरीकी उपराष्टपति अल गोरे का कहना है की जनसंख्या की बेतहाशा वृद्धि पृथ्वी के संसाधनों पर भारी दबाव है, और इसे स्थिर करने में सबसे महत्वपूर्ण कारक लड़कियों को शिक्षित करना ही बन सकती है।

मैं समझता हूँ की भारत की अनेक समस्याओं का इलाज़ इस जनसख्या विस्फोट पर लगाम लगाना ही है।1975 में आपातकाल (Emergency) लगाये जाने के समय उस समय के असंवैधानिक सत्ता के स्वामी, इंदिरा गाँधी के छोटे पुत्र संजय गाँधी ने जनसँख्या नियंत्रण के लिए नसबंदी सहित कई उपाय किये जो बाद में इस दौरान की गयी ज्यादतियों में तब्दील हो गयी थी। इसमें मुसलमानों पर भी जनसख्या नियत्रण के लिए दबाब दिया गयाथा। कहते हैं की 1977 में कांग्रेस की चौंकाने वाला हार की वजह इमेर्जेंसी में हुई ज्यादतियाँ को माना गया।
अब वर्षों बाद पहली बार है कि काँग्रेस पार्टी ने संजय गांधी के बारे में अपनी राय स्पष्ट की है। कांग्रेस ने अपने वजूद के 125 साल पूरे होने पर अपना इतिहास जारी किया है जिसमें इमरजेंसी का जिक्र किया गया है। 'द कांग्रेस एंड द मेकिंग ऑफ द नेशन' नाम की इस किताब में इमरजेंसी के दौरान जबरन नसबंदी और झुग्गियां हटाने के लिए संजय गांधी को जिम्मेदार ठहराया गया है।

जबकि इस नीति की कितनी आवश्यकता है यह आज समझा सकता है।

इधर इसी विषय पर समाजवादी नेता आज़म खान ने राजीव गांधी और संजय गांधी की मौत को अल्लाह द्वारा दी गई सजा करार दिया।
आजम ने कहा कि राजीव गांधी ने बाबरी मस्जिद के प्रवेश द्वारों को खोलने के आदेश दिए थे जबकि संजय गांधी ने आपातकाल के दौरान बल प्रयोग कर नसबंदी कार्यक्रम चलवाया और इसलिए दोनों को अल्लाह ने सजा दी।



इनसे परे मेरा तो आज भी इसी नारा पर विश्वास है कि बच्चे दो ही अच्छे।

Sunday, September 14, 2014

हिंदी दिवस पर शुभकामनाएँ : On 14th September.


हिन्दी संवैधानिक रूप से भारत की प्रथम राजभाषा और भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। चीनी के बाद यह विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा भी है।
हिन्दी और इसकी बोलियाँ उत्तर एवं मध्य भारत के विविध राज्यों में बोली जाती हैं। भारत और अन्य देशों में ६० करोड़ से अधिक लोग हिन्दी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मॉरिशस, गयाना, सूरीनाम की अधिकतर और नेपाल की कुछ जनता हिन्दी बोलती है।

हिन्दी शब्द का सम्बन्ध संस्कृत शब्द सिन्धु से माना जाता है। 'सिन्धु' सिन्ध नदी को कहते थे ओर उसी आधार पर उसके आस-पास की भूमि को सिन्धु कहने लगे। यह सिन्धु शब्द ईरानी में जाकर ‘हिन्दू’, हिन्दी और फिर ‘हिन्द’ हो गया। बाद में ईरानी धीरे-धीरे भारत के अधिक भागों से परिचित होते गए और इस शब्द के अर्थ में विस्तार होता गया तथा हिन्द शब्द पूरे भारत का वाचक हो गया। इसी में ईरानी का ईक प्रत्यय लगने से (हिन्द ईक) ‘हिन्दीक’ बना जिसका अर्थ है ‘हिन्द का’। यूनानी शब्द ‘इन्दिका’ या अंग्रेजी शब्द ‘इण्डिया’ आदि इस ‘हिन्दीक’ के ही विकसित रूप हैं। हिन्दी भाषा के लिए इस शब्द का प्राचीनतम प्रयोग शरफुद्दीन यज्+दी’ के ‘जफरनामा’(१४२४) में मिलता है।

भाषाविद हिन्दी एवं उर्दू को एक ही भाषा समझते हैं। हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है और शब्दावली के स्तर पर अधिकांशत: संस्कृत के शब्दों का प्रयोग करती है। उर्दू, फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है और शब्दावली के स्तर पर उस पर फ़ारसी और अरबी भाषाओं का प्रभाव अधिक है।

हिन्दी हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवार परिवार के अन्दर आती है। ये हिन्द ईरानी शाखा की हिन्द आर्य उपशाखा के अन्तर्गत वर्गीकृत है। हिन्द-आर्य भाषाएँ वो भाषाएँ हैं जो संस्कृत से उत्पन्न हुई हैं। उर्दू, कश्मीरी, बंगाली, उड़िया, पंजाबी, रोमानी, मराठी नेपाली जैसी भाषाएँ भी हिन्द-आर्य भाषाएँ हैं।

हिन्‍दी भाषा का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना माना गया है। हिन्‍दी भाषा व साहित्‍य के जानकार अपभ्रंश की अंतिम अवस्‍था अवहट्ठ से हिन्‍दी का उद्भव स्‍वीकार करते हैं।





अपभ्रंश की समाप्ति और आधुनिक भारतीय भाषाओं के जन्मकाल के समय को संक्रांतिकाल कहा जा सकता है। हिन्दी का स्वरूप शौरसेनी और अर्धमागधी अपभ्रंशों से विकसित हुआ है। १००० ई. के आसपास इसकी स्वतंत्र सत्ता का परिचय मिलने लगा था, जब अपभ्रंश भाषाएँ साहित्यिक संदर्भों में प्रयोग में आ रही थीं। यही भाषाएँ बाद में विकसित होकर आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के रूप में अभिहित हुईं। अपभ्रंश का जो भी कथ्य रुप था - वही आधुनिक बोलियों में विकसित हुआ।

इतिहास को ठीक जानें : काका कालेलकर कमीशन के रिपोर्ट.


प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग या काका कालेलकर कमीशन के रिपोर्ट को 1955 में क्यों नहीं मानी गई, इसके जवाब में अलग अलग धारणाएँ हैं।

परन्तु इसके लिए प्रमुख रूप से स्वयं काका कालेलकर जिम्मेदार थे। अपनी ही रिपोर्ट के राष्ट्रपति महोदय को लिखे गए अनुशंसा भूमिका पत्र में काका कालेलकर ने रिपोर्ट से असहमति जताते हुए उसे निरस्त करने की मांग कर दी थी।

केंद्र सरकार को उपरोक्त रिपोर्ट अग्रेसारित करते हुए कालेलकर ने उसके बुनियादी निष्कर्ष के साथ अपने मजबूत से असहमति रिकॉर्डिंग करवाई थी। उन्होंने लिखा की रिपोर्ट की अनुशंसा और दिए गए सुझाव उन बुराईयाँ जिनसे वे मुकाबला करने की मांग कर रही थी, वे उन बुराइयों से भी बदतर थे। उन्होंने लिखा कि आयोग द्वारा अपनाई जांच की लाइन गलत था क्योंकि "लोकतंत्र में यह इकाई है जो व्यक्ति, न परिवार या जाति है, और यह विश्लेषण लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध है।"

................................................ In 1953, six years after India got its independence from the British Raj, the central government established a Backwards Classes Commission under Kalelkar's chairmanship with the charter to recommend reforms for removing inequities for underprivileged people. The Commission issued its report in 1955, recommending, among other things, that the government grant special privileges to untouchables and other underprivileged people.



While forwarding the above report to the central government, Kalelkar attached a letter, recording his strong disagreement with the Commission's fundamental conclusions. He wrote that the suggested remedies were worse than the evils they sought to combat. He wrote that the whole line of investigation pursued by the Commission was “repugnant to the spirit of democracy since in democracy it is the individual, not the family or the caste, which is the unit." He recommended that the state regard as backward and entitled to special educational and economic aid all persons whose total annual family income was less than 800 rupees [at that time] regardless of their caste or community. He stated his disagreement with the Commission's recommendation of reserving posts in government services for the backward classes.

ब्लू जींस : (Blue Jeans -Hindi)



जर्मनी के बेवेरिया में जन्मे लेवी स्ट्रॉस 18 साल की उम्र में अपने परिवार के साथ 1847 में अमेरिका गए थे। स्ट्रॉस के दो भाइयों का न्यूयॉर्क में कपड़े का बिजनेस था। लेवी ने एक साल इनसे काम सीखा। फिर रिश्तेदारों के पास केन्टुकी गए। यहां उन्होंने तीन साल तक फेरी लगाकर कपड़े बेचे। इसी दौरान उन्होंने अपना स्टोर खोलने का मन बनाया। सेन फ्रांसिसको आकर बहनोई डेविड स्टर्न के साथ मिलकर स्टोर खोला, जिसे लेवी स्ट्रॉस एंड कंपनी नाम दिया।

लेवी जर्मनी से साथ लाए मोटा कपड़ा खदान मजदूरों को बेचने लगे। रफ एंड टफ होने के कारण मजदूर इसका पैंट सिलवाते थे। मांग ज्यादा होने के कारण जल्द ही कपड़े का स्टॉक खत्म हो गया। लेवी ने इसका विकल्प ढूंढ़ लिया। वे फ्रांस के शहर नाइम्स से मोटा डेनिम फेब्रिक मंगवाने लगे, जिसे नीला करने के लिए नील से डाई करवाते थे। मजदूरों ने इसे भी हाथों हाथ लिया। अगले 13 वर्षों में लेवी का बिजनेस तीन गुना बढ़ गया।

1872 में लेवी को नेवादा के टेलर जैकब डेविस का पत्र मिला, जिसने लेवी को ऑफर दिया कि अगर वे उसकी नई तकनीक के पेटेंट की फीस भर दें तो वह इससे होने वाली कमाई का आधा हिस्सा उन्हें देगा। कभी लेवी की दुकान से कपड़े खरीदने वाले जैकब ने पैंट में धातु के हुक (रिबिट) लगाने का तरीका ढूंढ़ा था। लेवी और उसके बहनोई को ऑफर अच्छा लगा। इस स्टाइल का पेटेंट कराकर 20 मई 1873 को लेवी ने अपने घर में ही कारखाना खोला और पहली ब्लू जींस बनाई। हालांकि तब मजदूर इसे ‘ओवरऑल' कहते थे। इस साल मंदी होने के बावजूद उनका नया बिजनेस प्रभावित नहीं हुआ। काम बढ़ा तो उन्होंने अपनी फैक्ट्री भी स्थापित कर दी। इसी दौरान जनवरी 1874 में स्टर्न की मौत हो गई।

1886 में लेवी ने पहली बार जींस की वेस्ट पर लेदर टैग लगाया। इस पर जींस को विपरीत दिशा में खींचते दो घोड़ों की फोटो के साथ 501 नंबर प्रिंट था। उम्र बढ़ने पर लेवी ने बिजनेस अपने भतीजों जेकब और लुईस स्टर्न को सौंप दिया और सामाजिक कार्यों से जुड़ गए। 1902 में लेवी के निधन के चार साल बाद भूकंप व आग से बैट्री स्ट्रीट पर कंपनी का मुख्यालय और फैक्ट्री पूरी तरह नष्ट हो गए। कंपनी दोबारा खड़ी की गई। इस मुसीबत के बाद मंदी ने उनके बिजनेस को और नुकसान पहुंचाया। इससे निपटने के लिए 1912 में कंपनी ने अपना पहला इनोवेटिव प्रोडक्ट बच्चों का प्लेसूट बाजार में उतारा। इसकी सेल से कंपनी कुछ संभली।



1950 के दशक में मजदूरों की देखा देखी हिप्पीज़ और युवाओं ने भी डेनिम पहनना चालू किया। रिंकल फ्री और फिक्स साइज इनके बीच ज्यादा पॉपुलर हुए। 1960 में इसे जींस नाम मिला। 1964 तक दो प्लांट वाली लेवी स्ट्रॉस के 80 के दशक में 50 प्लांट हो गए थे। 35 से ज्यादा देशों में उसके ऑफिस काम करने लगे थे। 1991 में अमेरिका के कोलंबस ओहियो में पहला स्टेार खोला। इसके बाद जॉर्ज पी सिंपकिंस के नेतृत्व में कंपनी ने अमेरिका के बाहर 23 प्लांट खोले। साथ ही डॉकर्स, डेनिजिन, सिगनेचर और लेवाइस जैसे कई ब्रांड बाजार में उतारे। जींस मार्केट में दुनिया के टॉप बैंड लेवाइस के भारत सहित 110 देशों में स्टोर हैं। हाल में लेवाइस ने खादी ब्रैंड पेश किया है। जिन लेवी स्ट्रॉस ने दुनिया को जींस दी, उन्होंने खुद इसे कभी नहीं पहना।