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New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....
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Saturday, June 30, 2018

बढ़ती बेरोज़गारी और सत्ताधारियों की बेशर्मी : इन्द्रजीत

बढ़ती बेरोज़गारी और सत्ताधारियों की बेशर्मी:
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार बेरोज़गारी की बढ़ती दर के मामले में भारत 8.0 प्रतिशत की दर के साथ एशिया में पहले स्थान पर पहुँच गया है। उप-राष्ट्रपति के पद को शोभायमान कर रहे वंकैया नायडू ने हालिया दिनों में बयान दिया था कि सभी को सरकारी नौकरी नहीं दी जा सकती व स्वरोज़गार भी काम ही है तथा साथ ही कह दिया कि चुनाव में हर पार्टी रोज़गार देने जैसे वायदे कर ही दिया करती है, तो कहने का मतलब भाजपा ने भी तो इसी गौरवशाली परम्परा को ही आगे बढ़ाया है! ‘न्यूज़ रूम’ से लेकर राज्यसभा और वहाँ से लेकर नेताओं-मन्त्रियों और सरकारी भोंपुओं के दरबारों तक हर जगह पकौड़े का ख़ूब महात्म्य गाया जा रहा है। आप बेशक मशहूर शायर दुष्यन्त कुमार के विचारों से इत्तेफ़ाक न रखते हों, पर उनका एक शेर हुक्मरानों की अच्छी कलई खोलता है। शेर है – ‘कहाँ तो तय था चरागाँ हर घर के लिए / कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए’। हालिया अख़बारी ख़बरों के हवाले से यह बात सामने आयी है कि केन्द्र में बैठी भाजपा नीत राजग सरकार पाँच साल से ख़ाली पड़े पदों को समाप्त करने की ठान चुकी है। केन्द्र सरकार के द्वारा कुल 36 लाख 33 हज़ार 935 पदों में से 4 लाख 12 हज़ार 752 पड़ ख़ाली पड़े हैं तथा इनमें से क़रीब आधे पद ख़ाली हैं। कहाँ तो चुनाव से पहले करोड़ों रोज़गार देने के ढोल बजाय जा रहे थे कहाँ अब ख़ाली पदों पर काबिल युवाओं को नियुक्त करने की बजाय पदों को ही समाप्त करने के लिए कमर कस ली गयी है। देश के प्रधानमन्त्री से लेकर सरकार के आला मन्त्रीगण बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि ‘शाम तक 200 रुपये के पकौड़े बेचना भी काफ़ी बेहतर रोज़गार है’ और इसके लिए भी सरकार बहादुर अपनी पीठ थपथपा रही है! अब ‘मरता क्या न करता’ अपना और अपने बच्चों का पेट भरने के लिए फ़ाके करके और किसी-न-किसी तरह छोटे-मोटे काम काम-धन्धे करके जैसे-तैसे लोग गुज़र-बसर कर रहे हैं, किन्तु आम जन की हालत का मज़ाक़ उड़ाते हुए बेशर्म सत्ताधारियों द्वारा कहा जा रहा है कि ‘स्वरोज़गार भी तो नौकरी ही है। नौकरी के लिए सरकार का मुँह ताकने की क्या ज़रूरत है?’ लेकिन बजट बनाते समय करों का बोझ जब जनता की कमर पर लादना हो तब सरकार को क़तई अहसास नहीं होता कि यह जो जनता की जेब से एक-एक दमड़ी निचोड़ी जा रही है, इसके बदले में जनता को वापस कुछ देने का भी फ़र्ज़ बनता है! आम मेहनतकश लोग व्यवस्था का बोझ भी उठायें और कुछ माँग भी न करें! यह कहाँ का न्याय है? आज देश एक अभूतपूर्व दौर से गुज़र रहा है। शिक्षा-स्वास्थ्य-रोज़गार के हालात भयंकर बुरे हैं, किन्तु दूसरी और साम्प्रदायिक और जातीय दंगों को बढ़ावा दिया जा रहा है। ख़ुद सरकार में बैठे नेतागणों में से भी बहुत सारे दंगों की आँच में अपनी रोटियाँ सेंकते नज़र आ रहे हैं। हाल ही में हुए गुजरात चुनाव प्रचार में सबके सामने आ गया है कि “विकास” व “गुजरात मॉडल” के नाम पर झूठ बोलकर लोगों को अब नहीं ठगा जा सकता, इसलिए वोट की राजनीति फिर से मन्दिर-मस्जिद पर केन्द्रित हो चुकी है। इसलिए अब यह समझना भी मुश्किल नहीं है कि 2019 में चुनावी प्रचार का ऊँट किस करवट बैठने वाला है। यानी इसकी काफ़ी सम्भावना है कि जाति-धर्म के दंगों में होने वाली ख़ून की बारिश में ही मतदान की फ़सल लहलहायेगी!

देश में लम्बे समय से बेरोज़गारी का संकट बढ़ता ही चला जा रहा है। तमाम सरकारें आयीं और चली गयीं, किन्तु आबादी के अनुपात में रोज़गार बढ़ना तो दूर उल्टा घटते चले गये। सरकारी नौकरियाँ नाममात्र के लिए निकल रही हैं, सार्वजनिक क्षेत्रों की बर्बादी जारी है। केन्द्र और राज्यों के स्तर पर लाखों-लाख पद ख़ाली पड़े हैं। भर्तियों को लटकाकर रखा जाता है, सरकारें भर्तियों की परीक्षाएँ करने के बाद भी उत्तीर्ण उम्मीदवारों को नियुक्तियाँ नहीं देतीं! परीक्षाएँ और इण्टरव्यू देने में युवाओं के समय, स्वास्थ्य दोनों का नुक़सान होता है तथा आर्थिक रूप से परिवार की कमर ही टूट जाती है। नये रोज़गार सृजित करने का वायदा निभाने की बात तो दूर की है, सरकारें पहले से मौजूद लाखों पदों पर रिक्तियों को ही नहीं भर रही हैं। सरकारी ख़ज़ाने से नेताओं, मन्त्रियों, नौकरशाहों की सुरक्षा और ऐयाशी पर ख़र्च होने वाले अरबों रुपये अप्रत्यक्ष करों के रूप में हमारी जेबों से ही वसूले जाते हैं, तो क्या बदले में हमें शिक्षा-रोज़गार की बुनियादी सुविधाएँ भी नहीं मिलनी चाहिए? उल्टे आज महँगाई लोगों की कमर तोड़ रही है, व्यापक जनता के लिए रोज़गार ‘आकाश कुसुम’ हो गये हैं, कॉर्पोरेट घरानों के सामने सरकारें दण्डवत हैं तथा सत्ता के ताबेदारों ने बड़ी ही बेहयाई के साथ बेरोज़गारी के घाव को कुरेद-कुरेदकर नासूर बना दिया है।

बेरोज़गारी की भयंकरता की कहानी, कुछ आँकड़ों की ज़ुबानी!

रोज़गारहीनता के मामले में आम जनता कम-से-कम स्वयं को तो कोसना बन्द ही कर दे! बहुत समय नहीं हुआ जब राज्यसभा में कैबिनेट राज्यमन्त्री जितेन्द्र प्रसाद ने माना था कि कुल 4,20,547 पद तो अकेले केन्द्र में ख़ाली पड़े हैं। देश-भर में प्राइमरी-अपर-प्राइमरी अध्यापकों के क़रीब 10 लाख पद, पुलिस विभाग में 5 लाख 49 हज़ार 25 पद, 47 केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में 6 हज़ार पद, 363 राज्य विश्वविद्यालयों में 63 हज़ार पद रिक्त हैं, विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार चलने पर तो देश भर में 5 लाख डॉक्टरों की तुरन्त ज़रूरत है, इन मानकों को पूरा करना तो दूर की कौड़ी है, यदि 36 हज़ार सरकारी अस्पतालों के 2 लाख से ज़्यादा ख़ाली पड़े डॉक्टरों के पदों पर न्युक्तियाँ कर दी जायें तो गनीमत हो। यही नहीं 11,500 मनोचिकित्सकों के पद भी ख़ाली पड़े हैं। केन्द्र और राज्यों के स्तर पर क़रीब बीसियों लाख पद ख़ाली हैं। एक ओर पाखण्डी गोबर-गणेशों को भारत “विश्वगुरू” बनता दिख रहा है, दूसरी ओर यहाँ शिक्षण संस्थानों और अस्पतालों में आधे से अधिक पद तो ख़ाली ही पड़े हैं! भाजपा के दिग्गजों ने कभी एक करोड़ तो कभी दो करोड़ रोज़गार देने के चुनावी जुमले उछाले थे, किन्तु साढ़े तीन साल बीत जाने के बाद आधिकारिक श्रम ब्यूरो के आँकड़ों के मुताबिक़ सिर्फ़ 5 लाख नयी नौकरियों को जोड़ा गया है। वर्ष 2012 में भारत की बेरोज़गारी दर 3.8 प्रतिशत थी जो 2015-16 में 5 प्रतिशत पहुँच गयी। श्रम ब्यूरो सर्वेक्षण 2013-14 और 2015-16 के बीच 37.4 लाख नौकरियों की कमी दर्शाता है। र्इपीडब्ल्यू के एक लेख के मुताबिक़ रोज़गार में कमी 53 लाख तक पहुँच गयी है। केन्द्रीय श्रम मन्त्रालय के आँकड़ों के मुताबिक़ वर्ष 2015 और 2016 में क्रमश: 1.55 लाख और 2.31 लाख (पिछले आठ सालों में सबसे कम) नयी नौकरियाँ सृजित हुईं। 1991 में लागू की गयी उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों ने रोज़गार पर ग्रहण लगाना शुरू कर दिया था, मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल में वर्ष 2009 में 10 लाख नयी नौकरियाँ सृजित हुई थीं, जोकि ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ थीं किन्तु इसके बाद तो हालत बद से बदतर होती चली गयी। सर्वे बताते हैं कि मोदी राज में संगठित-असंगठित क्षेत्र में 2 करोड़ रोज़गार छीने गये हैं। सांख्यिकी मन्त्रालय के आँकड़ों की मानें तो भारत में 15 से 29 बरस के बीच की आयु के 33,33,65,000 युवा हैं। ‘ओईसीडी’ की रिपोर्ट कहती है कि कुल युवाओं की उक्त संख्या में से 30 प्रतिशत न तो पढ़ाई करते हैं और न ही कोई नौकरी। साल 2013 के श्रम और रोज़गार मन्त्रालय के ही एक आँकड़े के अनुसार ग्रामीण और शहरी स्नातक (ग्रेजुएट) युवाओं में क्रमशः 36.4 प्रतिशत और 26.5 प्रतिशत बेरोज़गारी दर अनुमानित है। सरकारी आँकड़ों की सीमा को समझते हुए प्रच्छन्न और अर्ध-बेरोज़गारों को जोड़ दें तो बेरोज़गारों का असल आँकड़ा 25 करोड़ से भी ज़्यादा बैठेगा।

ज़रा एक नज़र उन भर्तियों पर डाल लें, जिन्हें अधर में लटकाकर रखा गया है या फिर पूरा तो कर दिया गया, किन्तु नियुक्ति का कहीं कुछ अता-पता नहीं है। 2016 में क़रीब 15 लाख़ अभ्यार्थियों ने एसएससी-सीजीएल की परीक्षा दी थी। 10,661 का नौकरी के लिए चुनाव हुआ, 5 अगस्त 2017 को नतीजा भी आ गया किन्तु अब तक नियुक्ति नहीं हो रही है। हरियाणा कर्मचारी चयन सेवा आयोग की 2015 में नौकरियाँ निकली थीं, परीक्षा होकर नतीजा आने में दो वर्ष लग गये पर नियुक्ति यहाँ भी नदारद है। हरियाणा में ही 2015 में पीजीटी स्कूल अध्यापक की भर्ती निकली जिसकी परीक्षा तो किसी तरह से हो गयी किन्तु अभी तक साक्षात्कार नहीं हो सका है। इसी प्रकार 2015 में रेलवे में ग़ैर-तकनीकी पदों हेतु 18 हज़ार की भर्ती का विज्ञापन आया था, परीक्षा प्रक्रिया के बीच में ही 4 हज़ार पदों को कम कर दिया गया। इस भर्ती को भी दो साल गुज़र गये किन्तु मेडिकल होना अभी बाक़ी ही है। आरआरबी मुम्बई भर्ती की अगस्त 2015 में परीक्षा हुई और 30 नवम्बर 2017 को परिणाम भी आ गया किन्तु नियुक्ति के लिए अभ्यार्थी अभी तक पलक-पाँवड़े बिछाये हुए हैं। एसएससी सीपीओ का जनवरी 2016 में विज्ञापन आया पर पेपर लीक होने के कारण परीक्षा टाल दी गयी, फिर दोबारा परीक्षा हुई तथा पूरी प्रक्रिया होने के बाद सितम्बर 2017 में परिणाम निकला किन्तु अभी तक नियुक्ति नहीं हुई है। इसी तरह से एसएससी सीएचएसएल की 2015 में प्री की परीक्षा हुई, मुख्य परीक्षा व टाइपिंग टेस्ट में 2 साल गुज़र गये और अन्तिम परिणाम अक्टूबर 2017 को आया, किन्तु नियुक्ति के नाम पर वही ‘ढाक के तीन पात’। इसी प्रकार यूपी लोक सेवा आयोग ने 2013 में राज्य स्तर पर इंजीनियरिंग की परीक्षा के लिए फ़ॉर्म निकाले थे, जैसे-तैसे परीक्षा 2015 में हो गयी किन्तु सरकार बदल गयी पर परीक्षा परिणाम के इन्तज़ार में अभ्यार्थियों की उम्र पाँच बरस बढ़ चुकी है। उत्तराखण्ड में अप्रैल 2015 में सहायक अभियन्ता की परीक्षा हुई किन्तु परीक्षा परिणाम का यहाँ भी कुछ अता-पता नहीं है। दिल्ली सेलेक्शन बोर्ड की 2015 में फार्मास्यूटिकल की भर्ती निकली, जिसकी 2015 में परीक्षा हुई जिसका परिणाम तो आ गया किन्तु नियुक्ति के मामले में परिणाम शून्य। इसी तरह बिहार में बीपीएससी 56-59 का 17 महीने से परीक्षा परिणाम नहीं आया है किन्तु अगली भर्ती यानी बीपीएससी 60-62 की परीक्षा की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है तथा बीपीएससी 63 के फ़ॉर्म भरे जा चुके हैं। झारखण्ड लोकसेवा आयोग के ढंग तो और भी निराले हैं। यहाँ 17 साल में कुल पाँच बार परीक्षा हुई है जिसमें से भी दो बार की परीक्षा रद्द हो गयी! छठी परीक्षा का फ़ॉर्म 2015 में निकला जिसकी तारीख़ तीन बार बढ़ायी गयी; मर-पड़ कर 18 दिसम्बर 2016 को प्री की परीक्षा हुई फिर मेंस की परीक्षा की तारीख़ भी दो बार बढ़ायी गयी किन्तु फिर भी परीक्षा अभी तक नहीं हुई है! 2015 की भर्ती 2018 तक भी पूरी हो जाये तो गनीमत हो। दोस्तो! अटकी पड़ी भर्तियों के ये तो कुछ प्रातिनिधिक उदाहरण ही सामने हैं!

दिल्ली में 2013 में 9.13 लाख बेरोज़गार थे जोकि 2014 में बढ़कर 10.97 लाख हो गये। यही नहीं 2015 में इनकी संख्या 12.22 लाख हो गयी। नोटबन्दी और जीएसटी के बाद के हालात तो सामने ही हैं, जब दिल्ली में ही लाखों लोगों के मुँह से निवाला छीन लिया गया। आम आदमी पार्टी ने 55,000 ख़ाली पदों को तुरन्त भरने और ठेका प्रथा ख़त्म करने की बात की थी, किन्तु रोज़गार से जुड़े तमाम मामलों में यहाँ भी वही ‘ढाक के तीन पात’ हैं। हरियाणा में रोज़गार के हालात की बात करें तो 1966 में यहाँ रोज़गार दफ़्तर में कुल 36,522 लोगों के नाम दर्ज थे जोकि 2009 में बढ़कर 9,60,145 हो गये। यह तो 2017 की ही बात है जब मदवि, रोहतक में चपरासी के मात्र 92 पदों के लिए 22 हज़ार अभ्यार्थियों ने आवेदन किया था। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार स्कूल अध्यापकों के कुल 1 लाख 28 हज़ार 791 पदों में से 52 हज़ार 675 पद रिक्त पड़े हैं। लाखों युवा डिग्रियों का गट्ठर लेकर घूम रहे हैं पर हरियाणा के मुख्यमन्त्री खट्टर के कानों पर जूँ तक नहीं रेंग रही। हरियाणा में लाखों युवाओं को रोज़गार के अवसर मुहैया कराने का वायदा करने वाली भाजपा सरकार अब कभी तो जातिवाद और आरक्षण का धुआँ उड़ा देती है; कभी गाय की पूँछ पकड़ लेती है; कभी शतुरमुर्ग की तरह “सरस्वती नदी” में अपनी गर्दन घुसा लेती है तो कभी गीता के नाम पर पाखण्ड रचने लगती है!

देश की जनता के साथ भारतीय राज्य का छल

भारतीय राज्य और सरकारें देश के संविधान को लेकर ख़ूब लम्बी-चौड़ी बातें करते हैं। संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है कि ‘सभी को समान नागरिक अधिकार’ मिलने चाहिए और अनुच्छेद 21 के अनुसार ‘मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार’ सभी को है। किन्तु ये अधिकार देश की बहुत बड़ी आबादी के असल जीवन से कोसों दूर हैं। क्योंकि न तो देश स्तर पर एक समान शिक्षा-व्यवस्था लागू है तथा न ही देश में करोड़ों लोगों के लिए पक्के रोज़गार की कोई गारण्टी है। हर काम करने योग्य स्त्री-पुरूष को रोज़गार का अधिकार मिलना ही सही मायने में उसका ‘जीने का अधिकार’ है। मनरेगा में सरकार ने पहली बार माना था कि रोज़गार की गारण्टी देना उसकी ज़िम्मेदारी है किन्तु यह योजना भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयी। न केवल ग्रामीण और न केवल 100 दिन बल्कि हरेक के लिए उचित जीवनयापन योग्य पक्के रोज़गार के प्रबन्ध की ज़िम्मेदारी सरकारों की बनती है, यह हमारा जायज़ हक़ है। जिसका सीधा सा कारण यह है कि सरकारी ख़ज़ाने का बहुत बड़ा हिस्सा जनता से आने वाले अप्रत्यक्ष करों से भरता है। यदि सरकारें जनता को शिक्षा-रोज़गार-चिकित्सा जैसी बुनियादी सुविधाएँ तक नहीं दे पाती तो फिर ये हैं ही किसलिए? पूँजीपतियों को तो करोड़ों-अरबों रुपये और सुविधाएँ खैरात में मिल जाते हैं, बैंकों का अरबों-खरबों रुपये धन्नासेठों के द्वारा बिना डकार तक लिये निगल लिया जाता है। दूसरी तरफ़ आम ग़रीब लोगों को व्यवस्था का शिकार बनाकर तबाही-बर्बादी में धकेल दिया जाता है!

क्या किया जाये?

ज़रा दिमाग़ पर ज़ोर डालकर सोचने पर हम समझ सकते हैं कि सभी को रोज़गार देने के लिए तीन चीज़ें चाहिए (1) काम करने योग्य हाथ (2) विकास की सम्भावनाएँ (3) प्राकृतिक संसाधन। क्या हमारे यहाँ इन तीनों चीज़ों की कमी है? अब सवाल सरकारों की नीयत पर उठता है। पूँजीपरस्त और जनविरोधी नीतियों को लागू करने में कांग्रेस-भाजपा से लेकर तमाम रंगों-झण्डों वाले चुनावी दल एकमत हैं, विरोध की नौटंकी केवल विपक्ष में बैठकर ही की जाती है! धर्म, जातिवाद और क्षेत्रवाद की राजनीति करने वाली चुनावी पार्टियाँ केवल अपनी गोटियाँ लाल करने के लिए हमें आपस में बाँटती हैं। ये किसी की सगी नहीं, अन्यथा ये ख़ाली पदों को भरतीं और शिक्षा-रोज़गार-स्वास्थ्य के लिए नीतियाँ बनातीं। असल बात यह है कि मौजूदा तमाम चुनावी पार्टियों का मक़सद ही आम जनता को ठगना है। और आज लुटरों के सभी दलों में से भाजपा ही पूँजीपतियों को अधिक रास आ रही है। यह अनायास ही नहीं है कि अकेली भाजपा को ही कुल कॉर्पोरेट का 2012-13 में 89 प्रतिशत और 2015-16 में 87 प्रतिशत चन्दा प्राप्त हुआ है। अब आप ही सोचिए कि इन्हें आपकी फ़िक्र होगी या फिर अपने आकाओं की? रास भी क्यों न आये क्योंकि भाजपा संघ परिवार का हिस्सा है जोकि अपने ऐतिहासिक पुरखों की तरह फ़ासीवादी राजनीति के तहत आम जन को आपस में बाँटने का काम बड़ी ही शिद्दत से कर रहा है! लेकिन हर अँधेरे दौर की तरह मौजूदा दौर भी बीत जाना निश्चित है, यह आम जन की नियति नहीं है। किन्तु यह भी उतना ही सच है कि यह दौर भी अपने आप नहीं बीतेगा बल्कि जन आन्दोलनों का दबाव ही सत्ताधारियों के घुटने टिका सकता है। इस या उस चुनावी मदारी की पूँछ पकड़ने की बजाय जन आन्दोलनों के द्वारा ही आम जन अपने हक़-अधिकार हासिल कर सकते हैं। सरकारी अन्याय और अन्धेरगर्दी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी होगी। धर्म-जाति-आरक्षण के नाम पर किये जा रहे बँटवारे की राजनीति को समझना होगा। केवल और केवल अपनी एकजुटता के बल पर शिक्षा-स्वास्थ्य-रोज़गार से जुड़े अपने हक़-अधिकार हासिल किये जा सकते हैं। छात्रों-युवाओं और मेहनतकशों को इस बात को गहराई से समझना होगा। ग़ैरज़रूरी मुद्दों पर झगड़ों-दंगों से कोई फ़ायदा नहीं होगा। इन बातों को जितना जल्दी समझ लिया जाये उतना बेहतर होगा वरना आने वाली पीढ़ियों के सामने जवाब देने के लिए हमारे पास शब्द नहीं होंगे!

मज़दूर बिगुल, फ़रवरी 2018

Friday, May 18, 2018

नए संघर्ष का आगाज़ : 18 मई, 2018 को लोकतान्त्रिक जनता दल की नई दिल्ली तालकटोरा स्टेडियम में स्थापना। शरद यादव संरक्षक की भूमिका में।


सामाजिक न्याय, लोकतान्त्रिक व्यवस्था, संविधान और साझी विरासत के लिए संघर्षरत क्रांति कार्यकर्ता एक मंच पर नज़र आएंगे। मंच पर जहाँ एक ओर अम्बेडकर मंडल पक्ष के अधिकांश पढ़े लिखे नौजवान समर्थक होंगे जिनका ध्येय आरएसएस और भाजपा के कुशासन और षड्यंत्र से सामाजिक न्याय और संविधान को बचाना है वहीं दूसरी ओर लोहिया-जेपी के आदर्श पथों पर बढने के लिये कृत-संकल्पित सुलझे हुए अनुभवी नए राजनैतिक सोच के साथ देश को एक साथ पिरो कर नरेंद्र मोदी अमित शाह ब्रांड कॉर्पोरेट गुलामी और लोकतांत्रिक मूल्यों के ह्रास का मुक़ाबला करने वाले संघर्षशील नेतागण भी होंगे !
एक लम्बी राजनैतिक पारी खेलने वाले शरद यादव, आज इस मुहीम को आगे ले जाने के खिवैये के रूप में संरक्षक की भूमिका में होंगे। लोकतान्त्रिक जनता दल की स्थापना पर राजस्थान सरकार के पूर्व मंत्री फतेह सिंह अध्यक्ष, महाराष्ट्र की प्रो सुशीला मोराले, राष्ट्रिय महामंत्री एवं गाज़ियाबाद (यूपी) के डा लाल रत्नाकर, कोषाध्यक्ष होंगे।
दरअसल, 17 मई 1934 को में राजनैतिक पथ-प्रदर्शक लोकनायक जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव एवं लोहिया जी के नेतृत्व में समाजवादी कांग्रेस पार्टी की नींव ये सोच कर रखी गई थी कि देश जब आजाद होगा तब हम तमाम तरह की गैरबराबरी को दूर करेंगे, हर हाथ को रोजगार एवं शोषितों-वंचितों को न्याय दिलवायेंगे। प्रारंभ में यह मुहीम सफल भी हुई, परन्तु लोहिया जी के असमय निधन से एक प्रखर मार्गदर्शक छीन गया, जिसका असर इस क्रांति पर भी पड़ा।
आज देश की परिस्थिति विकट है। रोजगार ख़त्म, आरक्षण समाप्त, उच्च शिक्षा बेचा जा रहा है , रेलवे बेचा जा रहा है, दलितों पर हमला, अल्पसंखयकों पर हमला, मौत का तांडव है। दिल्ली विश्वविद्यालय और सभी विश्वविद्यालयों में, रोहित वेमुला से अब तक लोग घुटन महसूस कर रहें हैं। प्रतिदिन लोकतंत्र और संविधान की धज्जियां उड़ाई जा रही है। वर्तमान सरकार जनता से किये करार को पूरा करने के बजाय संवैधानिक संस्थाओं की अस्मिता और अक्षुण्णता को तार-तार करने में तल्लीन है। ऐसी तानाशाही सरकार जो हमारे लोकतंत्र के लिये खतरनाक साबित हो रही है। हम देश की वर्तमान परिस्थितियों से घोर चिंता में हैं।
माहौल अन्याय से भिड़ने का है। रण का है।
अनायास ही शरद यादव जी के यहाँ भीड़ जुट रही है। जेएनयू, दिल्ली विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र, प्रोफेसर, जो खास तौर से सामाजिक न्याय के पक्ष के हैं - दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक आदि सब शरद यादव जी से इस अन्याय के विरूद्ध राजनैतिक मुक़ाबला करने के लिए नेतृत्व का निवेदन किये।
मोदी और अमित शाह ने तमाम विपक्षियों पर शिकंजा कस दिया है। अकेले शरद जी हैं जो मोदी के विरुद्ध दहाड़ने का हैसियत रखते हैं।
शरद यादव समझ रहें हैं और उन्होंने दो टुक कहा कि वे मंत्री नहीं बनेंगे। देश की साझी विरासत पर आरएसएस/ भाजपा और मोदी सरकार का हमला का मुक़ाबला के लिए वे तैयार हैं।
इधर, नरेंद्र मोदी की सरकार संसद के सबसे वरिष्ठ सदस्यों में एक शरद यादव को अपमानित करने और सबक सीखाने में अपनी सारी ताक़त लगा दी है।
कारण - पूरे विपक्ष में अकेले शरद यादव हैं जो मोदी सरकार के कॉर्पोरेट के सेवार्थ जनविरोधी क़दमों और सभी मापदंड को लांघते हुए आम लोगों पर कहर ढा रहे नीतियों के विरोध में चट्टान की तरह खड़े हो गए हैं। दिल्ली से शुरू और फिर देश के अलग अलग जगहों में सांसद अली अनवर के साथ, सभी विपक्षी पार्टियों के सहयोग से #साझी_विरासत_बचाओ मुहीम के तहत की जा रही कार्यकर्मों की शानदार सफलता से घबरा कर मोदी सरकार ने अब अपनी पूरी ताक़त से इसकी खबरों को दबाने लगे हैं। लेकिन दिक्कत यह है कि जब भी #मोदी_गोदी_मीडिया खबरों को दबाता है, तब सोशल मीडिया उसे फ़ैलाने में काम आता है। खबर छुपाने की कोशिश हुई, लेकिन सन्देश लोगो तक पहुंच गया है।
नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी राष्ट्रिय राजनीति को नई गहराई तक ले गए हैं और अब धरातल में पहुँचा चुके हैं। उनकी नीति है की विपक्ष के नेता की जो कमजोरी हो, उसी के आधार पर उन्हें ब्लैक मेल करके चुप करा दिया जाय। कांग्रेस नेतृत्व भी ऐसे तत्वों के गिरफ्त में है कि विपक्ष की भूमिका अच्छी तरह निभा नहीं पा रही है। सरकारी रोजगार समाप्त, आरक्षण ख़त्म, प्रायवेट रोजगार का अता पता नहीं, छोटे व्यापारियों का कारोबार ख़त्म, किसान आत्महत्या को मजबूर, विश्वविद्यालयों में सीटें ख़त्म, राजस्थान में सभी सरकारी स्कूल बंद किये गए, सीमा पर शहीद होने वाले जवानों की संख्या में लगातार 400% वृद्धि, दुनिया में जब पेट्रोल का दाम सबसे कम तो, भारत में अम्बानी को भरपूर लूटने के लिए पेट्रोल का दाम रोज बढ़ाते बढ़ाते दुनिया में सबसे अधिक कर दिया गया है, सरकारी कर्मचारी को 1% डीए, रेलवे के 4 लाख नौकरी ख़त्म (और इस वजह से भी रोज रेल हादसे जिसमें हज़ारों लोगों की मौत), अल्पसंख्यकों पर हमला, लिंचिंग, सभी संस्थाओं पर आरएसएस का कब्ज़ा, सिर्फ एक जाति का वर्चस्व आदि आदि के विरुद्ध बोलने वाले कौन? तो शरद यादव।
नतीजा शरद यादव मोदी सरकार की आँख की किरकिरी बन चुके हैं।
इसका बदला लेने के लिए मोदी सरकार, शरद यादव को अपमानित करके, उनपर नित्य नए हमले करना, शुरू कर चुका है।
बता दें कि शरद यादव संसद के वरिष्ठतम सदस्य हैं। वे 1974 में पहली बार लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के समय जबलपुर से संयुक्त विपक्ष की ओर से लड़कर लोक सभा के सदस्य बने। वे सात बार लोक सभा सदस्य चुने गए हैं और 2 बार राज्य सभा के सदस्य चुने गए हैं। तीन बार उन्होंने संसद से इस्तीफा दिया है। शरद यादव को सर्वश्रेष्ठ सांसद के पुरष्कार से भी सम्मानित किया गया है।
लेकिन अमित शाह का निशाना शरद यादव राज्य सभा मेम्बरी समाप्त करने के तरफ है। चुकी चुनाव आयोग से लेकर संसद के दोनों सदन के कार्यालय, देश की न्यायपालिका अभी आरएसएस की कब्जे में है तो यह तिकड़म अमित शाह के लिए आसान है।
सभी कानून को ताक पर रखते हुए, और बिना उनके वरिष्टता का ख्याल रखते हुए, शरद यादव को नोटिस दी गयी है की 7 दिन के भीतर बताएँ की क्यों नहीं उनकी सदयस्ता रद्द की जाए? इधर बिना कोई समय दिए चुनाव आयोग ने फैसला सुना दिया है कि 'तीर' निशान नितीश के पास रहेगा। शरद यादव ने नए सिरे से फिर 'तीर' पर दावा किए हैं।
लोहिया जी ने कहा थाः
"जब सड़कें सुनसान हो जायेगी, तो संसद आवारा हो जायेगी"
आज उनका कथन सत्य होता प्रतीत हो रहा है। इसलिए बतौर दिशा निर्देशक लोकपुरूष श्री शरद यादव ने लोहिया, जेपी, बिरसा, अबुल कलाम और अंबेडकर के सपनों को वर्तमान और भविष्य में संरक्षण के लिये एक आंदोलन का आगाज किया है, जो लोकतांत्रिक जनता दल के बैनर तले आगे बढेगा
कल (18 मई 2018) को इस आंदोलन का मुख्य रूप "लोकतांत्रिक जनता दल" का स्थापना सम्मेलन तालकटोरा स्टेडियम में आयोजित हो रहा है। राष्ट्र निर्माण के इस महायज्ञ का हिस्सा बनने के लिये हम आप सभी को आमंत्रित करते हैं।

~ डा सूरज मंडल.

Tuesday, March 6, 2018

संसद की फाइल से : एट्रोसिटी ऑन हॉरिजंस (हरिजनों पर अत्याचार डिबेट में बी पी मण्डल) #BPMandal


बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री, सामाजिक न्याय के प्रणेता, पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष स्व बी पी मंडल कई बार विधान सभा व संसद के लिए चुने गए।
6 अप्रैल,1978 को पार्लियामेंट (लोक सभा) में "Atrocities on Harijans" पर उनका भाषण। ( अब 'हरिजन' के जगह 'दलित' शब्द का प्रयोग होता है।) 24 मार्च 1977 को मोरारजी मंत्रिमंडल ने शपथ ली। बमुश्किल 2 महीने बाद ही 27 मई 1977 को बिहार का बहुचर्चित बेलछी कांड हो गया। 1 दर्जन दलितों का नरसंहार किया गया था। इंदिरा गांधी ने बेलछी का दौरा किया। वे हाथी पर सवार होकर बेलछी पहुंची थीं। इसके बाद भी दलितों पर एट्रोसिटी हुए। इसी के सन्दर्भ में लोक सभा में चर्चा थी।
ध्यान दें, बिहार और केंद्र में जनता पार्टी की सरकार थी और श्री मंडल जनता पार्टी के ही सांसद थे।
श्री बी पी मण्डल (मधेपुरा) :
सभापति महोदय, मैं पहले आपको धन्यवाद दूँ जो आपने मेरा नाम लिया।
सभापति महोदय, मुझे इस बात अफ़सोस होता है जबकि हमारे ट्रेजरी बेंच से होम मिनिस्टर या उनके स्टेट मिनिस्टर लोग बिहार में हरिजन पर होने वाले अत्याचार को छिपाना चाहते हैं। और सभापति जी, यह कोई स्टेट की रिस्पॉन्सिबिलिटी नहीं हो सकती है। अगर अमरीका में नीग्रो पर जुल्म होता है, तो उससे कम जुल्म हमारे यहाँ हरिजन पर नहीं होता है। अमरीका की फेडरल गवर्नमेंट और प्रेसिडेंट यह कहें कि फलाँ स्टेट में जुल्म होता है, हमारी रिस्पॉन्सिबिलिटी नहीं है, यह कभी टेनेबल नहीं हो सकता। इसलिए जो जुल्म हरिजनों पर होता है, जिस धर्म में हमलोग हैं, उस धर्म की बुनियाद इसीपर है। मैं काँग्रेस वालों को क्या दोष दूँ। कोई सरकार रहे, चाहे अँगरेज़ रहे, मुसलमान रहे या हिन्दू पीरियड रहा हो, हज़ारों साल से हरिजनों पर जुल्म इस देश में हो रहे हैं। दुनिया के किसी भी देश से कम जुल्म नहीं, यहाँ सबसे ज्यादा ज़ुल्म होता है। मैं इसका एक उदहारण दूँगा।
दुनिया का कौन सा ऐसा देश है जिसमें खानदान के खानदान, बाबा, बेटा, पोता, परपोता जाति के आधार पर बरसों से पखाना माथे पर ढोए। हमलोग हरिजनों से यह काम करा रहें हैं। आपकी म्युनिसिपैलिटी में भी किसी दूसरी जाति के लोग पखाना नहीं ढोते। यह हमारे समाज की जड़ में है। इसको यह कह देना मखौल है कि काँग्रेस में क्या हुआ, महाराष्ट्र में क्या हुआ, फलाँ जगह क्या हुआ। इस आड में हम नहीं बच सकते। यह काँग्रेस या जनता पार्टी की बात नहीं है। हमारे समाज की जड़-जड़ में, अंग-अंग में और कण-कण में यह है कि जात-पात के द्वेष के आधार पर हमारा समाज बना हुआ है। किसी भी सरकार के लिए यह शर्म की बात है, खासकर जनता पार्टी के लिए अगर हम पुरानी लकीर के फ़क़ीर हों।
हिन्दुस्तान में ऐसी बड़ी क्रांति हुई, रेवोल्यूशन हुआ, जनता पार्टी यहाँ आई, काँग्रेस वालों को हटा कर जनता पार्टी को लाया गया और हम अब भी पुराने लकीर के फ़क़ीर हों, यह कहाँ की बात है? आंध्र में कितना होता है, कर्नाटक में कितना होता है, इससे हमारा कोई भी केस सुधरने वाला नहीं है। यह हमारे लिए शर्म की बात है। आज हमको टोटल रिस्पॉन्सिबिलिटी लेनी चाहिए कि ईस समाज को हम परिवर्तित करेंगे और हरिजनों पर ज़ुल्म नहीं होंगे।
एक माननीय सदस्य : अगर हरिजन ज़ुल्म कर दें हम पर तो ?
श्री बी पी मण्डल : जितना ज़ुल्म हमने हरिजनों पर किया है, अगर कोई हरिजन थोड़ा सा भी ज़ुल्म करता है, बदला लेता है तो वह जस्टीफाईड है। आपने हज़ारों वर्षों तक पुश्तैनी तरीके से ज़ुल्म किया है। अगर एक आध ज़ुल्म हरिजन करता है तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर ज़ुल्म नहीं करता है तो यह आश्चर्य की बात है कि क्यों नहीं करता है ? इसलिए हरिजनों पर ज़ुल्म होता है।
कार्लमार्क्स का जन्म हिंदुस्तान में होता तो सोशलिज्म की डेफिनिशन में वह भी इकनॉमिक आधार नहीं मानते, सोशल एक्सप्लॉयटेशन का आधार मानते। जगजीवन बाबू इकनॉमिक आधार में किसी से कम नहीं, पॉलीटिकल आधार में बहुत ज्यादा, हिंदुस्तान में जीनियस, उन्होंने एक मूर्ति, स्टेचू का उदघाटन किया, अनावरण किया तो उस मूर्ति को गंगाजल से धोया गया। तो इसमें इकनॉमिक आधार नहीं है। हमारे देश में डबल एक्सप्लोइटेशन है और और दुनियाँ के देशों में एक एक्सप्लॉइटेशन है, वह है इकनॉमिक एक्सप्लॉयटेशन। हमारे यहाँ डबल एक्सप्लॉयटेशन है, एक है इकनॉमिक और दूसरी सोशल एक्सप्लॉयटेशन है। हरिजनों पर ज़ुल्म होता है। और भी बहुत सी जातियाँ हैं जो हरिजनों के समकक्ष जातियाँ हैं। हरिजन हरिजन में भी आपस में लड़ाई होती है, लेकिन समाज की बनावट ही ऐसी है कि ऊपर में एक जाति है ब्राह्मण और नीचे में एक जाति है हरिजन और बीच में 3 हज़ार जातियाँ हैं। इनसे पहले देश में 4 वर्ण थे लेकिन गुप्त वंश के बाद डेढ़ हज़ार वर्ष से हज़ारों जातियाँ ले गई। समाज का बनावट ही ऐसा है कि जाति जाति में लड़ाई होती है, लेकिन इसका सूत्रधार हरिजन नहीं है, पिछड़ा वर्ग नहीं है। इसके सूत्रधार वर्ण-व्यस्था को बनाने वाले मनु स्मृति है।
(हंगामा शोर-गुल व्यवधान )
इसलिए हम अपनी सरकार को कहेंगे कि यह आंकड़े न दें कि एक परसेंट हरिजन है और 15 परसेंट हरिजन हैं एक परसेंट भी ज़ुल्म हुआ, यह शर्म की बात है। इस किस्म के आंकड़ें देना ठीक नहीं होगा। इस पर हमें पार्टी लाइन से ऊपर उठना होगा। यह देश के नेशनल इंटरेस्ट का सवाल है, इसको हम पार्टी के दायरे में नहीं लेंगे। हमारे साथी ने जो कहा, इसका मतलब यह है कि 15 परसेंट तक क्राइम जस्टीफाईड होगा हरिजन पर ? जो लोग यह जवाब देते हैं, इन आंकड़ों को बनाने ब्यूरोक्रेट्स हैं, वह सब अपर क्लास के हैं और इन पर जो ज़ुल्म होता है, उसमें इनका हाथ रहता है। वही लोग परदे के पीछे से स्ट्रिंग पुल करते हैं, और जो ज़ुल्म होता है, उसको वे देखते हैं।
हरिजनों की नियुक्तियों के सम्बन्ध में तो रिजर्वेशन दिया गया है, लेकिन प्रोमोशन के मामले में उनके लिए कोई रिजर्वेशन नहीं है। पटना हाई कोर्ट साठ वर्ष से बना हुआ है। वहाँ आज तक एक भी हरिजन, आदिवासी या पिछड़े वर्ग का जज नहीं हुआ है। पिछड़े वर्ग का एक जज वहाँ हुआ, जब मैं मुख्य मंत्री था। मैंने जस्टिस कन्हैया जी को जज बनाया। उसके बाद किसी ने नहीं बनाया।
हरिजनों को जो रिजर्वेशन दिया गया है, वह तो एक मखौल है। टॉप ऑफिसर्स, जो अपर कास्ट के होते हैं, हरिजन और वीकर सेक्शनस के सर्विस रिकार्ड्स को खराब कर देते हैं, जिससे उनका प्रोमोशन नहीं होता है। सरकार कहती है कि प्रोमोशन में रिजर्वेशन का सवाल ही नहीं उठता है, सिर्फ एपॉइंटमेंट में ही रिजर्वेशन है। इसलिए प्रोमोशन में भी रिजर्वेशन का कोटा फिक्स करना होगा।
हमने सुना है कि तमिलनाडु में जब डीएमके सरकार थी, तो उसने पहले के सब सर्विस रिकार्ड्स को कैंसल कर दिया, जो ब्राह्मण टॉप ऑफिसर्स द्वारा लिखे गए थे - वहाँ पर सिर्फ ब्राह्मण और नॉन-ब्राह्मण हैं, जब कि हमारे यहाँ चार पाँच अपर कास्ट्स हैं -, जिसके कारण आज वहाँ पर हरिजन टॉप ऑफिसर्स भी है।
बिहार में हाई कोर्ट जज को तो छोड़ दीजिए, एक भी डिस्ट्रिक्ट जज नहीं है। मुंसिफ हैं, सब-जज तक तो वे जाते हैं, लेकिन हाई कोर्ट तक, जो अपर कास्ट की मोनोपॉली है, उन्हें नहीं जाने दिया जाता है।
मैं कहना चाहता हूँ कि हरिजनों पर ज़ुल्म के मामले को इस तरह से नहीं लेना चाहिए कि 15 परसेंट और 1 परसेंट वगैरह पर्सेंटेज बता दिया, काँग्रेस शासन से तुलना कर दी, और दुनियाँ के सामने एक मखौल हो गया। उनकों इसमें पूरी दिलचस्पी लेनी चाहिए। ऐसा न हो कि "अति संघर्ष करे जो कोई, अनल प्रकट चन्दन से होई"। उनको आप दबाते चले जा रहें हैं, समझते हैं कि कुछ नहीं है। अगर आपका ऐसा ही रवैय्या रहा, तो जैसे की उस दिन श्री रामधन से कहा था, यह मामला यूएनओ में ले जायेंगे, ले ही जाना चाहिए। मैं हरिजन नहीं हूँ। लेकिन मैं समझता हूँ कि यह ह्यूमन राइट्स का सवाल है। अमरीका में निग्रोस की जो हालत है, हमारे यहाँ हरिजनों की हालत उससे भी बदतर है। इसलिए मैं समझता हूँ कि अगर इस सवाल को यूएनओ में ले जाया जाय, तो हमलोगों का भी उसमें समर्थन होगा।
इस बारे में एक कमीशन बैठा देने से काम नहीं चलेगा, अगर सिंसियरिटी ऑफ परपज नहीं है। वही लहँगा, वही साड़ी जो पहले थी, वह अब भी है। उनकी जगह पर आप बैठ गए, बड़ी बड़ी कोठियों में चले गए, बड़ी बड़ी गाड़ियों में बैठते हैं, इमरजेंसी में जो मारपीट हुई थी, वह सब भूल गए, और फिर वही जवाब देने लग गये, मैं इसको अच्छा समझता हूँ।
मैंने एक अमेंडमेंट दिया है, जिसका मतलब है कि पार्लियामेंट के रेस्पांसिबल मेम्बरों की एक कमिटी बनाई जाये, जो इस समस्या पर विचार करे।
श्री चंद्रशेखर सिंह (वाराणसी) :
सभापति महोदय, यह बहुत सीरियस बात है। क्या यहाँ कोई मेम्बर इरेस्पोंसिबल भी है ? माननीय सदस्य ने कहा है कि रेस्पोंसिबल मेमबर्स की एक कमिटी बनाई जाये।
श्री बी पी मण्डल : अगर मैंने रेस्पोंसिबल कह दिया, तो मेरा मतलब यह नहीं था कि बाँकी मेमबर्स इरेस्पोंसिबल हैं। इस तरह समझने का नतीजा है कि हिंदुस्तान में ये ज़ुल्म हो रहें हैं। बात बात पर भिनक जाते हैं।
मैंने यह अमेंडमेंट दिया है :
That in the Motion, ---
add at the end ---
"and recommends that a Committee of MPs be appointed to go into its causes and suggest preventive measures."

मैं फिर से यह कहना चाहता हूँ कि इस रेवोल्यूशन के बाद जनता पार्टी की जो रिस्पांसिबिलिटी है, उसको देखते हुए यह बिलकुल अवांछनीय है कि एक भी हरिजन को जलाया जाये। अगर ऐसी बात होती रहे, तो यह शर्म की बात है।
संकलन -
डा सूरज मण्ड़ल (SSN College, University of Delhi)
डा रतन लाल (Hindu College, University of Delhi).

Sunday, March 4, 2018

SSC पेपर लीक मामला: विरोध में सड़को पर सैकड़ो छात्र, CBI जांच की मांग:

पिछले दो दिनों से लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों ने एसएससी(SSC) का पेपर लीक होने का गंभीर आरोप लगाया है। इसको लेकर छात्रों की मांग है कि इस मामले में सीबीआई जांच होनी चाहिए।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में छात्रों ने यह गंभीर आरोप लगाया है कि एसएससी द्वारा आयोजित सीजीएल 2017 के टियर 2 की परीक्षा के प्रश्न पत्र और अनसर की लीक हो गई थी। इसके बाद ही छात्र सड़कों पर विरोध प्रदर्शन करने में जुटे है। छात्रों ने यह आरोप गंभीर आरोप लगाया है कि एसएससी परीक्षा में घोटाला किया जा रहा है।
इस बीच, ‘बड़े पैमाने पर’ धोखाधड़ी के विरोध में हजारों एसएससी उम्मीदवार सड़कों पर उतर आए। विरोध कर रहें एक छात्र ने कहा कि, ‘यह कम से कम 1,000 करोड़ का घोटाला है, कोई भी हमें सुनने के लिए तैयार नहीं है हम अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठेंगे और इस भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ेगे।’
छात्रों का कहना है कि सीबीआई इसमें निष्पक्ष तरीके से पूरी जांच करें और इसमें शामिल दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। बता दें कि, एसएससी उम्मीदवार दिल्ली में कमीशन के कार्यालय के पास विरोध कर रहे हैं, बड़े पैमाने पर पीड़ित छात्र सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं।
**तुम क्या जानो फर्जी डिग्री वाले चौकीदार, ये स्टूडेंट्स से पूछो कितनी मेहनत लगी है एग्जाम क्लियर करने में यार, दोस्तों में आपके जज्बे को धन्यवाद देता हूँ - लड़ेंगे तो जीतेंगे।
~ Jignesh Mevani.
** #sscscam
SSC CGL 2017 mains paper leaks, India’s youth on streets, jobs being sold openly through private agencies.
For 2 days, hapless youth protest without food and water near Khan Market, Delhi yet a failed Modi Govt arrogates & refuses to listen.
Where are the jobs Modiji?
~ Randeep Singh Surjewala.
** हज़ारों छात्र SSC exam scam की CBI enquiry की माँग कर रहे है। ये मुद्दा हज़ारों छात्रों के भविष्य से जुड़ा है। केंद्र सरकार को छात्रों की माँग तुरंत मान कर CBI enquiry करानी चाहिए।
~ Arvind Kejriwal
**‘दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस तरह से एसएससी की संयुक्त स्नातक स्तर की परीक्षा पत्र लीक हो गया है और अब परीक्षा रद्द कर दी गई है। 30 लाख से अधिक सपने बिखर गए कौन हमें कुछ लाखों लोगों के भविष्य के साथ खेलने की अनुमति देता है?
~ Dr. Kumar Vishwas.
#SSCExamScam #sscexamfixing #SSCScam

Friday, January 5, 2018

यूं ही नहीं कोई #फेकू कहलाता है ! झूठ और फरेब के फैक्ट्री हैं #साहेब और उनके #भक्त।

यूं ही नहीं कोई #फेकू कहलाता है !
झूठ और फरेब के फैक्ट्री हैं #साहेब और उनके #भक्त।
2017 के सबसे जबरदस्त 'फेक न्यूज' (फ़र्ज़ी समाचार या पोस्ट) #साहेब और #भक्तों नाम !
1. प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी की अहमदाबाद से मेहसाना के एक सी प्लेन पर उड़ान को भारत की तरफ से सबसे पहले समुद्री विमान सेवा के रूप में प्रचारित किया गया था। यह दावा प्रधान मंत्री मोदी की निजी वेबसाइट www.narendramodi.in द्वारा किया गया जिसे बाद में भाजपा कार्यकर्ताओं और मुख्यधारा के #गोदी_मीडिया द्वारा जोर-शोर से दोहराया गया था। हालांकि, सच्चाई यह है कि 2010 में अंडमान और निकोबार द्वीपों में जल हंस द्वारा पहली बार सी प्लेन सेवा शुरू गया था।
2. भारत के पहले सीपलेन के दावे की तरह, भारत के पहले मेट्रो दिल्ली मेट्रो के दावा आया। यह दावा एक भाषण में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने दावा किया था। प्रधान मंत्री मोदी ने दावा किया कि पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी 2002 में देश की पहली मेट्रो सेवा पर यात्री थे। हालांकि, भारत में पहली मेट्रो सेवा 1984 में कोलकाता में शुरू हुई थी।
3. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की विधानसभा चुनाव की पूर्व संध्या पर गुजरात के सोमनाथ मंदिर की यात्रा पर विवाद उभरा था, जब दावा किया गया था कि उन्होंने मंदिर में प्रवेश के लिए गैर हिंदुओं के लिए रजिस्टर पर हस्ताक्षर किए थे। मूल रूप से ज़ी गुजरात के एक पत्रकार ने प्रकाशित किया, और यह फ़र्ज़ी 'न्यूज़' मुख्यधारा के मीडिया की सबसे बड़ी कहानी थी। बाद में यह सामने आया कि प्रविष्टि वास्तव में किसी और के द्वारा बनाई गई थी और यह ऐसा प्रतीत करने के लिए गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया था कि राहुल गांधी ने इसे हस्ताक्षर किया था। मूल प्रवेश नियमित मंदिर रजिस्टर में किया गया था।
4. #टाइम्स_नाउ ने प्राइम टाइम पर एक कहानी की, जिसमें उन्होंने दिखाया कि किस तरह गाय का वध के पहले कैसे उस पर 'अत्याचार' किया गया था। कहानी के लिए हैशटैग #CowSlaughterCruelty था, और पशुओँ पर क्रूरता दर्शाया गया था। यह वीडियो में से एक वास्तव में मवेशियों के गर्भाशय मरोड़ के रूप में जाना जाता है, और गर्भवती मवेशियों के इलाज के लिए एक पशु चिकित्सक प्रक्रिया है।
5. उडुपी-चिकीमोगलूर के भाजपा सांसद शोभा करंदलाजे ने आरोप लगाया कि परेश मेस्टा, जो राज्य के उत्तरा कन्नड़ जिले में होनवानावर शहर में झील में मृत पाया गया, की 'जिहादी तत्वों' ने क्रूरता से अत्याचार और हत्या कर दी थी। बाद में जांच के बाद यह झूठ पाया गया।
6. 2012 में फिलिस्तीन में ली गयी एक तस्वीर जिसमें में एक आदमी को अपने पैरों के साथ एक बाइक से बाँध कर घसीटते हुए दिखाई पड़ा, को सोशल मिडिया पाकिस्तान का बताया गया। फोटो के साथ कैप्शन में लिखा था, 'यह एक हिंदू है जो पाकिस्तान में जय श्रीराम का नारा लगा रहा था। इस पोस्ट को इतना साझा करें कि प्रत्येक हिन्दू इसे देखे।'
7. भाजपा सांसद किरण खेर ने सैनिकों के ट्विटर अकाउंट पर एक तस्वीर पोस्ट की, जो बेहद ठंड के मौसम से जूझ रहे एक सैनिक का था। उसने ट्वीट किया कि यह सियाचिन में तैनात भारतीय सेना के सैनिकों की तस्वीर है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा वह तस्वीर दरअसल रूसी सेना के सैनिकों की थी।
8. रतन शारदा, आरएसएस के विचारक और विचारधारा और कई अन्य लोगों ने एक संदेश को ट्वीट किया, जिसमें दावा किया गया था कि ए राजा और कनिमोझी को बरी कर रहे 2 जी घोटाले के फैसला देने वाले न्यायाधीश ओपी सैनी पंजाब के सबसे कम उम्र के विधायक अंगद सैनी के पिता हैं। यह जानकारी गलत साबित हुई क्योंकि दोनों का कोई सम्बन्ध नहीं हैं। शारदा ने बाद में अपनी ट्वीट को हटा दिया।
9. गुरमेहर कौर (लेडी श्री राम कॉलेज की छात्रा, शहीद की बेटी) का वीडियो, जिसमें उसे 'रसके कमर'गाते बताया गया, उसका था ही नहीं। किसी और का था।
10. चंडीगढ़ में आईएएस की बेटी, वर्णिका कुंडू, जिसने हरियाणा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पर 'किडनैप' के प्रयास का आरोप लगाया, किसी और के फोटो को उसका बता कर भाजपा प्रवक्ता साइना आईसी ने उसे बदनाम किया।
11. कन्हैया कुमार के जेएनयू सभा के वीडियो में पाया गया कि भारत विरोधी ऑडियो ऊपर से डाला गया था।
12. संबित पात्रा ने एक फोटोशॉप तस्वीर को भारतीय सैनिकों का कह कर शेयर किया।
13. भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा ने गुजरात दंगों के फोटो को बंगाल का कह कर प्रोटेस्ट आयोजित किया।
14. बाबुल सुप्रियो एक गलत तस्वीर को गुजरात के राजकोट के बस स्टैंड का कह कर शेयर किया।
15. केरल भाजपा नेता के सुदर्शन ने गाय के कत्ले आम का फोटोशॉप तस्वीर फूक पर शेयर किया।
16 .सबसे दिलचस्प था भोजपुरी फिल्म की एक सीन को बंगाल में बसीरहाट में हुए महिला के साथ अभद्रता बता कर शेयर किया गया।
17. पियूष गोयल ने विदेश की एक तस्वीर को अपने मंत्रालय के प्रयास से रौनक एक सड़क को बताया।

Friday, December 15, 2017

सबका मालिक एक : ईवीएम चिप और मोदी के मुख्य मंत्री रहते गुजरात गैस घोटाला।

खुलासा हुआ है कि GSPC घोटाले में शामिल कंपनी और ईवीएम की चिप बनाने वाली कंपनी का मालिक एक ही है।
गुजरात स्टेट पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन (GSPC) वो कंपनी है जो गुजरात समुन्द्र तट में गैस की खोज कर रही थी। 26 जून 2005 को गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रेस कांफेर्रेंस में घोषणा की थी कि इस कंपनी द्वारा खोजी गई गैस का मूल्य 2 लाख करोड़ रुपये होगा। इससे गुजरात को सालों तक बाहर से गैस खरीदने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
इस प्रोजेक्ट को गुजरात सरकार की तरफ से 1500 करोड़ दिए गए। साथ ही समय के साथ साथ सरकारी बैंकों की ओर से 20 हज़ार करोड़ रुपये दिए गए। लेकिन गैस निकलने का जो दावा था वो पूरा नहीं हुआ और पैसे डूब गए।
इस प्रोजेक्ट में मुख्य कंपनी Goe Global Services,India (GGR) है। इस कंपनी का गैस खोजने जैसे कामों में कोई तजुर्बा नहीं है उसके बाद भी गुजरात सरकार ने देश की सरकारी और तजुर्बे वाली कंपनी ONGC को प्रोजेक्ट में ना लेकर GGR को लिया गया। आरोप है कि इस कंपनी को हज़ारों करोड़ का फायदा हुआ और CAG रिपोर्ट के मुताबिक गुजरात GSPC को 20 हज़ार करोड़ का घाटा।
Goe Global Services (India) की मूल कंपनी Goe Global Services Inc. है, जिसका मुख्यालय कैलगरी, कनाडा में है। दिलचस्प बात यह है कि, Goe Global Services Inc. अमेरिका के एक वित्तीय समूह Key Capital Corp. (KCC) की सहायक कंपनी है। भारत में उपयोग किए जाने वाले ईवीएम के लिए माइक्रोचिप बनाने वाली अमेरिकी कंपनी Microchip Inc. और KCC स्वामित्व काफी हद तक एक ही है। मतलब एक ही कंपनियों ने दोनों में निवेश कर रखा है।
Vanguard Group ltd, Blackrock Inc., State Street Corp., Jp Morgan Chase Co., Price Rowe Associates Inc., Barrow Hanley MewHinney, Invesco ltd. ने KCC और ईवीएम चिप बनाने वाली Microchip Inc. दोनों में निवेश किया है। Microchip Inc में निवेश करने वाली 15 कम्पनियाँ हैं जिसमें से 7 वो हैं जिनका निवेश KCC में भी है।
मतलब Microchip Inc और KCC की कंपनी Goe Global Services (India), जिसकों कथित GSPC घोटाले में फायदा पहुंचा, की मालिक एक ही कम्पनियाँ हैं। साथ ही ये भी बता दें, कि इस समय चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त अचल कुमार ज्योति गुजरात में GSPC के चेयरमैन थे। मतलब कथित GSPC घोटाला उनकी नाक के नीचे ही हुआ है।
यानि सबका मालिक एक "जय हो मोदी"।

Wednesday, November 29, 2017

केंद्र सरकार के नौकरियों में आरक्षण के लाभों का वितरण के लिए पिछड़े वर्ग के उप वर्गीकरण के लिए जस्टिस रोहिणी कमीशन:

केंद्र सरकार के नौकरियों में आरक्षण के लाभों का वितरण के लिए पिछड़े वर्ग के उप वर्गीकरण के लिए जस्टिस रोहिणी कमीशन:
पिछड़े वर्ग का आरक्षण विवाद का केंद्र रहा है। दरअसल, संविधान के अनुच्छेद 340,341,342 तथा अनुच्छेद 15(4),के अनुसार विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा मीडिया तथा अन्य संस्थाओं में जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व होना चाहिए। परन्तु, जैसा मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, अक्सर समाज के पिछड़े वर्ग को प्रतिनिधित्व या समान अवसर देने में एक बड़े तबके को "हार्टबर्न" या हृद्दाह अथवा नाख़ुशी होती है। यह उस समय दिखा था जब 7 अगस्त, 1991 को मंडल आयोग की रिपोर्ट को ठन्डे बस्ते से निकाल कर आंशिक रूप से केंद्र सरकार की नौकरियों में लागू करने का वी पी सिंह सरकार ने फैसला किया था। फिर जबरदस्त विरोध का दौर चला। मामला सर्वोच्च न्यायालय में गया, जहाँ दिग्गज वकील राम जेठमलानी ने इसका बचाव किया। लोगों को लग रहा था की सर्वोच्च न्यायालय इसे निरस्त कर देगी। परन्तु सर्वोच्च न्यायालय के फैसले अनुसार पिछड़े वर्ग के आरक्षण में कृमि लेयर लागू किया गया और यह उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने इंदिरा साहनी एवं अन्य बनाम भारत सरकार मामले में 16 नवंबर 1992 को अपने आदेश में व्यवस्था दी थी कि पिछड़े वर्गों को पिछड़ा या अति पिछड़ा के रूप में श्रेणीबद्ध करने में कोई संवैधानिक या कानूनी रोक नहीं है।
इसी प्रावधान के मद्देनज़र, 2 अक्टूबर, 2017 को नरेंद्र मोदी कैबिनेट के अनुशंसा पर संविधान की धारा 340 के अंतर्गत महामहिम राष्ट्रपति ने अन्य पिछड़ा वर्गों के सभी स्तरों के बीच केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण के लाभों व संसाधनों के समान वितरण के तरीके और पर विचार कर अन्य पिछड़ा वर्ग के उप वर्गीकरण के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय रिटायर्ड चीफ जस्टिस जी रोहिणी की अध्यक्षता में एक कमीशन का गठन किया है। इस कमीशन के एक अन्य महत्वपूर्ण सदस्य डा जे के बजाज हैं। आयोग के अध्यक्ष द्वारा प्रभार धारण के बारह हफ्तों की अवधि के भीतर आयोग को अपनी रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा गया है।
संदर्भ की शर्तों के अनुसार आयोग को केंद्रीय सूची के अन्य पिछड़ा वर्गों की व्यापक श्रेणी में शामिल जाति या समुदायों में आरक्षण के लाभों के गैर-लाभकारी वितरण की सीमा को जांचने के लिए कहा गया है तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के उप वर्गीकरण की विधि और तंत्र, मापदंड, मानदंड और पैरामीटर तय करने के लिए भी कहा गया है।
यहाँ अन्य पिछड़े वर्ग के आरक्षण की पृष्ठभूमि पर थोडी जानकारी आवश्यक है।
देश की आज़ादी के बाद यह भी बात उठी कि इन वर्गों के अलावे कई और सामाजिक तपके हैं, जिन्हें भी विशेष अवसरों कि आवश्यकता होगी। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से इन पिछड़े वर्गों का पता लगाने के लिए संविधान के धारा 340 के अनुसार एक आयोग बनाने का प्रावधान किया गया, जिसे पिछड़ा वर्ग आयोग कहा जाना था।
पंडित नेहरू पर इस बात का दबाब बढ़ने पर 29 जनवरी, 1953 को काका कालेलकर की अध्यक्षता में पहले पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया जिसने 30 मार्च 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी।इस रिपोर्ट के अनुसार 2,399 जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया, जिनमें 837 जातियों को अति-पिछड़ा घोषित किया गया। लेकिन इस आयोग के रिपोर्ट कि सबसे दिलचस्प पहलु यह थी कि आयोग के अध्यक्ष ने रिपोर्ट के साथ माननीय राष्ट्रपति को दिए गए अपने पत्र में अपनी ही रिपोर्ट को ख़ारिज कर दी।
इसी पत्र के आधार पर वर्षों तक पिछड़े वर्ग के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। 1977 के लोक सभा चुनाव में नवगठित जनता पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में पिछड़े वर्ग के लिए विशेष उपाय पूरे संजीदगी से उठाया गया और उस चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस को पहली और करारी हार दी।
राष्ट्रपति ने 1 जनवरी, 1979 को पिछड़ा वर्ग आयोग कि गठन कि अधिसूचना जारी की जिसके अध्यक्ष बिहार के पूर्व मुख्य-मंत्री बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल (बी पी मंडल) को बनाया गया। उन्हीं के नाम पर इस आय़ोग को मंडल आयोग के नाम से जाना गया। बी पी मंडल ने 31 दिसंबर,1980 को नई दिल्ली के विज्ञानं भवन में राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह को रिपोर्ट सौंप दी।
मंडल कमीशन रिपोर्ट तो पूरे विज्ञानिक आधार के बनायी गयी की वर्षों बाद सर्वोच्च न्यायलय के सम्पूर्ण बेंच द्वारा भी इसमें किसी तरह कि कमी नहीं निकाली जा सकी। रिपोर्ट 5 वॉल्यूम में है। पहले वॉल्यूम में रिपोर्ट और अनुशंसा है। दुसरे में तमाम जुड़े कागजात का 'अपेंडिक्स' है। तीसरे में आज़ादी और उसके पहले से आरक्षण पर पूरे भारत में न्यायालय में दायर केस और उनके निर्णय की इंडियन लॉ इंस्टिट्यूट द्वारा किया गया विस्तृत अध्यन है। चौथे वॉल्यूम में भारत के 31 राज्यों (उस समय के) में प्रत्येक ज़िले में जातियों का अध्यन है जो प्रतिष्ठित टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज द्वारा किया गया है। पांचवे वॉल्यूम में राज्यवार जातियों की सूची है जिन्हें पिछड़े वर्ग की केंद्रीय सूची में शामिल किया गया है। रिपोर्ट में 1931 में हुए आखिरी जाति आधारित जनगणना के अनुसार भारत के 52% जनसंख्या जिसमें 3,743 अलग अलग जातियों को समाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा या ‘backward’ घोषित किया गया। परन्तु चुकी पहले से अनुसूचित जाति/जनजाति को 22.5% आरक्षण प्राप्त था अतः कई अन्य अनुशंसाओं के साथ साथ उनके लिए 27% आरक्षण का प्रावधान करने के लिए कहा गया, जिसे जोड़ने के बाद आरक्षण का कुल प्रतिशत 49.5 होता था जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय सीलिंग 50% से कम था।
1989 का लोकसभा चुनाव के बाद वी. पी.सिंह प्रधानमंत्री बने और दिसंबर 1980 से ठन्डे बस्ते में पड़ी मंडल आयोग के रिपोर्ट को 7 अगस्त, 1991 को आंशिक रूप से लागू कर दिया। और उधर मंडल कमीशन का भीषण विरोध शुरू हो गया। अतः वास्तव में मंडल कमीशन की सिफारिशों से भारतीय राजनीति और समाज में भूचाल आ गया।
अब हम यह जानते हैं कि पिछड़े वर्ग का उप वर्गीकरण क्या है ? इस बात की मांग उठती रही है कि अन्य पिछड़ी जातियों में जो आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत जातियां हैं उनको आरक्षण का सबसे ज्यादा फायदा मिल रहा है और बिल्कुल हाशिए पर की जातियां आरक्षण के लाभ से वंचित हैं। इस तर्क के अनुसार बिहार में मुंगेरी लाल कमीशन के अनुसार कर्पूरी ठाकुर फार्मूला लागू किया गया जिसके तहत एनेक्सचर-1 और एनेक्सचर- 2 की जातियों का विभाजन कियागया था और आरक्षण के भीतर आरक्षण देने का फैसला किया था। अन्य पिछड़ी जातियों में वर्गीकरण कराने और क्रीमी लेयर के दायरे को छोटा करने का केंद्र सरकार का फैसला इस बात का संकेत है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार के कर्पूरी ठाकुर फार्मूला को केंद्र स्तर पर लागू करना चाहते हैं।
परन्तु इससे कुछ अन्य चिंताएं जुडी हुई है। सबसे अधिक जिज्ञासा दो बिंदुओं पर है। एक, मंडल आयोग लागू होने के बाद पिछड़े वर्ग का केंद्रीय सरकार की नौकरियों में कितना प्रतिनिधित्व है ? और दूसरा आज की परिस्थिति में केंद्र सरकार की नौकरियाँ ही कितनी है ?
इस सन्दर्भ में 26 दिसंबर, 2015 के टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपे एक रिपोर्ट के अनुसार मंडल आयोग की सिफारिश के आंशिक रूप से लागू किये जाने के 20 वर्ष बाद भी केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़े वर्ग की संख्या 12 प्रतिशत से भी कम है। एक आरटीआई से प्राप्त जानकारी के आधार पर कहा गया है कि 1 जनवरी, 2015 तक मण्डल आयोग की रिपोर्ट के कार्यान्वयन के 2 दशक बाद केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की अनुशंसा किये जाने के बाद भी आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों और सांविधिक निकायों के 12 प्रतिशत से कम कर्मचारी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से हैं। इस सम्बन्ध में केंद्र सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय सहित 40 मंत्रालय और सामाजिक न्याय विभाग सहित 48 विभागों ने आरटीआई का जवाब नहीं दिया। फिर भी, उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक केंद्र सरकार में कार्यरत समूह ए, बी, सी और डी श्रेणी के कर्मचारी के 79,483 पदों में से केवल 9,040 कर्मचारी ओबीसी हैं।
एक आरटीआई के अनुसार रोजगार के सन्दर्भ में 74 मंत्रालोयों और विभागों ने सरकार को बताया है कि अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों की 2013 में 92,928 भर्तियां हुई थीं। 2014 में 72,077 भर्तियां हुईं। मगर 2015 में घटकर 8,436 रह गईं। इस तरह नब्बे फीसदी गिरावट आई है।
अतः यह ज़रूरी होगा की सरकार यह जानकरी दें की पिछड़े वर्ग में प्राप्त आरक्षण में किन जातियों का प्रतिनिधित्व कितना है ? साथ ही दावेदारी कितनी है ?
अगर जातियों की दावेदारी और प्राप्त हिस्सा में अन्तर हो तो उप वर्गीकरण से निश्चित तौर पर लाभ होगा। अगर न दावेदारी है, न जातियों को हुए फायदे के आंकड़ें हैं और न ही सरकार को देने के लिए रोजगार है, तो पिछड़े वर्ग के आरक्षण उप वर्गीकरण का कोई मतलब नहीं है और न ही इसका कोई राजनैतिक लाभ नरेंद्र मोदी की सरकार को मिलेगा।

Tuesday, November 7, 2017

नोटबंदी : अब तक का सबसे बड़ा स्कैम.

नोटबंदी :
अब तक का सबसे बड़ा स्कैम,
गरीबों के खून पसीने की कमाई का मोदी सरकार द्वारा लूट।
8 नवम्बर, 2016 को रात आठ बजे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी टेलीविजन पर आए और बोले, "आज से 500 रु एवं 1000 रु के नोट कागज का टुकड़ा है, रद्दी बन गया है।"
दरअसल, नोटबंदी पर मोदी के झूठ के सिलसिला में यह पहला बड़ा झूठ था। क्योंकि घोषणा अनुसार भी जो नोट अमान्य हो गए थे, उन्हें बदला जा सकता था। लोग लाइनों में खड़े होकर नोट बदलते रहे। जैसा की हम सब देखे कि इस घोषणा के लगभग 38 दिनों बाद भी आप इन 500 व 1000 के नोटों से पेट्रोल खरीद सकते थे, डीजल खरीद सकते थे, लेकिन अनाज नहीं खरीद सकते थे, दूध, सब्जी, दाल नहीं खरीद सकते थे।
क्यों? इसलिए की पेट्रोल अम्बानी का है, और चावल, गेंहूँ, दूध, आलू वगैरह आम आदमी के हैं।
परिणाम ?
मोदी सरकार के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक को नोटबंदी से 16,000 करोड़ रुपये का फयदा हुआ, लेकिन नए नोट्स को छपाई में 21,000 करोड़ रुपये का घाटा हुआ।
एक खूबी है इस जुमलेबाज़ में, झूठ भी सच की तरह ही कॉन्फिडेंस से बोलता है।
15 अगस्त के भाषण में मोदी के झूठ सामने आने का सिलसिला जारी। नोटबंदी के बाद 91 लाख नए करदाता जुड़ने की बात निकली गलत।
असफल था। नोटबंदी का उद्देश्य काले धन को सिस्टम से बाहर करना था, अगर वो किसी न किसी रूप में बैंक में आ गया तो इसका मतलब है कि धन किसी तरह से काले धन में बदला गया है और सफेद धन बनकर बैंकिंग सिस्टम में आ गया है। ये इसकी असफलता दर्शाता है।
रिजर्व बैंक ने अपने इतिहास में पहली बार बैलेंसशिट जारी करने से हाथ खीच लिया है. ऐसा करने से नोटबंदी के प्रभावों का देश को पता तक नहीं चलेगा. आरबीआई के इस भगोड़े स्टैंड को अमित कुमार 2जी और कोल ब्लॉक घोटाला से भी बड़ा घोटाला बता रहे हैं जिसमें मोदी सरकार की गर्दन फंसी हुई है।
2G, कोल ब्लॉक आवंटन में तो सीएजी ने 1.75 लाख करोड़ और 2.8 लाख करोड़ के घोटाले का आभासी तथा सनसनीखेज आंकड़ा सनसनी पैदा करने के लिए दिया था। लेकिन इसमें तो सीधा-सीधा कैश का उटलफेर हुआ है। गौर कीजिए–
* आरबीआई स्पष्ट रूप से नहीं बता रहा कितने मूल्य के नए नोट जारी किये?
* कितने मूल्य के हज़ार और पांच सौ के पुराने नोट रद्द किए गए?
* कितने पुराने नोट वापस नहीं आये?
* कितने जाली नोट चलन में थे, कितने पकड़े गए?
* नोटबंदी का मौद्रिक रूप में क्या लाभ हुए?
घोटाले तीन तरह से हुए हैं — नए नोट छापकर बड़ी मात्रा में पहले ही आकाओं को दे दिए गए। इसके समायोजन के लिए भरसक प्रयास किया गया कि लोगों को पुराने नोट बदलने के लिए हतोत्साहित किया गया। जिससे लोग पुराने नोट न जमा करें। दूसरा तरीका यह था कि आकाओं के नकली नोट बदले गये। तीसरा उनके काले धन के रूप में रहे पुराने नोट को एकबारगी में नए नोट से बदल दिए गये। इस तरह तीन-चार लाख करोड़ का महाघोटाला हुआ। यह आकंड़े बढ़ भी सकते हैं। अगर सुप्रीम कोर्ट में अपनी निष्पक्षता के विख्यात पूर्व मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में एक सर्वदलीय कमेटी से इसकी पूरी पारदर्शिता से जांच हो तो यह वैश्विक इतिहास का सबसे बड़ा महाघोटाला साबित होगा। यह अमरीका के इशारे पर किया गया, इसके भी सबूत हैं।
कंटपा ने बाहुबली को क्यो मारा ये तो आप को पता चल जाएगा , लेकिन नोटबंदी से क्या लाभ हुआ , ये हास्यपद और गोपनीय ही रहेगा ! मीडिया के पिछले जुमलो का स्मरण करिए , ये देखिये नक्सलियों की नोटबंदी से कमर टूटी , नोट बर्बाद हो गए , पाकिस्तान को मुह की पड़ी , आंतकवादी की कमी , इससे तो ज्यादा हास्यपद मीडिया दाऊद इब्राहिम की नोटबंदी से कमर टूटने , दहसत मे होने की ख़बर देता है !
सवालों से घिरा मोदी सरकार।
नोटबंदी के मोदी जी ने तीन फ़ायदे बताए थे
1. नक़ली नोट ख़त्म
2. काला धन रद्दी का टुकड़ा हो जाएगा
3. आतंकवाद और उग्रवाद की कमर टूट जाएगी।
मोदी जी ख़ुद बता दें कि देश को लाइन में क्यों खड़ा किया?
इस 3 फ़रवरी को कोलकाता में एक क़त्लेआम-सा हुआ। इस दिन आनंदबाजार पत्रिका समूह के 700 स्टाफ़ से इस्तीफ़ा लिखवा लिया गया। उनमें से ज़्यादातर पत्रकार और कर्मी वैसे हैं, जो उम्र के इस पड़ाव पर नई नौकरी शायद ही खोज पाएँ। ऑफ़िस में लोग रो रहे थे। चीख़ रहे थे।
कंपनी कह रही है नोटबंदी के कारण करना पड़ा। आनंदबाजार किसी दौर में देश का सबसे बड़ा अखबार था। जागरण और भास्कर से भी बड़ा। टेलीग्राफ़ भी इनका ही है।
नोटबंदी से जब देश को लाभ हुआ है तो फिर उस लाभ का कुछ हिस्सा किसानों को देने में मोदी सरकार को क्या दिक़्क़त है...???
दरअसल नोटबंदी से क्या दिक्कत है, पढ़िए :
Ø बंद नोटों का 99 प्रतिशत बैंकों में जमा होना इस बात का प्रमाण है कि नोटों की शक्ल में कालाधन था ही नहीं और यदि था तो भी केवल उस 6 प्रतिशत का भी एक छोटा भाग क्योंकि भारत की जी0डी0पी0 में नोटों का हिस्सा केवल 6 प्रतिशत है। जबकि नोटबंदी का सबसे बड़ा कारण कालाधन वापस लाना बताया गया था जो सरासर गलत साबित हुआ।
Ø यह फैसला न तो भारतीय अर्थव्यवस्था के पक्ष में था न ही आम जनता के पक्ष में क्योंकि भारत में 93 प्रतिशत कामगार असंगठित क्षेत्र से संबद्ध है जो नकद पर निर्भर करते हैं यानि हमारी अर्थव्यवस्था में 78 प्रतिशत विनिमय नकद में किया जाता है जो एकाएक ठप हो गया। जिसके परिणाम स्वरूप हजारों छोटे एवं मंझोले उद्योग धंधे, कल-कारखाने बंद हो गये एवं बेरोजगारी में बेतहाशा वृद्धि हुई।
Ø इस प्रकार पुराने नोटों को बदलने संबंधी नियमों को 40 दिन में 60 बार बदला गया जो दर्शाता है कि बिना सोचे समझे लिया गया फैसला था जिससे आम लोगों की परेशानियां बढ़ी।
Ø यह सरकार की असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा का प्रमाण है कि बैंकों से अपना पैसा पाने के लिए लोगों को लंबी कतारों में लगना पड़ा, सैंकड़ों लोग मरे, कई लोगों ने आत्महत्याएं कर ली-इसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह किसी अन्य देश में हुआ होता तो प्रधानमंत्री अपने पद पर नहीं होते।
Ø नोटबंदी से कालाधन तो वापस आया नहीं बल्कि उल्टे नोटों की छपाई पर करीब 12 हजार करोड़ रूपये जनता की गाढ़ी कमाई के पैसे बर्बाद किये गये।
Ø नोटबंदी के कारण पिछले छः तिमाहियों में जी0डी0पी0 विकास दर 9.2 प्रतिशत से गिरकर 5.7 प्रतिशत पर आ गया जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक साबित हुआ।
Ø नोटबंदी ने किसानों की कमर तोड़ दी, खाद्य-बीज एवं खेतों की जुताई आदि के लिए नकद का ही प्रचलन है लेकिन नोटबंदी के कारण किसान बैंकों के चक्कर काटने लगे जिससे भारतीय कृषक और कृषि पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ा।
Ø बड़े पैमाने पर अस्पतालों एवं नर्सींेग होम में नकदी के अभाव में मरीजों का ईलाज प्रभावित हुआ।
Ø नोटबंदी के एक वर्ष पूरा होने पर जनता सरकार से पूछना चाहती है कि कालेधन, आतंकी-धन प्रवाह कहां गया? और इस पूरी प्रक्रिया से देश और अवाम को क्या लाभ हुआ है इसके बारे में प्रधानमंत्री एवं वित्तमंत्री को जवाब देना होगा।
नोटबंदी एक धोखा है, घोटाला है, देशद्रोह है।
आईये 8 नवम्बर को इसका विरोध कर मोदी सरकार को यह जनता का सन्देश दें की इस धोखा का परिणाम मोदी को अगले चुनाव में भगतना पड़ेगा।
#मोदी_भगाओ_देश_बचाओ

Sunday, August 6, 2017

पनगढ़िया " 'नीता' आयोग" क्यों छोड़ा ?


जो नीति आयोग ने जेल, सरकारी अस्पताल, स्कूल के साथ-साथ नीति आयोग को भी बेचने का प्रस्ताव दिया, जिसके उपाध्यक्ष अरविन्द पनगड़िया हैं, और लग रहा था की खुद ही खरीदे लेंगें नीति आयोग को, उन्होंने इस्तीफा दे दिया है।
कारण उन्हें परमानेंट नौकरी चाहिए था, जहाँ पेंशन की भी ज़रूरी नहीं पड़े। इस तरह, 65 साल की उम्र में कोलंबिया यूनिवर्सिटी में जिस तरह की नौकरी मिल रही है वो मोदी और नीति आयोग के प्रस्तावित उपायों से भारत में तो अब कभी नहीं मिलेगी।
नौकरी स्थायी है।
अब ये देशद्रोही और गद्दार द्वारा सुधार के नाम पर कम कर्मचारी भर्ती करने, जल्दी रिटायर करने, पेंशन ख़त्म करने और आसानी से निकाल देने की नीतियां बनाते रहे हैं, ये कॉर्पोरेट भांड घूम-घूम कर, लिख-लिख कर इस व्यवस्था का प्रचार करते हैं और अब 65 साल की उम्र में भी अपने लिए स्थायित्व का जुगाड़ कर रहे होते हैं।
लग रहा था कि पनगढ़िया तथाकथित राष्ट्र निर्माण के नाम पर देश बेचने में लगे प्रधानमंत्री मोदी को छोड़ कर नहीं जाएंगे। पर नेहरूवादी योजना आयोग को ख़त्म कर नीति आयोग के प्रथम उपाध्यक्ष बने राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया भीतर से निकले नेहरूवादी। बजाय अपनी योग्यता का बायोडेटा लेकर मार्केट में नौकरी खोजने के उन्होंने नौकरी में सुरक्षा को महत्व दिया है।
अपने लिए तो नियम अलग होंगें हीं।
इन गद्दारों और नक़ली देशभक्त से सावधान रहिये जो भारत में आकर ये लाखों शिक्षकों से ठेके पर नौकरी करवाने की वकालत करते हैं और अपने लिए अमेरिका में स्थाई नौकरी बचाने के लिए पत्राचार करते हैं।
निवेदन है की देश को और #साझा_विरासत बचाने वाले हमारे कृतसंकल्प साथी, देश के गद्दारों की बाज़ारवादी नीतियों का विरोध करें।

Tuesday, July 18, 2017

Diluting Mandal By S. S. Gill

From : THE HINDU.
Online edition of India's National Newspaper
Tuesday, Jun 24, 2003
Diluting Mandal
By S. S. Gill, IAS (Secretary of Mandal Commission for Backward Classes.)


The move to extend reservation to the poor among the forward castes not only goes against the basic concept of affirmative action, it also violates the spirit of the Constitution.


IT WAS in December 1980 that members of the Mandal Commission, and I as its Secretary, trooped into the office of Zail Singh, then Home Minister, and presented our report to him. As we came out of the secretariat, B. P. Mandal, our chairman, told me, " I know how much labour has gone into the writing of this report. But let me tell you that today we have performed its immersion (visarjan) ceremony". And truly, for the next 10 years, the report lay in the Home Ministry's dusty vaults.

Then all of a sudden, V. P. Singh, as Prime Minister, opened the lid in 1990, and the Mandal Commission report became the single-most heated topic of controversy and discussion. There was total confusion in the national political arena and Mr. Singh was accused of indulging in the worst form of opportunism. No major political party supported the move. In fact, the BJP saw it as a serious threat to its `upper' caste constituency, and L. K. Advani, now Deputy Prime Minister, marched towards Ayodhya in his chariot to uphold `dharma'.

Those were days of high tension and emotions. The polity was in turmoil. Old power equations were dissolving and new ones emerging. The logic of numbers suddenly brought OBC leaders into prominence and every political party turned a votary of Mandal. Never before had the Indian political scene undergone the sort of sea change it did during the decade following the implementation of the Mandal report.

On the face of it, the radical change in the political landscape of the country marks the setting right of ancient historical wrongs. Or does it? In fact, to some extent, the Mandal Commission report was `demandalised' during the very process of its implementation. Of the dozen or so recommendations, only one pertaining to reservation was picked up, as it had the highest visibility and attracted immediate attention. More far-reaching recommendations regarding structural changes in the land-tenurial system, and institutional reforms for the educational and economic uplift of the OBCs were not even noticed. The attention thus got focussed on the fruits rather than the roots and branches of the tree of affirmative action.

Whereas the objective of the Mandal Commission report was the creation of a more egalitarian society, this selective and populist approach introduced an element of inequality among the OBCs themselves. If equal attention had been paid to strengthening the roots and branches of the tree of social justice and the base of the deprived sections of the society strengthened by undertaking structural reforms, it would have resulted in fortifying them from within instead of perennially making them dependant on the crutch of reservation.

And who were the main beneficiaries of this provision? Only the better off among the OBCs — the so-called creamy layer — who already had access to good educational facilities and could outperform their lesser privileged peers at competitive examinations within the reserved quota. This deepened the divide among the OBCs, as those who were already at the top of their community cornered the plum jobs and those at the bottom were left further behind.

At a deeper level, mandalisation was supposed to empower the deprived by giving them access to political power. This has happened in a limited way, as evidenced by the the manner in which every political party is wooing the OBCs by promising them all sorts of concessions. But even this process of empowerment is seriously flawed. Most of the positions of power have been cornered only by a couple of backward castes, and the really deprived communities have been left high and dry. Moreover, instead of identifying themselves with their impoverished communities, the OBC leaders who have risen to the top have adopted the lifestyle and value system of the `upper' castes against whom they had agitated all along. One would have expected these leaders to introduce a new political culture of austerity and self-denial, and adopt a lifestyle which projects them as role-models for the deprived members of their own community. But just the reverse has happened. The dispossessed have the highest stake in democracy, as it is their only hope. But instead of strengthening the Panchayati Raj institutions at the grassroots, the OBC and Dalit leaders are propagating a feudal culture and exclusivist tendencies. Their entire crusade was against the divisive caste system, and they should have tried to build inter-community bridges to eliminate caste hierarchies. But they have created vested interests in narrow caste loyalties to serve personal ends.

It was also hoped that both the Dalits and the OBCs, being victims of the same caste system, would join hands and form a powerful alliance to secure political power and wield it to improve the lot of their historically disadvantaged castes. But the pursuit of narrower personal ends has produced just the opposite result. There exits a lot of antagonism and ill will between these two sections.

But the latest episode in the `demandalisation' drama is being enacted now with the farcical proposals to reserve seats for the economically weaker sections among the `upper' castes. Whereas the Rajasthan Chief Minister wants reservation for the poor among the forward castes, the BJP has upstaged him by not only proposing to constitute a national commission for this purpose, but also by promising to extend them to Muslims. This move not only goes against the basic concept of affirmative action, it also violates the spirit of the Constitution.

Reservation for the Scheduled Castes, the Scheduled Tribes and the OBCs has been made under Article 15 (4) of the Constitution which empowers the state to make any "special provision for the advancement of any socially and educationally backward classes of citizens or for the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes". Now, social backwardness is a structural disability linked to one's caste, and does not vary from generation to generation. Even a rich Dalit suffers from social stigma. But economic backwardness within the same family may vary from time to time. There are any number of rags-to-riches and riches-to-rags stories. Unlike social and educational backwardness, there is no criterion to determine economic backwardness, which is, in any case, a relative term. More importantly, the Constitution does not provide for reservation of jobs for the economically backward. After all, billions of rupees under the Five Year Plans are spent every year for the eradication of poverty and the benefits accrue to all the poor people, including those among the `upper' castes. Of course, Article 16 (4) empowers the State to make job reservation for "any backward class citizens... not adequately represented in the services under the state". But is it anyone's case that the forward castes as a whole are not adequately represented in the services?

But such are the compulsions of blind pursuit of power sans principles that politicians pay scant attention to facts, law or the Constitution, or the social implications of their tactics, if it serves their immediate goal. Look at the latest Government ploy of adding new castes to the Central OBC lists of eight States. As the percentage of people living below poverty line has halved since the implementation of the Mandal report, it should have led to the progressive exclusion of the beneficiary castes from the OBC list. But, defying all logic, the Government has repeatedly enlarged this list, mostly on the eve of elections.

Sunday, May 28, 2017

महाराजा (एयर इण्डिया) की बिक्री : देश को अरबों का चूना !


3 साल की लूट बनाम 60 साल की!!
हम जान चुके हैं की आर्थिक दृष्टिकोण से मनमोहन सिंह की काँग्रेस सरकार और मोदी की भाजपा सरकार में कोई फ़र्क़ नहीं है।
अंतर सिर्फ इतना की देश और जनसाधारण के हितों से खिलवाड़ करने में नरेंद्र मोदी की सरकार अधिक घिनौनी, घृणित, घटिया और घातक है।
यह भी बड़ी सच्चाई है कि देश के अधिकतर सार्वजानिक प्रतिष्ठानों को बेचने के लिए उन्हें घाटे में लाना ज़रूरी होता है। घाटे में लाने वाले अधिकतर अफसर "मेरिटधारी" होते हैं, जो आरक्षण से नहीं आते और उनमें से अधिकांश पर भ्रष्टाचार के आरोप होते जो कभी साबित नहीं होते। जब इन्हें विनिवेश के नाम पर औने- पौने दाम में किसी कॉर्पोरेट को बेचा जाता है तो इन प्रतिष्ठानों पर हुए खर्च का एक छोटा हिस्सा भी सरकार को नहीं मिलता और तब टैक्सपेयर्स के पैसों को लूटने की बात कोई नहीं करता।
एयर इंडिया की स्थापना 1932 में जेआर डी टाटा ने टाटा एयरलाइंस के नाम से की थी। आज एयर इंडिया भारत की ध्वज वाहक एयरलाइन है। यह इंडिगो, जेट एयरवेज और स्पाइसजेट के बाद यात्रियों की दृष्टि से भारत की चौथी सबसे बड़ी घरेलू एयरलाइन है, मार्च 2017 तक 13% की बाजार हिस्सेदारी है। यह एयर इंडिया लिमिटेड, भारत सरकार की एक उद्यम है, और एयरबस और बोइंग विमान के एक बेड़े का संचालन करता है जिसमें 90 घरेलू और अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों की सेवा है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, भारत में नियमित व्यावसायिक सेवा बहाल की गई और टाटा एयरलाइंस 29 जनवरी 1946 को एयर इंडिया नाम के तहत एक सार्वजनिक लिमिटेड कंपनी बन गई। 1947 में भारतीय स्वतंत्रता के बाद, 1948 में भारत सरकार द्वारा 49% एयरलाइंस का अधिग्रहण किया गया था। 1953 में, भारत सरकार ने एयर कॉरपोरेशन अधिनियम पारित किया और कैरियर में बहुमत हिस्सेदारी खरीद ली। कंपनी का नाम बदलकर एयर इंडिया इंटरनेशनल लिमिटेड रखा गया था और घरेलू सेवाएं पुनर्रचना के एक हिस्से के रूप में इंडियन एयरलाइंस को स्थानांतरित कर दी गई।
2000-01 में, एयर इंडिया के निजीकरण और 2006 से बाद के प्रयासों के लिए प्रयास किए गए, पर 2006 में NCP के मंत्री प्रफुल पटेल द्वारा इंडियन एयरलाइंस से किए गए विलय के बाद एयर इण्डिया को बड़ा नुकसान हुआ।
2006-07 में एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस के लिए संयुक्त नुकसान 7.7 बिलियन (120 मिलियन अमेरिकी डालर) थे और विलय के बाद यह मार्च 2009 तक 72 अरब (यूएस $ 1.1 बिलियन) तक पहुंच गया।
मनमोहन सिंह की सरकार और मंत्री प्रफुल पटेल के कार्यकाल में ही मार्च 2012 में एयर इंडिया में 32 हज़ार करोड़ रूपया का पंप किया। कल्पना कीजिये किसको कितनी कमीशन मिली होगी।
2013 में तत्कालीन नागर विमानन मंत्री अजित सिंह ने कहा था कि निजीकरण इस एयरलाइन के अस्तित्व की कुंजी है।परन्तु उस समय भाजपा और सीपीआई (एम) के नेतृत्व में विपक्ष ने सरकार के इस फैसले का पुरजोर विरोध किया और इसके विरुद्ध अरुण जेटली ने धुआंधार भाषण दिया।
11 जुलाई 2014 को एयर इंडिया स्टार अलायंस का 27 वां सदस्य बन गया। अगस्त 2015 में, यह कार्यशील पूंजी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बाह्य वाणिज्यिक उधार में $ 300 मिलियन जुटाने के लिए सिटी बैंक और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। वित्त वर्ष 2014-15 के लिए वित्त वर्ष 2014-15 की तुलना में वित्त वर्ष 2014-15 की तुलना में वित्त वर्ष 2014-15 की तुलना में इसकी राजस्व, संचालन हानि और शुद्ध हानि ₹ 198 बिलियन (यूएस $ 3.1 बिलियन), ₹ 2.171 बिलियन (34 मिलियन अमेरिकी डॉलर) और ₹ 5.41 बिलियन (यूएस $ 84 मिलियन) थी, जो कि ₹ 147 बिलियन (यूएस $ 2.3 बिलियन), ₹ 5.138 बिलियन (यूएस $ 80 मिलियन) और ₹ 7.55 बिलियन (यूएस $ 120 मिलियन) है।
सरकारी नागर विमान सेवा उपक्रम एयर इंडिया ने पिछले वित्त वर्ष में 105 करोड़ रुपये का परिचालन लाभ का दावा किया था। ईंधन खर्च में कमी और यात्री संख्या में बढोतरी के साथ कंपनी ने दस साल में पहली बार परिचालन लाभ दिखाया। वित्तीय स्थिति सुधारने में लगी इस एयरलाइन को वर्ष 2014-15 में परिचालन कार्य में 2,636 करोड़ रुपये की हानि हुई थी। इसी दौरान इसकी आय घटकर 20,526 करोड़ रुपये रही, जो एक साल पहले 20,613 करोड़ रुपये थी. 2007 के बाद कंपनी पहली बार परिचालन लाभ में आई।
उधर, भारत के नियंत्रण एवं महालेखापरीक्षक (कैग) ने कहा था कि एयर इंडिया को पिछले वित्त वर्ष में परिचालन मुनाफे के बजाय वास्तव में 321.4 करोड़ रुपये का परिचालन घाटा हुआ। एयरलाइन ने इससे पहले वर्ष के दौरान परिचालन मुनाफा होने की जानकारी दी थी. कैग ने हालांकि, यह स्पष्ट किया कि इसमें आंकड़ों का कोई हेरफेर नहीं हुआ है बल्कि एयरलाइन ने जो आंकड़े रिपोर्ट किये हैं वह वास्तव में ‘घाटे को कम करके बताया गया है।
’इंडिगो और जेट एयरवेज के 15.4% बाजार हिस्सेदारी के बाद फरवरी 2016 तक, एयर इंडिया भारत में तीसरी सबसे बड़ी वायु वाहक है। .
अब, जेटली जी कहते हैं कि, "एयर इंडिया पर 50,000 करोड़ रुपये का कर्ज है, जबकि उसके विमानों का मूल्यांकन 20,000-25,000 करोड़ रुपये होगा. नागरिक विमानन मंत्रालय सभी संभावनाएं तलाश रहा है।" नागरिक विमानन राज्यमंत्री जयंत सिन्हा ने पहले कहा था कि एयर इंडिया के कर्जो को कम करने की जरूरत है तथा इसमें वित्तीय बदलाव के लिए बैलेंस शीट के पुर्नगठन की जरूरत है। सिन्हा ने कहा था, "एयर इंडिया में कॉरपोरेट प्रशासन और बेहतर प्रबंधन को लागू करने की भी जरूरत है।इसके अलावा यह भी देखा जाना चाहिए कि एयर इंडिया की गैर-महत्वपूर्ण संपत्तियों का किस प्रकार से सर्वश्रेष्ठ उपयोग किया जा सकता है।"
दरअसल, यह लूट है। और इसे रोकना है।

Saturday, May 27, 2017

#EC का मिशन इम्पॉसिबल : #EVM हैकिंगः #NCP का चैलेंज लेने मतलब :

3 जून को #EVM स्वयंवर है
सभी दल आमंत्रित है ,
शर्त है #दुल्हन को बिना छुए माँ बनाना है।
देश में लोकतंत्र के अधिकृत अभिरक्षक #ECI द्वारा इस तरह का ड्रामा ठीक नहीं नहीं।
कांग्रेस ने कहा है की चुनौती देने वालों को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के मदरबोर्ड सहित प्रमुख पार्ट पुर्जे तक पहुंच की अनुमति दी जानी चाहिए।
हम सभी जानते हैं कि हमारे फोन का ब्लूटूथ ऑन नहीं हो तो उस तक भी कोई पहुँच नहीं सकता, फिर यह तो #ईवीएम मशीन है।
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) से छेड़छाड़ करके दिखाने के चुनाव आयोग के चैलेंज को एनसीपी (NCP) को छोड़कर किसी भी राजनीतिक दल ने आवेदन नहीं किया है। चुनाव आयोग की ओर से राजनीतिक दलों को शुक्रवार शाम पांच बजे तक एक्सपर्ट के नाम देने का समय दिया था।
चुनाव आयोग के प्रवक्ता ने बताया कि एनसीपी चुनाव आयोग की ईवीएम चुनौती में भाग लेने की इच्छुक एक मात्र पार्टी है और इसके अलावा किसी राजनीतिक दल ने आवेदन नहीं किया है। वहीं चुनाव आयोग ने गुरुवार देर शाम को बताया था कि अब तक किसी पार्टी ने किसी जानकार को ईवीएम चुनौती स्वीकार करने के लिए नामित नहीं किया है। बीती 20 मई को आयोग ने घोषणा की थी कि 3 जून से ईवीएम चैलेंज हो रहा है जिसके लिए 26 मई तक पार्टियां तान जानकारों को नामित कर सकती हैं।



प्रश्न यह है कि क्या एनसीपी वाक़ई में हैकिंग के लिए सीरियस है? या एनसीपी चुनाव आयोग के लिए "अप्रूवर" बनने वाली है?
इसका जवाब श्री शरद पवार जी हैं।
पवार साहब राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार हैं। अगर एनसीपी EVM हैक करने की ताक़त रखता है तो बीजेपी पवार साहब को राष्ट्रपति मानते हुए हैकिंग करने से एनसीपी को रोकेगी। अगर एनसीपी यह कहने के लिए भी कि EVM हैक नहीं हो सकता, यह चैलेंज स्वीकार की है, तो भी बीजेपी पवार साहेब को राष्ट्रपति पद के लिए दी जाने वाली प्रस्ताव पर सहानुभूति पूर्वक विचार करेगी।
दरअसल, शरद पवार जी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से भारत के किसी नेता से अधिक नजदीक हैं और यह मोदी जानते हैं।

Friday, May 26, 2017

मोदी सरकार के तीन साल : जनता का खून जला है, खून खौलेगा तो ?

मोदी सरकार के तीन साल असल में मनमोहन सरकार पार्ट 3 है।
एक अहम् फ़र्क़ ज़रूर है, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता पर मोदी सरकार का हमला अब कोई छुप छुपा कर नहीं, खुले आम है।
पर मैं आर्थिक नीति की बात कर रहा हूँ।
कोई माई का लाल एक फ़र्क़ दिखा दे, मनमोहन और मोदी के आर्थिक नीतियों में। डिग्री का फ़र्क़ ज़रूर है। अब आम जनता के हितों पर कुठाराघात अधिक पैने तरीके से है, और अंबानी अडानी के दौलत को दिन दुगुना रात चौगुना 56 इंच का सीना ठोक कर किया जा रहा है। जनाब वज़ीरे आला देश विदेश परदेश सब जगह अम्बानी अडानी को साथ लेकर घूमें। पीएम कम और एजेंट ज्यादा थे। बांग्लादेश को करोड़ों डॉलर इसलिए दिए कि वे अडानी के पॉवर प्रोजेक्ट का कैश पेमेंट करें।
सरदार जी इतने बेशर्म नहीं थे।
आधार कार्ड पर मोदी ने सुरक्षा लेकर गंभीर सवाल उठाये, और अब आधार कार्ड लेकर नाँच रहें हैं। मनमोहन सिंह और आधार का मजाक उड़ाते मोदी का वीडियो ज़रूर देखें। अब मोदी सरकार ने हर योजना के लिये आधार जरूरी कर दिया है। रोज आधार के डाटा को कॉर्पोरेट को लीक कर रहें हैं।
2005 में 500 - 1000 रुपये नोट बंद करने का मनमोहन सरकार के प्रस्ताव का भाजपा ने विरोध किया, और फिर अब #नोटबंदी का खेल खेला। उसमें भी अम्बानी को फायदा। '#जियो' सिम पर आधार कार्ड मांगना और फिर पुराने नोट को बदलने के लिए आधार कार्ड का फोटोकॉपी। काफी छुटभैये जैसे काम करके अम्बानी को फायदा पहुँचाया और दावा की काला धन को समाप्त कर रहें हैं, अलगावादियों और आतंकवादियों को पैसे नहीं मिलेंगें। थोथे दलील। ढाक के तीन पात।
किसानों के क़र्ज़ माफ़ी में भारी दिक्कत, परन्तु कॉर्पोरेट के अरबों रुपये माफ़ किया। नतीजा यह है कि तीन साल में कई गुना अधिक किसानों ने खुदकशी की, कर्ज और भुखमरी से परेशान हो कर।
विजय माल्या जैसे मालामाल, किसान तंगहाल।
मोदी ने पहले #मनरेगा को विफलताओं की स्मारक, #GST को घातक और #एफडीआई को देश विरोधी बताया था।
आज मनरेगा में पहले से ज्यादा पैसा, #एफडीआई देश हित में और #GST से सारे पाप धुल गये बताये जा रहे हैं।
मोदी जो चाय पर चर्चा में लोगों को बताता था कि देश के बाहर इतना काला धन है कि वह आ जाये तो हर एक के खाते में 15-15 लाख आ जायें।
अब सुप्रीम कोर्ट के कहने के बावजूद उन काले धन वालों के नाम तक सार्वजनिक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाये जिनकी सूचि सरकार के पास मौजूद है।
मोदी माँ बेटे की सरकार को जम कर कोसता था कि उसकी सरकार आते ही सारे भ्रष्टाचारी कांग्रेसी जेल में होंगे।
पर तीन साल में एक कांग्रेसी का एक भी कुत्ता तक को जेल न भेजा जा सका, उल्टे सारे भ्रष्टाचारी अपनी पार्टी में ले कर उन्हें पवित्र घोषित कर दिये हैं।
यहाँ मैंने आतंकवाद और चीन पाकिस्तान के हाँथ देश के नितन्तर हो रहे अपमान का जिक्र नहीं कर रहा हूँ। इस पर अलग से चर्चा ज़रूरी है।
दरअसल मनमोहन या मोदी सरकार को नहीं चलाते। चलाते हैं अंतराष्ट्रीय पूँजी के मालिक अमेरिका, वर्ल्ड बैंक, IMF आदि। ये तो एजेंट हैं। अंतरष्ट्रीय पूँजी अलग अलग समय में मुक्त व्यापार, ग्लोबलाइजेशन आदि के नाम से नियम बना कर अन्य देशों पर यह कह कर थोपते हैं कि "तुम्हारे फायदे में है"। समस्त एजेंट अर्थशास्त्री, पार्टी और मनमोहन मोदी जैसे जैसे नेता इसका प्रचार करते हैं, अमल में लाते हैं।
इसलिए सेट टॉप बॉक्स, #GST, #नोटबंदी, #कैशलेस, #FDI, #किसानों_पर_टैक्स, स्वास्थ्य व शिक्षा का निजीकरण, उच्च शिक्षा का बाजारीकरण, #FYUP या #CBCS, आदिवासियों के जल, ज़मीन, जंगल पर कॉर्पोरेट के लिए कब्ज़ा आदि नीतियाँ मनमोहन और मोदी दोनों के हैं।
इसके विपरीत मोरारजी देसाई, चौ चरण सिंह, वीपी सिंह, देवेगौडा आदि की तथाकथित कमजोर सरकारें ही जनहित और देशहित की आर्थिक नीतियाँ को लागू किये। इंदिरा गाँधी 1971 से पहले कमजोर स्थिति में थीं अतः बैंक राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स को समाप्त करना आदि नीतियों पर सत्ता में आते अमल कीं।
देश की स्थिति अब फिर एक ऐसी सरकार की मांग कर रही है।
#नोटबंदी, #उच्च_शिक्षा पर निशाना, #जेएनयू, #बेरोजगारी, #सहारनपुर, #सुकमा, #ईवीएम, #सीमा_पर_शहादत आदि से जनता का खून जला है, खून खौलेगा तो सही।
निसंदेह सोशल मिडिया क्रांति का एक साधन होगा।
#मोदी_सरकार_तीन_साल_जनता_परेशान_बदहाल

Thursday, May 25, 2017

"युद्ध" या फिक्स्ड मैच !!

'राष्ट्रवादी' नारों के बीच ये अजीबोगरीब "जंग" चल रहा है भारत पाकिस्तान में !
दोनों ओर से वीडियो जारी की जाती है, और उसे दोनों तरफ से 'फर्जी' कहा जाता है।
दोनों देश 'शांति' के समय एक दुसरे पर किये गए गोलाबारी से नुकसान को ख़ारिज करते हैं, जबकि अमूमन शांति के समय इस तरह की क्रिया को अंतराष्ट्रीय फोरम पर उठाया जाता है जिससे हमलावर राष्ट्र की चौतरफा निंदा हो।
परन्तु यह सच्चाई है कि हमारे फौजी रोज शहीद हो रहें हैं।
और हमारे मंत्रीगण 'सिर्फ' निंदा करते हैं।
यह समझना होगा कि 'युद्ध' की घोषणा करना एक जटिल स्थिति है, जिसके लिए क्या हम तैयार है ?
मोदी सरकार जनता को हाशिये पर रख कर कॉर्पोरेट के कभी न मिटने वाली दौलत की भूख को पूरा करने में लगी हुई हैं।
मोदी और नवाज़ की दोस्ती में सज्जन जिंदल को फायदा पहुँचाने का रेस को अंतराष्ट्रीय स्तर पर सब जानते हैं।
फिर क्या यह तथाकथित गोला बारी सिर्फ जनता को दिखाने के लिए WWF कुश्ती है, जिसमें कहीं न कहीं हमारे किसी देशवासी के घर पर मातम मनाया जा रहा है?
संभव है भारत पाकिस्तान में 'युद्ध' ज़रूर होगा, पर तब यह मोदी और उसके सरकार की गिरती साख को बचाने के लिए होगा, देश और उसकी जनता के लिए नहीं।
जय हिन्द।

Wednesday, December 28, 2016

कैशलेस धोखा : आपकी जेब काटी जा रही है, वह भी जबरन।


क्या आपको अंदाजा है हम पर जो कैश लेस इकनॉमी थोपी जा रही है उसका फायदा किसको और कितना होने वाला है?
तथ्य नंबर-1
जब भी आप डेबिट कार्ड से कोई आर्थिक व्यवहार करते हैं तो बैंक रिटेलर या जिसको पैसे का भुगतान किया गया है उससे 0.5 से लेकर 1% तक कमीशन लेते हैं।
तथ्य नंबर -2
क्रेडिट कार्ड कंपनियां और बैंक क्रेडिट कार्ड से होने वाले हर आर्थिक व्यवहार (ट्रांजेक्शन) पर 1.5 % से लेकर 2.5% तक दलाली लेती है । यह दलाली दुकानदार यानी भुगतान लेने वाले से वसूली जाती है।
तथ्य नंबर -3
Paytm/Freecharge/ Jio Money और इन जैसी दूसरी E-wallets कम्पनियां 2.5% से 3.5% तक दलाली लेती है जब हम अपने मेहनत की कमाई अपने बैंक अकाउंट से e-wellet में ट्रांसफर करते हैं।
तथ्य नंबर -4
आरबीआई के अंकड़ों के मुताबिक हर महीने 2.25 लाख करोड़ और हर साल करीब 25 से 30 लाख करोड़ रुपये पूरे देश में ATM मशीनों से निकाले जाते हैं। अगर बैंकों से होने वाले विड्राल को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो (ATM+ बैंक) से निकलने वाली यह राशि होती है करीब 75 लाख करोड़। चूंकि इस राशि का सारा लेनदेन बैंक से होता है इसलिए यह सारा पैसा 1 नंबर का सफेद धन होता है।
तथ्य नंबर -5
वर्तमान में कुल आर्थिक व्यवहार का केवल 3 % आर्थिक व्यवहार इलेक्ट्रॉनिक तरीके से होता है।
तथ्य नंबर -6
अगर 1 नंबर में हुए 75 लाख करोड़ के आर्थिक व्यवहार को कैश लेस कर देंगे तो क्या होगा? Paytm/Freecharge/ Jio Money और इन जैसी दूसरी E-wallets कंपनियों की चांदी हो जायेगी।
कैसे होगी? तो जानिए ऐसे होगी...
75 लाख करोड़ के कैशलैस आर्थिक व्यवहार पर अगर यह निजी कंपनियां औसतन 2% भी कमीशन पाती हैं तो सीधे-सीधे हर साल डेढ़ लाख करोड़ रुपये इन कंपनियों को मिलेगा। बिना कुछ किये धरे। पैसा जनता का, माल व्यापारी का और ये कंपनियां मुफ्त में माल उड़ाएंगी!

सरकार ऐसे देगी सफाई
सरकार कहेगी मत यूज करो E-WELLET हम आपको फ्री में UPI app उपलब्ध करा रहे हैं। यह सरकारी है। एकदम फ्री है। इसके जरिये भुगतान करो। अच्छी बात है। लेकिन जरा सोचिए पिछले कई सालों से काम कर रहे रेलवे रिजर्वेशन के सरकारी सर्वर की क्या स्पीड है? इसी स्पीड में UPI का सर्वर भी चलेगा या फिर Paytm/Freecharge/ Jio Money और इन जैसी दूसरी E-wallets कंपनियां इसकी स्पीड बढ़ने नहीं देंगी। इतिहास गवाह है सरकारी विमान कंपनी एयर इंडिया की कमर बीजेपी वाले प्रमोद महाजन की करीबी जेट ने तोड़ी। BSNL और MTNL को कौन अपनी मुट्ठी में कर लिया है। इसलिए यह मत कहना की UPI यूज करो। जब UPI से स्पीड में पेमेंट नहीं होगा तो लोग वापस Paytm/Freecharge/ Jio Money और इन जैसी दूसरी E-wallets कंपनियों पर आश्रित हो जाएंगे।
डेढ़ लाख करोड़ रुपये सालाना का यह एक खुल्लमखुल्ला घोटाला है।
सरकार, Paytm/Freecharge/ Jio Money और इन जैसी दूसरी E-wallets कॉर्पोरेट कंपनियों और बैंकों की इसमें मिली भगत है।
अब समझ में आ रहा है कि कालाधन के नाम पर नोट बन्दी का फैसला कालाधन चलाने वाले कॉर्पोरेट को उपकृत करने के लिए लिया गया है। 2014 के चुनाव में कॉर्पोरेट ने बीजेपी पर जो निवेश किया था यह उसका रिटर्न है।
सारा गेम प्लान है
जैसे- जैसे नोट बन्दी की परतें उघड़ रहीं है कई बातें समझ में आने लगी हैं। मसलन नोट बन्दी, मोदी या जेटली के दिमाग से निकला फैसला नहीं है, क्योंकि इनके पास इतना गूढ़ डेढ़ लाख करोड़ सालाना कमाने का आइडिया सोचने वाला दिमाग है ही नहीं। अगर होता तो यह लोग राजनीति नहीं बिजनेस कर रहे होते। यह तो सिर्फ चेहरा हैं। असल गेम प्लान तो किसी और ने करोड़ों रुपये खर्च करके, टॉप चार्टड अकाउंटेंट, बैंकर और वित्त विशेषज्ञों से तैयार करवाया है। सरकार तो सिर्फ इस रेडीमेड प्लान को ढो रही है।
याद कीजिए, नोट बन्दी के चार दिन बाद यानी 13 नवंबर को प्रधानमंत्री का गोवा में दिया गया भाषण। क्या कहा था मोदी ने? उन्होंने कहा था, "मैं जानता हूं, मैंने कैसी-कैसी ताकतों से लड़ाई मोल ले ली है। जानता हूं, कैसे लोग मेरे खिलाफ हो जाएंगे। मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे..." अब समझ में आ रहा है कि प्रधानमंत्री वास्तव में किस से डर रहे हैं।

Thursday, December 1, 2016

सीमा क्या होगी कंपनी राज का ?

सरकार कैश रकम निकालने और रखने की सीमा तय कर चुकी है।
अब सोना रखने और खरीदने पर भी सीमा तय कर दिया जायेगा।
परंतु अम्बानी और अडानी और उनके जैसे धन्ना सेठों के संपत्ति पर कोई सीमा नहीं। दिन दुगुना और रात चौगुना बढ़ती रहे।
पुराने मोनोपोली (एकाधिकार) एक्ट का कोई मतलब नहीं रह गया है।
टीवी देखने के लिए भी, न जाने किस कानून के अन्तर्गत, बिना सेट टॉप बॉक्स, आप टीवी देख नहीं सकते। छिटपुट केवल वालों की जगह ज़ी नेटवर्क और रिलायंस को केबल सप्लाई का एकाधिकार दे दिया गया है : वजह, पहले एक पेमेंट पर कई लोग देखते थे जिससे कंपनियों को नुकसान हो रहा था और लोगों पर कड़ी नज़र भी रखना है।
पहले भी लैंड सीलिंग एक्ट के तहत ज़मीन रखने की सीमा तय की गयी थी। आज कंपनियों को सेज़ (SEZ) आदि के माध्यम से बेहिसाब ज़मीन किसानों से छीन कर दे दिया गया है।
तो "सीमा" सिर्फ आम लोगों के लिए।
दरअसल यह कवायद वर्ल्ड बैंक और अमरीका के इशारे पर हो रहा है। भारत अभी भी 'सोने की चिड़िया' है, परंतु आम जनों का अपनी सम्पति और मेहनत से कमाई दौलत को बचा बचा कर खर्च करने की परंपरा रही है। अब विदेशों में जमा 'काला धन' का परिभाषा बदल कर, लोगों के निजी संपत्ति को ही 'काला धन' बता कर, उसे विदेशियों और देशी धन्ना सेठों को लूटने के लिए निकलवाया जा रहा है।
इस पूरे प्रकरण में, आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी विपक्ष नपुंसक जैसा सिर्फ शोर कर पा रहा है।
पर इसका उपाय दिखेगा, वक़्त के साथ जवाब भी मिलेगा।
इंतज़ार है।

Thursday, November 24, 2016

संगठित लूट? कानूनी लूट-खसोट ? किसका देश और किसकी सरकार ?



सर्वोच्च न्यायालय में नोटबन्दी पर केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा है कि दुनिया में जीडीपी का महज 4 प्रतिशत कैश ट्रांजैक्शन होता है, लेकिब हमारे देश में ये जीडीपी का 12 प्रतिशत है, ऐसे में नोटबंदी का कदम ज्यादा कैश ट्रांजैक्शन को खत्म कर, उसको डिजिटल करने के लिए उठाया गया है।
विश्व बैंक की 2011 में अंतर्राष्ट्रीय तुलना कार्यक्रम के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि भारतीय आबादी का 23.6%, या लगभग 276 मिलियन लोग प्रति दिन क्रय शक्ति समानता पर $ 1.25 से नीचे रहते हैं। यानि हैण्ड तो माउथ, या जैसे तैसे ज़िन्दगी बसर कर रहें हैं। और सबसे दुःखस पहलु है की यही वह तपका है जिसे डिजिटलाइजेशन की ओर ले जाने के लिए सरकार यह कवायद कर रही है।
हलफनामा में सरकार ने कहा है कि इस कदम से 70 साल के ब्लैक मनी के बोझ को सरकार ने खत्म करने का प्रयास किया है। क्या इसी 'ब्लैकमनी' की बात नरेन्द्र मोदी ने चुनाव प्रचार में किए थे ?
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने नोटबंदी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जिस तरह से इसे लागू किया गया है, वह ‘प्रबंधन की विशाल असफलता’ है और यह संगठित एवं कानूनी लूट-खसोट का मामला है। उन्होंने पीएम से पूछा कि क्या ऐसा कोई देश है जहां लोग अपने पैसे जमा तो करवा सकते हैं लेकिन निकलवा नहीं सकते? नोटबंदी के बाद से देश में 60 से 65 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
इस बीच, मोदी सरकार ने अपने दोस्तों को दिया हुआ 7 हज़ार करोड़ रुपए का लोन माफ़ कर दिया जिसमें 1200 करोड़ रुपए का लोन विजय माल्या का भी था।
बैंकों के माध्यम से जो लोन सरकार माफ़ करा रहे हैं वो हमारे या आपके द्वारा लिए गए छोटे-छोटे लोन नहीं हैं बल्कि इस देश के 9 बड़े-बड़े धन्नासेठों के घराने हैं जिन्होंने मिलकर कुल 7 लाख करोड़ रुपए का लोन सरकारी बैंकों से उठा रखा है। और मोदी जी के इन कर्ज़दार दोस्तों के नाम हैं –
एस्सार, रिलायंस, जीवीके, जीएमआर, अडानी, लैनको, वीडियोकॉन, वेदांता, जेपी आदि बड़े उद्योगपतियों के लोन माफ़ किया गया है।
कई कारणों से सरकार ने यह दावा किया है की नोट बंदी पर गोपनीयता बरती गयी। परंतु RBI के सितंबर 2016 की आकड़े देखे तो अगस्त 2016 के मुकाबले 5,88,600 करोड़ रुपया बैंकों के खाते में अतिरिक्त जमा हुआ। जुलाई 2016 में बैंकों के खातों में 96 हजार 196 बिलियन रुपये जमा हुए और सितंबर 2016 में बैंकों के सभी खातों में राशि बढ़कर 1 लाख 2 हजार 82 बिलियन रुपये हो गई। जिसका अंतर कनवर्ट करने पर 5,88,600 करोड़ रुपया होता है।
अब जरा RBI के आकड़ों के अनुसार ही 2015 में जुलाई और सितंबर के बीच जमा होने वाली राशि देखिए। जुलाई 2015 में सभी बैंकों में लगभग 88 हजार 301 बिलियन रुपये जमा हुआ और उसी साल सितंबर 2015 में 89 हजार 462 बिलियन रुपये जमा हुआ था।
हाल ही में ये बात सामने आई थी कि कुछ नेताओं को नोट बंदी की जानकारी पहले से ही थी। ऐसे में ये आकड़े सवाल पैदा करते है कि क्या कुछ नेताओं या बिजनेस मैन को इस बात की जानकारी पहले से ही थी। क्या जुलाई और सितंबर के जमा आकड़ों का भारी अंतर ये दर्शाता है कि कुछ लोगों ने अपने पैसों का निपटारा पहले ही कर लिया है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में वित्त मंत्री अरूण जेटली से नोट बंदी की गोपनीयता पर सवाल करने पर वो मान चुके है कि सरकार ने पूरी तरह से नोट बंदी पर गोपनीयता बरती है लेकिन हो सकता हो इस बात कि जानकारी कुछ लोगों को पहले ही हो गई हो।
8 नवंबर की रात ऐतिहासिक थी। देश में 500 और 1000 का नोट बंद कर प्रधानमंत्री मोदी ने नये 500 और 2000 रुपये के नोट जारी करने की घोषणा की। पीएम मोदी ने अपने फैसले को अबतक का काला धन के खिलाफ सबसे बड़ा फैसला बताया।
इससे पहले भी पीएम मोदी कई मौकों पर काला धन के मुद्दे पर भाषण देते आए हैं। लेकिन इन भाषणों के दौरान भी दौरान यानि नोट बंदी के 11 महीने पहले ही मोदी सरकार की कुछ फैसले से हवाला काराबारियों को कानूनी रूप से विदेशों में धन भेजने का सुनहरा मौका मिल गया। इतने समयांतराल में कुछ लोगों ने 30,000 करोड़ रुपये विदेशों में ट्रांसफर कर दिया। यह पिछले सालो की तुलना में तीन गुना राशि है।
मोदी सरकार बनने के पहले LRS (Liberalised Remittance Scheme) की तहत विदेश में धन भेजने की सीमा सिर्फ 75 हजार डॉलर थी। बीजेपी की सरकार ने सत्ता में आने के एक हफ्ते के अंदर ही 03 जून 2014 को इसकी सीमा बढ़ा 125 हजार डॉलर कर दी गई। पिछले साल 26 मई 2015 को दोबारा LRS बढ़ाकर 250 डॉलर कर दी गई। ये फैसला एक तरफ से हवाला कारोबार को कानूनी दर्जा देने जैसा साबित हुआ। इस फैसले के चलते जून 2015 में 30,000 हजार करोड़ रुपये विदेशी खातों में भेज गए।
यहा तक कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की जानकारी में ये सब तब से हो रहा था। जब RBI गुपचुप तरीके से 500 और 1000 की नोटों की रोक की तैयारी कर रही थी। RBI के पास आज भी इसका स्पष्ट जवाब नहीं है कि इतनी बड़ी रकम अचानक कैसे विदेशी खातों में पहुंच गई।
प्रधानमंत्री ने कहा है 50 दिन तक रुकने के लिए कहा है, लेकिन देश के गरीब वर्ग के लिए ये 50 दिन मुश्किलों भरे होंगे।

Sunday, October 9, 2016

Duping Railway passengers : Government acting broker for Airline Owners.

Suresh Prabhu is Minister of Railways of Government of India but his actions are meant to force people to fly Airlines instead.
Recently, Railways, defying its duty as a public carrier, has indulged in money making business enterprise. But the money is not supposed to be made by this public sector, but embark on policies, which shall ensure money is made by Airline owners.
Railways have announced Dynamic Pricing as done by the Airlines. But there is big difference : Airlines offer confirmed seats and there is a 'supposed' competition among Airlines, though they too have cartel, because profit at the cost of passengers is the prime concern.
Railways have no option. And the tickets are Wait Listed,. So the real reasons for "Dynamic Pricing' has to be understood.
Let us take an example of October 2016, and journey between Patna nad New Delhi.
Saturday 9th October, 2016 is Dussehra Holidays. 11th October, 2016 is Vijay Dashmi and and 12th October is Muharram. Delhi High Court, Schools etc are closed till Sunday, the 16th October.
So, if you have to come from Patna to New Delhi, and you have to take the ticket now. It is expected that train ticket in Rajdhani with Waiting List likely to be confirmed will be available only on 17th October. Now with Dynamic Pricing for Rajdhani, the Wait Listed Ticket has been raised inexplicably by nearly Rs 1000/- and the tickets for Airlines reduced considerably.
So, those who can afford to travel by Rajdhani can as well fly by Airlines, fishing out a Thousand bucks more.
So Railways do not give you the option of taking a less costly ticket for some other day, but to fly a Private airlines instead.
Railways loss is the Airlines gain. Government loss is Private Owners Gain.
And this is how Narendra Modi Government is functioning.
This is also why Suresh Prabhu is made railway Minister.
The sooner this is opposed, the better it shall be for the Nation and its Citizens.
Jai Hind.

Saturday, October 8, 2016

जब हम युद्ध हारे थे और रक्षा मंत्री थे वी के कृष्ण मेनन :

भारत-चीन युद्ध 20 अक्टूबर, 1962 को लड़ा गया था। दोनों देशों के बीच ये युद्ध क़रीब एक महीने तक चला, जिसमें भारत को काफ़ी हानि उठानी पड़ी और उसकी हार हुई।
भारतीय सैनिकों ने वीरतापूर्वक चीनी सेना का सामना किया, किंतु राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व की अक्षमता के कारण सैनिकों की बहादुरी व्यर्थ चली गई। हार के कारणों को जानने के लिए भारत सरकार ने युद्ध के तत्काल बाद ले. जनरल हेंडरसन ब्रुक्स और इंडियन मिलिट्री एकेडमी के तत्कालीन कमानडेंट ब्रिगेडियर पी एस भगत के नेतृत्व में एक समिति बनाई थी। दोनों सैन्य अधिकारियो द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट को भारत सरकार अभी भी इसे गुप्त रिपोर्ट मानती है। दोनों अधिकारियों ने अपनी रिपोर्ट में हार के लिए प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराया था। साथ ही इस हार के जिम्मेदार रक्षा मंत्री वी के कृष्णमेनन और दूसरा नाम लेफ़्टिनेंट जनरल बीएम कौल का है, जिन पर कृष्ण मेनन की छत्रछाया थी। लेफ़्टिनेंट जनरल बीएम कौल को पूर्वोत्तर के पूरे युद्धक्षेत्र का कमांडर बनाया गया था। उस समय वो पूर्वोत्तर फ्रंटियर कहलाता था और अब इसे अरुणाचल प्रदेश कहा जाता है। बीएम कौल सैनिक नौकरशाह थे, लेकिन उन्हें युद्ध का कोई अनुभव नहीं था।
एक और प्रकरण जानने की ज़रुरत है। 1962 में चीन के हाथों हमारी हार का भारत ने पांच साल बाद बदला लिया। वो भी दो बार दो अलग अलग मोर्चों पर, पहले नाथुला मोर्चे की विजयगाथा।
भारत और चीन के बीच करीब 4 हजार किलोमीटर लंबी लाईन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानी एलएसी पर 1967 में भारतीय सेना ने चीन को मुंहतोड़ जवाब दिया था, वो जगह थी भारत चीन सीमा पर मौजूद ना-थुला पास। 11 सितंबर साल 1967 दोनों देशों की सेनाएं एक दूसरे के सामने आ गई थीं। चीन की सेना बाकायदा लाउडस्पीकर पर भारत की सेना को पीछे हटने की धमकी दिया करती थी कि पीछे हटो वरना 1962 की तरह कुचल दिया जाएगा। यही नहीं चीनियों ने भारतीय सीमा में घुसकर बंकर बनाने की कोशिश भी की थी।
चीन की इन हरकतों को रोकने के लिए 1967 में नाथुला पास पर तैनात मेजर जनरल सगत राय की अगुवाई में कंटीली बाड़ लगाने का फैसला किया। आज भी इस बाड़ के हिस्से ज्यों के त्यों मौजूद हैं। कंटीली बाड़ को लेकर खूनी लड़ाई तब शुरू हुई तब जुबानी झड़प के बाद चीन ने बाड़ लगा रही भारतीय सेना पर हमला कर दिया। बाड़ लगाने में जुटे इंजीनिरिंग यूनिट समेत भारतीय सेना के 67 जवान मारे गए।
1967 के चीनी हमले के बाद भारतीय सेना का खून खौल उठा। जवाबी हमला शुरू हुआ और चीन की मशीनगन यूनिट को पूरी तरह तबाह कर दिया गया।
1967 की उस लड़ाई में शहीद हुए भारतीय सैनिकों के लिए यहां अमर जवान स्मारक बनाया गया है। तब से इस इलाके में चीन ने कभी ना तो घुसपैठ की कोशिश की और ना ही भारतीय सेना से टकराने की हिम्मत की। यहां आज भी 48 साल पुराने हालात की तरह ही चौकियां मौजूद हैं जिनके बीच सिर्फ चंद कदमों का फासला है।
नाथुला में मुंह की खाने के सिर्फ 15 दिन बाद एक और जंग हुई पास के ही चोला इलाके में।
भारत चीन सीमा में नाथुला के पास ही है चोला इलाका जहां पिछले साल बनाया गया है चोला विजय का स्मारक। यहां दर्ज है चोला की विजयगाथा। यहाँ एक लाल रंग का पत्थर है जिस पर कब्जे को लेकर भारत और चीन में बारूदी जंग शुरू हुई थी।
यहां दर्ज भारत की जीत की कहानी स्मारक की शक्ल में हमेशा के लिए अमर बना दिया गया है।