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New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....
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Thursday, July 23, 2015

कृष्ण की द्वारिका :

मथुरा से निकलकर भगवान कृष्ण ने द्वारिका क्षेत्र में ही पहले से स्थापित खंडहर हो चुके नगर क्षेत्र में एक नए नगर की स्थापना की थी। कहना चाहिए कि भगवान कृष्ण ने अपने पूर्वजों की भूमि को फिर से रहने लायक बनाया था लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ कि द्वारिका नष्ट हो गई? किसने किया द्वारिका को नष्ट? क्या प्राकृतिक आपदा से नष्ट हो गई द्वारिका? क्या किसी आसमानी ताकत ने नष्ट कर दिया द्वारिका को या किसी समुद्री शक्ति ने उजाड़ दिया द्वारिका को। आखिर क्या हुआ कि नष्ट हो गई द्वारिका और फिर बाद में वह समुद्र में डूब गई। अंतिम पेज पर खुलेगा इसका रहस्य जो आज तक कोई नहीं जानता।

इस सवाल की खोज कई वैज्ञानिकों ने की और उसके जवाब भी ढूंढे हैं। सैकड़ों फीट नीचे समुद्र में उन्हें ऐसे अवशेष मिले हैं जिसके चलते भारत का इतिहास बदल गया है। अब इतिहास को फिर से लिखे जाने की जरूरत बन गई है। आओ, इस सबके खुलासे के पहले जान लें इस क्षेत्र की प्राचीन पृष्ठभूमि को। पहले जान लें इस क्षेत्र का इतिहास... तब खुलेगा द्वारिका का एक ऐसा रहस्य, जो आप आज तक नहीं जान पाए हैं।

ययाति के प्रमुख 5 पुत्र थे- 1. पुरु, 2. यदु, 3. तुर्वस, 4. अनु और 5. द्रुहु। इन्हें वेदों में पंचनंद कहा गया है। 7,200 ईसा पूर्व अर्थात आज से 9,200 वर्ष पूर्व ययाति के इन पांचों पुत्रों का संपूर्ण धरती पर राज था। पांचों पुत्रों ने अपने-अपने नाम से राजवंशों की स्थापना की। यदु से यादव, तुर्वसु से यवन, द्रुहु से भोज, अनु से मलेच्छ और पुरु से पौरव वंश की स्थापना हुई। इन पांचों कुल के लोगों ने आपस में कई प्रसिद्ध लड़ाइयां लड़ी हैं जिसमें से एक दासराज्ञ का युद्ध और दूसरा महाभारत का युद्ध प्रसिद्ध है।

पुराणों में उल्लेख है कि ययाति अपने बड़े लड़के यदु से रुष्ट हो गया था और उसे शाप दिया था कि यदु या उसके लड़कों को राजपद प्राप्त करने का सौभाग्य न प्राप्त होगा। (हरिवंश पुराण, 1, 30, 29)। ययाति सबसे छोटे बेटे पुरु को बहुत अधिक चाहता था और उसी को उसने राज्य देने का विचार प्रकट किया, परंतु राजा के सभासदों ने ज्येष्ठ पुत्र के रहते हुए इस कार्य का विरोध किया। (महाभारत, 1, 85, 32)

किसको कौन सा क्षेत्र मिला : ययाति ने दक्षिण-पूर्व दिशा में तुर्वसु को (पंजाब से उत्तरप्रदेश तक), पश्चिम में द्रुहु को, दक्षिण में यदु को (आज का सिन्ध-गुजरात प्रांत) और उत्तर में अनु को मांडलिक पद पर नियुक्त किया तथा पुरु को संपूर्ण भूमंडल के राज्य पर अभिषिक्त कर स्वयं वन को चले गए।

यदु ने पुरु पक्ष का समर्थन किया और स्वयं मांडलिक पद से इंकार कर दिया। इस पर पुरु को राजा घोषित किया गया और वह प्रतिष्ठान की मुख्य शाखा का शासक हुआ। उसके वंशज पौरव कहलाए। अन्य चारों भाइयों को जो प्रदेश दिए गए, उनका विवरण इस प्रकार है- यदु को चर्मरावती अथवा चर्मण्वती (चंबल), बेत्रवती (बेतवा) और शुक्तिमती (केन) का तटवर्ती प्रदेश मिला। तुर्वसु को प्रतिष्ठान के दक्षिण-पूर्व का भू-भाग मिला और द्रुहु को उत्तर-पश्चिम का। गंगा-यमुना दो-आब का उत्तरी भाग तथा उसके पूर्व का कुछ प्रदेश जिसकी सीमा अयोध्या राज्य से मिलती थी, अनु के हिस्से में आया।

यदि हम यादवों के क्षेत्र की बात करें तो वह आज के पाकिस्तान स्थित सिन्ध प्रांत और भारत स्थित गुजरात का प्रांत है। इसके बीच का क्षेत्र यदु क्षेत्र कहलाता था। पहले राज्य का विभाजन नदी और वन क्षेत्र के आधार पर था। सरस्वती नदी पहले गुजरात के कच्छ के पास के समुद्र में विलीन होती थी। सरस्वती नदी के इस पार (अर्थात विदर्भ की ओर गोदावरी-नर्मदा तक) से लेकर उस पार सिन्धु नदी के किनारे तक का क्षेत्र यदुओं का था। सिन्धु के उस पार यदु के दूसरे भाइयों का क्षेत्र था।
द्वारिका का परिचय : कई द्वारों का शहर होने के कारण द्वारिका इसका नाम पड़ा। इस शहर के चारों ओर बहुत ही लंबी दीवार थी जिसमें कई द्वार थे। वह दीवार आज भी समुद्र के तल में स्थित है। भारत के सबसे प्राचीन नगरों में से एक है द्वारिका। ये 7 नगर हैं- द्वारिका, मथुरा, काशी, हरिद्वार, अवंतिका, कांची और अयोध्या। द्वारिका को द्वारावती, कुशस्थली, आनर्तक, ओखा-मंडल, गोमती द्वारिका, चक्रतीर्थ, अंतरद्वीप, वारिदुर्ग, उदधिमध्यस्थान भी कहा जाता है।

गुजरात राज्य के पश्चिमी सिरे पर समुद्र के किनारे स्थित 4 धामों में से 1 धाम और 7 पवित्र पुरियों में से एक पुरी है द्वारिका। द्वारिका 2 हैं- गोमती द्वारिका, बेट द्वारिका। गोमती द्वारिका धाम है, बेट द्वारिका पुरी है। बेट द्वारिका के लिए समुद्र मार्ग से जाना पड़ता है।

द्वारिका का प्राचीन नाम कुशस्थली है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाराजा रैवतक के समुद्र में कुश बिछाकर यज्ञ करने के कारण ही इस नगरी का नाम कुशस्थली हुआ था। यहां द्वारिकाधीश का प्रसिद्ध मंदिर होने के साथ ही अनेक मंदिर और सुंदर, मनोरम और रमणीय स्थान हैं। मुस्लिम आक्रमणकारियों ने यहां के बहुत से प्राचीन मंदिर तोड़ दिए। यहां से समुद्र को निहारना अति सुखद है।

कृष्ण क्यों गए थे द्वारिका : कृष्ण ने राजा कंस का वध कर दिया तो कंस के श्वसुर मगधपति जरासंध ने कृष्ण और यदुओं का नामोनिशान मिटा देने की ठान रखी थी। वह मथुरा और यादवों पर बारंबार आक्रमण करता था। उसके कई मलेच्छ और यवनी मित्र राजा थे। अंतत: यादवों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कृष्ण ने मथुरा को छोड़ने का निर्णय लिया। विनता के पुत्र गरूड़ की सलाह एवं ककुद्मी के आमंत्रण पर कृष्ण कुशस्थली आ गए। वर्तमान द्वारिका नगर कुशस्थली के रूप में पहले से ही विद्यमान थी, कृष्ण ने इसी उजाड़ हो चुकी नगरी को पुनः बसाया।

कृष्ण अपने 18 नए कुल-बंधुओं के साथ द्वारिका आ गए। यहीं 36 वर्ष राज्य करने के बाद उनका देहावसान हुआ। द्वारिका के समुद्र में डूब जाने और यादव कुलों के नष्ट हो जाने के बाद कृष्ण के प्रपौत्र वज्र अथवा वज्रनाभ द्वारिका के यदुवंश के अंतिम शासक थे, जो यदुओं की आपसी लड़ाई में जीवित बच गए थे। द्वारिका के समुद्र में डूबने पर अर्जुन द्वारिका गए और वज्र तथा शेष बची यादव महिलाओं को हस्तिनापुर ले गए। कृष्ण के प्रपौत्र वज्र को हस्तिनापुर में मथुरा का राजा घोषित किया। वज्रनाभ के नाम से ही मथुरा क्षेत्र को ब्रजमंडल कहा जाता है।
द्वारिका के इन समुद्री अवशेषों को सबसे पहले भारतीय वायुसेना के पायलटों ने समुद्र के ऊपर से उड़ान भरते हुए नोटिस किया था और उसके बाद 1970 के जामनगर के गजेटियर में इनका उल्लेख किया गया। उसके बाद से इन खंडों के बारे में दावों-प्रतिदावों का दौर चलता चल पड़ा। बहरहाल, जो शुरुआत आकाश से वायुसेना ने की थी, उसकी सचाई भारतीय नौसेना ने सफलतापूर्वक उजागर कर दी।

एक समय था, जब लोग कहते थे कि द्वारिका नगरी एक काल्पनिक नगर है, लेकिन इस कल्पना को सच साबित कर दिखाया ऑर्कियोलॉजिस्ट प्रो. एसआर राव ने।

प्रो. राव ने मैसूर विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के बाद बड़ौदा में राज्य पुरातत्व विभाग ज्वॉइन कर लिया था। उसके बाद भारतीय पुरातत्व विभाग में काम किया। प्रो. राव और उनकी टीम ने 1979-80 में समुद्र में 560 मीटर लंबी द्वारिका की दीवार की खोज की। साथ में उन्हें वहां पर उस समय के बर्तन भी मिले, जो 1528 ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व के हैं। इसके अलावा सिन्धु घाटी सभ्यता के भी कई अवशेष उन्होंने खोजे। उस जगह पर भी उन्होंने खुदाई में कई रहस्य खोले, जहां पर कुरुक्षेत्र का युद्ध हुआ था।
नौसेना और पुरातत्व विभाग की संयुक्त खोज : पहले 2005 फिर 2007 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निर्देशन में भारतीय नौसेना के गोताखोरों ने समुद्र में समाई द्वारिका नगरी के अवशेषों के नमूनों को सफलतापूर्वक निकाला। उन्होंने ऐसे नमूने एकत्रित किए जिन्हें देखकर आश्चर्य होता है। 2005 में नौसेना के सहयोग से प्राचीन द्वारिका नगरी से जुड़े अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छंटे पत्थर मिले और लगभग 200 नमूने एकत्र किए गए।

गुजरात में कच्छ की खाड़ी के पास स्थित द्वारिका नगर समुद्र तटीय क्षेत्र में नौसेना के गोताखोरों की मदद से पुरा विशेषज्ञों ने व्यापक सर्वेक्षण के बाद समुद्र के भीतर उत्खनन कार्य किया और वहां पड़े चूना पत्थरों के खंडों को भी ढूंढ निकाला।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के समुद्री पुरातत्व विशेषज्ञों ने इन दुर्लभ नमूनों को देश-विदेशों की पुरा प्रयोगशालाओं को भेजा। मिली जानकारी के मुताबिक ये नमूने सिन्धु घाटी सभ्यता से कोई मेल नहीं खाते, लेकिन ये इतने प्राचीन थे कि सभी दंग रह गए।

नौसेना के गोताखोरों ने 40 हजार वर्गमीटर के दायरे में यह उत्खनन किया और वहां पड़े भवनों के खंडों के नमूने एकत्र किए जिन्हें आरंभिक तौर पर चूना पत्थर बताया गया था। पुरातत्व विशेषज्ञों ने बताया कि ये खंड बहुत ही विशाल और समृद्धशाली नगर और मंदिर के अवशेष हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के निदेशक (धरोहर) एके सिन्हा के अनुसार द्वारिका में समुद्र के भीतर ही नहीं, बल्कि जमीन पर भी खुदाई की गई थी और 10 मीटर गहराई तक किए गए इस उत्खनन में सिक्के और कई कलाकृतियां भी प्राप्त हुईं।

इस समुद्री उत्खनन के बारे में सहायक नौसेना प्रमुख रियर एडमिरल एसपीएस चीमा ने तब बताया था कि इस ऐतिहासिक अभियान के लिए उनके 11 गोताखोरों को पुरातत्व सर्वेक्षण ने प्रशिक्षित किया और नवंबर 2006 में नौसेना के सर्वेक्षक पोत आईएनएस निर्देशक ने इस समुद्री स्थल का सर्वे किया। इसके बाद इस साल जनवरी से फरवरी के बीच नौसेना के गोताखोर तमाम आवश्यक उपकरण और सामग्री लेकर उन दुर्लभ अवशेषों तक पहुंच गए। रियर एडमिरल चीमा ने कहा कि इन अवशेषों की प्राचीनता का वैज्ञानिक अध्ययन होने के बाद देश के समुद्री इतिहास और धरोहर का तिथिक्रम लिखने के लिए आरंभिक सामग्री इतिहासकारों को उपलब्ध हो जाएगी।

इस उत्खनन के कार्य के आंकड़ों को विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के सामने पेश किया गया। इन विशेषज्ञों में अमेरिका, इसराइल, श्रीलंका और ब्रिटेन के विशेषज्ञ भी शामिल हुए। नमूनों को विदेशी प्रयोगशालाओं में भी भेजा गया ताकि अवशेषों की प्राचीनता के बारे में किसी प्रकार की त्रुटि का संदेह समाप्त हो जाए।
द्वारिका पर ताजा शोध : 2001 में सरकार ने गुजरात के समुद्री तटों पर प्रदूषण के कारण हुए नुकसान का अनुमान लगाने के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी द्वारा एक सर्वे करने को कहा। जब समुद्री तलहटी की जांच की गई तो सोनार पर मानव निर्मित नगर पाया गया जिसकी जांच करने पर पाया गया कि यह नगर 32,000 वर्ष पुराना है तथा 9,000 वर्षों से समुद्र मंड विलीन है। यह बहुत ही चौंका देने वाली जानकारी थी।

माना जाता है कि 9,000 वर्षों पूर्व हिमयुग की समाप्ति पर समुद्र का जलस्तर बढ़ने के कारण यह नगर समुद्र में विलीन हो गया होगा, लेकिन इसके पीछे और भी कारण हो सकते हैं।
कैसे नष्ट हो गई द्वारिका : वैज्ञानिकों के अनुसार जब हिमयुग समाप्त हुआ तो समद्र का जलस्तर बढ़ा और उसमें देश-दुनिया के कई तटवर्ती शहर डूब गए। द्वारिका भी उन शहरों में से एक थी। लेकिन सवाल यह उठता है कि हिमयुग तो आज से 10 हजार वर्ष पूर्व समाप्त हुआ। भगवान कृष्ण ने तो नई द्वारिका का निर्माण आज से 5 हजार 300 वर्ष पूर्व किया था, तब ऐसे में इसके हिमयुग के दौरान समुद्र में डूब जाने की थ्योरी आधी सच लगती है।
लेकिन बहुत से पुराणकार और इतिहासकार मानते हैं कि द्वारिका को कृष्ण के देहांत के बाद जान-बूझकर नष्ट किया गया था। यह वह दौर था, जबकि यादव लोग आपस में भयंकर तरीके से लड़ रहे थे। इसके अलावा जरासंध और यवन लोग भी उनके घोर दुश्मन थे। ऐसे में द्वारिका पर समुद्र के मार्ग से भी आक्रमण हुआ और आसमानी मार्ग से भी आक्रमण किया गया। अंतत: यादवों को उनके क्षेत्र को छोड़कर फिर से मथुरा और उसके आसपास शरण लेना पड़ी।

हाल ही की खोज से यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया कि यह वह दौर था जबकि धरती पर रहने वाले एलियंस का आसमानी एलियंस के साथ घोर युद्ध हुआ था जिसके चलते यूएफओ ने उन सभी शहरों को निशाना बनाया, जहां पर देवता लोग रहते थे या जहां पर देवताओं के वंशज रहते थे।

https://youtu.be/QSEMIdGB8Uk

Friday, February 13, 2015

रुक्मिणी सन्देश : Message of Rukmini::

रुक्मिणी सन्देश :
जिस वैलेंटाइन डे पर पश्चिम इतना इतराती है, उससे अलग प्रेम स्वरुप की एक झलक रुक्मिणी द्वारा १६ कलाओं में निपुण द्वारकाधीश श्री कृष्ण को उनके द्वारा लिखा गया प्रेम पत्र में नज़र आता है। द्वारका से लगभग ६ किलोमीटर दूर रुक्मिणी मंदिर में इसकी पत्र की प्रति आज भी वितरित होती है। भागवत पुराण के दशम स्कन्ध अध्याय ५२ में इस पत्र की चर्चा है जो रुक्मिणी जी द्वारा एक विश्वस्त विप्र के हाथ भिजवाया गया है | किन्तु क्यों भिजवाया ?
इसका उल्लेख भी वहीँ है |

वे श्रीकृष्ण के अनुपम रूप ,प्रभाव,भक्तवात्सल्य आदि गुण तथा अलौकिक संपत्ति की चर्चा अपने यहाँ आये नारदादि ऋषियों एवं अन्य लोगों से सुन
चुकी थीं | अतः उन्हें अपने अनुरूप समझकर पति रूप में मन ही मन वरण कर लिया --

" सोपश्रुत्य मुकुन्दस्य रूपवीर्यगुणश्रियः |
गृहागतैर्गीयमानास्तं मेने सदृशं पतिम् ||--भा.पु. १०/५२/२३,

उनकी इस भावना का सम्मान उनके माता पिता आदि ने भी किया,
किन्तु उनका भाई रुक्मी श्रीकृष्ण से द्वेष के कारण उन्हे रोककर
अयोग्य शिशुपाल के साथ उनका विवाह करना चाहा --

" बन्धूनामिच्छतां दातुं कृष्णाय भगिनीं नृप |
ततो निवार्य कृष्णद्विड्रुक्मी चैद्यममन्यत ||-१०/५२/२५,

इस बात से रुक्मिणी जी का मन बड़ा खिन्न हुआ और उन्होंने भगवान्
कृष्ण के पास पत्र देकर एक ब्राह्मण को भेजा --

" तदवेत्यासितापाङ्गी वैदर्भी दुर्मना भृशम् |
विचिन्तयाSSप्तं द्विजं कञ्चित् कृष्णाय प्राहिणोद्द्रुतम् ||१०/५२/२६,

रुक्मिणी जी अपने पत्र के ३९वें श्लोक में यह स्पष्ट लिखती हैं कि " हे
प्रभो ! मैंने पतिरूप में आपको वरण कर लिया है अपने आपको आपको समर्पित कर दिया है | आप आकर मुझे अपनी पत्नी बना लें, हे कमलनयन ! जैसे सिंह के भाग को सृगाल ( सियार ) नहीं स्पर्श कर सकता, वैसे ही मुझे सृगालवत् तुच्छ शिशुपाल स्पर्श न कर सके --

तन्मे भवान्खलु वृतः पतिरङ्ग जायामात्माSर्पितश्च भवतोSत्र विभो विधेहि | मा वीरभागमभिमर्शतु चैद्यआराद्गोमायुवन्मृगपतेर्बलिमम्बुजाक्ष ||
--१०/५२/३९,


Message of Rukmini
O the infallible and the most handsome One! Having heard Your qualities, which enter through the path of ears and absolve away the pains of life, and having heard about Your handsome appearance, which is the only asset of the eyes of living beings with eyes, my heart is accepting You as a consort leaving behind shyness.||1||
O Mukunda, the lion (best) among men! Given a chance, which composed girl from a good lineage will not wish for You as a consort; You, Who is the happiness of the minds of people, Who is the happiness of the world, and Who is incomparable from any viewpoint — be it lineage, nature, beauty, knowledge, energy, wealth, or abode.||2||
Therefore, O Lord! I have indeed accepted You as a consort and I have submitted myself to You. O lotus-eyed Krishna! Please arrive here [and accept me]; so that the prince of Cedi (Sisupala) does not takes away the property of brave You — just like a jackal should not take away the prey of a lion.||3||
If I have revered the all pervading Paramatman by social welfares (digging wells), oblations, obeying rules, penance, and serving demi-gods, saints, and preceptor, then O Gadagraja (Krishna)! You accept me after holding my hand — instead of anyone else like the son of Damaghosa (Sisupala).||4||
O Lord, Who is unconquered! Arrive secretly in Vidarbha one day before my marriage. Then after defeating all the army-commanders from the regions of Cedi and Magadha (Sisupala and Jarasandha), marry me with the ways of demons by showing Your valor and conquering power.||5||
If You are wondering that how will you conquer me without killing the women and relatives inside my palace, then I am telling You a way out. As per an old tradition, there is a grand fair before the marriage, during which the bride goes out to the temple of Girija for prayers.||6||
O lotus-eyed Krishna! If I don’t achieve the dust of Your feet, which is sought after by incomparable Ones like Umapati (Siva), then I will destroy my life. If the service of Your feet is not achieved in this life, then I will take hundreds of birth and do penance; I am sure I will achieve Your lotus feet some day.||7||
Notes:
¹This letter was sent to Krishna by Rukmini. It is a beautiful eulogy in which love for the divine is evident. The letter was carried by a Brahman, who was a trustee of Rukmini. The eulogy appears in tenth-book and fifty-second chapter of the Bhagavat Purana.
Poet: Rukmini
Source:Bhagavat Purana

श्रीकृष्ण जन्म महोत्सव की बात आती है तो उनके जीवन की एक प्रमुख लीला – रुक्मिणी हरण की लीला – की चर्चा तो होगी ही | श्रीकृष्ण चरित्र की एक प्रमुख लीला है रुक्मिणी हरण की लीला | रुक्मिणी हरण की लीला एक ओर सांसारिक दृष्टि से जहाँ एक घटना भर है, वहीं कृष्ण की अन्य लीलाओं के समान इस लीला का भी आध्यात्मिक रहस्य है | सबसे पहले चर्चा करते हैं इस लीला की |

विदर्भ देश में भीष्मक नामक एक परम तेजस्वी और सद्गुणी राजा थे । उनकी राजधानी थी कुण्डिनपुर । उनकी एक पुत्री थी – रुक्मिणी जो पाँच भाइयों के बाद उत्पन्न हुई थी इसलिये सभी की लाडली थी । उसके शरीर में लक्ष्मी के शरीर के समान ही लक्षण थे इसलिये लोग उसे लक्ष्मीस्वरूपा भी कहा करते थे । रुक्मिणी जब विवाह योग्य हुईं तो भीष्मक को उसके विवाह की चिंता हुई । रुक्मिणी के पास जो लोग आते-जाते थे वे श्रीकृष्ण की प्रशंसा किया करते थे कि श्रीकृष्ण अलौकिक पुरुष हैं तथा समस्त विश्व में उनके सदृश अन्य कोई पुरुष नहीं है । भगवान श्रीकृष्ण के गुणों और उनकी सुंदरता के विषय में सुनकर रुक्मिणी मन ही मन उन पर आसक्त हो गईं और उन्होंने मन में निश्चय कर लिए कि वे विवाह करेंगी तो श्री कृष्ण के साथ ही | उधर कृष्ण को भी नारद से यह बात ज्ञात हो चुकी थी तथा रुक्मिणी के सौन्दर्य के विषय में तथा उनके गुणसम्पन्न होने के विषय में भी नारद उन्हें बता चुके थे | रुक्मिणी का बड़ा भाई रुक्मी कृष्ण से शत्रुता रखता था | वह अपनी बहन रुक्मिणी का विवाह चेदि वंश के राजा तथा कृष्ण की बुआ के बेटे शिशुपाल के साथ करना चाहता था | इसका एक कारण यह भी था कि शिशुपाल भी रुक्मी के समान ही कृष्ण से शत्रुता रखता था | अपने पुत्र की भावनाओं का सम्मान करते हुए राजा भीष्मक ने शिशुपाल के साथ ही पुत्री के विवाह का निश्चय कर लिया और शिशुपाल के पास सन्देश भेजकर विवाह की तिथि भी निश्चित कर ली |

रुक्मिणी को इस बात का पता लगा तो उन्हें बहुत दुःख हुआ और उन्होंने एक ब्राह्मण को कृष्ण के लिये अपना सन्देश द्वारिका भेजा | अपने सन्देश में उन्होंने स्पष्ट रूप से अपना प्रणय कृष्ण के प्रति व्यक्त किया | साथ ही यह भी बताया था उनका विवाह उनकी इच्छा के विपरीत शिशुपाल के साथ किया जा रहा है | उन्होंने पत्र में लिखा कि “मैंने आपको ही पति रूप में वरण किया है । मैं आपको अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष के साथ विवाह नहीं कर सकती । मैं अपने कुल की प्रथा के अनुसार विवाह से पूर्व वधू के रूप में श्रृंगार करके नगर के बाहर स्थित गिरिजा देवी के मन्दिर में उनके दर्शन के लिए जाऊँगी | आपसे निवेदन है कृपया उसी समय आप मुझे वहाँ से भगा कर ले जाएँ और मुझे पत्नी रूप में स्वीकार करें | यदि ऐसा नहीं हुआ तो मैं अपने प्राण त्याग दूँगी |” रुक्मिणी का संदेश पाकर सन्देशवाहक ब्राह्मण को साथ ले भगवान श्रीकृष्ण रथ पर सवार होकर अकेले ही शीघ्र ही कुण्डिनपुर की ओर चल दिए । इधर बलराम को पूरी घटना का पता चला और यह भी ज्ञात हुआ कि कृष्ण अकेले ही चल दिए हैं रुक्मिणी को लाने तो युद्ध की आशंका हुई उन्हें और वे यादवों की सेना को लेकर कृष्ण की सहायता के लिये चल दिये | दूसरी ओर राजा भीष्मक का सन्देश पाकर शिशुपाल भी निश्चित तिथि पर दल बल के साथ बारात लेकर कुण्डिनपुर जा पहुँचा | शिशुपाल की बारात में जरासंध, शाल्व इत्यादि वे सभी राजा अपनी अपनी सेनाओं के साथ थे जो श्री कृष्ण से वैर रखते थे | सारा नगर शिशुपाल और रुक्मिणी के विवाह के लिये वन्दनवारों तथा तोरणों से सजा हुआ था तथा मंगल वाद्य बजाए जा रहे थे |

सन्ध्या समय रुक्मिणी विवाह के वस्त्रों में सज-धजकर गिरिजा देवी के मंदिर की ओर चल पड़ीं । उनके साथ उनकी सखियाँ तथा बहुत से अंगरक्षक भी थे । गिरिजा देवी की की पूजा करते हुए रुक्मिणी ने उनसे प्रार्थना की कि हे माँ, तुम तो समस्त जगत की माता हो, मेरी मनोकामना पूर्ण करो, आशीर्वाद दो मुझे कि श्रीकृष्ण मुझे यहाँ से ले जाएँ और पत्नी रूप में स्वीकार करें | पूजा अर्चना के बाद घर वापस लौटने के लिये रुक्मिणी अपने रथ पर बैठना ही चाहती थी कि वहाँ पहुँच चुके श्रीकृष्ण ने विद्युत गति से रुक्मिणी का हाथ पकड़ लिया और उन्हें खींचकर अपने रथ पर बैठा लिया और तीव्र गति से द्वारका की ओर चल पड़े । रुक्मिणी के हरण का समाचार तुरन्त राज्य भर में फ़ैल गया | क्रोधित शिशुपाल ने अपने मित्र राजाओं और उनकी सेनाओं के साथ कृष्ण का पीछा किया किन्तु बलराम और यदुवंशी सेनाओं ने उन सबको बीच में ही रोक लिया | भयंकर युद्ध हुआ | शिशुपाल तथा उसकी मित्र सेनाएँ पराजित और निराश होकर वापस अपने अपने राज्यों को लौट गईं | शिशुपाल को पराजित होकर भागते देख रुक्मी ने क्रोध में भरकर प्रतिज्ञा की या तो कृष्ण को बन्दी बनाकर लौटेगा, अन्यथा कुण्डिनपुर में मुँह नहीं दिखाएगा | रुक्मी और कृष्ण के मध्य युद्ध हुआ | रुक्मी पराजित हुआ | श्रीकृष्ण उसका वध करने ही वाले थे कि रुक्मिणी ने उन्हें रोक दिया और कहा कि आप अत्यन्त बलवान होने के साथ साथ कल्याण स्वरूप भी हैं | मेरे भाई का वध आपको शोभा नहीं देता | तब कृष्ण ने उसकी दाड़ी मूँछ काटकर और सर के बाल जगह जगह से उखाड़ कर उसे कुरूप बना दिया | बलराम को उस पर दया आई और उन्होंने कृष्ण को समझाया कि तुमने यह अच्छा नहीं किया । अपने सम्बन्धी को कुरूप बना देने जैसा निन्दित कार्य हम लोगों को शोभा नहीं देता | और बलराम ने स्वयं रुक्मी के बन्धन खोल दिए | अब बलराम को ध्यान आया कि जिस कन्या को वधू के रूप में ले जाया जा रहा है उसी के भाई के साथ इस प्रकार के आचरण से सम्भवतः उसे कष्ट होगा और हो सकता है वह अपने ह्रदय में कृष्ण के प्रति तथा उनके परिवार के प्रति कोई दुराग्रह पाल बैठे | यदि ऐसा हुआ तो कृष्ण का वैवाहिक जीवन सुखी नहीं रह पाएगा | अतः परिवार का ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते उन्होंने रुक्मिणी को समझाया कि तुम्हारे भाई के साथ जो कुछ कृष्ण ने किया उसके कारण मन में किसी प्रकार की दुर्भावना मत रखना, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति को अपने किये कर्म का फल तो भोगना ही पड़ता है | और इस प्रकार भविष्य के लिये वातावरण को विषाक्त होने से बचा लिया | क्योंकि गृहस्थ जीवन में यदि आरम्भ में ही मनों में किसी प्रकार की कटुता उत्पन्न हो जाए तो उसके दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं होते | इस प्रकार रुक्मिणी हरण की घटना गृहस्थ जनों को यह सन्देश भी देती है कि अपने जीवन साथी के प्रति किसी प्रकार की कटुता अथवा दुराग्रह नहीं रखना चाहिये |

कृष्ण ने रुक्मिणी को द्वारिका ले जाकर उनके साथ विधिवत विवाह किया | रुक्मिणी के गर्भ से बाद में कामदेव के अवतार प्रद्युम्न का जन्म हुआ | शिवजी की तपस्या भंग करने पर जब शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया था तो कामदेव की पत्नी रति ने अपने पति को जीवन दान देने की प्रार्थना शिव से की थी | और शिव ने उसे वरदान दिया था कि उसका पति कामदेव कृष्ण की सन्तान के रूप में पुनर्जन्म लेगा |

निम्बार्क सम्प्रदाय की पद्धति में रुक्मिणी को विशेष स्थान प्राप्त है | इस सम्प्रदाय में एक ओर तो गोलोकवासी राधा-कृष्ण की उपासना का विधान है तथा सुख विलास का स्थान अखण्ड वृंदावन को भी माना गया है, किन्तु दूसरी ओर द्वारिकापुरी को अपना धाम और रुक्मिणी जी को अपना इष्ट एवं गरुड़ जी को देवता माना गया है । इन दोनों बातों में सैद्धान्तिक विरोध है । किन्तु यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि एक ही श्री कृष्ण नाम के शरीर में तीन विभिन्न शक्तियों ने अलग-अलग प्रकार की लीला की । बृहत्सदाशिव संहिता में कहा गया है कि परब्रह्म की किशोर लीला का ऐश्वर्य वृंदावन में स्थित है । वह ही गोकुल में बाल रूप की लीला में स्थित है । वैकुण्ठ का वैभव मथुरा और द्वारिका में स्थित है । रास मण्डल में वेद ऋचाओं के द्वारा स्तुति किये जाने पर श्री कृष्ण जी ने उनके साथ लीला करने का वरदान दिया और उनके साथ वृंदावन में सात दिनों तक लीला करके वे मथुरा चले गये । वहाँ पहुँचकर उन्होंने कंस का वध किया | कृष्ण के विरह में व्याकुल वेद ऋचा सखियाँ गोलोक धाम को प्राप्त हुईं । पृथ्वी का भार हरण करने की इच्छा से चक्रधारी विष्णु भगवान कुछ वर्षों तक मथुरा में रहे । इसके बाद वे द्वारिका गये और बाद में वैकुण्ठ में विराजमान हो गये । बृहत्सदाशिव संहिता के इस कथन से यह सिद्ध होता है कि राधा-कृष्ण का अनन्य उपासक यदि रुक्मिणी जी को अपना इष्ट बनाये तो यही कहा जा सकता है कि उसने सार और असार को एक ही में मिला दिया है । अर्थात सांसारिक राग जब भगवत चिन्तन का माध्यम बन जाता है तो वह राग ही प्रेम रस के रूप में परिणत हो जाता है । किसी भी क्रिया में प्रेम और ज्ञान दोनों की संगति आवश्यक है । निम्बार्क के अनुसार श्री कृष्ण ब्रह्म हैं, रुक्मिणी ज्ञान शक्ति और सत्यभामा क्रियाशक्ति हैं । इन दोनों की समाविष्ट पराशक्ति श्री राधा हैं ।

रुक्मिणी वास्तव में भक्ति और प्रेम का सामंजस्य हैं । वह भगवान की भक्त भी हैं और प्रेमी भी । बिना देखे, बिना मिले, कृष्ण के गुणों से, उनके स्वरूप से प्रेम कर बैठीं । प्रेम भी इतना प्रगाढ़ कि मन ही मन उन्हें अपना सर्वस्व तक समर्पित कर दिया । जब प्रेम ऐसा हो जाए – निष्ठा ऐसी हो जाए – तो परमात्मा को खोजने के लिए – सत्य को खोजने के लिये भटकना नहीं पड़ता । वह परमात्मा तो स्वयं ही हमें ढूँढता चला आता है । अर्थात पूर्ण निष्ठावान होकर, एकाग्रचित्त होकर यदि सत्य की खोज की जाए, ज्ञान प्राप्ति की कामना की जाए तो वह सत्य, वह ज्ञान हमें बहुत सरलता से उपलब्ध हो सकता है | रुक्मिणी ने मन में भगवान को सर्वोच्च स्थान दिया अतः भगवान ने स्वयं उनके जीवन में प्रवेश किया | और इस ईश्वर प्राप्ति के लिये रुक्मिणी ने बहुत सोच विचारकर एक विश्वासपात्र ब्राह्मण को सन्देश देकर कृष्ण के पास भेजा | अर्थात ईश्वर की प्राप्ति के लिये माध्यम अर्थात सत्य की प्राप्ति के लिये गुरु किसी ऐसे व्यक्ति को ही बनाना चाहिये जिसे स्वयम् ईश्वर सत्ता का ज्ञान हो – सत्य का ज्ञान हो | सच्चे गुरु का चित्त सदा सन्तुष्ट रहता है | उसे अपने पूर्व पुरुषों द्वारा स्वीकृत धर्म का पालन करने में भी कोई कठिनाई नहीं होती । वह समस्त धर्मों, समस्त विचारों का मनन करना जानता है | तथा सत्यान्वेषण और सत्यप्राप्ति की दिशा में शिष्य का भली भांति तथा उचित विधि से मार्ग दर्शन करता है |

रुक्मिणी भक्त भी हैं और प्रेमी भी । भक्ति और प्रेम के समक्ष सबसे बड़ी कठिनाई यही आती है कि जब मन सत्य में लीन होना चाहता है तो अन्य इन्द्रियाँ उसे अनेक प्रकारों के विकारों में भटकाने का प्रयास करती हैं । किन्तु मन तटस्थ हो, ध्यानावस्थित हो तो कोई भी विकार उसे प्रभावित नहीं कर सकता | रुक्मिणी रूपी मन का परमात्मा अकेला है और शिशुपाल आदि विकार पूरी सेना हैं । किन्तु मन अर्थात रुक्मिणी को तो केवल शाश्वत सत्य अर्थात ईश्वर की ही लगन लगी है, उसी के ध्यान में पूर्ण निष्ठा तथा एकाग्रता के साथ अवस्थित हैं वे | यही कारण है कि सत्य अर्थात परमात्मा स्वयं उसके समक्ष उपस्थित हो गया |

इस प्रकार रुक्मिणी हरण की लीला केवल एक लौकिक लीला ही नहीं वरन् कृष्ण की अन्य लीलाओं के समान इसमें भी बहुत गहन रहस्य छिपे हुए हैं, बहुत गूढ़ सन्देश छिपे हुए हैं |

Wednesday, August 28, 2013

श्री कृष्ण


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संक्षिप्त परिचय -
श्री कृष्ण
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अन्य नाम - द्वारिकाधीश, केशव, गोपाल, नंदलाल, बाँके बिहारी, कन्हैया, गिरधारी, मुरारी आदि
अवतार - सोलह कला युक्त पूर्णावतार (विष्णु)
वंश - गोत्र वृष्णि वंश (चंद्रवंश)
कुल - यदुकुल
पिता - वसुदेव
माता - देवकी
पालक पिता - नंदबाबा
पालक माता -यशोदा
जन्म विवरण - भादों कृष्णा अष्टमी
समय-काल - महाभारत काल
परिजन - रोहिणी बलराम (भाई), सुभद्रा (बहन), गद (भाई)
गुरु - संदीपन, आंगिरस
विवाह - रुक्मिणी, सत्यभामा, जांबवती, मित्रविंदा, भद्रा, सत्या, लक्ष्मणा, कालिंदी
संतान - प्रद्युम्न
विद्या पारंगत - सोलह कला, चक्र चलाना
रचनाएँ - गीता
शासन-राज्य - द्वारिका
संदर्भ ग्रंथ महाभारत, भागवत, छान्दोग्य उपनिषद
मृत्यु - पैर में तीर लगने से
यशकीर्ति - द्रौपदी के चीरहरण में रक्षा करना। कंस का वध करके उग्रसेन को राजा बनाना।
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मैं कोई धार्मिक विवेचन न करना जनता हूँ और न ही भगवान को मानने के लिए किसी को कहता हूँ। और न मैं कहता हूँ की मेरे हैं गिरिधर गोपाल, दूसरो न कोई। पर श्री कृष्ण मेरे अराध्य देवों में एक ज़रूर हैं।

और आज जन्माष्टमी पर मेरे कुछ फेसबुकिया साथी श्री कृष्ण पर टिप्पणी कर रहें हैं जो इस मुहावरे को चरितार्थ करता है कि अधजल गगरी छलकत जाये। कोई गीता के ज्ञान को अपूर्ण मानते हुए अपनी अलग व्यख्या दे रहें हैं। उनको यही कहना चाहूँगा कि थोडा ज्ञान रखने से अच्छा अज्ञानी ही रहना है।

श्री कृष्ण को जानने और समझने के लिए एक जन्म काफी नहीं है। सनातन धर्म के अनुसार भगवान विष्णु सर्वपापहारी पवित्र और समस्त मनुष्यों को भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाले प्रमुख देवता हैं। कृष्ण हिन्दू धर्म में विष्णु के अवतार माने जाते हैं ।
ऐतिहासिक अनुसंधानों के आधार पर श्रीकृष्ण का जन्म लगभग 1500 ई.पू. माना जाता है, जो कि अनुचित है। हिंदू काल गणना अनुसार आज से लगभग 5235 वर्ष पूर्व कृष्ण का जन्म हुआ था।

श्रीकृष्ण साधारण व्यक्ति न होकर युग पुरुष थे। उनके व्यक्तित्व में भारत को एक प्रतिभासम्पन्न राजनीतिवेत्ता ही नही, एक महान कर्मयोगी और दार्शनिक प्राप्त हुआ, जिसका गीता- ज्ञान समस्त मानव-जाति एवं सभी देश-काल के लिए पथ-प्रदर्शक है। कृष्ण की स्तुति लगभग सारे भारत में किसी न किसी रूप में की जाती है।
कृष्ण पूर्ण योगी और योद्धा थे। यमुना के तट पर और यमुना के ही जंगलों में गाय और गोपियों के संग-साथ रहकर बाल्यकाल में कृष्ण ने पूतना, शकटासुर, यमलार्जुन, कलिय-दमन, प्रलंब, अरिष्ट आदि का संहार किया तो किशोरावस्था में बड़े भाई बलदेव के साथ कंस का वध किया और फिर नरकासुर वध ।

यहाँ बताना चाहूँगा की माना जाता है की भगवान कृष्ण को १६,१०८ पत्नियाँ थीं. दरअसल राजकन्याओं से विवाहोपरांत उनकी सिर्फ ८ पत्नियाँ थी। १६,१०० वे थीं जिन्हें नरकासुर का वध करके भगवान कृष्ण ने आज़ाद किया था। उन्हें कहीं जाने को नहीं था, और समाज में प्रतिष्ठता से रह सकें, तो उनके आग्रह पर कृष्ण ने अपने महल में उन्हें पनाह दिए, परन्तु कोई शारीरिक संपर्क नहीं रहा।

देवता के रूप में कृष्ण की पूजा, बाल कृष्ण गोपाल या वासुदेव के रूप में 4 शताब्दी ई.पू. से देखा जा सकता है। 10 वीं सदी ई. से, कृष्ण कला और क्षेत्रीय परंपराओं के प्रदर्शन में एक पसंदीदा विषय बन गए और फिर ओडिशा में भगवान जगन्नाथ, राजस्थान में श्रीनाथजी, महाराष्ट्र में विठोबा के रूप में कृष्ण के रूपों के लिए भक्ति का विकास हुआ। International Society for Krishna Consciousness के कारण1960 के दशक के बाद से कृष्ण की पूजा भी पश्चिम में फैल गया है।

कृष्ण युग पुरुष भी थे और योगी भी इसलिए योगेश्वर कहलाये। वास्तव में कृष्ण जी दो प्रकार के योग में पारंगत थे। पहला तो वहीँ महान पवित्र योग और द्वितीय भृष्ट योग। प्रथम योग के द्वारा जो कि पूर्ण सत्य पर आधारित होता है, भगवान कृष्ण ने अपने शिष्य अर्जुन को विराट रूप दिखाया था। यह रूप कोई भी महान योगी दिखा सकता है. जिसमें वह अपने शरीर में ही पूरे ब्रह्माण्ड के दर्शन करा देता है। द्रोपदी को दुर्वासा क्र श्राप से बचने के लिए जब कृष्ण ने पतीले से एक शेष चावल का दाना ढूंढ़ कर निकाला और उसे खा लिया. और डकार लेते हुए बोले कि अब मेरी भूख शांत होने वाली है। तब भृष्ट योग के द्वारा उन्होंने उस चावल का प्रभाव उन आगंतुकों पर डाला और उनका पेट भी भर गया।

योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने योग की शिक्षा और दिक्षा उज्जैन स्थित महर्षि सांदिपनी के आश्रम में रह कर हासिल की थी। वह योग में पारगत थे तथा योग द्वारा जो भी सिद्धियाँ स्वत: की प्राप्य थी उन सबसे वह मुक्त थे। सिद्धियों से पार भी जगत है वह उस जगत की चर्चा गीता में करते है। गीता मानती है कि चमत्कार धर्म नहीं है। बहुत से योगी योग बल द्वारा जो चमत्कार बताते है योग में वह सभी वर्जित है। सिद्धियों का उपयोग प्रदर्शन के लिए नहीं अपितु समाधि के मार्ग में आ रही बाधा को हटाने के लिए है। गीता में कर्म योग का बहुत महत्व है। गीता में कर्म बंधन से मुक्ति के साधन बताएँ हैं। कर्मों से मुक्ति नहीं, कर्मों के जो बंधन है उससे मुक्ति। कर्म बंधन अर्थात हम जो भी कर्म करते हैं उससे जो शरीर और मन पर प्रभाव पड़ता है उस प्रभाव के बंधन से मुक्ति आवश्यक है।

कृष्ण को ईश्वर मानना अनुचित है, किंतु इस धरती पर उनसे बड़ा कोई ईश्वर तुल्य नहीं है, इसीलिए उन्हें पूर्ण अवतार कहा गया है। कृष्ण ही गुरु और सखा हैं। कृष्ण ही भगवान है अन्य कोई भगवान नहीं। कृष्ण हैं राजनीति, धर्म, दर्शन और योग का पूर्ण वक्तव्य। कृष्ण को जानना और उन्हीं की भक्ति करना ही हिंदुत्व का भक्ति मार्ग है। अन्य की भक्ति सिर्फ भ्रम, भटकाव और निर्णयहीनता के मार्ग पर ले जाती है। भजगोविंदम मूढ़मते।

कालिया नाग :
कदंब वन के समीप एक नाग जाति का व्यक्ति रहता था, जिसे पुराणों ने नाग ही घोषित कर दिया। उक्त व्यक्ति बालक कृष्ण के द्वार पर आ धमका था। जबकि घर में कोई नहीं था, लेकिन बलशाली कृष्ण ने उक्त व्यक्ति को तंग कर वहाँ से भगा दिया। इसी प्रकार वहीं ताल वन में दैत्य जाति का धनुक नाम का अत्याचारी व्यक्ति रहता था जिसे बलदेव ने मार डाला था। उक्त दोनों घटना के कारण दोनों भाइयों की ख्‍याति फैल गई थी।

गोवर्धन पूजा -
गोकुल के गोप प्राचीन-रीति के अनुसार वर्षा काल बीतने और शरद के आगमन के अवसर पर इन्द्र देवता की पूजा किया करते थे। इनका विश्वास था कि इन्द्र की कृपा के कारण वर्षा होती है, जिसके परिणामस्वरूप पानी पड़ता है। कृष्ण और बलराम ने इन्द्र की पूजा का विरोध किया तथा गोवर्धन (धरती माँ, जो अन्न और जल देती है) की पूजा का अवलोकन किया। इस प्रकार एक ओर कृष्ण ने इन्द्र के काल्पनिक महत्त्व को बढ़ाने का कार्य किया, दूसरी और बलदेव ने हल लेकर खेती में वृद्धि के साधनों को खोज निकाला। पुराणों में कथा है कि इस पर इन्द्र क्रुद्ध हो गया और उसने इतनी अत्यधिक वर्षा की कि हाहाकार मच गया। किन्तु कृष्ण ने बुद्धि-कौशल के गिरि द्वारा गोप-गोपिकाओं, गौओं आदि की रक्षा की। इस प्रकार इन्द्र-पूजा के स्थान पर अब गोवर्धन पूजा की स्थापना की गई।

कंस-वध
कृष्ण-बलराम का नाम मथुरा में पहले से ही प्रसिद्ध हो चुका था। उनके द्वारा नगर में प्रवेश करते ही एक विचित्र कोलाहल पैदा हो गया। जिन लोगों ने उनका विरोध किया वे इन बालकों द्वारा दंडित किये गये। ऐसे मथुरावासियों की संख्या कम न थी जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृष्ण के प्रति सहानुभूति रखते थे। इनमें कंस के अनेक भृत्य भी थे, जैसे सुदाभ या गुणक नामक माली, कुब्जा दासी आदि।
कंस के शस्त्रागार में भी कृष्ण पहुंच गये और वहाँ के रक्षक को समाप्त कर दिया। इतना करने के बाद कृष्ण-बलराम ने रात में संभवत: अक्रूर के घर विश्राम किया। अन्य पुराणों में यह बात निश्चित रूप से ज्ञात नहीं हो पाती कि दोनों भाइयों ने रात कहाँ बिताई। कंस ने ये उपद्रवपूर्ण बातें सुनी। उसने चाणूर और मुष्टिक नामक अपने पहलवानों को कृष्ण-बलराम के वध के लिए सिखा-पढ़ा दिया। शायद कंस ने यह भी सोचा कि उन्हें रंग भवन में घुसने से पूर्व ही क्यों न हाथी द्वारा कुचलवा दिया जाय, क्योंकि भीतर घुसने पर वे न जाने कैसा वातावरण उपस्थित कर दें। प्रात: होते ही दोनों भाई धनुर्याग का दृश्य देखने राजभवन में घुसे। ठीक उसी समय पूर्व योजनानुसार कुवलय नामक राज्य के एक भयंकर हाथी ने उन पर प्रहार किया। दोनों भाइयों ने इस संकट को दूर किया। भीतर जाकर कृष्ण चाणूर से और बलराम मुष्टिक से भिड़ गये। इन दोनों पहलवानों को समाप्त कर कृष्ण ने तोसलक नामक एक अन्य योद्धा को भी मारा। कंस के शेष योद्धाओं में आतंक छा जाने और भगदड़ मचने के लिए इतना कृत्य यथेष्ट था। इसी कोलाहल में कृष्ण ऊपर बैठे हुए कंस पर झपटे और उसको भी कुछ समय बाद परलोक पहुँचा दिया। इस भीषण कांड के समय कंस के सुनाम नामक भृत्य ने कंस को बचाने की चेष्टा की। किन्तु बलराम ने उसे बीच में ही रोक उसका वध कर डाला।
अपना कार्य पूरा करने के उपरांत दोनो भाई सर्वप्रथम अपने माता-पिता से मिले। वसुदेव और देवकी इतने समय बाद अपने प्यारे बच्चों से मिल कर हर्ष-गदगद हो गये। इस प्रकार माता-पिता का कष्ट दूर करने के बाद कृष्ण ने कंस के पिता उग्रसेन को, जो अंधकों के नेता थे, पुन: अपने पद पर प्रतिष्ठित किया। समस्त संघ चाहता था कि कृष्ण नेता हों, किन्तु कृष्ण ने उग्रसेन से कहा:- "मैनें कंस को सिंहासन के लिए नहीं मारा है। आप यादवों के नेता हैं । अत: सिंहासन पर बैठें।"

जरासंध वध -
पुराणों के अनुसार जरासंध ने अठारह बार मथुरा पर चढ़ाई की। सत्रह बार यह असफल रहा। अंतिम चढ़ाई में उसने एक विदेशी शक्तिशाली शासक कालयवन को भी मथुरा पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। कृष्ण बलराम को जब यह ज्ञात हुआ कि जरासंध और कालयवन विशाल फ़ौज लेकर आ रहे हैं तब उन्होंने मथुरा छोड़कर कहीं अन्यत्र चले जाना ही बेहतर समझा।
अब समस्या थी कि कहाँ जाया जाय? यादवों ने इस पर विचार कर निश्चय किया कि सौराष्ट्र की द्वारकापुरी में जाना चाहिए। यह स्थान पहले से ही यादवों का प्राचीन केन्द्र था और इसके आस-पास के भूभाग में यादव बड़ी संख्या में निवास करते थे। ब्रजवासी अपने प्यारे कृष्ण को न जाने देना चाहते थे और कृष्ण स्वयं भी ब्रज को क्यों छोड़ते? पर आपत्तिकाल में क्या नहीं किया जाता? कृष्ण ने मातृभूमि के वियोग में सहानुभूति प्रकट करते हुए ब्रजवासियों को कर्त्तव्य का ध्यान दिलाया और कहा-
'जरासंध के साथ हमारा विग्रह हो गया है दु:ख की बात है। उसके साधन प्रभूत है। उसके पास वाहन, पदाति और मित्र भी अनेक है। यह मथुरा छोटी जगह है और प्रबल शत्रु इसके दुर्ग को नष्ट करना चाहता है। हम लोग यहाँ संख्या में भी बहुत बढ़ गये हैं, इस कारण भी हमारा इधर-उधर फैलना आवश्यक है।'
इस प्रकार पूर्व निश्चय के अनुसार उग्रसेन, कृष्ण, बलराम आदि के नेतृत्व में यादवों ने बहुत बड़ी संख्या में मथुरा से प्रयाण किया और सौराष्ट्र की नगरी द्वारावती में जाकर बस गये। द्वारावती का जीर्णोद्वार किया गया और उससे बड़ी संख्या में नये मकानों का निर्माण हुआ। मथुरा के इतिहास में महाभिनिष्क्रमण की यह घटना बड़े महत्त्व की है। यद्यपि इसके पूर्व भी यह नगरी कम-से-कम दो बार ख़ाली की गई थी-पहली बार शत्रुध्न-विजय के उपरांत लवण के अनुयायिओं द्वारा और दूसरी बार कंस के अत्याचारों से ऊबे हुए यादवों द्वारा, पर जिस बड़े रूप में मथुरा इस तीसरे अवसर पर ख़ाली हुई वैसे वह पहले कभी नहीं हुई थी। इस निष्क्रमण के उपरांत मथुरा की आबादी बहुत कम रह गई होगी। कालयवन और जरासंध की सम्मिलित सेना ने नगरी को कितनी क्षति पहुँचाई, इसका सम्यक पता नहीं चलता। यह भी नहीं ज्ञात होता कि जरासंध ने अंतिम आक्रमण के फलस्वरूप मथुरा पर अपना अधिकार कर लेने के बाद शूरसेन जनपद के शासनार्थ अपनी ओर से किसी यादव को नियुक्त किया अथवा किसी अन्य को। परंतु जैसा कि महाभारत एवं पुराणों से पता चलता है, कुछ समय बाद ही श्री कृष्ण ने बड़ी युक्ति के साथ पांडवों की सहायता से जरासंध का वध करा दिया। अत: मथुरा पर जरासंध का आधिपत्य अधिक काल तक न रह सका।
कुछ समय बाद युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ की तैयारियाँ आरंभ कर दी। और आवश्यक परामर्श के लिए कृष्णा को बुलाया। कृष्ण इन्द्रप्रस्थ आये और उन्होंने राजसूय यज्ञ के विचार की पुष्टि की। उन्होंने यह सुझाव दिया कि पहले अत्याचारी शासकों को नष्ट कर दिया जाय और उसके बाद यज्ञ का आयोजन किया जाय। कृष्ण ने युधिष्ठिर को सबसे पहले जरासंध पर चढ़ाई करने की मन्त्रणा दी। तद्नुसार भीम और अर्जुन के साथ कृष्ण रवाना हुए और कुछ समय बाद मगध की राजधानी गिरिब्रज पहुँच गये। कृष्ण की नीति सफल हुई और उन्होंने भीम के द्वारा मल्लयुद्ध में जरासंध को मरवा डाला। जरासंध की मृत्यु के बाद कृष्ण ने उसके पुत्र सहदेव को मगध का राजा बनाया। फिर उन्होंने गिरिब्रज के कारागार में बन्द बहुत से राजाओं को मुक्त किया। इस प्रकार कृष्ण ने जरासंध-जैसे महापराक्रमी और क्रूर शासक का अन्त कर बड़ा यश पाया। जरासंध के पश्चात पांडवों ने भारत के अन्य कितने ही राजाओं को जीता।

शिशुपाल वध -
अब पांडवों का राजसूय यज्ञ बड़ी धूमधाम से आरम्भ हुआ। ब्रह्मचारी भीष्म ने कृष्ण की प्रशंसा की तथा उनकी `अग्रपूजा` करने का प्रस्ताव किया। सहदेव ने सर्वप्रथम कृष्णको अर्ध्यदान दिया। चेदि-नरेश शिशुपाल कृष्ण के इस सम्मान को सहन न कर सका और उलटी-सीधी बातें करने लगा। उसने युधिष्ठिर से कहा कि 'कृष्ण न तो ऋत्विक् है, न राजा और न आचार्य। केवल चापलूसी के कारण तुमने उसकी पूजा की है। शिशुपाल दो कारणों से कृष्ण से विशेष द्वेष मानता था-प्रथम तो विदर्भ कन्या रुक्मिणी के कारण, जिसको कृष्ण हर लाये थे और शिशुपाल का मनोरथ अपूर्ण रह गया था। दूसरे जरासंध के वध के कारण, जो शिशुपाल का घनिष्ठ मित्र था। जब शिशुपाल यज्ञ में कृष्ण के अतिरिक्त भीष्म और पांडवों की भी निंदा करने लगा तब कृष्ण से न सहा गया और उन्होंने उसे मुख बंद करने की चेतावनी दी। किंतु वह चुप नहीं रह सका। कृष्ण ने अन्त में शिशुपाल को यज्ञ में ही समाप्त कर दिया। अब पांडवों का राजसूर्य यज्ञ पूरा हुआ। पर इस यज्ञ तथा पांडवों की बढ़ती हुई साख को देख उनके प्रतिद्वंद्वी कौरवों के मन में विद्वेश की अग्नि प्रज्वलित हो उठी और वे पांडवों को नीचा दिखाने का उपाय सोचने लगे।

महाभारत में यादव -
इस प्रकार कृष्ण भी संधि कराने में असफल हुए। अब युद्ध अनिवार्य हो गया। दोनों पक्ष अपनी-अपनी सेनाएँ तैयार करने लगे। इस भंयकर युद्धग्नि में इच्छा या अनिच्छा से आहुति देने को प्राय: सारे भारत के शासक शामिल हुए। पांडवों की ओर मध्स्य, पंचाल, चेदि, कारूश, पश्चिमी मगध, काशी और कंशल के राजा हुए। सौराष्ट्र-गुजरात के वृष्णि यादव भी पांडवो के पक्ष में रहे। कृष्ण, युयंधान और सात्यकि इन यादवों के प्रमुख नेता थे। ब्रजराम अद्यपि कौरवों के पक्षपाती थे, तो भी उन्होंने कौरव-पांडव युद्ध में भाग लेना उचित न समझा और वे तीर्थ-पर्यटन के लिए चले गये। कौरवों की और शूरसेन प्रदेश के यादव तथा महिष्मती, अवंति, विदर्भ और निषद देश के यादव हुए। इनके अतिरिक्त पूर्व में बंगाल, आसाम, उड़ीसा तथा उत्तर-पश्चिम एवं पश्चिम भारत के बारे राजा और वत्स देश के शासक कौरवों की ओर रहे। इस प्रकार मध्यदेश का अधिकांश, गुजरात और सौराष्ट्र का बड़ा भाग पांडवों की ओर था और प्राय: सारा पूर्व, उत्तर-पश्चिम और पश्चिमी विंध्य कौरवों की तरफ। पांडवों की कुल सेना सात अक्षौहिणी तथा कौरवों की ग्यारह अक्षौहिणी थी।

लेकिन क्या कृष्ण की पूजा सिर्फ हिन्दू करते हैं?

जैन धर्म - जैन धर्म में सबसे ऊंचा स्थान चौबीस तीर्थंकरों हैं। जब कृष्ण को जैन वीरों की सूची में शामिल किया गया तो यह एक समस्या थी क्योंकि वे शांतिवादी नहीं थे। इसे हल करने के लिए बलदेव, वासुदेव और प्रति-वासुदेव की अवधारणा का इस्तेमाल किया गया। जैन महापुरुष की सूची में तिरेसठ शलाकापुरुष थे जिनमें चौबीस तीर्थंकरों और इस त्रय के नौ सेट शामिल थे। इस त्रय में से एक में वासुदेव के रूप में कृष्ण, बलदेव के रूप में बलराम और प्रति-वासुदेव के रूप में जरासंध हैं। वे 22 वें तीर्थंकर नेमिनाथ के चचेरे भाई थे। कृष्ण इनके पास बैठकर इनके प्रवचन सुना करते थे। जैन धर्म ने कृष्ण को उनके त्रैषठ शलाका पुरुषों में शामिल किया है, जो बारह नारायणों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि अगली चौबीसी में कृष्ण जैनियों के प्रथम तीर्थंकर होंगे।
''उन-उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित होकर उस-उस नियम को धारण करके अन्य देवताओं को भजते हैं अर्थात पूजते हैं। परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।''-कृष्ण

बौध धर्म - कृष्ण की कहानी बौद्ध धर्म में जातक कथाओं में, वैभव जातक में है, जहाँ कृष्ण को भारत के राजा के रूप में तथा एक राजकुमार और महान विजेता कहा गया है। बौद्ध संस्करण में, कृष्ण को वासुदेव, कान्हा और केशव कहा जाता है, और बड़े भाई बलराम बलदेव है। ये विवरण भागवत पुराण में दी गई कहानी के जैसे लगते हैं।

बहाई धर्म - बहाई कृष्णा को एक "इश्वर की अभिव्यक्ति" मानते हैं जो धीरे - धीरे परिपक्व होते मानवता के लिए पैगम्बर के श्रेणी में एक के रूप में विश्वास करते हैं।
अहमदिया इस्लाम - अहमदिया समुदाय के मानने वाले उनके संस्थापक मिर्जा गुलाम अहमद द्वारा वर्णित इश्वर के महान पैगम्बर के रूप में होने का विश्वास करते है।

कृष्ण का अंत -
आर्यभट्‍ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ई.पू. में हुआ। नवीनतम शोधानुसार यह युद्ध 3067 ई. पूर्व हुआ था। इस युद्ध के 35 वर्ष पश्चात भगवान कृष्ण ने देह छोड़ दी थी। तभी से कलियुग का आरम्भ माना जाता है।
कृष्ण जन्म और मृत्यु के समय ग्रह-नक्षत्रों की जो स्थिति थी उस आधार पर ज्योतिषियों अनुसार कृष्ण की आयु 119-33 वर्ष आँकी गई है। उनकी मृत्यु एक बहेलिए के तीर के लगने से हुई थी।
ऐसा माना जाता है की जब महाभारत (३१३८ ईसा पूर्व) के ३६ वर्षों बाद जंगल में व्याध जारा के बाण से कृष्ण घायल हुए तो उन्होंने मृत्युलोक छोड़ कर वैकुण्ठ की ओर प्रस्थान किया। वन में श्रीकृष्ण भूमि पर लेटे थे। उस समय एक व्याघ मृगों को मारने की इच्छा से उधर आ निकला। व्याघ ने दूर से श्रीकृष्ण को मृग समझकर उन पर बाण चला दिया। जब वह पास आया तो पीताम्बरधारी कृष्ण को वहाँ देख भयभीत हो खड़ा रह गया।
तब अर्जुन द्वारका आकर कृष्ण के पौत्रों एवं उनके पत्नियों को हस्तिनापुर ले गए। जब अर्जुन द्वारका छोड़े तब यह भव्य शहर समुद्र में समा गया. महाभारत में अर्जुन ने इसका वर्णन इस प्रकार किया है -
......प्रकृति द्वारा यह लाया गया था. समुद्र शहर की ओर तेजी से बढ़ा. समुद्र पूरे शहर को निगल गया। मैंने देखा की ख़ूबसूरत भवन एक एक करके जलमग्न हो रहे थे। कुछ ही क्षण में वह स्थल एक शांत झील में परिवर्तित हो गया। शहर का की निशान नहीं था। द्वारका का सिर्फ नाम रह गया, बस उसकी स्मृति रह गयी।
विष्णु पुराण भी द्वारका के समुद्र द्वारा निगले जाने का जिक्र है - जिस दिन श्री कृष्ण संसार छोड़े उसी दिन कलि-युग का आगमन हुआ। समुद्र मेंवृद्धि हुई और सम्पूर्ण द्वारका जलमग्न हो गया।

अंतत: कृष्ण के जीवन के कई उलझे हुए पहलू हैं जिन्हें समझना आसान नहीं है किंतु फिर भी गहन अध्ययन किया जाए तो उनके जीवन की सच्चाई को जाना जा सकता है। परन्तु सबसे है इस युग पुरुष के धार्मिक, अध्यात्मिक और ऐतिहासिक अस्तित्व को अलग अलग करके देखना।



एक राजनैतिक दल आम आदमी पार्टी की अपील मैं देख रहा था जिसमें दिल्ली के कंस कोंग्रेस को चुनाव में वध करने के लिए इस तरह से आह्वान किया गया है -
भ्रष्टाचार और शोषण की राजनीति के खिलाफ धर्मयुद्ध के महानायक 'श्रीकृष्ण' के जन्मदिवस पर शुभकामनाएं. श्री कृष्ण, एक ऐसे आन्दोलनकारी थे जो पूरा जीवन आम आदमी का शोषण करने वाली सत्ता के खिलाफ लडते रहे. उन्होंने कंस की सत्ता को उखाड़ फेंका था, दिल्ली विधानसभा चुनाव राजनीति में बैठे कंस को खत्म करने का एक मौका होगा. इस जन्माष्टमी पर, अपने अंदर बैठे श्रीकृष्ण को जिंदा कीजिए और आम आदमी पार्टी को वोट देने का संकल्प लीजिए दीजिए.
हरे कृष्ण।