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New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....
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Tuesday, February 3, 2015

नरेंद्र टंडन और किरण बेदी : कुछ पुरानी बातें।


आज सुबह सुबह करीब 10 बजे बीजेपी की ओर से सीएम पद की प्रत्याशी किरण बेदी के प्रचार प्रमुख नरेंद्र टंडन ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था।
उन्होंने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को चिट्ठी लिखी जिसमें कहा कि," मैं भारतीय जनता पार्टी से इस्तीफा दे रहा हूं। मैं पिछले लगभग 30 साल से बीजेपी से जुड़ा रहा हूं और पार्टी के विभिन्न पदों पर रहा हूं। लेकिन आज जिस तरह किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है, मैं उससे आहत हूं।"
परन्तु शाम को अपना इस्तीफा वापस ले लिया है। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि,"मैं पार्टी का निष्ठावान कार्यकर्ता था, हूं और रहूंगा।"
इस पूरे प्रकरण में मुझे 1987 -89 का दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव याद आ रहा है।
छात्र संघ अध्यक्ष पद के लिए नरेंद्र टंडन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रत्याशी थे और किरण बेदी नार्थ दिल्ली की डीसीपी थीं। चुनाव के पूर्व संध्या पर प्रचार के दौरान रात के करीब 11-12 बजे कथित तौर पर कांग्रेस छात्र इकाई NSUI के अपराधिक तत्वों ने नरेंद्र टंडन को घेर लिया और एक खंजर से ठीक उनके ह्रदय के नीचे वार कर उसे आर-पार कर दिया। नरेंद्र गंभीर रूप से घायल थे और तब मुझे किरोड़ीमल कॉलेज में इसकी सूचना हमें देर रात को मिली। इस बीच उन दिनों इंडियन एक्सप्रेस के संपादक अरुण शौरी ने स्वयं नरेंद्र टंडन को अस्पताल में दाखिल करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। नरेंद्र अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़ रहे थे और सवेरे चुनाव के वोटिंग का समय आ गया।
चुकी घटना देर रात की थी तो सिर्फ "पंजाब केसरी" के लगभग 500 कॉपी में रात 2 बजे स्टॉप प्रेस कर यह समाचार छपी थी जिसकी सभी प्रति हमलोगों ने हॉकरों से खरीद ली थी। उन दिनों चैनल्स और मोबाइल का प्रचलन नहीं के बराबर था। अतः सवेरे सवेरे वोटरों को रात को हुए गुंडागर्दी और जानलेवा हमले की जानकारी देना चुनौती थी। किरण बेदी उन दिनों के गृह मंत्री सरदार बूटा सिंह के प्रभाव में थीं और उनकी कांग्रेस से अच्छे सम्बन्ध थे। डीसीपी होने के नाते अखबार में छपे समाचार की संवेदनशीलता को देखते हुए अखबार बांटने पर रोक लगा दी। नरेंद्र प्रिय मित्र थे और उनकी हालत के बारे में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को सूचित करना मुझे नैतिक जिम्मेदारी लग रही थी जिसके बारे में मैं भावुक भी हो गया था। पुलिस से लुका-छिपी खेलते हुए किरोड़ीमल कॉलेज, हिन्दू कॉलेज, हंसराज कॉलेज, रामजस कॉलेज, मिरांडा हाउस आदि में अखबार बाँट दिया और छात्रों को रात की घटना की जानकारी हो गयी। इस बीच किरण बेदी हमलोगों को अनेक बार एरेस्ट करने की चेतावनी दे चुकी थी।
खैर, उस चुनाव में नरेंद्र टंडन भारी मतों से दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष चुने गए। ठीक होकर छात्र संघ के कार्यभार को सँभालने में नरेंद्र टंडन को तीन-चार महीने लग गए, और इस बीच विद्यार्थी परिषद की ओर से छात्र संघ गतिविधियों की देख रेख का भार मुझे ही मिला था।
परन्तु उन दिनों की याद का प्रभाव किरण बेदी के बारे में हमारे राय पर ज़रूर है। और मुझे आश्चर्य नहीं है जब आवेश में नरेंद्र टंडन ने कल बयान दिया था कि,"जिस किरण बेदी ने भाजपा कार्यकर्ताओं पर निर्ममता से डंडे बरसाए थे, ना जाने कितने कार्यकर्ताओं के सिर फटे, टांगे टूटी और वो किरण बेदी आज हम पर राज करेगीं।"
लेकिन अच्छा है की मामला टूल पकड़ने से पहले सुलझ गया है।
(तस्वीर में भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्री श्री जगत प्रकाश नड्डा जी , दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ पूर्व अध्यक्ष नरेंद्र टंडन के साथ मैं (सूरज यादव).


Wednesday, January 30, 2013

एक आन्दोलन का बिखराव - इंडिया अगेंस्ट करप्शन से जनतत्र मोर्चा तक.....


भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अन्ना हजारे की जनतंत्र रैली को लेकर पटना की जनता पर कोई ख़ास उत्साह नहीं दिखा। स्थानीय गांधी मैदान में दोपहर बाद आयोजित इस रैली में बहुत ज़्यादा भीड़ नहीं दिखी।

दरअसल शुरुआत ही पटना में गलत हुआ। सुशासन बाबू से तालमेल के बाद इस रैली को भ्रष्टाचार विरोध की जगह जनतंत्र रैली कहा गया। बिहार में सुशासन बाबू की भ्रष्टाचार से त्रस्त लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ की नितीश कुमार अन्ना की तारीफ कर यह सन्देश दे रहे थे की उन्ही के छत्रछाया में यह रैली हो रही है। अगर अन्ना आज नितीश के विरुद्ध हुंकार भरते तो बेशक उनका जादू चल जाता। वैसे, बिहार की जनता ने इतना ज़रूर याद रखा है की राज ठाकरे जैसे कलुषित बोल नेता के बिहार विरोधी अनर्गल प्रलाप का अन्ना ने विरोध नहीं किया।

टीम अन्ना के एक सदस्य के अनुसार , “यह तक साफ नहीं है कि यह रैली किसकी है और कौन इसे करवा रहा है। यह जनरल वी. के. सिंह की प्रायोजित रैली है या फिर उनके करीबी बिजनेसमैन इसकी फंडिंग कर रहे हैं। पहले पटना प्रशासन भी रैली के लिए सहयोग नहीं कर रहा था, अब वहां के मुख्यमंत्री खुद इसमें रुचि ले रहे हैं। इस रैली में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के नाम का भी इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है।”

अन्ना के आन्दोलन का यह हश्र होने से हम जैसे भ्रष्टाचार विरोधियों को निराशा हुई है। जो आन्दोलन कांग्रेस जैसी पार्टी के आगे नहीं झुकी, जिसे स्वामी अग्निवेश(कपिल मुनि!) जैसे भीतरघातियों तोड़ने में कामयाब नहीं हुए, वह अपने ही टीम के अहम् और महत्वकांक्षा का शिकार हो गयी है।

इसमें मैं अरविन्द केजरीवाल का उतना ही दोष मानता हूँ जितना उन्होंने पार्टी की गठन की जल्दीबाजी में दिखाई। अगर रोज़ दिग्विजय सिंह जैसे नेता यह चुनौती दें की आप चुनाव लड़ कर आओ और तब कुछ बोलो, तो चुनाव के लिए तैयार होने के अलावे कोई चारा नहीं बच रहा था। लेकिन जब अरविन्द ने कांग्रेस के साथ-साथ भा जा पा को भी निशाने पर लिया तो उनका एजेंट किरण बेदी को यह नागवार गुजरा। अन्ना के आन्दोलन के बिखराव के लिए किरण बेदी ही अधिक जिम्मेदार है। जो पुलिस सेवा के दौरान इनके राजनैतिक ताल मेल से वाकिफ हैं, वे मुझसे ज़रूर सहमत होंगे।


किंतु इसी बीच यह खबर भी आ रही है कि टीम अन्ना का दिल्ली कार्यालय बंद हो रहा है। मकान मालिक महेश शर्मा के अनुसार , “हम अब नए किराएदार की तलाश कर रहे हैं। कार्यालय का अनुबंध भ्रष्टाचार विरोधी जनआंदोलन (रालेगण सिद्धि) के श्याम सुंदर के नाम से है। किरन बेदी इसमें गवाह बनी थीं। उन्होंने हमसे कहा कि 1 लाख रुपये सुरक्षा राशि में से 50 हजार रुपये इस महीने का किराया काट कर बाकी के 50 हजार का चेक बना कर उन्हें दे दें। हम दुविधा में हैं क्योंकि अनुबंध में किसी और का नाम है।”