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New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....
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Wednesday, September 19, 2018

#DUSU चुनावों में #ईवीएम: भारत के चुनाव आयोग का इस सम्बन्धी 13.9.2018 का बयान क्यों भ्रामक है?


चुनाव आयोग ने दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में प्रयोग #ईवीएम से किसी तरह से लेने देने से इंकार किया है, जबकि पिछले ही वर्ष चुनाव आयोग की सहमति से दिल्ली विश्वविद्यालय को ईवीएम फिर से मुहैया किया गया। इसके पहले भी चुनाव आयोग के आदेश पर ही पहली बार सरकारी कंपनी ईसीआईएल ने दिल्ली विश्वविद्यालय को सन 2006 में ईवीएम सप्लाई किया था। कोई भी व्यक्ति या संस्था बिना चुनाव आयोग के आदेश के ईवीएम प्राप्त नहीं कर सकता।
कुछ तथ्य:
शैक्षणिक वर्ष 2005-2006 में स्वामी श्रद्धानन्द कॉलेज छात्र संघ के चुनाव अधिकारी के रूप में, मैंने ईवीएम मशीनों के द्वारा कॉलेज छात्र संघ चुनाव आयोजित करने के लिए ईवीएम मशीनों को उधार देने के लिए भारत के निर्वाचन आयोग से संपर्क किया था। वह पहली बार #ईवीएम का छात्र संघ चुनाव में प्रयोग होता।
चूंकि तब चुनाव बहुत नजदीक था,(2 सितंबर, 2005), अतः भारत का निर्वाचन आयोग, अपने दिनांक 25 अगस्त, 2005 के पत्र संख्या 51/8/4/2005-पीएलएन -4 से प्रिंसिपल, स्वामी श्रद्धानन्द कॉलेज को सूचित किया गया कि "आयोग आपके द्वारा अनुरोध किए गए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को उधार देने की स्थिति में नहीं है।" (उस समय का, बतौर चुनाव अधिकारी, मेरे द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति की प्रति, संलग्न है।)
हालांकि, अगले वर्ष, 2006 में, दिल्ली विश्वविद्यालय ने घोषणा की कि आने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ (डीयूएसयू) चुनाव एक से अधिक तरीकों से ऐतिहासिक होंगे। हाई-टेक जाकर, वे पार्टियों को एसएमएस और ई-मेल जैसे दिन के संचार उपकरण का उपयोग पर ध्यान देने की इच्छा रखते हैं। परन्तु विशेष बात यह थी कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (#ईवीएम) का इस्तेमाल देश के विश्वविद्यालय चुनावों में पहली बार किया जाना था।(यह समाचार 'द हिंदू' समेत कई समाचार पत्रों में यह रिपोर्ट छपा था। 24 अगस्त, 2006 'द हिन्दू' अखबार का स्क्रीनशॉट संलग्न है। लिंक है: Electronic voting machines for DUSU elections now https://www.thehindu.com/…/electronic-vo…/article3095105.ece....। (परसों से द हिन्दू ने इस लिंक से समाचार हटा लिया है। )
चुनाव आयोग ने विश्वविद्यालय की जरूरतों के अनुरूप विशेष रूप से डिजाइन की गई मशीनों का आदेश दिया था।
दिल्ली विश्वविद्यालय के तत्कालीन प्रोक्टर प्रोफेसर गुरमीत सिंह, जो वर्तमान में पांडिचेरी विश्वविद्यालय के कुलपति के रूप में कार्यरत हैं, ने उस समय कहा था कि, "विश्वविद्यालय को केवल 18 अगस्त को ही ईवीएम मशीनों के लिए औपचारिक अनुमति मिली।... इस ईवीएम में हमारे लिए अलग आवश्यक सुविधाएं देनी हैं। अलग अलग पोस्ट के लिए कई छात्र चुनाव लड़ेंगे। मशीन का इस्तेमाल कॉलेज यूनियन चुनावों के लिए भी किया जाएगा, इसलिए हम उन आम मशीनों का इस्तेमाल नहीं कर सकते थे जिनका इस्तेमाल आम चुनावों के लिए किया जाता था।''
ऐसा कहा जाता था कि ईसीआईएल ने ईसीआई के निर्देशों पर ईवीएम को दिल्ली विश्वविद्यालय को आपूर्ति की थी। यह वास्तव में दिलचस्प है कि भारत के निर्वाचन आयोग ने दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनावों में इस्तेमाल ईवीएम से किसी भी तरह से कोई लेने देने से इंकार कर दिया है। (चुनाव आयोग की 13.9.18 दिनांकित पत्र की प्रतिलिपि संलग्न है।)
उस समय दिल्ली विश्वविद्यालय ने मशीनों की लागत प्रत्येक मशीन के लिए अनुमानित राशि लगभग 10,000 रु प्रति मशीन माना था। प्रोफेसर गुरमीत सिंह ने कहा, "हम यह राशि अग्रिम एडवांस दे सकते हैं और फिर व्यय का एक हिस्सा कॉलेजों को स्थानांतरित कर सकते हैं। '
तदनुसार इसलिए सभी कालेजों को प्रत्येक चुनाव में #ईवीएम के इस्तेमाल के लिए कुछ राशि विश्वविद्यालय को देना पड़ता हैं। उदहारण के लिए पिछले वर्ष स्वामी श्रद्धानन्द कॉलेज छात्र संघ चुनाव के चुनाव अधिकारी के रूप में मैंने किंस्वे कैंप स्थित विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव कण्ट्रोल रूम में ईवीएम वापस सौंपते समय 34,000/ - रुपये का डिमांड ड्राफ्ट सौंप कर, रसीद प्राप्त की।
पिछले साल, ईवीएम की समस्या फिर से हुई थी। चूंकि केवल कुछ ही ईवीएम दिए जाते हैं, जिससे मतदान के दौरान छात्रों की लंबी कतार हो जाती है, अतः हम, स्वामी श्रद्धानन्द कॉलेज की ओर से विश्वविद्यालय से अधिक ईवीएम मांगे थे। इस बीच, हमें पता चला कि विश्वविद्यालय भी ईवीएम की कमी के कारण समस्याओं का सामना कर रहा था और ईसीआई से अनुरोध किया था कि वह या तो ईवीएम किराए पर दे या विश्वविद्यालय को खरीदने की अनुमति दें, जैसा कि पहले किया गया था। प्रारंभ में, आयोग ने इनकार कर दिया, क्योंकि उन्होंने कुछ अन्य विश्वविद्यालयों से इनकार कर दिया था, लेकिन फिर आयोग की बैठक के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय को #ईवीएम प्राप्त करने के बाद अनुमति दी गई थी। इस मामले की जानकारी संबंधित कार्यालयों के साथ उपलब्ध है।
अब ईवीएम के कार्यप्रणाली पर: हर साल, ईवीएम कंपनी के तकनीकी विशेषज्ञ, आवश्यकता के अनुसार ईवीएम को प्रोग्राम करने के लिए विश्वविद्यालय आते हैं। यह प्रग्रामिंग प्रति पद पर चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों के अनुरूप लिया जाता है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि अलग-अलग पदों के लिए अलग-अलग पोलिंग पैनल (मतदान बोर्ड की इकाइयां) होती हैं, जबकि वोट यानि सूचनाओं को संग्रहित करने के लिए एक ही नियंत्रण इकाई (कण्ट्रोल पैनल) होता है। इसमें परेशानियाँ हो सकती है। कुछ इसी तरह कि शिकायत 2018 में माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा निपटाए गए याचिका (संजय बनाम दिल्ली विश्वविद्यालय और अन्य) में उल्लिखित शिकायतें हो सकती हैं। इस पेटिशन में बताया गया कि एक ही कॉलेज में मतदान करने वाले एक ही संख्या के छात्रों के मतगणना में अलग अलग वोट पाए हए। विभिन्न पदों के लिए मतदान किए गए विभिन्न मतों से संबंधित पेटीशन के प्रासंगिक हिस्सों की प्रतिलिपि संलग्न है।
इस साल भी यह जानना महत्वपूर्ण है कि कौन से कॉलेज ईवीएम दोषपूर्ण थे?
(डॉ सूरज यादव)

Wednesday, June 17, 2015

CBSC : सीबीसीएस? उच्च शिक्षा पर लगातार कुठाराघात !



दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र और शिक्षक फिर सड़क पर आने को मजबूर है। कारण नरेंद्र मोदी की सरकार आने से देश 'कांग्रेस मुक्त भारत' बनने की दिशा में कदम तो बढ़ाया पर असल में देश अभी भी कांग्रेस-नीत भारत ही है।
पिछले वर्ष ही छात्र-शिक्षक संघर्ष के दबाब में सरकार ने चार -साल के बेसिरपैर की पाठ्यक्रम (कोर्स) FYUP को दिल्ली विश्वविद्यालय से हटाया। अब फिर से तथाकथित "सुधार" के नाम पर उसी घटिया कोर्स को तीन वर्ष के ढाँचे में सीबीसीएस (CBCS) के नाम पर थोपा जा रहा है। इससे न विद्यार्थियों को बेहतर शिक्षा मिलेगी और न ही वे रोज़गार के लिए तैयार हो सकेंगें।
इस बार देश के सभी कॉलेज और विश्वविद्यालय में जुलाई 2015 से ही चॉइस बेस्ड क्रेडिट सीस्टम (CBCS) लागू करने की घोषणा की गयी है।
इस तरह से देश में उच्च शिक्षा के स्तर को बेहतर बंनाने की जगह इसे विदेशी और निजी हाथों में सौंपने की तैयारी की जा रही है जिससे देश की उच्च शिक्षा के साथ साथ छात्र-छात्राओं की भविष्य के साथ खिलवाड़ होगी।

सीबीसीएस (CBCS) क्या है ?
दरअसल अमेरिका में 12 वीं के बाद अक्सर माँ-बाप बच्चों की शिक्षा के लिए बच्चों को उन्हीं के हाल पर छोड़ देते हैं। बच्चे नौकरी करने के साथ साथ 6 महीने तक पैसे इकठ्ठा कर या लोन लेकर निजी संस्थाओं से क्रेडिट लेते हैं और कई वर्षों में क्रेडिट को इकठ्ठा कर डिग्री लेते हैं। नतीजा साधारण अमरीकी विद्यार्थी का स्तर भारत के आम विद्यार्थी से कहीं नीचे रहता है। इसकी एक झलक हम तब देखते हैं जब अमरीका में नासा (NASA) सहित अनेक वैज्ञानिक, मैनजमेंट, सामाजिक शास्त्र के संस्थानों में भारत से शिक्षित कार्यरत हैं। पर पिछली कांग्रेसी सरकार और अब कांग्रेस-नीत मोदी सरकार उच्च शिक्षा का श्रेष्ठ केंद्र दिल्ली विश्वविद्यालय पर इसलिए लगातार कुठाराघात कर रही है क्योंकि साधारण फीस में यहीं लाखों विद्यार्थी अच्छी शिक्षा प्राप्त करते हैं और लाखों फीस लेने वाले निजी संस्थानों की बिजनेस चल नहीं रही है। इधर भारत जैसे माहौल में जहाँ मंत्री भी फ़र्ज़ी डिग्री ले आते हैं, वहां कई वर्षों में घूम घूम कर तथाकथित "क्रेडिट" से क्या डिग्री का हश्र होगा यह हम समझ सकते हैं। साथ ही अमरीकी व्यवस्था की अंधी नक़ल शिक्षा के बाजारीकरण के अलावे पी चिदंबरम, कपिल सिबल, सुषमा स्वराज आदि के पुत्र-पुत्री, भतीजा-भतीजी के शिक्षा के "एडजस्टमेंट" के भी कारण है।
इसलिए चॉइस यानि मनपसंद कोर्स चुनने की सहूलियत दरअसल उन्हीं को मिल पायेगी जो ऊँची फीस दे सकेंगे।

इसलिए सीबीसीएस (CBCS) का मक़सद:
* चॉइस के नाम पर सरकारी संस्थानों को प्राइवेट संस्थानों के अधीन बनाना।
* सरकारी संस्थानों को बर्बाद करके छात्रों को प्राइवेट संस्थानों में जाने के लिए मज़बूर करना।
* उच्च शिक्षा का बाजारीकरण करके इसको धंधा-कारोबार में बदलने का मंसूबा।
* औने-पौने वेतन शिक्षकों को ठेकेदारी (contractual) पर बहाल करके और ऊंची फीस लेकर निजी संस्थानों को मुनाफे का अवसर देना।
* जनता से टैक्स उसूल कर देशी विदेशी मुनाफाखोरों को फायदा पहुँचाने की साज़िश।
इस तरह कांग्रेस-नीत सरकार पुराने कांग्रेसी सरकार के रास्ते चल कर, जिस तरह पहले सरकारी स्कूलों और सरकारी अस्पतालोंको बर्बाद किया गया है, वैसे ही अब इनका अगला निशाना उच्च शिक्षा है।

कुल मिला कर जो फटीचर शिक्षा के लिए भी लाखों की फीस से सकेंगे (मजेदार बात है इसके लिए शिक्षा लोन भी उपलब्ध करा देतें हैं), वही अब शिक्षा प्राप्त कर सकेंगे।
गरीब, देहात के नौजवान, महिलाओं, पिछड़े, दलित को नतीजन शिक्षा से बाहर करने की विदेशी प्रायोजित इस साज़िश को नाकाम करना हर देशभक्त का कर्तव्य है। इसके विरुद्ध दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (DUTA) के आंदोलन को अपना सहयोग और समर्थन दने की हमारे अपील पर विचार करें।

जय हिन्द।

Tuesday, February 3, 2015

नरेंद्र टंडन और किरण बेदी : कुछ पुरानी बातें।


आज सुबह सुबह करीब 10 बजे बीजेपी की ओर से सीएम पद की प्रत्याशी किरण बेदी के प्रचार प्रमुख नरेंद्र टंडन ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया था।
उन्होंने बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को चिट्ठी लिखी जिसमें कहा कि," मैं भारतीय जनता पार्टी से इस्तीफा दे रहा हूं। मैं पिछले लगभग 30 साल से बीजेपी से जुड़ा रहा हूं और पार्टी के विभिन्न पदों पर रहा हूं। लेकिन आज जिस तरह किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है, मैं उससे आहत हूं।"
परन्तु शाम को अपना इस्तीफा वापस ले लिया है। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि,"मैं पार्टी का निष्ठावान कार्यकर्ता था, हूं और रहूंगा।"
इस पूरे प्रकरण में मुझे 1987 -89 का दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव याद आ रहा है।
छात्र संघ अध्यक्ष पद के लिए नरेंद्र टंडन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रत्याशी थे और किरण बेदी नार्थ दिल्ली की डीसीपी थीं। चुनाव के पूर्व संध्या पर प्रचार के दौरान रात के करीब 11-12 बजे कथित तौर पर कांग्रेस छात्र इकाई NSUI के अपराधिक तत्वों ने नरेंद्र टंडन को घेर लिया और एक खंजर से ठीक उनके ह्रदय के नीचे वार कर उसे आर-पार कर दिया। नरेंद्र गंभीर रूप से घायल थे और तब मुझे किरोड़ीमल कॉलेज में इसकी सूचना हमें देर रात को मिली। इस बीच उन दिनों इंडियन एक्सप्रेस के संपादक अरुण शौरी ने स्वयं नरेंद्र टंडन को अस्पताल में दाखिल करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। नरेंद्र अस्पताल में जिंदगी और मौत से लड़ रहे थे और सवेरे चुनाव के वोटिंग का समय आ गया।
चुकी घटना देर रात की थी तो सिर्फ "पंजाब केसरी" के लगभग 500 कॉपी में रात 2 बजे स्टॉप प्रेस कर यह समाचार छपी थी जिसकी सभी प्रति हमलोगों ने हॉकरों से खरीद ली थी। उन दिनों चैनल्स और मोबाइल का प्रचलन नहीं के बराबर था। अतः सवेरे सवेरे वोटरों को रात को हुए गुंडागर्दी और जानलेवा हमले की जानकारी देना चुनौती थी। किरण बेदी उन दिनों के गृह मंत्री सरदार बूटा सिंह के प्रभाव में थीं और उनकी कांग्रेस से अच्छे सम्बन्ध थे। डीसीपी होने के नाते अखबार में छपे समाचार की संवेदनशीलता को देखते हुए अखबार बांटने पर रोक लगा दी। नरेंद्र प्रिय मित्र थे और उनकी हालत के बारे में दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को सूचित करना मुझे नैतिक जिम्मेदारी लग रही थी जिसके बारे में मैं भावुक भी हो गया था। पुलिस से लुका-छिपी खेलते हुए किरोड़ीमल कॉलेज, हिन्दू कॉलेज, हंसराज कॉलेज, रामजस कॉलेज, मिरांडा हाउस आदि में अखबार बाँट दिया और छात्रों को रात की घटना की जानकारी हो गयी। इस बीच किरण बेदी हमलोगों को अनेक बार एरेस्ट करने की चेतावनी दे चुकी थी।
खैर, उस चुनाव में नरेंद्र टंडन भारी मतों से दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष चुने गए। ठीक होकर छात्र संघ के कार्यभार को सँभालने में नरेंद्र टंडन को तीन-चार महीने लग गए, और इस बीच विद्यार्थी परिषद की ओर से छात्र संघ गतिविधियों की देख रेख का भार मुझे ही मिला था।
परन्तु उन दिनों की याद का प्रभाव किरण बेदी के बारे में हमारे राय पर ज़रूर है। और मुझे आश्चर्य नहीं है जब आवेश में नरेंद्र टंडन ने कल बयान दिया था कि,"जिस किरण बेदी ने भाजपा कार्यकर्ताओं पर निर्ममता से डंडे बरसाए थे, ना जाने कितने कार्यकर्ताओं के सिर फटे, टांगे टूटी और वो किरण बेदी आज हम पर राज करेगीं।"
लेकिन अच्छा है की मामला टूल पकड़ने से पहले सुलझ गया है।
(तस्वीर में भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्री श्री जगत प्रकाश नड्डा जी , दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ पूर्व अध्यक्ष नरेंद्र टंडन के साथ मैं (सूरज यादव).


Thursday, July 25, 2013

24 जुलाई, 1987, मौरिस नगर चौक, दिल्ली विश्वविद्यालय, कार्यक्रम - भ्रष्टाचार के विरूद्ध विश्वनाथ प्रताप सिंह की सिंहगर्जना।



1 अप्रैल, 1987 को राजीव गाँधी की सरकार से भ्रष्टाचार के गंभीर मुद्दे पर विवाद के बाद वित्त-मंत्री के पद से विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इस्तीफा दे दिया था। एक दो दिन बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र नेता होने के नाते मैं और दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के महासचिव नरेन्द्र टंडन विश्वनाथ प्रताप सिंह से मिल कर भ्रष्टाचार के विरुद्ध दिल्ली विश्वविद्यालय में एक सभा संबोधित करने का निवेदन किया। उस समय परीक्षाएं चल रही थी, इसलिए राजा साहब(मैं इसी तरह उन्हें संबोधित करता था) ने छुट्टियों के बाद विश्वविद्यालय खुलने पर 24 जुलाई को आने को राजी हुए। वर्तमान सांसद जगत प्रकाश नड्डा जी, जो उस समय विद्यार्थी परिषद् से संबधित थे, मुझे कार्यक्रम करने को प्रोतसाहित करते किया। परन्तु 23 जुलाई की देर शाम सेंट स्टीफेंस कॉलेज में आते वक़्त NSUI के कर्यकर्ताओं द्वारा विश्वनाथ प्रताप सिंह पर पेट्रोल बम से जानलेवा हमला किया गया। राजा साहब बाल-बाल बचे।

अगली सुबह सभी अख़बारों के सुर्ख़ियों में यह हमला था। मुझे लगा की 24 जुलाई का कार्यक्रम फ्लॉप हो जायेगा और रद्द करना पड़ेगा। किसी तरह मैंने श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह जी को कार्यक्रम में आने के लिए राजी कर लिया। और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों, कर्मचारियों और प्रोफेसरों ने जो समर्थन दिया, और जो भीड़ हुई वह अभूतपूर्व था।

समापन भाषण में मैंने कहा, : ऐसा नहीं है की दिल्ली विश्वविद्यालय में किसी सम्मानीय व्यक्ति को सुनने के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। हमारे पास ऑडिटोरियम है, लेक्चर हाल हैं, ग्राउंड है। लेकिन कांग्रेस के इशारे पर कुलपति ने हमें कोई भी सुविधा देने से इनकार कर दिया और इस सभा पर पाबन्दी लगा दी। मजबूर होकर हमें यह सभा वहिंकरनी पद रही है जहाँ श्रीमति इंदिरा गाँधी के विरुद्ध पहली बार जयप्रकाश नारायण ने सभा की थी जिसके परिणामस्वरूप श्रीमति गाँधी सत्ता से हटी थी। आज की सभा का अपरिणाम फिर वही होगा। कांग्रेस सत्ता से हटेगी और भावी प्रधानमंत्री राजा विश्वनाथ प्रताप सिंह का मैं स्वागत करता हूँ। जय हिन्द .:

Tuesday, January 15, 2013

कांग्रेस नीत यू पी ए की सोनिया-मनमोहन सरकार की जनता के साथ गुंडागर्दी की हद - अब आई आई टी के बाद आई आई ऍम की फीस तीन गुना बढाई। Fee hike in IIT & IIM.


कांग्रेस नीत यू पी ए की सोनिया-मनमोहन सरकार की जनता के साथ गुंडागर्दी की हद - अब आई आई टी के बाद आई आई ऍम की फीस तीन गुना बढाई।

केंद्र की कांग्रेस नीत यू पी ए सरकार सोनिया गाँधी की क्षत्र-छाया में और अमरीकी खवास सरदार मनमोहन सिंह के नेतृत्व में बार-बार गरीब विरोधी फैसले ले रही है और लोगों के धैर्य पर मोहित हो रही है। इस बार जनता के पैसे पर बने आई आई टी की फीस 80% बढ़ाते हुए प्रति वर्ष 90,000/- रुपये से अधिक कर (पूरे कोर्स के लिए 3लाख,60 हज़ार से भी अधिक), अपनी पीठ थप-थपा रही है। गौरतलब है की मामूली पृष्ठभूमि के छात्र आई आई टी में कम्पीट कर भी जायें तो शिक्षा उनसे दूर हो, इसका भरसक प्रयास विदेशी प्रभाव में किया जा रहा है। इसी मकसद के तहत दिल्ली विश्वविद्यालय और जे एन यू जैसे जनसाधारण के पहुँच के केन्द्रीय शैक्षिक संस्थाओं को योजनाबद्ध तरीके से तहस-नहस किया जा रहा है, और उनके फीस को बढ़ाने का दवाब निरंतर जारी है। दिल्ली विश्वविद्यालय में तो पिछले तीन-चार वर्षों से कोई स्थायी नियुक्ति नहीं हुई है। यह सब उन विदेशी और निजी संस्थाओं के लिए किया जा रहा है, जिनमें अधिकांस मानकों से नीचे हैं, परन्तु मंत्रियों और यु जी सी अधिकारीयों की जेबे गरम करते हैं। आज महिलाओं के साथ दुराचार पर देश आहत है, परन्तु शिक्षा व्यवस्था का बलात्कार भी नेताओं द्वारा बदस्तूर जारी है।

कुछ ही दिनों पहले आई आई टी की फीस 80% बढ़ाने के बाद यह जनविरोधी सरकार ने जनता के पैसे पर बनायीं गयी सभी आई आई एम् (भारतीय प्रबंधन संस्थान) की फीस में 60,000/- रुपये से तीन गुना बढ़ा कर 1.80 लाख रुपये कर दी है। पूरे सत्र के लिए अब यह 7.4 लाख रुपये से बढ़ कर 16.6 लाख रुपये हो गयी है। इसके पहले 2008 में आई आई एम् ने 6 गुना बढ़ा कर 2 लाख से 12 लाख किया था। विश्व बेंक के दलाल अर्थशास्त्री भांड गैस, पेट्रोल, डीजल की मूल्यवृद्धि पर तो कहते हैं की 'लागत' तो जनता से वुसूल करना ही होगा। अब जनता के पैसे पर बनी ये संस्थान किसके बाप की लागत से बनी है की इसे आमीरों के चोंचले बनाने की कवायद जारी है।

और कहाँ गए वे महानुभाव जो 'आर्थिक आधार' की वकालत करते हैं? जब कभी सार्वजानिक संस्थानों में आरक्षण की बात आती है तो जाने कहाँ से समाज के जातिवादी शोषकों के आंख से 'आर्थिक दृष्टि से कमजोर वर्गों' के लिए घडियाली आंसू बहने लगते है। अब गरीबों के साथ हो रहे नाइंसाफी पर न तो इनका और न ही जातिवादी मीडिया का खून खौलता है? फेसबुक पर मैंने देखा की एक महाशय ने आई आई टी की फीस की वृद्धि के समाचार में सिर्फ उस अंश को चिन्हित किया था, जहाँ लिखा था की SC/ST वर्गों को फीस में छूट है। वाह रे क्रांतिकारी। सामान्य वर्ग के साथ अन्याय को दलितों के आर में छुपा कर कौन तीर मार लोगे? और कर ही क्या लोगे? सर पर मनमोहन वही कर रहा है जो वह जबान से नहीं कर सकता। और विपक्ष के जिन नेताओं के भरोसे हो, उममें इतना ही दम है की वे कितना भी भ्रष्ट साबित हों, अपने जाति के बूते ही 'पूर्ती' घोटाले से बचते रहेंगे।

मुझे अब भी भरोसा है की जनसाधारण के लिए विष उगलने वाली इस कालिया सांप रुपी मनमोहन सरकार को चुनाव में कोई पिछड़े वर्ग का ही कोई नेता नाथेगा, जैसा उत्तर प्रदेश में हुआ।

Friday, February 17, 2012

Delhi University – out of bounds for its own students and teachers!

A University should be a place of light, of liberty, and of learning.




~Benjamin Disraeli.

Prof Dinesh Singh, the Lord Saheb Vice Chancellor of Delhi University, it seems, has promulgated a new Farmaan – ‘no vehicle of anyone except the Vice-Chancellor’s is permitted in the premises of Vice-Chancellor’s office’, which incidentally apart from having Delhi University Administrative block and the Examination Branch also houses public utility places like the State Bank of India, ICICI Bank, the Post Office, General Store etc. As a result one can see the vehicles lined up on the University Marg, leading from Mall Road to Malkaganj.

Earlier, the Vice-Chancellor blocked the road in front of the Vice-Chancellor’s office, towards the big park, on the western side having entry from the Botany Department, to be used exclusively for himself. An archaic and foolishly feudal step, something which even during the days when the building was the British Viceroy’s residence, did not happen. Interestingly, with the elaborate bureaucratic procedures in which the Vice-Chancellor's PA and four other staff are involved, it is next to impossible for any teacher to meet the VC, let alone any student try so.

The tendency to barricade and restrict the Vice-Chancellor’s office has unfortunately been taking place since the tenure of Prof Moonis Raza and it seems every incumbent has been worse than the previous one in this regard. But the present Vice-Chancellor has broken all records in ‘exclusivity’, and it is difficult to see whether the reason for this mentality lies in his feudal thinking or St Stephen’s complex.

The question is whether such an order is at all required? It also raises the basic proposition, ‘whose University is it anyway?’

The answer to the second question will automatically answer the first. The word university is derived from the Latin universitas magistrorum et scholarium, which roughly means "community of teachers and scholars." It is implied that the most important part of the University are the students and the teachers. To restrict University campus areas and places for use of only the University Authorities is simply un-academic and abusive. Someone rightly said, “The University brings out all abilities, including incapability.”

My firm belief and forthright opinion is that such an order and moreover this mentality should be opposed tooth and nail, both by the teachers and the students. A defunct Students Union and an ineffective Teachers body have proven to be of great convenience to the “Lord Saheb” and it is upon the general teachers and students to contribute towards letting the University remain for students and teachers rather than be exclusive domain of privileges of the functionaries.

Monday, February 13, 2012

सन्नी लेओने इस वर्ष की "दमदमी माई". Sunny Leone this years "damdami Mai" at DU.

दिल्ली विश्वविद्यालय में वेलेंटाइन डे मनाये जाने को हिन्दू कालेज के विद्यार्थिओं ने देशी रंग में ढाल कर हर वर्ष सबसे चर्चित सेलेब्रिटी महिला को "दमदमी माई" घोषित करने की परंपरा शुरू की है. छात्र "दमदमी माई" का 'आशीर्वाद'लेते हैं. अब तो "दमदमी माई" की घोषणा सभी प्रमुख अख़बारों के समाचार भी बनने लगे हैं. चुकी १४ फ़रवरी नजदीक है, अतः इस वर्ष चर्चित पोर्न फिल्मों की अदाकारा सन्नी लेओने, जिसे टी वी प्रोग्राम "बिग बॉस" में मौका मिला, को "दमदमी माई" घोषित किया गया है. पिछले वर्ष सोनाक्षी सिन्हा "दमदमी माई" थीं, और उसके पहले कटरीना कैफ,दीपिका पादुकोण,ऐश्वर्या राय. खूब है हिन्दू कालेज की यह परंपरा!

Every Valentine's Day, a unique tradition is observed at Hindu College. A group of male students, mostly hostel residents, offers prayers to "Damdami Mai" and celebrates a female icon who it feels has hogged headlines for all the wrong reasons.

Valentine's Day celebration has become indigenised in Delhi University's North Campus. Hindu College boys have been worshipping what they call Damdami Mai, a goddess from whom they seek blessings for a suitable girl to share love with.The ritual of worshipping the chosen Goddess of the year, involves a panditji who comes with a puja thali. The panditji is always a student of a college. In the past, a third year student would be nominated to become the pujari but now the winner of the Mr. Fresher contest gets to be a pandit and dress up for the part.

A teeka of red chilli powder is put on the foreheads of all the students present before the ceremonies start. A picture of the Goddess is hung on the 'Virgin Tree' which is decorated with balloons and inflated condoms. A procession is then carried out across the campus with the pandit carrying the puja ki thali. Slogans such as “Damdami Mai ki Jai” are chanted to the beat of the drums to invoke the Goddess.

Prasad is offered after the procession ends. Bhang ke laddo used to be distributed few years back but now motichoor ke laddoos and batashas are distributed.

Interestingly, the Hindu College boys refer to her as the goddess of girls. Every Valentine's Day, Damdami Mai is personified. Porn Star Sunny Leone is the flavour of the season on Tuesday, the 14th February.Former Damdami Mai's include actor Sonakshi Sinha (last year), Priyanka Chopra, Madhubala, Mallika Sherwat, Aishwarya Rai, Deepika Padukone and Anara Gupta amongst others.

Monday, December 5, 2011

यादें देव साहब से मुलाक़ात की....

शायद १९९० का वर्ष था और दिल्ली विश्वविद्यालय में 'फिल्म अप्रिसिएसन सोसाइटी' के अध्यक्ष के नाते मेरा, प्रो सिडनी रिबेरो और छात्र संघ के तत्कालीन सह-सचिव अतुल गंगवार व पूर्व अध्यक्ष नरिंदर टंडन के साथ मिलकर देव आनंद साहब को विश्वविद्यालय कला संकाय में सम्मानित करने का कार्यक्रम बना.
इसके लिए देव साब को एक दिन पूर्व रात के नौ बजे नई दिल्ली के मौर्या शेराटन में स्वागत करना था. देव साब की उडान दो घंटे लेट हो गई. इंतज़ार करते-करते रात के लगभग १२ बज गए. देव साब आये और उनके स्वागत की औपचारिकता पूरा करते एक-ढेढ़ घंटे और बीत गए. नींद आ रही थी, तो देव साब को कहा कि 'आप थक गयें होंगे, आराम करें'. सुनते ही देव साब तपाक से बोले, ' तुम लोग थक गए हो, आराम करो. मेरी चिंता मत करो'. उस समय ६७ वर्ष के नायक २२-२४ साल के छात्रों को जो कह रहे थे, अजीब लगा. वे उर्जा से भरे, और खुशमिजाज थे- इसीलिए उन्हें सदा-बहार कहते थे.
दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय(Arts Faculty) के नई दीक्षांत सभागार(New Convocation Hall) में दिख रहा था की देव आनंद सभी पीढ़ी के दिलों की धड़कन हैं - एक और कुलपति सहित विश्वविद्यालय प्रशासन के लगभग सभी प्रोफ़ेसर १०.३० बजे ही अपने स्थान पर बैठे थे, तो दूसरी और छात्र- छात्राएं ११०० लोगों के लिए बने सभागार के अन्दर - बहार भरे हुए थे. छात्रों की एक अकेस्त्रा को हम लोगों ने मंच पर देव आनंद के गानों को सुनाने के लिए कह रखा था, यह सोच कर की अगर वे विलम्ब से आएंगे तो श्रोताओं का ध्यान बटा रहेगा. परन्तु वे एक दम सही वक़्त पर ११ बजे पहुँच गए और हॉल में सभी लोगों ने खड़े होकर जोरदार तालियों के साथ उनका स्वागत किया, और उधर मंच पर उनके ही फिल्म का गाना , "पल भर के लिए कोई मुझे प्यार कर ले....." गाया जा रहा था. वो पल शानदार था, और देव आनंद का स्वागत अविस्मर्णीय बन गया.
देव साहब के मंच पर आते ही लगा की बिजली कौंध गयी. जब वे "Flying Kiss" देने लगे तो, पीछे से एक छात्रा कुर्सियों पर से कूदते हुए, कुलपति को लांघते हुए मंच तक पहुँच गयी, जब एक महिला पुलिस ने उसे रोक लिया. देव साब मुझे कहे की उसे आने दें, पर मैंने अदब से कहा की पूरा हॉल मंच पर आ जायेगा, और हम किसी को रोक नहीं पाएंगे. देव साब मान गए. लेकिन संबोधन उसी छात्रा का जिक्र करते शुरू किया.
उसके बाद हम लोग University Guest House में लंच पर गए. भीड़ इतनी थी की मेरे कंधे पर लटका हुआ कैमरा(Nikkon




MF II) कोई काट लिया. देव आनंद साहब खाने में सिर्फ सलाद खाए और बोले की चावल खाए मुझे बरसों बीत गए.
कल उनके ८८ वर्ष की उम्र में दुखद देहांत की खबर सुन कर वो पल एक-एक कर याद आने लगे, जिसे मैं आपसे बाँट रहा हूँ. इश्वर देव आनंद साहब के आत्मा को शांति दें. उनके जीवन और फिल्म से सीख हमेशा मिलती रहेगी.

Monday, July 11, 2011

Academic Forum for Social Justice protests "loot" of OBC seats at Delhi University.

And why did Delhi University Colleges keep 100% marks as cut-off ? Read to debar OBC seats being filled up. The exercise continues with Minister for HRD, Vice-Chancellor, University of Delhi playing lead roles and lesser mortals (Principals etc) playing their own role.

It is interesting to note that in December 2010, the High Court ruled that relaxation of marks for OBCs should be given on "minimum marks" as specified in the 2008 judgement of the Constitution Bench of the Supreme Court, and should not be in comparison to the marks of the students admitted in the general category. But by challenging and getting a stay, Delhi University has unambiguously announced that it is against OBC seats being filled up by the eligible OBC candidates. So, DU contests case against its own students and with their money.
The activists of Academic Forum for Social Justice marched to Vice-Chancellor's office today, the 11th July at 12'O clock noon to protest against anti-OBC measures of Delhi University ostensibly under direct encouragement of Prof Dinesh Singh, the Vice-Chancellor of Delhi University. The contempt and disregard for democratic and constitutional rights of the students of Backward Classes was more than clear when the Vice-Chancellor and other University Authorities chose not to meet the delegation of the forum, inspite of the protest continuing for more than three hours at VC office. The activist of Academic Forum for Social Justice resolved to organise a much bigger OBC protest to expose the nexus between the VC and HRD Minister to neutralise the reservation being extended to OBC students. Meanwhile, the Dean Students Welfare had a discussion with the forum delegation after the protest continued.

The protesters marched with the following demand to the Vice-Chancellor -
* Implement 27% reservation for OBCs without reference to the marks of the admitted general category candidate ( correct interpretation of SC judgement).
* Withdraw SLP filed in the Division Bench of Delhi High Court challenging December 2010 judgement of a single judge of the Delhi High Court.
* Announce cut off marks for General and OBC candidates well in advance for all level of admission by giving OBC 10% relaxation in cut-off.
* Implement strict reservation in M Phil and Ph D admission/registration and University Teaching Assistantship.
* Bring out a white paper on how the money for OBC expansion has been spent in the University and its colleges.


A RTI disclosure shows that the Total OBC seats are - 7059, Total OBC Admission -3158, Total OBC seats vacant - 3901, Total grants received for expanding infrastructure in lieu of OBC reservation - Rs 203,39,50,186/-, Total teaching posts sanctioned -905.



So, OBC reservation is being granted from one hand and being taken away from another.