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New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....
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Friday, February 1, 2013

नया लोकपाल - The Lokpal Bill



लोकपाल बिल को अब यू पी ए द्वारा चर्चा का केंद्र बनाने का प्रयास जारी है। अब तक जो संकेत हैं, उस के अनुसार सोनिया-मनमोहन का लोकपाल दंतहीन, विषहीन, नखविहीन और भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देने वाला होगा। जैसे अगर आप शिकायत करेंगे, तो पहले उसकी प्रति सम्बंधित अधिकारी को जायेगा। जाहिर है शिकायत रसूखदार आईएस/ आईपीएस के विरुद्ध ही होगा, और सभी शिकायतकर्ता अरविन्द केजरीवाल की तरह मीडिया के ढाल के साथ नहीं होगा। अफसर को पहले ही संकेत रहेगा की निपटा लो। अब शिकायत निपटेगा या शिकायतकर्ता, यह तो आगे पता चलेगा।

सरकारी लोकपाल राजनीतिक दलो की जांच नही कर पाएगा,न धार्मिक संस्थाओ की,न सरकारी चंदे वाली NGO की।तो क्या वो नर्सरी के बच्चो की कापियां जांचेगा? सरकारी लोकपाल वैसा ही है जैसे बिल्ली अपने गले में डालने के लिए घंटी बनाए मगर उसमें घूंघरूं न डाले। सरकारी लोकपाल के कमजोर होने का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि उससे ज्यादा अधिकार तो मनमोहन सिंह के पास है। अतः सरकारी लोकपाल के रूप में सरकार ने देश को एक और मनमोहन सिंह दिया है।

और कहा जा रहा है की लोकायुक्त एक वर्ष के भीतर बन जाना चाहिए। मगर कैसा? अगर सुशासन बाबू का लोकायुक्त देखा जाय तो इस पद का ऐसा भौंडा मजाक कुछ और नहीं हो सकता है। एक-दो विशेषताएं अगर गिनाऊँ तो कहा जा सकता है की बिहार में लोकायुक्त के पास कोई शिकायत जाने पर उस शिकायत को गोपनीय रखा जायेगा। उस अफसर को पहले शिकायत जायेगा जिसके लिए सरकार का वकील पैरवी करेगा। अगर शिकायतकर्ता आरोप को साबित नहीं कर पायेगा तो शिकायतकर्ता को 6 महीने कैद-इ-बामुशक्कत की सजा होगी। नतीजा है की जबसे नितीश कुमार वर्जन का लोकायुक्त लागू हुआ है, एक भी शिकायत करने का किसी को हिम्मत नहीं हुआ है। टीम अन्ना ने जब इस लोकायुक्त को ख़ारिज किया तो विकास पुरुष बिफर पड़े थे। लेकिन कल अन्ना ने उनके दिल को छू लिया, क्योंकि नितीश के भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना ने मौन साध ली थी।

वैसे गुजरात जैसे राज्य में नरेन्द्र मोदी लोकायुक्त लाना ही नहीं चाहते हैं। पता नहीं क्यों?


पद शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल है,
उसका क्या जो दंतहीन विषरहित शक्तिहीन तरल हैI

Wednesday, January 30, 2013

एक आन्दोलन का बिखराव - इंडिया अगेंस्ट करप्शन से जनतत्र मोर्चा तक.....


भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अन्ना हजारे की जनतंत्र रैली को लेकर पटना की जनता पर कोई ख़ास उत्साह नहीं दिखा। स्थानीय गांधी मैदान में दोपहर बाद आयोजित इस रैली में बहुत ज़्यादा भीड़ नहीं दिखी।

दरअसल शुरुआत ही पटना में गलत हुआ। सुशासन बाबू से तालमेल के बाद इस रैली को भ्रष्टाचार विरोध की जगह जनतंत्र रैली कहा गया। बिहार में सुशासन बाबू की भ्रष्टाचार से त्रस्त लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ की नितीश कुमार अन्ना की तारीफ कर यह सन्देश दे रहे थे की उन्ही के छत्रछाया में यह रैली हो रही है। अगर अन्ना आज नितीश के विरुद्ध हुंकार भरते तो बेशक उनका जादू चल जाता। वैसे, बिहार की जनता ने इतना ज़रूर याद रखा है की राज ठाकरे जैसे कलुषित बोल नेता के बिहार विरोधी अनर्गल प्रलाप का अन्ना ने विरोध नहीं किया।

टीम अन्ना के एक सदस्य के अनुसार , “यह तक साफ नहीं है कि यह रैली किसकी है और कौन इसे करवा रहा है। यह जनरल वी. के. सिंह की प्रायोजित रैली है या फिर उनके करीबी बिजनेसमैन इसकी फंडिंग कर रहे हैं। पहले पटना प्रशासन भी रैली के लिए सहयोग नहीं कर रहा था, अब वहां के मुख्यमंत्री खुद इसमें रुचि ले रहे हैं। इस रैली में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के नाम का भी इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है।”

अन्ना के आन्दोलन का यह हश्र होने से हम जैसे भ्रष्टाचार विरोधियों को निराशा हुई है। जो आन्दोलन कांग्रेस जैसी पार्टी के आगे नहीं झुकी, जिसे स्वामी अग्निवेश(कपिल मुनि!) जैसे भीतरघातियों तोड़ने में कामयाब नहीं हुए, वह अपने ही टीम के अहम् और महत्वकांक्षा का शिकार हो गयी है।

इसमें मैं अरविन्द केजरीवाल का उतना ही दोष मानता हूँ जितना उन्होंने पार्टी की गठन की जल्दीबाजी में दिखाई। अगर रोज़ दिग्विजय सिंह जैसे नेता यह चुनौती दें की आप चुनाव लड़ कर आओ और तब कुछ बोलो, तो चुनाव के लिए तैयार होने के अलावे कोई चारा नहीं बच रहा था। लेकिन जब अरविन्द ने कांग्रेस के साथ-साथ भा जा पा को भी निशाने पर लिया तो उनका एजेंट किरण बेदी को यह नागवार गुजरा। अन्ना के आन्दोलन के बिखराव के लिए किरण बेदी ही अधिक जिम्मेदार है। जो पुलिस सेवा के दौरान इनके राजनैतिक ताल मेल से वाकिफ हैं, वे मुझसे ज़रूर सहमत होंगे।


किंतु इसी बीच यह खबर भी आ रही है कि टीम अन्ना का दिल्ली कार्यालय बंद हो रहा है। मकान मालिक महेश शर्मा के अनुसार , “हम अब नए किराएदार की तलाश कर रहे हैं। कार्यालय का अनुबंध भ्रष्टाचार विरोधी जनआंदोलन (रालेगण सिद्धि) के श्याम सुंदर के नाम से है। किरन बेदी इसमें गवाह बनी थीं। उन्होंने हमसे कहा कि 1 लाख रुपये सुरक्षा राशि में से 50 हजार रुपये इस महीने का किराया काट कर बाकी के 50 हजार का चेक बना कर उन्हें दे दें। हम दुविधा में हैं क्योंकि अनुबंध में किसी और का नाम है।”

Saturday, August 13, 2011

कांगेस में फैसला किसका? नेतृत्व का संकट?


कांग्रेस का ही फैसला कहें की अन्ना हजारे को अनशन करने के लिए २२ शर्तों के साथ तीन दिन के लिए, मात्र ५- ६ हज़ार लोगों के साथ जे पी पार्क में इज़ाज़त देने का नाटक किया जा रहा है. सभी समझ रहे हैं कि अन्ना के अनशन की शानदार कामयाबी के लिए कांग्रेस आधार तैयार कर रही है.

दुष्यंत कुमार की चार लाइन हैं - हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिएइI
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिएईII


मैं इसलिए याद दिला दूं कि हिंदुस्तान के लोगों, और खास तौर से युवाओं की फितरत है की अगर उन्हें लगता है की किसी के साथ अन्याय हो रहा है तो वे पूरे ताक़त के साथ उसके साथ खड़े हो जाते हैं. मुझे याद आ रहा है कि २४ जुलाई, १९८७ को वी पी सिंह कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध दिल्ली विश्वविद्यालय में सिंहनाद आयोजित किया गया था. २३ जुलाई के शाम को दिल्ली विश्वविद्यालय के ही सेंट स्टीफंस कालेज के छात्रावास में प्राचार्य जॉन हाला द्वारा अनुमति नहीं दिए जाने पर, वार्डेन प्रो दिवेदी द्वारा अपने आवास पर परिचर्चा पर राजा साहेब को बुलाये थे. कांग्रेस के छात्र इकाई के कुछ अति उत्साही गुट ने वी पी सिंह पर पेट्रोल बम से हमला किया जिसमें वे बाल-बाल बचे. मुझे लगा कि अगले दिन दिल्ली विश्वविद्यालय कि सभा में कोई नहीं आयेगा. परन्तु अगले दिन जो सभा हुई वह दिल्ली विश्वविद्यालय कि इतिहास में अभूतपूर्व था. सभा में धन्यवाद ज्ञापन देते हुए मैंने कहा कि "...हार कर मजबूर होकर यह सभा हमें वहीँ करनी पड़ रही है जहाँ पहली पर जे पी ने सभा की थी जिसके परिणामस्वरुप श्रीमती गाँधी सत्ता से हटी थीं. आज के सभा के परिणाम यही होगा कि राजीव गाँधी सत्ता से हटेंगे और भावी प्रधान मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का मैं स्वागत करता हूँ."

अब जे पी पार्क में कई शर्तों के साथ अगर अन्ना हजारे को इजाजत दी जा रही है , तो यह तय है की हिंदुस्तान की इतिहास में एक मोड़ आने वाला है! कहने का अर्थ यह है कि कांग्रेस के फैसला लेने वाले अन्ना हजारे से डर कर कई तरह कि बाधाएं खड़ी कर रहें हैं, जो निश्चित तौर से लोगों को अन्ना के प्रति सहानुभूति बढ़ाएंगे और उनके मांगों को लोगों के बीच में और अधिक लोकप्रिय करेंगे. एक वकील बेशर्मी से कानून का ज्ञान बघार रहें हैं, और दूसरा वकील दलीलें देते हुए आम जनता को मूर्खों कि जमात समझ रहें हैं. परन्तु क्या कांग्रेस में वकीलों की ही चल रही है?

हम सब जानते हैं के कांग्रेस का अर्थ है सोनिया गाँधी या राहुल गाँधी - यानि आदेश इन्ही का चलेगा. परन्तु सच्चाई शायद यह नहीं है. कांग्रेस में दो- तीन सत्ता के केंद्र हैं. सोनिया और राहुल तो औपचारिक (De jure) सत्ता के केंद्र हैं ही, दुसरे वास्तविक (de facto) सत्ता पंजाबी खत्रियों के एक गुट के पास है जो प्रधान मंत्री डा.मनमोहन सिंह के इर्द-गिर्द हैं. इस गुट में गृह मंत्री चिदंबरम भी शामिल हैं. अन्य मंत्री हैं - डा. मनमोहन सिंह का खासम-खास कपिल सिबल, सूचना और प्रसारण मंत्री अम्बिका सोनी, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया.

अब जो यह गुट हैं उनके फैसले कैसे प्रभावी हैं यह उन सभी मसलों पर दीखता है जिन्हें जन-विरोधी फैसले कहा जा सकता है, या यूं कहें की जिससे कांग्रेस की किर-किरी हुई हो. उधाहरण के लिए अन्ना हजारे से बात-चीत के बीच में ही एक शिखंडी बिल प्रस्तुत किया जाना, पहले बाबा रामदेव से समझौता और फिर रामलीला मैदान में उनके शिविर में हमला इत्यादि.

परन्तु भाजपा कुछ बोले तो अच्छा नहीं लगता है, खास तौर से अन्ना के समर्थन में उन्हें आने का नैतिक आधार ही नहीं है. सभी समझते हैं की लोकपाल विधेयक पर उनका रुख क्या है. और जब गुजरात में सही बात कहने के लिए IPS अधिकारीयों के विरुद्ध कार्यवाई हो रही है तो ताक़तवर लोकपाल को ये कैसे बर्दाश्त करेंगे? कपिल सिबल के तार जातिगत आधार पर ही भाजपा से भी जुड़े हुए हैं.

यह आम धरना है की देश में आपात काल जैसे हालत बन रहे हैं. यह संयोग ही है की आपात काल के पहले-दौर में भी संजय गाँधी के साथ अम्बिका सोनी का योगदान था. अब करेला पर नीम चढ़ा हैं कपिल सिबल जैसे धुरंधर जो कभी भी आम जनता से जुड़े नहीं रहे हैं. पैसे के लिए किसी भी मुअक्किल के लिए काम करना ही इनका ईमान है. दरअसल इनके जैसे लोगों का राजनीती में पदार्पण लालू प्रसाद जैसे नेताओं के पाप से ही हुआ है. कपिल सिबल चारा घोटाले में लालू प्रसाद के वकील थे. फीस में राज्य सभा की सदस्यता लालू प्रसाद से ली और बाद में कांग्रेस ज्वाइन कर लिये. यह जो 'ब्लेकमेल' का आरोप अन्ना हजारे पर यह लगते हैं , यह खुद उसमें माहिर हैं और इसके भुक्तभोगी शोइब इकबाल हैं जो चांदनी चौक चुनाव-क्षेत्र से सिबल के विरुद्ध लोजपा के प्रत्यासी थे, और जिन्हें रास्ते से हटाने के लिए हर कुकर्म सिबल ने किये.

अन्ना हजारे की मुहीम कांग्रेस के विरुद्ध है या कांग्रेस खामखा भ्रष्टाचारियों का संरक्षक बन रही है. दोनों वकील - चिदंबरम और सिबल - अपराधियों का ही बचाओ करते रहें हैं और अब भी वही कर रहे है. बाबा रामदेव प्रकरण में इन्होने दिखा दिया की विदेशों में काला धन जमा करने वालों को डरने ज़रुरत नहीं - कांग्रेस का हाथ, सदा उनके साथ! या बताया जा रहा है की समय रहते भैया स्विस बैंक से पैसे निकाल लो!


निष्कर्ष यह है की अगर नुकसान कांग्रेस का होता है तो इसके भुक्तभोगी सोनिया गाँधी या राहुल गाँधी होंगे. डा. मनमोहन सिंह अपनी पारी खेल चुके हैं. अब खेल बिगर जायें तो उनका या सिबल का क्या बिगड़ेगा? जो बिगड़ेगा वो राहुल गाँधी का ही होगा, क्योंकि उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में कांग्रेस को सत्ता में लाने का उनका सपना ज़रूर बिखर जायेगा. सिबल तो तुरंत दूसरा मुअक्किल दूंढ़ लेंगे. नुकसान ऐसे तमाम कांग्रेसियों का है जो निष्ठां से पार्टी के लिए काम करते हैं.

Thursday, August 4, 2011

लोकपाल- विधेयक से कानून तक. दिल्ली दूर है.

आज लोकपाल विधेयक लोक सभा में पेश किया गया तो प्रणब मुख़र्जी ने बयान दिया कि संसद की संप्रभुता का पूर्ण ख्याल रखा जायेगा और सभी संसदीय परम्पराओं का पालन किया जायेगा. इशारा है की बेकार में अन्ना और उनके साथी विधेयक की प्रतियाँ जला रहें हैं, इसका वो ही हस्र होगा जो पहले लोकपाल के कई विधेयेकों का हुआ.

दरअसल प्रथम लोकपाल विधेयक १९६८ में पेश किया गया और लोक सभा में पारित होने के बावजूद राज्य सभा में पारित नहीं होने पर कानून नहीं बन पाया. फिर १९७१, १९७७ में तत्कालीन कानून मंत्री और लोकपाल विधेयक समिति के वर्तमान सदस्य शांति भूषण द्वारा, १९८५, १९८९, १९९६, १९९८, २००१, २००५ तथा २००८ में प्रस्तुत किये गए. इस तरह प्रस्तुत होने के ४२ वर्ष बाद भी लोकपाल विधेयक कानून नहीं बन सका. अब अन्ना हजारे ने जन लोकपाल की मुहीम शुरू की तो विधेयक प्रस्तुत कर सरकार ने यह बताने की कोशिश की है कि ढाक के तीन पात. अब अगर यह कानून भी बन जायेगा तो क्या? यह एक शिखंडी लोकपाल होगा और भ्रष्ट नेताओं को चिंतित होने कि जरूरत नहीं.


संसदीय परंपरा में विधेयक को कानून बनने के लिए उसे संसद के दोनों सदनों - लोक सभा और राज्य सभा - में पारित होकर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो जाने के बाद कानून का दर्जा मिल जाता है. साधारणतया संसद के दोनों सदनों में समान कार्यविधि की व्यवस्था होती है। प्रत्येक विधेयक को कानून बनने से पहले प्रत्येक सदन में अलग अलग पांच स्थितियों से गुजरना पड़ता है और उसके तीन वाचन (Reading) होते हैं। पाँचों स्थितियाँ इस प्रकार हैं पहला वाचन, दूसरा वाचन, प्रवर समिति की स्थिति, प्रतिवेदन काल (report stage) तथा तीसरा वाचन। जब दोनों सदनों में इन पाँचों स्थितियों से विधेयक गुजर कर बहुमत से प्रत्येक सदन में पारित हो जाता है तब विधेयक सर्वोच्च कार्यपालिका (राष्ट्रपति) के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाता है. इस बीच में विधेयक संसदीय समिति (Standing Committee) के अवलोकन तथा आवश्यक सुधIर के लिए भी भेजा जाता है. तो समय बड़ा बलवान है, और कोई नहीं जनता कि इस लोक सभा कि कार्यकाल कब तक है, यानि सरकार कब तक रहे.
और प्रणब मुख़र्जी ने बराबर यह कतिपय शब्दों में स्पष्ट किया है कि सरकार भ्रष्टाचारियों और विदेशों में कला धन जमा करने वालों के साथ है. और संसदीय परंपरा के पक्षधर प्रणब बाबु जाने कितने बार बिना बहस किये विधेयेकों को कानून बनाये है, खास तौर से जब अमेरिका के साथ परमाणु संधि जैसे मसलें हों.

संसदीय व्यवस्था में गिरावट कोई शोध का विषय नहीं है, यह सर्व विदित है. गिरावट का निष्कर्ष इससे भी निकलता है कि पूर्व में संसद का ४९% समय कानून बनाने में जाता था और अब मात्र १३%. सदस्य उपस्थित ही नहीं रहते हैं. पिछले ३० वर्षों में सदस्यों का एक भी निजी बिल कानून नहीं बन पाया है और सरकारी बिल बिना सोचे-समझे और बहस के पारित होते रहें हैं. तो अन्ना के जन लोकपाल को सदस्यों के निजी बिल के तौर पर भी पारित होने के आसार नहीं है. और कौन सदस्य चाहेगे की भ्रष्टाचार मिटे, घाटा उन्हें भी हो सकता है.

अन्ना के सामने रास्ता कठिन है. एक दायरे (सिविल सोसाइटी) में रह कर कोई आन्दोलन नहीं हो सकता है. जे पी और वि पी , हाल में भ्रष्टाचार के विरूद्ध योद्धाओं ने, युवाओं के बीच जाकर ही हुंकार कर बढे और विजयी बने.सबसे महत्वपूर्ण विषय है की सिविल सोसाइटी द्वारा सामाजिक न्याय पक्ष को साथ नहीं ले सकने से एक बड़े तपके इस मुहीम से नदारद है और इसका फायदा सरकार ले रही है.

हम यह तहे दिल से चाहते हैं और हमारी इच्छा है की अन्ना की मुहीम कामयाब हो और एक सशक्त लोकपाल बने जिससे सुरसा जैसे मुह फाड़े भ्रष्टाचार पर लगाम लगे. इसके लिए आवश्यक है की या तो अन्ना अपने मुहीम को पैना बनाये या संसद सदस्यों के द्वारा प्रस्तुत बिल में व्यापक फेर बदल कर इसे शिखंडी के जगह अर्जुन का तीर बनाया जाये.