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New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....

Saturday, May 27, 2017

#EC का मिशन इम्पॉसिबल : #EVM हैकिंगः #NCP का चैलेंज लेने मतलब :

3 जून को #EVM स्वयंवर है
सभी दल आमंत्रित है ,
शर्त है #दुल्हन को बिना छुए माँ बनाना है।
देश में लोकतंत्र के अधिकृत अभिरक्षक #ECI द्वारा इस तरह का ड्रामा ठीक नहीं नहीं।
कांग्रेस ने कहा है की चुनौती देने वालों को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के मदरबोर्ड सहित प्रमुख पार्ट पुर्जे तक पहुंच की अनुमति दी जानी चाहिए।
हम सभी जानते हैं कि हमारे फोन का ब्लूटूथ ऑन नहीं हो तो उस तक भी कोई पहुँच नहीं सकता, फिर यह तो #ईवीएम मशीन है।
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) से छेड़छाड़ करके दिखाने के चुनाव आयोग के चैलेंज को एनसीपी (NCP) को छोड़कर किसी भी राजनीतिक दल ने आवेदन नहीं किया है। चुनाव आयोग की ओर से राजनीतिक दलों को शुक्रवार शाम पांच बजे तक एक्सपर्ट के नाम देने का समय दिया था।
चुनाव आयोग के प्रवक्ता ने बताया कि एनसीपी चुनाव आयोग की ईवीएम चुनौती में भाग लेने की इच्छुक एक मात्र पार्टी है और इसके अलावा किसी राजनीतिक दल ने आवेदन नहीं किया है। वहीं चुनाव आयोग ने गुरुवार देर शाम को बताया था कि अब तक किसी पार्टी ने किसी जानकार को ईवीएम चुनौती स्वीकार करने के लिए नामित नहीं किया है। बीती 20 मई को आयोग ने घोषणा की थी कि 3 जून से ईवीएम चैलेंज हो रहा है जिसके लिए 26 मई तक पार्टियां तान जानकारों को नामित कर सकती हैं।



प्रश्न यह है कि क्या एनसीपी वाक़ई में हैकिंग के लिए सीरियस है? या एनसीपी चुनाव आयोग के लिए "अप्रूवर" बनने वाली है?
इसका जवाब श्री शरद पवार जी हैं।
पवार साहब राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार हैं। अगर एनसीपी EVM हैक करने की ताक़त रखता है तो बीजेपी पवार साहब को राष्ट्रपति मानते हुए हैकिंग करने से एनसीपी को रोकेगी। अगर एनसीपी यह कहने के लिए भी कि EVM हैक नहीं हो सकता, यह चैलेंज स्वीकार की है, तो भी बीजेपी पवार साहेब को राष्ट्रपति पद के लिए दी जाने वाली प्रस्ताव पर सहानुभूति पूर्वक विचार करेगी।
दरअसल, शरद पवार जी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से भारत के किसी नेता से अधिक नजदीक हैं और यह मोदी जानते हैं।

Friday, May 26, 2017

मोदी सरकार के तीन साल : जनता का खून जला है, खून खौलेगा तो ?

मोदी सरकार के तीन साल असल में मनमोहन सरकार पार्ट 3 है।
एक अहम् फ़र्क़ ज़रूर है, सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता पर मोदी सरकार का हमला अब कोई छुप छुपा कर नहीं, खुले आम है।
पर मैं आर्थिक नीति की बात कर रहा हूँ।
कोई माई का लाल एक फ़र्क़ दिखा दे, मनमोहन और मोदी के आर्थिक नीतियों में। डिग्री का फ़र्क़ ज़रूर है। अब आम जनता के हितों पर कुठाराघात अधिक पैने तरीके से है, और अंबानी अडानी के दौलत को दिन दुगुना रात चौगुना 56 इंच का सीना ठोक कर किया जा रहा है। जनाब वज़ीरे आला देश विदेश परदेश सब जगह अम्बानी अडानी को साथ लेकर घूमें। पीएम कम और एजेंट ज्यादा थे। बांग्लादेश को करोड़ों डॉलर इसलिए दिए कि वे अडानी के पॉवर प्रोजेक्ट का कैश पेमेंट करें।
सरदार जी इतने बेशर्म नहीं थे।
आधार कार्ड पर मोदी ने सुरक्षा लेकर गंभीर सवाल उठाये, और अब आधार कार्ड लेकर नाँच रहें हैं। मनमोहन सिंह और आधार का मजाक उड़ाते मोदी का वीडियो ज़रूर देखें। अब मोदी सरकार ने हर योजना के लिये आधार जरूरी कर दिया है। रोज आधार के डाटा को कॉर्पोरेट को लीक कर रहें हैं।
2005 में 500 - 1000 रुपये नोट बंद करने का मनमोहन सरकार के प्रस्ताव का भाजपा ने विरोध किया, और फिर अब #नोटबंदी का खेल खेला। उसमें भी अम्बानी को फायदा। '#जियो' सिम पर आधार कार्ड मांगना और फिर पुराने नोट को बदलने के लिए आधार कार्ड का फोटोकॉपी। काफी छुटभैये जैसे काम करके अम्बानी को फायदा पहुँचाया और दावा की काला धन को समाप्त कर रहें हैं, अलगावादियों और आतंकवादियों को पैसे नहीं मिलेंगें। थोथे दलील। ढाक के तीन पात।
किसानों के क़र्ज़ माफ़ी में भारी दिक्कत, परन्तु कॉर्पोरेट के अरबों रुपये माफ़ किया। नतीजा यह है कि तीन साल में कई गुना अधिक किसानों ने खुदकशी की, कर्ज और भुखमरी से परेशान हो कर।
विजय माल्या जैसे मालामाल, किसान तंगहाल।
मोदी ने पहले #मनरेगा को विफलताओं की स्मारक, #GST को घातक और #एफडीआई को देश विरोधी बताया था।
आज मनरेगा में पहले से ज्यादा पैसा, #एफडीआई देश हित में और #GST से सारे पाप धुल गये बताये जा रहे हैं।
मोदी जो चाय पर चर्चा में लोगों को बताता था कि देश के बाहर इतना काला धन है कि वह आ जाये तो हर एक के खाते में 15-15 लाख आ जायें।
अब सुप्रीम कोर्ट के कहने के बावजूद उन काले धन वालों के नाम तक सार्वजनिक करने की हिम्मत नहीं जुटा पाये जिनकी सूचि सरकार के पास मौजूद है।
मोदी माँ बेटे की सरकार को जम कर कोसता था कि उसकी सरकार आते ही सारे भ्रष्टाचारी कांग्रेसी जेल में होंगे।
पर तीन साल में एक कांग्रेसी का एक भी कुत्ता तक को जेल न भेजा जा सका, उल्टे सारे भ्रष्टाचारी अपनी पार्टी में ले कर उन्हें पवित्र घोषित कर दिये हैं।
यहाँ मैंने आतंकवाद और चीन पाकिस्तान के हाँथ देश के नितन्तर हो रहे अपमान का जिक्र नहीं कर रहा हूँ। इस पर अलग से चर्चा ज़रूरी है।
दरअसल मनमोहन या मोदी सरकार को नहीं चलाते। चलाते हैं अंतराष्ट्रीय पूँजी के मालिक अमेरिका, वर्ल्ड बैंक, IMF आदि। ये तो एजेंट हैं। अंतरष्ट्रीय पूँजी अलग अलग समय में मुक्त व्यापार, ग्लोबलाइजेशन आदि के नाम से नियम बना कर अन्य देशों पर यह कह कर थोपते हैं कि "तुम्हारे फायदे में है"। समस्त एजेंट अर्थशास्त्री, पार्टी और मनमोहन मोदी जैसे जैसे नेता इसका प्रचार करते हैं, अमल में लाते हैं।
इसलिए सेट टॉप बॉक्स, #GST, #नोटबंदी, #कैशलेस, #FDI, #किसानों_पर_टैक्स, स्वास्थ्य व शिक्षा का निजीकरण, उच्च शिक्षा का बाजारीकरण, #FYUP या #CBCS, आदिवासियों के जल, ज़मीन, जंगल पर कॉर्पोरेट के लिए कब्ज़ा आदि नीतियाँ मनमोहन और मोदी दोनों के हैं।
इसके विपरीत मोरारजी देसाई, चौ चरण सिंह, वीपी सिंह, देवेगौडा आदि की तथाकथित कमजोर सरकारें ही जनहित और देशहित की आर्थिक नीतियाँ को लागू किये। इंदिरा गाँधी 1971 से पहले कमजोर स्थिति में थीं अतः बैंक राष्ट्रीयकरण, प्रिवी पर्स को समाप्त करना आदि नीतियों पर सत्ता में आते अमल कीं।
देश की स्थिति अब फिर एक ऐसी सरकार की मांग कर रही है।
#नोटबंदी, #उच्च_शिक्षा पर निशाना, #जेएनयू, #बेरोजगारी, #सहारनपुर, #सुकमा, #ईवीएम, #सीमा_पर_शहादत आदि से जनता का खून जला है, खून खौलेगा तो सही।
निसंदेह सोशल मिडिया क्रांति का एक साधन होगा।
#मोदी_सरकार_तीन_साल_जनता_परेशान_बदहाल

Thursday, May 25, 2017

"युद्ध" या फिक्स्ड मैच !!

'राष्ट्रवादी' नारों के बीच ये अजीबोगरीब "जंग" चल रहा है भारत पाकिस्तान में !
दोनों ओर से वीडियो जारी की जाती है, और उसे दोनों तरफ से 'फर्जी' कहा जाता है।
दोनों देश 'शांति' के समय एक दुसरे पर किये गए गोलाबारी से नुकसान को ख़ारिज करते हैं, जबकि अमूमन शांति के समय इस तरह की क्रिया को अंतराष्ट्रीय फोरम पर उठाया जाता है जिससे हमलावर राष्ट्र की चौतरफा निंदा हो।
परन्तु यह सच्चाई है कि हमारे फौजी रोज शहीद हो रहें हैं।
और हमारे मंत्रीगण 'सिर्फ' निंदा करते हैं।
यह समझना होगा कि 'युद्ध' की घोषणा करना एक जटिल स्थिति है, जिसके लिए क्या हम तैयार है ?
मोदी सरकार जनता को हाशिये पर रख कर कॉर्पोरेट के कभी न मिटने वाली दौलत की भूख को पूरा करने में लगी हुई हैं।
मोदी और नवाज़ की दोस्ती में सज्जन जिंदल को फायदा पहुँचाने का रेस को अंतराष्ट्रीय स्तर पर सब जानते हैं।
फिर क्या यह तथाकथित गोला बारी सिर्फ जनता को दिखाने के लिए WWF कुश्ती है, जिसमें कहीं न कहीं हमारे किसी देशवासी के घर पर मातम मनाया जा रहा है?
संभव है भारत पाकिस्तान में 'युद्ध' ज़रूर होगा, पर तब यह मोदी और उसके सरकार की गिरती साख को बचाने के लिए होगा, देश और उसकी जनता के लिए नहीं।
जय हिन्द।

Saturday, March 25, 2017

पिछड़े वर्ग के आरक्षण पर बड़ा हमला : मंडल कमीशन को बिना लागू किये,अब एक नया कमीशन:

पिछड़े वर्ग के आरक्षण पर बड़ा हमला : मंडल कमीशन को बिना लागू किये,अब एक नया कमीशन :
केंद्र सरकार ने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए नया आयोग बनाने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई कैबिनेट बैठक में यह निर्णय लिया गया।
कहा जा रहा है की अब आयोग को संवैधानिक दर्जा मिलेगा: नए आयोग का नाम सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग के लिए राष्ट्रीय आयोग (एनएसईबीसी) रखा जाएगा। यह मौजूदा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की जगह लेगा। संसद से बिल पारित करा इसे संवैधानिक दर्जा भी दिया जाएगा। अभी आयोग का संवैधानिक दर्जा नहीं है।
इससे पिछला कानून रद्द हो जायेगा : मंत्रिमंडल ने पिछड़ा वर्ग के लिए राष्ट्रीय आयोग अधिनियम, 1993 को भी निरस्त कर दिया और इसके तहत गठित संस्था को भंग कर दिया है। पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हुआ था। संवैधानिक दर्जा नहीं होने से इसकी सिफारिशों और आदेशों को मानने में विभाग कोताही बरतते हैं। यह माना जा रहा था कि यह आयोग अन्य पिछड़ा वर्ग के हितों की रक्षा नहीं कर पा रहा था।
दरअसल, पिछड़े वर्ग के लिए मंडल कमीशन की अनुशंसाओं को निरस्त कर, आरक्षण में छेड़छाड़ कर, आरक्षण समाप्त करने के संघ के कई बार घोषित एजेंडा की दिशा में मोदी सरकार का पहला कदम है।
मंदिर, रोमियो, बूचड़खाना, नोटबंदी आदि के नाम पर जब तक जनता का ध्यान बँटा कर खेल हो जायेगा।
संवैधानिक तौर पर पूर्व में पिछड़े वर्ग आयोग का दो बार गठन हुआ है : काका कालेलकर आयोग और मंडल आयोग।
काका कालेलकर खुद ही अपनी अनुशंसाओं को नहीं लागू करने का निवेदन राष्ट्रपति को किये थे।
मंडल आयोग को इतिहास के ठन्डे बक्से से निकाल कर आंशिक रूप से भी लागू करने में वर्षों लग गए।
बावजूद आज तक यह सही ढंग से लागू नहीं है। मंडल रिपोर्ट कानूनी तौर पर इतना ठोस है कि कोर्ट में इसे निरस्त करने के लंबे प्रयास को भी मुहँ की कहानी पड़ी।
तब एक असंवैधानिक क्लॉज़, "क्रीमी लेयर" जबरन जोड़ा गया जिसे आज तक संसद ने भी मान रखा है।
हाल में 120 पिछड़े वर्ग के सिविल सेवा में कम्पीट किये हुए अभ्यर्थियों को मोदी सरकार ने "क्रीमी लेयर" की नई परिभाषा लागू कर लिस्ट से हटा दिए और उस जगह को खाली रखा है।
अब किसे पिछड़े वर्ग के लिस्ट में रखना है, किसे हटाना है, यह संसद के माध्यम से मोदी सरकार अपने हाथ में लेना चाहती है। अतः यह नई कमीशन का प्रावधान।
पिछड़े वर्ग की संख्या मंडल आयोग ने 52% माना था और चुकी 50% का सर्वोच्च न्यायालय का कैप था, तो 27% आरक्षण की अनुशंसा की गई थी।
परंतु आज भी उल्टा आरक्षण लागू है यानि जेनेरल के 50% नौकरियों में 'मेरिट' पर आए पिछड़े और दलित अभ्यर्थियों को जेनेरल में स्थान नहीं दिया जाता है।
कई हाई कोर्ट ने इस असंवैधानिक परिभाषा पर मुहर लगाई है। सरकार और संसद चुप है।
अब सरकार पिछड़े वर्ग में शामिल किये या हटाये जाने की पॉवर को लेकर उन वर्गों पर हमला करेगी जो उसके वोटर नहीं है।
यह भी संभव है कि "आर्थिक" आधार पर पिछड़े वर्ग की पहचान को सरकार मान्यता दे दें। चुकी यह कमीशन संविधान में संशोधन करके लाया जायेगा, तो इसके पहले के संवैधानिक परिभाषा कि "शैक्षणिक और सामाजिक" रूप से पिछड़े वर्ग की भी बदला हुआ माना जायेगा।
आरक्षण को निरस्त करने के लिए काँग्रेस समय से सरकारी नौकरियां ख़त्म की जा रही हैं। अब सरकारी उच्च शिक्षा पर हमला है और सीटें काम करते हुए इन्हें "निजीकरण" करके कॉरपोरेट को सौंप दिया जायेगा।
यह बड़ी साज़िश है।
जैसे ईवीएम का खेल हुआ है, वैसे ही अब पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण को निरस्त किया जायेगा।
जो आरक्षण की समीक्षा करने की बात करते हैं, वह जान लें की मोदी कभी आरक्षण की समीक्षा नहीं करंगें।
अगर समीक्षा करना होता तो जाति जनगणना के परिणाम भी सार्वजानिक किये जाते, जिसमें कौन वर्ग को अभी कितने रोजगार पर्याप्त हैं और उनकी आर्थिक स्थिति क्या है, यह सभी को पता चल जायेगा।
मंडल कमीशन के लगूं होने पर भी पिछड़े वर्ग को कोई खास रोजगार नहीं, और आरक्षण के 27% अनुशंसा की जगह यह मात्र 6 या 7% है।
फिर जो यह कहते हैं की आरक्षण के अलाभ यह ले लिया और उसे नहीं मिला, वे साज़िश की तहत सिर्फ पिछड़े वर्ग में आपसी दुर्भावना या कलह को बढ़ाना चाहते हैं क्योंकि वास्तविक रूप से समाज में समानता लाने के लिए रोजगार की उपलब्धता और समान अवसर प्रदान करना एक सपना ही है।
ऊपर से सरकारी रोजगार के अवसर को ही समाप्त करके आरक्षण को निरस्त और रोजगार सिर्फ ठेकेदारी व्यवस्था में रहे, जिससे जब मालिक चाहे किसी को हटा सकें ऐवम कॉरपोरेट को अपने स्टाफ के लिए सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारी और खर्च से मुक्त रखा जाए का मार्ग प्रसस्त हो।
कुल मिला कर शाह और मोदी के पहले अगर कांग्रेसी शासन भ्रष्टाचार का मिसाल था, तो इन रंगा बिल्ला का शासन मात्र धोखा और जनता को बरगला कर अंततः अपने डिक्टेटरशिप को कायम करना है। सभी वर्गों को बेवकूफ बनाना ही इनका लक्ष्य है।
पिछड़े वर्ग के लिए नए आयोग के तमाम पहलु को सार्वजानिक कर इसके औचित्य पर जब तक बहस नहीं होगा, इसके पीछे की मंशा और आपके चिंता का निवारण नहीं होगा।
ध्यान रहे नरेन्द्र मोदी कोई पिछड़ा वर्ग से नहीं है। वह मोढ जाति से है जिसे उसने चुनाव से पहले गुजरात के पिछड़े वर्ग मैं शामिल करवाया और फिर खुद को पिछड़े वर्ग का घोषित करके चुनाव में वोट लिया। परंतु आज तक पिछड़े वर्ग के कल्याण के लिए कोई काम नहीं किया है। अब संघ के एजेंडा के तहत बहुत योजनाबद्ध तरीके से इस नए आयोग के माध्यम से पहले इसी 27% में जाट, पटेल आदि 90% जनता को ला कर, और यादव आदि को निकाल कर, जहाँ एक और आरक्षण को ही निरस्त किया जायेगा, वहीँ 2019 का चुनाव जीतने का आधार तैयार होगा।
फिर 2019 आरक्षण समाप्त कर दिया जायेगा।
हमारे दलित साथियों को समझना होगा की पिछड़े वर्ग 'बफर' हैं।
पिछड़े जब धराशायी तो अगली बारी दलितों की !!
हमें इसका विरोध करना ही चाहिए।

Wednesday, December 28, 2016

कैशलेस धोखा : आपकी जेब काटी जा रही है, वह भी जबरन।


क्या आपको अंदाजा है हम पर जो कैश लेस इकनॉमी थोपी जा रही है उसका फायदा किसको और कितना होने वाला है?
तथ्य नंबर-1
जब भी आप डेबिट कार्ड से कोई आर्थिक व्यवहार करते हैं तो बैंक रिटेलर या जिसको पैसे का भुगतान किया गया है उससे 0.5 से लेकर 1% तक कमीशन लेते हैं।
तथ्य नंबर -2
क्रेडिट कार्ड कंपनियां और बैंक क्रेडिट कार्ड से होने वाले हर आर्थिक व्यवहार (ट्रांजेक्शन) पर 1.5 % से लेकर 2.5% तक दलाली लेती है । यह दलाली दुकानदार यानी भुगतान लेने वाले से वसूली जाती है।
तथ्य नंबर -3
Paytm/Freecharge/ Jio Money और इन जैसी दूसरी E-wallets कम्पनियां 2.5% से 3.5% तक दलाली लेती है जब हम अपने मेहनत की कमाई अपने बैंक अकाउंट से e-wellet में ट्रांसफर करते हैं।
तथ्य नंबर -4
आरबीआई के अंकड़ों के मुताबिक हर महीने 2.25 लाख करोड़ और हर साल करीब 25 से 30 लाख करोड़ रुपये पूरे देश में ATM मशीनों से निकाले जाते हैं। अगर बैंकों से होने वाले विड्राल को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो (ATM+ बैंक) से निकलने वाली यह राशि होती है करीब 75 लाख करोड़। चूंकि इस राशि का सारा लेनदेन बैंक से होता है इसलिए यह सारा पैसा 1 नंबर का सफेद धन होता है।
तथ्य नंबर -5
वर्तमान में कुल आर्थिक व्यवहार का केवल 3 % आर्थिक व्यवहार इलेक्ट्रॉनिक तरीके से होता है।
तथ्य नंबर -6
अगर 1 नंबर में हुए 75 लाख करोड़ के आर्थिक व्यवहार को कैश लेस कर देंगे तो क्या होगा? Paytm/Freecharge/ Jio Money और इन जैसी दूसरी E-wallets कंपनियों की चांदी हो जायेगी।
कैसे होगी? तो जानिए ऐसे होगी...
75 लाख करोड़ के कैशलैस आर्थिक व्यवहार पर अगर यह निजी कंपनियां औसतन 2% भी कमीशन पाती हैं तो सीधे-सीधे हर साल डेढ़ लाख करोड़ रुपये इन कंपनियों को मिलेगा। बिना कुछ किये धरे। पैसा जनता का, माल व्यापारी का और ये कंपनियां मुफ्त में माल उड़ाएंगी!

सरकार ऐसे देगी सफाई
सरकार कहेगी मत यूज करो E-WELLET हम आपको फ्री में UPI app उपलब्ध करा रहे हैं। यह सरकारी है। एकदम फ्री है। इसके जरिये भुगतान करो। अच्छी बात है। लेकिन जरा सोचिए पिछले कई सालों से काम कर रहे रेलवे रिजर्वेशन के सरकारी सर्वर की क्या स्पीड है? इसी स्पीड में UPI का सर्वर भी चलेगा या फिर Paytm/Freecharge/ Jio Money और इन जैसी दूसरी E-wallets कंपनियां इसकी स्पीड बढ़ने नहीं देंगी। इतिहास गवाह है सरकारी विमान कंपनी एयर इंडिया की कमर बीजेपी वाले प्रमोद महाजन की करीबी जेट ने तोड़ी। BSNL और MTNL को कौन अपनी मुट्ठी में कर लिया है। इसलिए यह मत कहना की UPI यूज करो। जब UPI से स्पीड में पेमेंट नहीं होगा तो लोग वापस Paytm/Freecharge/ Jio Money और इन जैसी दूसरी E-wallets कंपनियों पर आश्रित हो जाएंगे।
डेढ़ लाख करोड़ रुपये सालाना का यह एक खुल्लमखुल्ला घोटाला है।
सरकार, Paytm/Freecharge/ Jio Money और इन जैसी दूसरी E-wallets कॉर्पोरेट कंपनियों और बैंकों की इसमें मिली भगत है।
अब समझ में आ रहा है कि कालाधन के नाम पर नोट बन्दी का फैसला कालाधन चलाने वाले कॉर्पोरेट को उपकृत करने के लिए लिया गया है। 2014 के चुनाव में कॉर्पोरेट ने बीजेपी पर जो निवेश किया था यह उसका रिटर्न है।
सारा गेम प्लान है
जैसे- जैसे नोट बन्दी की परतें उघड़ रहीं है कई बातें समझ में आने लगी हैं। मसलन नोट बन्दी, मोदी या जेटली के दिमाग से निकला फैसला नहीं है, क्योंकि इनके पास इतना गूढ़ डेढ़ लाख करोड़ सालाना कमाने का आइडिया सोचने वाला दिमाग है ही नहीं। अगर होता तो यह लोग राजनीति नहीं बिजनेस कर रहे होते। यह तो सिर्फ चेहरा हैं। असल गेम प्लान तो किसी और ने करोड़ों रुपये खर्च करके, टॉप चार्टड अकाउंटेंट, बैंकर और वित्त विशेषज्ञों से तैयार करवाया है। सरकार तो सिर्फ इस रेडीमेड प्लान को ढो रही है।
याद कीजिए, नोट बन्दी के चार दिन बाद यानी 13 नवंबर को प्रधानमंत्री का गोवा में दिया गया भाषण। क्या कहा था मोदी ने? उन्होंने कहा था, "मैं जानता हूं, मैंने कैसी-कैसी ताकतों से लड़ाई मोल ले ली है। जानता हूं, कैसे लोग मेरे खिलाफ हो जाएंगे। मुझे जिंदा नहीं छोड़ेंगे..." अब समझ में आ रहा है कि प्रधानमंत्री वास्तव में किस से डर रहे हैं।

Thursday, December 1, 2016

सीमा क्या होगी कंपनी राज का ?

सरकार कैश रकम निकालने और रखने की सीमा तय कर चुकी है।
अब सोना रखने और खरीदने पर भी सीमा तय कर दिया जायेगा।
परंतु अम्बानी और अडानी और उनके जैसे धन्ना सेठों के संपत्ति पर कोई सीमा नहीं। दिन दुगुना और रात चौगुना बढ़ती रहे।
पुराने मोनोपोली (एकाधिकार) एक्ट का कोई मतलब नहीं रह गया है।
टीवी देखने के लिए भी, न जाने किस कानून के अन्तर्गत, बिना सेट टॉप बॉक्स, आप टीवी देख नहीं सकते। छिटपुट केवल वालों की जगह ज़ी नेटवर्क और रिलायंस को केबल सप्लाई का एकाधिकार दे दिया गया है : वजह, पहले एक पेमेंट पर कई लोग देखते थे जिससे कंपनियों को नुकसान हो रहा था और लोगों पर कड़ी नज़र भी रखना है।
पहले भी लैंड सीलिंग एक्ट के तहत ज़मीन रखने की सीमा तय की गयी थी। आज कंपनियों को सेज़ (SEZ) आदि के माध्यम से बेहिसाब ज़मीन किसानों से छीन कर दे दिया गया है।
तो "सीमा" सिर्फ आम लोगों के लिए।
दरअसल यह कवायद वर्ल्ड बैंक और अमरीका के इशारे पर हो रहा है। भारत अभी भी 'सोने की चिड़िया' है, परंतु आम जनों का अपनी सम्पति और मेहनत से कमाई दौलत को बचा बचा कर खर्च करने की परंपरा रही है। अब विदेशों में जमा 'काला धन' का परिभाषा बदल कर, लोगों के निजी संपत्ति को ही 'काला धन' बता कर, उसे विदेशियों और देशी धन्ना सेठों को लूटने के लिए निकलवाया जा रहा है।
इस पूरे प्रकरण में, आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी विपक्ष नपुंसक जैसा सिर्फ शोर कर पा रहा है।
पर इसका उपाय दिखेगा, वक़्त के साथ जवाब भी मिलेगा।
इंतज़ार है।

Thursday, November 24, 2016

संगठित लूट? कानूनी लूट-खसोट ? किसका देश और किसकी सरकार ?



सर्वोच्च न्यायालय में नोटबन्दी पर केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में कहा है कि दुनिया में जीडीपी का महज 4 प्रतिशत कैश ट्रांजैक्शन होता है, लेकिब हमारे देश में ये जीडीपी का 12 प्रतिशत है, ऐसे में नोटबंदी का कदम ज्यादा कैश ट्रांजैक्शन को खत्म कर, उसको डिजिटल करने के लिए उठाया गया है।
विश्व बैंक की 2011 में अंतर्राष्ट्रीय तुलना कार्यक्रम के आधार पर यह अनुमान लगाया गया है कि भारतीय आबादी का 23.6%, या लगभग 276 मिलियन लोग प्रति दिन क्रय शक्ति समानता पर $ 1.25 से नीचे रहते हैं। यानि हैण्ड तो माउथ, या जैसे तैसे ज़िन्दगी बसर कर रहें हैं। और सबसे दुःखस पहलु है की यही वह तपका है जिसे डिजिटलाइजेशन की ओर ले जाने के लिए सरकार यह कवायद कर रही है।
हलफनामा में सरकार ने कहा है कि इस कदम से 70 साल के ब्लैक मनी के बोझ को सरकार ने खत्म करने का प्रयास किया है। क्या इसी 'ब्लैकमनी' की बात नरेन्द्र मोदी ने चुनाव प्रचार में किए थे ?
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने नोटबंदी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि जिस तरह से इसे लागू किया गया है, वह ‘प्रबंधन की विशाल असफलता’ है और यह संगठित एवं कानूनी लूट-खसोट का मामला है। उन्होंने पीएम से पूछा कि क्या ऐसा कोई देश है जहां लोग अपने पैसे जमा तो करवा सकते हैं लेकिन निकलवा नहीं सकते? नोटबंदी के बाद से देश में 60 से 65 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।
इस बीच, मोदी सरकार ने अपने दोस्तों को दिया हुआ 7 हज़ार करोड़ रुपए का लोन माफ़ कर दिया जिसमें 1200 करोड़ रुपए का लोन विजय माल्या का भी था।
बैंकों के माध्यम से जो लोन सरकार माफ़ करा रहे हैं वो हमारे या आपके द्वारा लिए गए छोटे-छोटे लोन नहीं हैं बल्कि इस देश के 9 बड़े-बड़े धन्नासेठों के घराने हैं जिन्होंने मिलकर कुल 7 लाख करोड़ रुपए का लोन सरकारी बैंकों से उठा रखा है। और मोदी जी के इन कर्ज़दार दोस्तों के नाम हैं –
एस्सार, रिलायंस, जीवीके, जीएमआर, अडानी, लैनको, वीडियोकॉन, वेदांता, जेपी आदि बड़े उद्योगपतियों के लोन माफ़ किया गया है।
कई कारणों से सरकार ने यह दावा किया है की नोट बंदी पर गोपनीयता बरती गयी। परंतु RBI के सितंबर 2016 की आकड़े देखे तो अगस्त 2016 के मुकाबले 5,88,600 करोड़ रुपया बैंकों के खाते में अतिरिक्त जमा हुआ। जुलाई 2016 में बैंकों के खातों में 96 हजार 196 बिलियन रुपये जमा हुए और सितंबर 2016 में बैंकों के सभी खातों में राशि बढ़कर 1 लाख 2 हजार 82 बिलियन रुपये हो गई। जिसका अंतर कनवर्ट करने पर 5,88,600 करोड़ रुपया होता है।
अब जरा RBI के आकड़ों के अनुसार ही 2015 में जुलाई और सितंबर के बीच जमा होने वाली राशि देखिए। जुलाई 2015 में सभी बैंकों में लगभग 88 हजार 301 बिलियन रुपये जमा हुआ और उसी साल सितंबर 2015 में 89 हजार 462 बिलियन रुपये जमा हुआ था।
हाल ही में ये बात सामने आई थी कि कुछ नेताओं को नोट बंदी की जानकारी पहले से ही थी। ऐसे में ये आकड़े सवाल पैदा करते है कि क्या कुछ नेताओं या बिजनेस मैन को इस बात की जानकारी पहले से ही थी। क्या जुलाई और सितंबर के जमा आकड़ों का भारी अंतर ये दर्शाता है कि कुछ लोगों ने अपने पैसों का निपटारा पहले ही कर लिया है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में वित्त मंत्री अरूण जेटली से नोट बंदी की गोपनीयता पर सवाल करने पर वो मान चुके है कि सरकार ने पूरी तरह से नोट बंदी पर गोपनीयता बरती है लेकिन हो सकता हो इस बात कि जानकारी कुछ लोगों को पहले ही हो गई हो।
8 नवंबर की रात ऐतिहासिक थी। देश में 500 और 1000 का नोट बंद कर प्रधानमंत्री मोदी ने नये 500 और 2000 रुपये के नोट जारी करने की घोषणा की। पीएम मोदी ने अपने फैसले को अबतक का काला धन के खिलाफ सबसे बड़ा फैसला बताया।
इससे पहले भी पीएम मोदी कई मौकों पर काला धन के मुद्दे पर भाषण देते आए हैं। लेकिन इन भाषणों के दौरान भी दौरान यानि नोट बंदी के 11 महीने पहले ही मोदी सरकार की कुछ फैसले से हवाला काराबारियों को कानूनी रूप से विदेशों में धन भेजने का सुनहरा मौका मिल गया। इतने समयांतराल में कुछ लोगों ने 30,000 करोड़ रुपये विदेशों में ट्रांसफर कर दिया। यह पिछले सालो की तुलना में तीन गुना राशि है।
मोदी सरकार बनने के पहले LRS (Liberalised Remittance Scheme) की तहत विदेश में धन भेजने की सीमा सिर्फ 75 हजार डॉलर थी। बीजेपी की सरकार ने सत्ता में आने के एक हफ्ते के अंदर ही 03 जून 2014 को इसकी सीमा बढ़ा 125 हजार डॉलर कर दी गई। पिछले साल 26 मई 2015 को दोबारा LRS बढ़ाकर 250 डॉलर कर दी गई। ये फैसला एक तरफ से हवाला कारोबार को कानूनी दर्जा देने जैसा साबित हुआ। इस फैसले के चलते जून 2015 में 30,000 हजार करोड़ रुपये विदेशी खातों में भेज गए।
यहा तक कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की जानकारी में ये सब तब से हो रहा था। जब RBI गुपचुप तरीके से 500 और 1000 की नोटों की रोक की तैयारी कर रही थी। RBI के पास आज भी इसका स्पष्ट जवाब नहीं है कि इतनी बड़ी रकम अचानक कैसे विदेशी खातों में पहुंच गई।
प्रधानमंत्री ने कहा है 50 दिन तक रुकने के लिए कहा है, लेकिन देश के गरीब वर्ग के लिए ये 50 दिन मुश्किलों भरे होंगे।