About Me

My photo
New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....
Showing posts with label B P Mandal. Show all posts
Showing posts with label B P Mandal. Show all posts

Wednesday, November 29, 2017

केंद्र सरकार के नौकरियों में आरक्षण के लाभों का वितरण के लिए पिछड़े वर्ग के उप वर्गीकरण के लिए जस्टिस रोहिणी कमीशन:

केंद्र सरकार के नौकरियों में आरक्षण के लाभों का वितरण के लिए पिछड़े वर्ग के उप वर्गीकरण के लिए जस्टिस रोहिणी कमीशन:
पिछड़े वर्ग का आरक्षण विवाद का केंद्र रहा है। दरअसल, संविधान के अनुच्छेद 340,341,342 तथा अनुच्छेद 15(4),के अनुसार विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा मीडिया तथा अन्य संस्थाओं में जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व होना चाहिए। परन्तु, जैसा मंडल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है, अक्सर समाज के पिछड़े वर्ग को प्रतिनिधित्व या समान अवसर देने में एक बड़े तबके को "हार्टबर्न" या हृद्दाह अथवा नाख़ुशी होती है। यह उस समय दिखा था जब 7 अगस्त, 1991 को मंडल आयोग की रिपोर्ट को ठन्डे बस्ते से निकाल कर आंशिक रूप से केंद्र सरकार की नौकरियों में लागू करने का वी पी सिंह सरकार ने फैसला किया था। फिर जबरदस्त विरोध का दौर चला। मामला सर्वोच्च न्यायालय में गया, जहाँ दिग्गज वकील राम जेठमलानी ने इसका बचाव किया। लोगों को लग रहा था की सर्वोच्च न्यायालय इसे निरस्त कर देगी। परन्तु सर्वोच्च न्यायालय के फैसले अनुसार पिछड़े वर्ग के आरक्षण में कृमि लेयर लागू किया गया और यह उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय ने इंदिरा साहनी एवं अन्य बनाम भारत सरकार मामले में 16 नवंबर 1992 को अपने आदेश में व्यवस्था दी थी कि पिछड़े वर्गों को पिछड़ा या अति पिछड़ा के रूप में श्रेणीबद्ध करने में कोई संवैधानिक या कानूनी रोक नहीं है।
इसी प्रावधान के मद्देनज़र, 2 अक्टूबर, 2017 को नरेंद्र मोदी कैबिनेट के अनुशंसा पर संविधान की धारा 340 के अंतर्गत महामहिम राष्ट्रपति ने अन्य पिछड़ा वर्गों के सभी स्तरों के बीच केंद्र सरकार की नौकरियों में आरक्षण के लाभों व संसाधनों के समान वितरण के तरीके और पर विचार कर अन्य पिछड़ा वर्ग के उप वर्गीकरण के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय रिटायर्ड चीफ जस्टिस जी रोहिणी की अध्यक्षता में एक कमीशन का गठन किया है। इस कमीशन के एक अन्य महत्वपूर्ण सदस्य डा जे के बजाज हैं। आयोग के अध्यक्ष द्वारा प्रभार धारण के बारह हफ्तों की अवधि के भीतर आयोग को अपनी रिपोर्ट पेश करने के लिए कहा गया है।
संदर्भ की शर्तों के अनुसार आयोग को केंद्रीय सूची के अन्य पिछड़ा वर्गों की व्यापक श्रेणी में शामिल जाति या समुदायों में आरक्षण के लाभों के गैर-लाभकारी वितरण की सीमा को जांचने के लिए कहा गया है तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के उप वर्गीकरण की विधि और तंत्र, मापदंड, मानदंड और पैरामीटर तय करने के लिए भी कहा गया है।
यहाँ अन्य पिछड़े वर्ग के आरक्षण की पृष्ठभूमि पर थोडी जानकारी आवश्यक है।
देश की आज़ादी के बाद यह भी बात उठी कि इन वर्गों के अलावे कई और सामाजिक तपके हैं, जिन्हें भी विशेष अवसरों कि आवश्यकता होगी। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से इन पिछड़े वर्गों का पता लगाने के लिए संविधान के धारा 340 के अनुसार एक आयोग बनाने का प्रावधान किया गया, जिसे पिछड़ा वर्ग आयोग कहा जाना था।
पंडित नेहरू पर इस बात का दबाब बढ़ने पर 29 जनवरी, 1953 को काका कालेलकर की अध्यक्षता में पहले पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया जिसने 30 मार्च 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी।इस रिपोर्ट के अनुसार 2,399 जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया, जिनमें 837 जातियों को अति-पिछड़ा घोषित किया गया। लेकिन इस आयोग के रिपोर्ट कि सबसे दिलचस्प पहलु यह थी कि आयोग के अध्यक्ष ने रिपोर्ट के साथ माननीय राष्ट्रपति को दिए गए अपने पत्र में अपनी ही रिपोर्ट को ख़ारिज कर दी।
इसी पत्र के आधार पर वर्षों तक पिछड़े वर्ग के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। 1977 के लोक सभा चुनाव में नवगठित जनता पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में पिछड़े वर्ग के लिए विशेष उपाय पूरे संजीदगी से उठाया गया और उस चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस को पहली और करारी हार दी।
राष्ट्रपति ने 1 जनवरी, 1979 को पिछड़ा वर्ग आयोग कि गठन कि अधिसूचना जारी की जिसके अध्यक्ष बिहार के पूर्व मुख्य-मंत्री बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल (बी पी मंडल) को बनाया गया। उन्हीं के नाम पर इस आय़ोग को मंडल आयोग के नाम से जाना गया। बी पी मंडल ने 31 दिसंबर,1980 को नई दिल्ली के विज्ञानं भवन में राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह को रिपोर्ट सौंप दी।
मंडल कमीशन रिपोर्ट तो पूरे विज्ञानिक आधार के बनायी गयी की वर्षों बाद सर्वोच्च न्यायलय के सम्पूर्ण बेंच द्वारा भी इसमें किसी तरह कि कमी नहीं निकाली जा सकी। रिपोर्ट 5 वॉल्यूम में है। पहले वॉल्यूम में रिपोर्ट और अनुशंसा है। दुसरे में तमाम जुड़े कागजात का 'अपेंडिक्स' है। तीसरे में आज़ादी और उसके पहले से आरक्षण पर पूरे भारत में न्यायालय में दायर केस और उनके निर्णय की इंडियन लॉ इंस्टिट्यूट द्वारा किया गया विस्तृत अध्यन है। चौथे वॉल्यूम में भारत के 31 राज्यों (उस समय के) में प्रत्येक ज़िले में जातियों का अध्यन है जो प्रतिष्ठित टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज द्वारा किया गया है। पांचवे वॉल्यूम में राज्यवार जातियों की सूची है जिन्हें पिछड़े वर्ग की केंद्रीय सूची में शामिल किया गया है। रिपोर्ट में 1931 में हुए आखिरी जाति आधारित जनगणना के अनुसार भारत के 52% जनसंख्या जिसमें 3,743 अलग अलग जातियों को समाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा या ‘backward’ घोषित किया गया। परन्तु चुकी पहले से अनुसूचित जाति/जनजाति को 22.5% आरक्षण प्राप्त था अतः कई अन्य अनुशंसाओं के साथ साथ उनके लिए 27% आरक्षण का प्रावधान करने के लिए कहा गया, जिसे जोड़ने के बाद आरक्षण का कुल प्रतिशत 49.5 होता था जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय सीलिंग 50% से कम था।
1989 का लोकसभा चुनाव के बाद वी. पी.सिंह प्रधानमंत्री बने और दिसंबर 1980 से ठन्डे बस्ते में पड़ी मंडल आयोग के रिपोर्ट को 7 अगस्त, 1991 को आंशिक रूप से लागू कर दिया। और उधर मंडल कमीशन का भीषण विरोध शुरू हो गया। अतः वास्तव में मंडल कमीशन की सिफारिशों से भारतीय राजनीति और समाज में भूचाल आ गया।
अब हम यह जानते हैं कि पिछड़े वर्ग का उप वर्गीकरण क्या है ? इस बात की मांग उठती रही है कि अन्य पिछड़ी जातियों में जो आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत जातियां हैं उनको आरक्षण का सबसे ज्यादा फायदा मिल रहा है और बिल्कुल हाशिए पर की जातियां आरक्षण के लाभ से वंचित हैं। इस तर्क के अनुसार बिहार में मुंगेरी लाल कमीशन के अनुसार कर्पूरी ठाकुर फार्मूला लागू किया गया जिसके तहत एनेक्सचर-1 और एनेक्सचर- 2 की जातियों का विभाजन कियागया था और आरक्षण के भीतर आरक्षण देने का फैसला किया था। अन्य पिछड़ी जातियों में वर्गीकरण कराने और क्रीमी लेयर के दायरे को छोटा करने का केंद्र सरकार का फैसला इस बात का संकेत है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बिहार के कर्पूरी ठाकुर फार्मूला को केंद्र स्तर पर लागू करना चाहते हैं।
परन्तु इससे कुछ अन्य चिंताएं जुडी हुई है। सबसे अधिक जिज्ञासा दो बिंदुओं पर है। एक, मंडल आयोग लागू होने के बाद पिछड़े वर्ग का केंद्रीय सरकार की नौकरियों में कितना प्रतिनिधित्व है ? और दूसरा आज की परिस्थिति में केंद्र सरकार की नौकरियाँ ही कितनी है ?
इस सन्दर्भ में 26 दिसंबर, 2015 के टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपे एक रिपोर्ट के अनुसार मंडल आयोग की सिफारिश के आंशिक रूप से लागू किये जाने के 20 वर्ष बाद भी केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़े वर्ग की संख्या 12 प्रतिशत से भी कम है। एक आरटीआई से प्राप्त जानकारी के आधार पर कहा गया है कि 1 जनवरी, 2015 तक मण्डल आयोग की रिपोर्ट के कार्यान्वयन के 2 दशक बाद केंद्र सरकार की नौकरियों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की अनुशंसा किये जाने के बाद भी आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार के मंत्रालयों, विभागों और सांविधिक निकायों के 12 प्रतिशत से कम कर्मचारी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से हैं। इस सम्बन्ध में केंद्र सरकार के मानव संसाधन मंत्रालय सहित 40 मंत्रालय और सामाजिक न्याय विभाग सहित 48 विभागों ने आरटीआई का जवाब नहीं दिया। फिर भी, उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक केंद्र सरकार में कार्यरत समूह ए, बी, सी और डी श्रेणी के कर्मचारी के 79,483 पदों में से केवल 9,040 कर्मचारी ओबीसी हैं।
एक आरटीआई के अनुसार रोजगार के सन्दर्भ में 74 मंत्रालोयों और विभागों ने सरकार को बताया है कि अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़ी जातियों की 2013 में 92,928 भर्तियां हुई थीं। 2014 में 72,077 भर्तियां हुईं। मगर 2015 में घटकर 8,436 रह गईं। इस तरह नब्बे फीसदी गिरावट आई है।
अतः यह ज़रूरी होगा की सरकार यह जानकरी दें की पिछड़े वर्ग में प्राप्त आरक्षण में किन जातियों का प्रतिनिधित्व कितना है ? साथ ही दावेदारी कितनी है ?
अगर जातियों की दावेदारी और प्राप्त हिस्सा में अन्तर हो तो उप वर्गीकरण से निश्चित तौर पर लाभ होगा। अगर न दावेदारी है, न जातियों को हुए फायदे के आंकड़ें हैं और न ही सरकार को देने के लिए रोजगार है, तो पिछड़े वर्ग के आरक्षण उप वर्गीकरण का कोई मतलब नहीं है और न ही इसका कोई राजनैतिक लाभ नरेंद्र मोदी की सरकार को मिलेगा।

Saturday, March 25, 2017

पिछड़े वर्ग के आरक्षण पर बड़ा हमला : मंडल कमीशन को बिना लागू किये,अब एक नया कमीशन:

पिछड़े वर्ग के आरक्षण पर बड़ा हमला : मंडल कमीशन को बिना लागू किये,अब एक नया कमीशन :
केंद्र सरकार ने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए नया आयोग बनाने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में गुरुवार को हुई कैबिनेट बैठक में यह निर्णय लिया गया।
कहा जा रहा है की अब आयोग को संवैधानिक दर्जा मिलेगा: नए आयोग का नाम सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग के लिए राष्ट्रीय आयोग (एनएसईबीसी) रखा जाएगा। यह मौजूदा राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की जगह लेगा। संसद से बिल पारित करा इसे संवैधानिक दर्जा भी दिया जाएगा। अभी आयोग का संवैधानिक दर्जा नहीं है।
इससे पिछला कानून रद्द हो जायेगा : मंत्रिमंडल ने पिछड़ा वर्ग के लिए राष्ट्रीय आयोग अधिनियम, 1993 को भी निरस्त कर दिया और इसके तहत गठित संस्था को भंग कर दिया है। पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद हुआ था। संवैधानिक दर्जा नहीं होने से इसकी सिफारिशों और आदेशों को मानने में विभाग कोताही बरतते हैं। यह माना जा रहा था कि यह आयोग अन्य पिछड़ा वर्ग के हितों की रक्षा नहीं कर पा रहा था।
दरअसल, पिछड़े वर्ग के लिए मंडल कमीशन की अनुशंसाओं को निरस्त कर, आरक्षण में छेड़छाड़ कर, आरक्षण समाप्त करने के संघ के कई बार घोषित एजेंडा की दिशा में मोदी सरकार का पहला कदम है।
मंदिर, रोमियो, बूचड़खाना, नोटबंदी आदि के नाम पर जब तक जनता का ध्यान बँटा कर खेल हो जायेगा।
संवैधानिक तौर पर पूर्व में पिछड़े वर्ग आयोग का दो बार गठन हुआ है : काका कालेलकर आयोग और मंडल आयोग।
काका कालेलकर खुद ही अपनी अनुशंसाओं को नहीं लागू करने का निवेदन राष्ट्रपति को किये थे।
मंडल आयोग को इतिहास के ठन्डे बक्से से निकाल कर आंशिक रूप से भी लागू करने में वर्षों लग गए।
बावजूद आज तक यह सही ढंग से लागू नहीं है। मंडल रिपोर्ट कानूनी तौर पर इतना ठोस है कि कोर्ट में इसे निरस्त करने के लंबे प्रयास को भी मुहँ की कहानी पड़ी।
तब एक असंवैधानिक क्लॉज़, "क्रीमी लेयर" जबरन जोड़ा गया जिसे आज तक संसद ने भी मान रखा है।
हाल में 120 पिछड़े वर्ग के सिविल सेवा में कम्पीट किये हुए अभ्यर्थियों को मोदी सरकार ने "क्रीमी लेयर" की नई परिभाषा लागू कर लिस्ट से हटा दिए और उस जगह को खाली रखा है।
अब किसे पिछड़े वर्ग के लिस्ट में रखना है, किसे हटाना है, यह संसद के माध्यम से मोदी सरकार अपने हाथ में लेना चाहती है। अतः यह नई कमीशन का प्रावधान।
पिछड़े वर्ग की संख्या मंडल आयोग ने 52% माना था और चुकी 50% का सर्वोच्च न्यायालय का कैप था, तो 27% आरक्षण की अनुशंसा की गई थी।
परंतु आज भी उल्टा आरक्षण लागू है यानि जेनेरल के 50% नौकरियों में 'मेरिट' पर आए पिछड़े और दलित अभ्यर्थियों को जेनेरल में स्थान नहीं दिया जाता है।
कई हाई कोर्ट ने इस असंवैधानिक परिभाषा पर मुहर लगाई है। सरकार और संसद चुप है।
अब सरकार पिछड़े वर्ग में शामिल किये या हटाये जाने की पॉवर को लेकर उन वर्गों पर हमला करेगी जो उसके वोटर नहीं है।
यह भी संभव है कि "आर्थिक" आधार पर पिछड़े वर्ग की पहचान को सरकार मान्यता दे दें। चुकी यह कमीशन संविधान में संशोधन करके लाया जायेगा, तो इसके पहले के संवैधानिक परिभाषा कि "शैक्षणिक और सामाजिक" रूप से पिछड़े वर्ग की भी बदला हुआ माना जायेगा।
आरक्षण को निरस्त करने के लिए काँग्रेस समय से सरकारी नौकरियां ख़त्म की जा रही हैं। अब सरकारी उच्च शिक्षा पर हमला है और सीटें काम करते हुए इन्हें "निजीकरण" करके कॉरपोरेट को सौंप दिया जायेगा।
यह बड़ी साज़िश है।
जैसे ईवीएम का खेल हुआ है, वैसे ही अब पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण को निरस्त किया जायेगा।
जो आरक्षण की समीक्षा करने की बात करते हैं, वह जान लें की मोदी कभी आरक्षण की समीक्षा नहीं करंगें।
अगर समीक्षा करना होता तो जाति जनगणना के परिणाम भी सार्वजानिक किये जाते, जिसमें कौन वर्ग को अभी कितने रोजगार पर्याप्त हैं और उनकी आर्थिक स्थिति क्या है, यह सभी को पता चल जायेगा।
मंडल कमीशन के लगूं होने पर भी पिछड़े वर्ग को कोई खास रोजगार नहीं, और आरक्षण के 27% अनुशंसा की जगह यह मात्र 6 या 7% है।
फिर जो यह कहते हैं की आरक्षण के अलाभ यह ले लिया और उसे नहीं मिला, वे साज़िश की तहत सिर्फ पिछड़े वर्ग में आपसी दुर्भावना या कलह को बढ़ाना चाहते हैं क्योंकि वास्तविक रूप से समाज में समानता लाने के लिए रोजगार की उपलब्धता और समान अवसर प्रदान करना एक सपना ही है।
ऊपर से सरकारी रोजगार के अवसर को ही समाप्त करके आरक्षण को निरस्त और रोजगार सिर्फ ठेकेदारी व्यवस्था में रहे, जिससे जब मालिक चाहे किसी को हटा सकें ऐवम कॉरपोरेट को अपने स्टाफ के लिए सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारी और खर्च से मुक्त रखा जाए का मार्ग प्रसस्त हो।
कुल मिला कर शाह और मोदी के पहले अगर कांग्रेसी शासन भ्रष्टाचार का मिसाल था, तो इन रंगा बिल्ला का शासन मात्र धोखा और जनता को बरगला कर अंततः अपने डिक्टेटरशिप को कायम करना है। सभी वर्गों को बेवकूफ बनाना ही इनका लक्ष्य है।
पिछड़े वर्ग के लिए नए आयोग के तमाम पहलु को सार्वजानिक कर इसके औचित्य पर जब तक बहस नहीं होगा, इसके पीछे की मंशा और आपके चिंता का निवारण नहीं होगा।
ध्यान रहे नरेन्द्र मोदी कोई पिछड़ा वर्ग से नहीं है। वह मोढ जाति से है जिसे उसने चुनाव से पहले गुजरात के पिछड़े वर्ग मैं शामिल करवाया और फिर खुद को पिछड़े वर्ग का घोषित करके चुनाव में वोट लिया। परंतु आज तक पिछड़े वर्ग के कल्याण के लिए कोई काम नहीं किया है। अब संघ के एजेंडा के तहत बहुत योजनाबद्ध तरीके से इस नए आयोग के माध्यम से पहले इसी 27% में जाट, पटेल आदि 90% जनता को ला कर, और यादव आदि को निकाल कर, जहाँ एक और आरक्षण को ही निरस्त किया जायेगा, वहीँ 2019 का चुनाव जीतने का आधार तैयार होगा।
फिर 2019 आरक्षण समाप्त कर दिया जायेगा।
हमारे दलित साथियों को समझना होगा की पिछड़े वर्ग 'बफर' हैं।
पिछड़े जब धराशायी तो अगली बारी दलितों की !!
हमें इसका विरोध करना ही चाहिए।

Wednesday, August 24, 2016

पिछड़ा वर्ग आयोग : मंडल कमीशन में मुस्लिम पिछड़े भी शामिल हैं।


देश के संविधान में बाबा साहेब के गैर दलित पिछड़ों के सम्बन्ध में व्यक्त चिंता की वजह से दिए गए प्रावधान के अनुरूप पहला पिछड़ा वर्ग आयोग एक ब्राह्मण काका कालेलकर की अध्यक्षता में गठित की गयी, परंतु इस आयोग की अनुशंसाओं पर स्वयं अध्यक्ष काका कालेलकर की ओर से राष्ट्रपति को दिए गए आपत्ति के कारण इसे ख़ारिज दिया गया। 1977 में जनता पार्टी के शासन में आने पर अपने घोषणा पत्र में किये गए वायदे के अनुसार दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग गठित किया गया। इसकी जिम्मेदारी प्रधान मंत्री मोरारजी भाई देसाई ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बी पी मंडल को सौपते हुए कहे थे कि, "मंडल जी, आपको शायद लगा होगा की मैंने आपको कैबिनेट में स्थान क्यों नहीं दिया। परंतु यह अधिक जिम्मेदारी का दायित्व है जिसके लिए आपको हमेशा याद किया जायेगा।"
यह गौरतलब है की जहाँ प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग ने 30 मार्च, 1955 को कुल 2399 हिन्दू जातियों को पिछड़ा घोषित किया था, और क्लास 1 में 25%, क्लास II में 33.5% तथा क्लास III & IV में 40% आरक्षण की अनुशंसा की थी, वहीं मंडल कमीशन रिपोर्ट ने विभिन्न धर्मो (मुसलमान भी) और पंथो के 3743 जातियाँ (देश के 54% जनसँख्या) को सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक मापदंडो के आधार पर सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ा (संविधान में आर्थिक पिछड़ा नहीं लिखा है और कमीशन आर्थिक बराबरी के लिए भी नहीं था) घोषित करते हुए 27% (क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 50% अधिकतम का फैसला दिया था और पहले से SC/ST के लिए 22.5 % था), की रिपोर्ट दी।
कोर्ट फैसले के अनुसार गैर संविधानिक 'क्रीमी लेयर" प्रावधान और नेशनल कमीशन फॉर बैकवर्ड क्लास के आदेशानुसार इसमें रोज छेड़-छाड़ की जा रही है।
सही मायने में उलटा आरक्षण लागू है (यानि 27% से अधिक मेरिट में भी नहीं आ सकते), और तमाम ओबीसी नेता सिर्फ अपने परिवार को तरक्की देने में लगे हैं।
#98thBirthAnniversaryOfBPMandal

Tuesday, June 23, 2015

आपातकाल और बी पी मंडल : Emergency and B P Mandal :

26 जून को आपातकाल की 40 वीं वर्षगांठ है। दरअसल, संविधान के अनुसार देश पर बाहरी खतरे (युद्ध) या आतंरिक (राजद्रोह या विद्रोह) खतरे से उत्पन्न विशेष स्थिति का सामना करने के लिए सरकार आपकाल लागू कर सकती है जब वह नागरिक अधिकार और साधारण कानून निलंबित करती है। सरकार के पास असीमित अधिकार मिल जाते हैं जिसका दुरपयोग भी किया जा सकता है। और हुआ भी यही था।
मामला 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था, जिसमें उन्होंने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी राज नारायण को पराजित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राज नारायण ने इलाहबाद हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। उनकी दलील थी कि इंदिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग किया, तय सीमा से अधिक खर्च किए और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए ग़लत तरीकों का इस्तेमाल किय। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया। इंदिरा हगंधी की इस्तीफे की मांग उठ गयी और कानूनन उन्हें ऐसा ही करना चाहिए था। फैसले में इंदिरा गांधी को चुनाव में धांधली करने का दोषी पाया गया और उन पर छह वर्षों तक कोई भी पद संभालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। परन्तु इसके बावजूद इंदिरा गांधी टस से मस नहीं हुईं और इस फ़ैसले को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की। 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी गई। तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी। यहाँ तक कि कांग्रेस पार्टी ने खुले आम कहने लगी कि इंदिरा का नेतृत्व पार्टी के लिए अपरिहार्य है।
इस तरह 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 मास की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल था। आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए तथा नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई। इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया और प्रेस पर प्रतिबंधित कर दिया गया। प्रधानमंत्री के बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान चलाया गया। जयप्रकाश नारायण ने इसे भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि' कहा था।
आपातकाल लागू होते ही आंतरिक सुरक्षा क़ानून (मीसा) के तहत राजनीतिक विरोधियों की गिरफ़्तारी की गई, इनमें जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, जॉर्ज फ़र्नांडिस, अटल बिहारी वाजपेयी आदि भी शामिल थे।
जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर सम्पूर्ण क्रांति के नारे को लेकर छात्र संघर्ष समिति का गठन हुआ। पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष लालू प्रसाद और सचिव सुशील मोदी, छात्र नेता रामविलास पासवान, दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष अरुण जेटली आदि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
18 मार्च 1974 को छात्र संघर्ष समिति ने बिहार विधान सभा का घेराव किया। फिर छात्र संघर्ष समिति ने बिहार विधान सभा के सभी सदस्यों से इस्तीफा देने आह्वान किया। उन्होंने मांग की मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर को बर्खास्त किया जाए।
उस समय 318 सदस्यीय बिहार विधान सभा में मुख्य पार्टियों की संख्या इस प्रकार थी : कांग्रेस (इंदिरा) 167, सी पी आई 35, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी 33, भारतीय जान संघ 25, कांग्रेस (ओ) 30, निर्दलीय 17, हिंदुस्तानी शोषित दल 3, झारखण्ड 1, झारखण्ड पार्टी 3, बिहार प्रान्त झारखण्ड पार्टी 2 आदि।
कर्पूरी ठाकुर और बी पी मंडल संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में थे। विधायक बदलते हुए राजनैतिक परिस्थितियों में धीरे-धीरे इस्तीफा देने लगे। भारतीय जन संघ में इस्तीफे के प्रश्न पर दो फाड़ हो गए। इसी तरह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के अधिकांश विधायक कर्पूरी ठाकुर के इस्तीफा बाद बी पी मंडल को नेता मान लिए।
मधेपुरा में राजनैतिक आंदोलन हो रहे थे और छात्र संघर्ष समिति के स्थानीय टी पी कॉलेज के नेता बी पी मंडल के इस्तीफा देने की मांग को लेकर एस डी ओ कंपाउंड (SDO Compound) में "यज्ञ आंदोलन" करते हुए इंदिरा - अब्दुल गफूर विरोधी अन्य मन्त्रों के साथ साथ "बी पी मंडल स्वाहा" कह कर आहुति दे रहे थे। मैं भी यह मंजर देखने वहां पहुंचा था। उसी दौरान विरोध प्रदर्शन में शामिल युवक सदानंद पुलिस की गोली का शिकार हो गए।
आपातकाल घोषणा एवं मधेपुरा में हुए इन घटनाओं के समय ही लगभग जय प्रकाश बाबू के आग्रह पर बी पी मंडल और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के लहभग सभी सदस्य बिहार विधान सभा से इस्तीफा दे दिए।
अब बिहार के कांग्रेस विरोधी नेताओं की भी धड़-पकड़ शुरू हो गयी। बी पी मंडल अपने गॉव मुरहो में थे। पर मंडल परिवार के पुराने रुतबे के कारण और मुरहो में तब जल्दी पुलिस का पदार्पण नहीं होने की परंपरा से संभवतः पुलिस इस ताक में रहती थी कब मंडल जी मधेपुरा आएं और कोई कार्यवाई हो। इस दौरान लगभग डेढ़ महीने तक दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश भी गिरफ़्तारी से परहेज रखने के लिए मंडल जी के साथ ही मुरहो में थे। कुछ दिनों तक चौधरी ब्रह्म प्रकाश मंडल जी के मधेपुरा आवास पर भी बतौर मेहमान रहें। (स्व बी पी मंडल और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री राव बिरेन्द्र सिंह भी अभिन्न मित्र थे)।
आपातकाल लागू करने के लगभग दो साल बाद 1977 में अपने पक्ष में ख़ुफ़िया रिपोर्ट के मद्देनज़र प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी। आपातकाल समाप्त कर दिया गया। चुनाव में आपातकाल लागू करने का फ़ैसला कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ। ख़ुद इंदिरा गांधी अपने गढ़ रायबरेली से चुनाव हार गईं। जनता पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। संसद में कांग्रेस के सदस्यों की संख्या 350 से घट कर 153 पर सिमट गई और 30 वर्षों के बाद केंद्र में किसी ग़ैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ।
बिहार में जनता पार्टी के सांसदीय समिति के अध्यक्ष होने के नाते, और जय प्रकाश बाबू के आग्रह पर, कर्पूरी ठाकुर और सत्येन्द्र बाबू के आपत्ति बावजूद, बी पी मंडल ने लालू प्रसाद को छपरा से लोक सभा टिकट के लिए अनुमोदन किए।
1977 में बिहार के 54 सीट में से 52 जनता पार्टी के पक्ष में थे और एक एक सीट निर्दलीय और झारखण्ड पार्टी को मिली।
बिहार से जीतने वाले दिग्गजों में बी पी मंडल के अलावे बाबू जगजीवन राम (कांग्रेस छोड़ कर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी बनाए थे), सत्येन्द्र नारायण सिंह, कर्पूरी ठाकुर, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडिस, हुकुमदेव नारायण यादव और पहली बार जीतने वालों में कम उम्र के लालू प्रसाद और रिकार्ड वोट के साथ राम विलास थे।
विडम्बना यह है की लालू प्रसाद आज भी अपने टिकट के लिए बी पी मंडल की स्मृति के प्रति अहसानमंद होने की जगह उनके प्रति उपेक्षा का भाव रखते हैं।

Sunday, August 24, 2014

25 अगस्त : सामाजिक न्याय के प्रणेता स्व बी पी मंडल की जयन्ती पर।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और भारत सरकार के पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष रहे स्व बी पी मंडल की जयन्ती बिहार सरकार के राजकीय समारोह के तौर पर उनके पैतृक गाँव मुरहो (मधेपुरा) और राजधानी पटना में मनाया जाता है।

स्व बिन्ध्येश्वरी प्रसाद मंडल का जन्म 25 अगस्त,1918 को बनारस में हुआ था। वे बिहार के आधुनिक इतिहास में पिछड़े वर्ग के और यादव समाज के संभवतः प्रथम क्रन्तिकारी व्यकित्व, मुरहो एस्टेट के ज़मींदार होते हुए भी स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रीय और कांग्रेस पार्टी में बिहार से स्थापना सदस्यों में एक, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, बिपिन चन्द्र पाल, सच्चिदानंद सिन्हा जैसे प्रमुख नेताओं के साथी, 1907 से 1918 तक बिहार प्रांतीय कांग्रेस कमिटी और ए आई सी सी के बिहार से निर्वाचित सदस्य, 1911 में गोप जातीय महासभा (बाद में यादव महासभा) की संस्थापक स्व रासबिहारी लाल मंडल के सबसे छोटे पुत्र थे। रासबिहारी बाबू यादवों के लिए जनेऊ धारण आन्दोलन और 1917 में मोंटेग-चेल्म्फोर्ड समिति के समक्ष यादवों के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए, वायसरॉय चेल्म्फोर्ड को परंपरागत 'सलामी'देने की जगह उनसे हाथ मिलते हुए जब यादवों के लिए नए राजनैतिक सुधारों में उचित स्थान और सेना में यादवों के लिए रेजिमेंट की मांग किए थे। 1911 में सम्राट जार्ज पंचम के हिंदुस्तान में ताजपोशी के दरबार में प्रतिष्टित जगह से शामिल हो कर वह उन अँगरेज़ अफसरों को भी दंग कर दिए जिनके विरुद्ध वे वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।1917 में कांग्रेस के कलकत्ता विशेष अधिवेशन में वे सबसे पहले पूर्ण स्वराज्य की मांग की थी। कलकत्ता से छपने वाली हिंदुस्तान का तत्कालीन प्रतिष्टित अंग्रेजी दैनिक अमृता बाज़ार पत्रिका ने रासबिहारी लाल मंडल की अदम्य साहस और अभूतपूर्व निर्भीकता की प्रशंसा की और अनेक लेख और सम्पादकीय लिखी, और दरभंगा महराज ने उन्हें 'मिथिला का शेर' कह कर संबोधित किया था। 27 अप्रैल, 1908 के सम्पादकीय में अमृता बाज़ार पत्रिका ने कलकत्ता उच्च न्यायलय के उस आदेश पर विस्तृत टिप्पणी की थी जिसमें भागलपुर के जिला पदाधिकारी लायल के रासबिहारी बाबू के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित व्यवहार को देखते हुए उनके विरुद्ध सभी मामलों पर संज्ञान लिया और उन मामलों को रासबिहारी बाबू के वकील मिस्टर जैक्सन के निवेदन पर दरभंगा हस्तांतरित कर दिया था।

1918 में बनारस में ५१ वर्ष की आयु में जब रासबिहारी बाबू का निधन हुआ तो वहीँ बी पी मंडल का जन्म हुआ। रासबिहारी लाल मंडल के बड़े पुत्र भुब्नेश्वरी प्रसाद मंडल थे जो १९२४ में बिहार-उड़ीसा विधान परिषद् के सदस्य थे, तथा १९४८ में अपने मृत्यु तक भागलपुर लोकल बोर्ड (जिला परिषद्) के अध्यक्ष थे। दूसरे पुत्र कमलेश्वरी प्रसाद मंडल आज़ादी की लड़ाई में जय प्रकाश बाबू वगैरह के साथ गिरफ्तार हुए थे और हजारीबाग सेन्ट्रल जेल में थे और १९३७ में बिहार विधान परिषद् के सदस्य चुने गए थे।

कहते हैं की एक समय कलकत्ता में रासबिहारी बाबू से राजनैतिक रूप से जुड़े प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के कारण मधेपुरा विधान सभा से 1952 के प्रथम चुनाव में बी पी मंडल काँग्रेस के प्रत्याशी बने और 1952 में बहुत काम उम्र में मधेपुरा विधान सभा से सदस्य चुने गए। 1962 में पुनः चुने गए और 1967 में मधेपुरा से लोक सभा सदस्य चुने गए1965 में मधेपुरा क्षेत्र के पामा गाँव में हरिजनों पर सवर्णों एवं पुलिस द्वारा अत्याचार पर वे विधानसभा में गरजते हुए कांग्रेस को छोड़ सोशिअलिस्ट पार्टी में आ चुके थे। बड़े नाटकीय राजनैतिक उतार-चढ़ाव के बाद १ फ़रवरी,१९६८ में बिहार के पहले यादव मुख्यमंत्री बने। इसके लिए उन्होंने सतीश बाबू को एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनवाए। अतः सतीश बाबू को एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनाने वाले स्व बी पी मंडल ही थे। बी पी मंडल ६ महीने तक सांसद थे, और बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री भी थे। वे राम मनोहर लोहिया जी एवं श्रीमती इंदिरा गाँधी की इच्छा के विरुद्ध बिहार में पहले पिछड़े समाजके मुख्यमंत्री बनने जा रहे थे। परन्तु विधानसभा में बहुमत के बावजूद तत्कालीन राज्यपाल अयंगर साहेब रांची जाकर बैठ गए और मंडल जी को शपथ दिलाने से इस आधार पर इंकार कर दिया कि बी पी मंडल बिहार में बिना किसी सदन के सदस्य बने ६ महीने तक मंत्री रह चुके है। परन्तु बी पी मंडल ने राज्यपाल को चुनौती दी और इस परिस्थिति से निकलने के लिए तय किया गया की सतीश बाबू एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बन कर इस्तीफा देंगे जिससे बी पी मंडल के मुख्यमंत्री बनने में राज्यपाल द्वारा खड़ा किया गया अरचन दूर किया जा सके। अब इंदिरा गाँधी और लोहिया जी सभी मंडल जी के व्यक्तित्व से डरते थे और नहीं चाहते थे की सतीश बाबू इस्तीफा दें। परन्तु सतीश बाबू ने बी पी मंडल का ही साथ दिया। आगे की कहानी और दिलचस्प है। उन्ही दिनों बरौनी रिफायनरी में तेल का रिसाव गंगा में हो गया और उसमें आग लग गयी। बिहार विधान सभा में पंडित बिनोदानंद झा ने कहा कि शुद्र मुख्यमंत्री बना है तो गंगा में आग ही लगेगी!

साक्ष्य तो इस प्रकरण का बिहार विधानसभा के रिकार्ड में है - बात पहले बिहार विधान सभा की है, जब स्व बी पी मंडल ने आपत्ति की थी कि यादवों के लिए विधान सभा में 'ग्वाला' शब्द का प्रयोग किया गया।सभापति सहित कई सदस्यों ने कहा की यह असंसदीय कैसे हो सकता है क्योंकि यह शब्दकोष (Dictionary) में लिखा हुआ है। स्व मंडल ने कुछ गालियों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये भी तो शब्दकोष (Dictionary) में है, फिर इन्हें असंसदीय क्यों माना जाता है. सभापति ने स्व मंडल की बात मानते हुए, यादवों के लिए 'ग्वाला' शब्द के प्रयोग को असंसदीय मान लिया। लेकिन उन दिनों किन जातिवादी हालातों में बाते हो रही थी, इसका अंदाज़ मुश्किल है।

१९६८ में उपचुनाव जीत कर पुनः लोक सभा सदस्य बने।१९७२ में मधेपुरा विधान सभा से सदस्य चुने गए। १९७७ में जनता पार्टी के टिकट पर मधेपुरा लोक सभा से सदस्य बने। १९७७ में जनता पार्टी के बिहार संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष के नाते लालू प्रसाद को कर्पूरी ठाकुर और सत्येन्द्र नारायण सिंह के विरोध के बावजूद छपरा से लोक सभा टिकट मंडल जी ने ही दिया। १९७८ में कर्णाटक के चिकमंगलूर से श्रीमती इंदिरा गाँधी के लोक सभा में आने पर जब उनकी सदस्यता रद्द की जा रही थी, तो मंडल जी ने इसका पुरजोर विरोध किया। १.१.१९७९ को प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने बी पी मंडल को पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया, जिस जबाबदेही को मानल जी ने बखूबी निभाया।इनके दिए गए रिपोर्ट को लाख कोशिश के बावजूद सर्वोच्च न्यायलय में ख़ारिज नहीं किया जा सका।खैर, उसके बाद की घटनाएं तो तात्कालिक इतिहास में दर्ज है और जो हममें से बहुतों को अच्छी तरह याद है.

स्व बी पी मंडल जी की मृत्यु १३ अप्रैल.१९८२ को ६३ वर्ष की आयु में हो गयी।

स्व बी पी मंडल के जयंती पर उनकी स्मृति को अनेकों बार नमन.

Wednesday, June 25, 2014

देश में आपातकाल (Emergency) 26 जून 1975 से 22 मार्च,1977.


देश में आपातकाल (Emergency) 26 जून 1975 से 22 मार्च,1977.

आज के नौजवान साथियों को वह दौर समझने में थोड़ी मुश्किल ज़रूर हो सकती है। पूरे इमरजेंसी का निचोड़ जॉर्ज फर्नांडिस की यह तस्वीर है, जो उनका 1977 के आम चुनाव में उनका पोस्टर था। जेल से चुनाव लड़े और उत्तर भारत में जनता पार्टी के अन्य प्रत्याशियों की तरह चुनाव स्वीप कर लिए।

मामला 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था, और सोशलिस्ट पार्टी के नेता हमेशा की तरह इंदिरा गांधी के विरुद्ध राय बरेली से चुनाव लड़ते थे। इस चुनाव में इंदिरा अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी राज नारायण को पराजित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राज नारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। उनकी दलील थी कि इंदिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग किया, तय सीमा से अधिक खर्च किए और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए ग़लत तरीकों का इस्तेमाल किय। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया। इंदिरा गांधी पर इस्तीफे का दवाब था। परन्तु उन्होंने इसे फ़ासिस्ट ताक़तों का षड़यंत्र (जे पी,जॉर्ज आदि नेतओं को फासिस्ट कहती थी) मानते हुए इस्तीफा देने से इंकार कर दिया और एक बड़े जन आंदोलन की सम्भावना को देखते हुए देश के संविधान में सशस्त्र विद्रोह से निपटने के प्रावधान -इमरजेंसी को लागू कर दिया। इस तरह इंदिरा गांधी ने इस फ़ैसले को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की और 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी गई।आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा, "जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील क़दम उठाए हैं, तभी से मेरे ख़िलाफ़ गहरी साजिश रची जा रही थी।" और तब शुरू हुआ इंदिरा -संजय गांधी के नेतृत्व में देश में तानाशाही का खौफनाक और शर्मनाक दौर।
आपातकाल लागू होते ही आंतरिक सुरक्षा क़ानून (मीसा) के तहत हज़ारों की तायदाद में राजनीतिक विरोधियों की गिरफ़्तारी की गई, इनमें जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चौ चरण सिंह, जॉर्ज फ़र्नांडिस और अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल थे।

आपातकाल लागू करने के लगभग दो साल बाद विरोध की लहर तेज़ होती देख प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी। चुनाव में आपातकाल लागू करने का फ़ैसला कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ. ख़ुद इंदिरा गांधी अपने गढ़ रायबरेली से चुनाव हार गईं।

1977 में 16 से 20 मार्च के बीच लोक सभा चुनाव हुए।1977 के चुनाव में 32 करोड़ मतदाताओं से 60% ने वोट किया। 23 मार्च को घोषित परिणाम में कह गया की 43.2% लोकप्रिय वोट और 271 सीटें हासिल करके जनता पार्टी ने एक व्यापक और अभूतपूर्व विजय हासिल की थी। अकाली दल और कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी के समर्थन के साथ, यह एक दो तिहाई, या 345 सीटों की पूर्ण बहुमत बन चुक था। कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी ने 28 सीटें जीती और जगजीवन राम एक राष्ट्रीय दलित नेता के रूप में जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को दलित वोट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मिलने के लिये काफी बड़ा प्रभाव डाला था।जनता पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने।



संसद में कांग्रेस के सदस्यों की संख्या 350 से घट कर 153 पर सिमट गई और 30 वर्षों के बाद केंद्र में किसी ग़ैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। कांग्रेस को उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में एक भी सीट नहीं मिली। नई सरकार ने आपातकाल के दौरान लिए गए फ़ैसलों की जाँच के लिए शाह आयोग गठित की गई। हालाँकि नई सरकार दो साल ही टिक पाई और अंदरूनी अंतर्विरोधों के कारण १९७९ में सरकार गिर गई. उप प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने कुछ मंत्रियों की दोहरी सदस्यता का सवाल उठाया जो जनसंघ के भी सदस्य थे। इसी मुद्दे पर चरण सिंह ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया और कांग्रेस के समर्थन से उन्होंने सरकार बनाई लेकिन चली सिर्फ़ पाँच महीने. उनके नाम कभी संसद नहीं जाने वाले प्रधानमंत्री का रिकॉर्ड दर्ज हो गया।

1977 में बिहार से सांसद चुने जाने वालों में अन्य प्रमुख नेतओं में पूर्व मुख्यमंत्री स्व बी पी मंडल -मधेपुरा,कर्पूरी ठाकुर -समस्तीपुर, सत्येन्द्र नारायण सिंह - औरंगाबाद, जॉर्ज फर्नांडिस - मुजफ्फरपुर, लालू प्रसाद -छपरा, राम विलास पासवान - हाजीपुर। इत्यादि।

Saturday, November 9, 2013

मंडल कमीशन:


दरअसल कई साथी यह जानना चाहेंगे कि मंडल कमीशन क्या है?

देश की आज़ादी के बाद समाज के सबसे कमजोर तपके, जिन्हें अनुसूचित जाति और जनजाति कहा गया, के बारे में यह मानते हुए कि यह वर्ग समाज में वर्षों से कई बाधाओं और विकृतियों से जूझ रहा है और उनके उत्थान के लिए विशेष अवसरों कि आवश्यकता होगी, उन्हें आरक्षण और विशेष अवसरों का प्रावधान किया गया। लेकिन इसके पीछे एक इतिहास थी और यह इतना आसान भी नहीं था क्योंकि आज़ादी के संघर्ष के दौरान दलित नेता डा बी आर आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच हुए समझौतों के कारण, खास तौर से हिन्दू समाज को एक रखने के लिए संविधान में यह आया।

परन्तु यह भी बात उठी कि इन वर्गों के अलावे कई और सामाजिक तपके हैं, जिन्हें भी विशेष अवसरों कि आवश्यकता होगी। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से इन पिछड़े वर्गों का पता लगाने के लिए संविधान के धारा 340 के अनुसार एक आयोग बनाने का प्रावधान किया गया, जिसे पिछड़ा वर्ग आयोग कहा जाना था।

पंडित नेहरू पर इस बात का दबाब बढ़ने पर 29 जनवरी, 1953 को काका कालेलकर की अध्यक्षता में पहले पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया जिसने 30 मार्च 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी।इस रिपोर्ट के अनुसार 2,399 जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया, जिनमें 837 जातियों को अति-पिछड़ा घोषित किया गया। लेकिन इस आयोग के रिपोर्ट कि सबसे दिलचस्प पहलु यह थी कि आयोग के अध्यक्ष ने रिपोर्ट के साथ माननीय राष्ट्रपति को दिए गए अपने पत्र में अपनी ही रिपोर्ट को ख़ारिज कर दी।

इसी पत्र के आधार पर वर्षों तक पिछड़े वर्ग के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। 1977 के लोक सभा चुनाव में नवगठित जनता पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में पिछड़े वर्ग के लिए विशेष उपाय पूरे संजीदगी से उठाया गया और उस चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस को पहली और करारी हार दी।

जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं में बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री बी पी मंडल भी थे जो बिहार में जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष भी थे।(उन्होंने ने ही लालू प्रसाद को उस चुनाओ में टिकट दी थी)। बी पी मंडल मधेपुरा लोक सभा क्षेत्र से शानदार विजय प्राप्त किये और इस बात का कयास लगाया जा रहा था की जनता पार्टी कि पहली गैर-कांग्रेसी केंद की सरकार उन्हें कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय दी जायेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

इसी बीच पैर टूटने के इलाज़ के दौरान मंडल जी बम्बई के जसलोक अस्पताल में भरती थे, जहाँ उनसे मिलने प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई पहुंचे। मोरारजी भाई ने बी पी मंडल से कहा की मैंने आपको मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया क्योंकि आपको एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देना चाहता हूँ। मंत्री तो कई लोग बनते हैं लेकिन यह जिम्मेदारो इतना विशेष है की मरने के बाद भी लोग आपको याद करेंगे।

राष्ट्रपति ने 1 जनवरी, 1979 को पिछड़ा वर्ग आयोग कि गठन कि अधिसूचना जारी की जिसके अध्यक्ष बिहार के पूर्व मुख्य-मंत्री बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल (बी पी मंडल) को बनाया गया। उन्हीं के नाम पर इस आय़ोग को मंडल आयोग के नाम से जाना गया। बी पी मंडल ने 31 दिसंबर,1980 को नई दिल्ली के विज्ञानं भवन में राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह को रिपोर्ट सौंप दी।

मंडल कमीशन रिपोर्ट तो पूरे विज्ञानिक आधार के बनायी गयी की वर्षों बाद सर्वोच्च न्यायलय के सम्पूर्ण बेंच द्वारा भी इसमें किसी तरह कि कमी नहीं निकाली जा सकी। रिपोर्ट में 1931 में हुए आखिरी जाति आधारित जनगणना के अनुसार भारत के 52% जनसंख्या जिसमें 3,743 अलग अलग जातियों को समाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा या ‘backward’ घोषित किया गया। परन्तु चुकी पहले से अनुसूचित जाति/जनजाति को 22.5% आरक्षण प्राप्त था अतः कई अन्य अनुशंसाओं के साथ साथ उनके लिए 27% आरक्षण का प्रावधान करने के लिए कहा गया, जिसे जोड़ने के बाद आरक्षण का कुल प्रतिशत 49.5 होता था जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय सीलिंग 50% से कम था।

स्व बी पी मंडल की मृत्यु रिपोर्ट सौंपने के लगभग एक वर्ष बाद 13 अप्रैल, 1982 को हो गयी। इस तरह कांग्रेस के सरकार में रिपोर्ट को ढंडे बस्ते में डाल दिया गया।
1989 का लोकसभा चुनाव पूर्ण हुआ। कांग्रेस को भारी क्षति उठानी पड़ी। उसे मात्र 197 सीटें ही प्राप्त हुईं। विश्वनाथ प्रताप सिंह के राष्ट्रीय मोर्चे को 146 सीटें मिलीं। भाजपा के 86 सांसद थे और वामदलों के पास 52 सांसद के समर्थन से राष्ट्रीय मोर्चे को 248 सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो गया और वी. पी.सिंह प्रधानमंत्री बने। दिसंबर 1980 से ठन्डे बस्ते में पड़ी मंडल आयोग के रिपोर्ट को 9 अगस्त, 1990 को आंशिक रूप से लागू कर इस देश के 52% से भी अधिक पिछड़े वर्ग को केंद्र सरकार की नौकरियों में 27% आरक्षण देकर समाजिक न्याय दिलाने का प्रयास किया, जिससे तमाम उच्च जातियां उनकी 'दुश्मन' बन बैठे, की उनकी मृत्यु पर भी उन्हें मिलने वाले सम्मान से वंचित किया गया।

और उधर 1991 में मंडल कमीशन का भीषण विरोध शुरू हो गया। परन्तु देश का बड़ा मौन प्रतिशत में भी इसकी प्रतिक्रिया हो रही थी और बिहार में लालू प्रसाद एवं उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव इसी मंडल आंदोलन के कारन मुख्य मंत्री बने और बने रहे। अतः वास्तव में मंडल कमीशन की सिफारिशों से भारतीय राजनीति और समाज में भूचाल आया।



आज भारतीय राजनीति में पिछड़े वर्ग की पहचान भी मंडल कमीशन से जुडी हुई है। यहाँ तक की राजनैतिक और ऐतिहासिक तौर पर आज़ाद भारत को मंडल पूर्व और मंडल पश्चात जाना जाने लगा है।

Thursday, August 8, 2013

जिला के लिए संघर्ष - मधेपुरा बनाम सहरसा 1947 -


हालाँकि सहरसा 1 अप्रैल 1954 में भागलपुर जिला से बांटकर जिला घोषित हुआ। लेकिन 1947 से ही मधेपुरा को सहरसा की जगह जिला घोषित किये जाने की मुहीम चल रही थी।
इसी उद्देश्य को लेकर मधेपुरा के कांग्रेस आफिस में दिनांक 8-8-1947 को शाम 7 बजे एक सार्वजानिक सभा हुई थी जिसका ब्यौरा इस प्रकार से है -
प्रस्ताव संख्या 1 - श्री भूपेंद्र नारायण मंडल को सभा का सभापति बनाने का प्रस्ताव हुआ।
प्रस्तावक - श्री उमादास गांगुली।
समर्थक - श्री शीतल प्रसाद मंडल।
प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकृत हुआ।

प्रस्ताव संख्या 2 - यह प्रस्ताव किया जाता है की मधेपुरा में निम्नलिखित कारणों से जिले सदर मुकाम हो -
(1) मधेपुरा उत्तर भागलपुर के मध्य में पड़ता है, लेकिन सहरसा जिले के दक्षिण-पश्चिम किनारें पर है।
(2) मधेपुरा 80 वर्ष पुराना सबडिविजन है। सुपौल और मधेपुरा में सिविल कोर्ट, क्रिमिनल कोर्ट, जेल, अस्पताल तथा प्रायः सभी प्रकार के सरकारी महकमें मौजूद हैं। जनसाधारण को मधेपुरा आने-जाने और रहने की काफी सुविधा है। लेकिन सहरसा एक नयी जगह है और वहां सभी बातों का आभाव है। इस तरह मधेपुरा में जिले की सदर मुकाम होने से सरकारी रुप्पियों की भी काफी बचत होगी।
(3) मधेपुरा कोशी से दूर है और इसकी सतह सहरसा की सतह से 5 (पांच) फुट ऊँची है। लेकिन सहरसा अभी भी कोशी, तिलाबे तथा धीमरा की प्रखर धाराओं से प्रभावित है।
(4) जलवायु की दृष्टि से भी मधेपुरा स्वस्थ्य-कर है। सहरसा भयंकर महामारियों (प्लेग,मलेरिया,कालाज्वर, हैजा, चेचक वगैरह) से प्रतिवर्ष पीड़ित रहता है।
(5) यातायात के ख्याल से जिला महकमें तथा जन-सुविधाओं के लिए मधेपुरा ही विशेष सुगम है। मुरलीगंज तक रेल सम्बन्ध, फुलौत तक बढ़िया सड़क आदि है।
(6) सुपौल के सात थानों के अन्दर सिर्फ सुपौल और थरबिट्टा के सिवाय शेष पांच थानें (भीमनगर, प्रतापगंज, डगमारा, त्रिवेणीगंज, छातापुर) के लोगों को मधेपुरा होकर ही सहरसा जाना पड़ता है। इसी तरह लोधरहारा को छोड़कर बांकीये सात थाने (मधेपुरा, सिंघेश्वर स्थान, सौर बाज़ार, सोनबर्षा, किशुनगंज, आलमनगर, मुरलीगंज) के लोगों को मधेपुरा आना ही सुविधाजनक है।
(7) यह सभा सरकार से मांग करती है कि वस्तुस्थिति की जांच के लिए एक निष्पक्ष कमीशन नियुक्त कर आवश्यक कार्यवाई करें।
(8) निशचय हुआ कि निम्नलिखित पाँच सज्जनों का एक डेलेगेशन अतिशीघ्र ही आवश्यक अधिकारीयों से मिलकर उक्त मांगों को पेश करें -
(क) बाबू भुवनेश्वरी प्रसाद मण्डल
(ख) बाबू सागर मल
(ग) मौलवी हलीम
(घ) बाबू कार्तिक प्रसाद सिंह
(ङ्) प्रेजिडेंट, थाना कांग्रेस कमिटी
(9) इस आन्दोलन को बराबर चालू रखने के लिए निम्नलिखित सज्जनों की एक कमिटी बनायी गयी -
(1) बाबू बिन्ध्येश्वरी प्रसाद मण्डल (सेक्रेटरी)
(2) बाबू महावीर प्रसाद सिंह
(3) बाबू सुधीन्द्र नाथ दास
(4) बाबू कमलेश्वरी प्रसाद मण्डल
(5) काजी अबू ज़फर
(6) बाबू गजेन्द्र नारायण महतो
(7) बाबू शीतल प्रसाद मण्डल
(8) बाबू हलधर चौधरी
(9) बाबू कमलेश चन्द्र भाधुरी
(10) बाबू सुरेन्द्र नारायण सिंह
(11) बाबू कैलाशपति मण्डल

(10) यह प्रस्तावित हुआ है कि निम्न-लिखित अधिकारीयों को ये प्रस्ताव भेजें जाएँ -
1. Home Member, Government of India.
2. President, Constituent Assembly.
3. H. E. Governor of Bihar.
4. Prime Minister, Government of Bihar.
5. President, Bihar Provincial Congress Committee.
6. Hon`ble Health Minister, Government of Bihar.
7. Parliamentary Secretary
Babu Shiv Nandan Prasad Mandal & Babu Bir Chand Patel

Sd/-
(Bhuvneshwari Prasad Mandal)
President.
8/8/47.


आन्दोलन हेतु चंदा देने वाले सदस्य -
(1) बाबू बिन्ध्येश्वरी प्रसाद मण्डल - 10 रु/-
(2) बाबू सागर मल - 10 रु/-
(3) बाबू मदन राम - 10 रु/-
(4) बाबू रघुनन्दन प्रसाद मण्डल - 15 रु/-
(5) बाबू शीतल प्रसाद मण्डल - 5 रु/-
(6) बाबू नंदन प्रसाद सिंह - 5 रु/-
(7) बाबू भुवनेश्वरी प्रसाद मण्डल - शेष खर्च।

_____________________________________________________________________________

मधेपुरा को जिला बनाये जाने की मुहीम के समय पूरे प्रकरण के अभिभावक और संरक्षक मधेपुरा के महान सपूत स्व रासबिहारी लाल मण्डल के बड़े पुत्र स्व भुवनेश्वरी प्रसाद मण्डल थे जो उस समय भागलपुर जिला कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष थे। वे तात्कालिक भागलपुर लोकल बोर्ड (जिला परिषद्) के भी अध्यक्ष थे। परन्तु इसी मुहीम के दौरान 1948 में उनकी मृत्यु हो गयी। बाद में उनके फुफेरे भाई स्व भूपेंद्र नारायण मण्डल (रानीपट्टी) और उनके अपने छोटे भाई स्व बी पी मण्डल इस मांग के लिए संघर्ष करते रहे। लेकिन ऐसा माना जाता है की सहरसा को जिला बनाने के फैसले के समय मधेपुरा के अन्य बड़े नेता स्व शिवनंदन प्रसाद मण्डल (रानीपट्टी), जो बिहार सरकार में तात्कालिक कबिनेट मंत्री थे, से चूक हुई थी।
9 मई, 1981 को मधेपुरा जिला बनाये जाने की औपचारिक घोषणा रासबिहारी विद्यालय में आयोजित एक समारोह में की गयी थी। उदघाटनकर्ता बिहार के तात्कालिक मुख्यमंत्री डा जगनाथ मिश्र थे और सभा की अध्यक्षता पूर्व मुख्यमंत्री और मधेपुरा के पहले विधायक और कई बार रहे सांसद स्व बी पी मण्डल कर रहे थे। अपने भाषण की शुरुआत करते हुए स्व बी पी मण्डल ने कहा था की मैं इश्वर को धन्यवाद देता हूँ की यह दिन देखने के लिए जीवित हूँ।
मधेपुरा को जिला घोषित किये जाने के लम्बे पृष्ठभूमि में स्व बी पी मण्डल के इस उदगार को समझा जा सकता है।
ध्यान देने की बात है कि 1935 के गवर्नमेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट के तहत कुछ प्रान्तों में जो चुनाव हुए, वहाँ के सदर को प्राइम मिनिस्टर या प्रीमियर कहा जाता था। अतः जिला बनाने के लिए बिहार के प्राइम मिनिस्टर को ज्ञापन देने की बात हुई थी जो उस समय डॉ श्रीकृष्ण सिंह थे।

_______________________________________________________________________________

प्रस्तुति -
सूरज यादव।
प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय।
8/8/2013

Sunday, July 28, 2013

आरक्षण पर भ्रम -


आरक्षण के लागू किये जाने में कई तरह के भ्रम पैदा किये जाते रहें हैं और कई बार ऐसा जान-बूझ कर किया जाता है, जिससे उल्टा आरक्षण लागू होता है। उधारण के लिए 100 पदों पर अगर नियुक्ति होनी है तो पहले 50 पर प्रतियोगिता में सफल कोई भी उम्मीदवार भले वह सामान्य, अनुसूचित जाति / जनजाति, पिछड़े वर्ग से हो शामिल होंगे। उसके बाद के 50 पदों पर 27% पर पिछड़े वर्ग और फिर 22.5 % पर अनुसूचित जाति। जनजाति नियुक्त होंगे।

परन्तु अक्सर पहले सभी आवेदकों में से अनुसूचित जाति/ जनजाति के 22.5 % और पिछड़े वर्ग के 27% छाँट दिए जाते हैं और बचे 50.5 % के लिए उन्हें अलग रखा जाता है जिससे सामान्य वर्ग के लगभग 15% उच्च जातियों के लिए यह 50.5 % एक तरह से अरक्षित हो जाता है।

मंडल कमीशन के रिपोर्ट दिए जाने के समय बिहार में कर्पूरी ठाकुर द्वारा पिछड़े वर्ग के आरक्षण के लिए लगभग इसी तरह व्याख्या की गयी थी, और उधर कर्पूरी ठाकुर के उच्च जाति के पक्ष में किये गए क्रियान्वन के बावजूद उनके विरुद्ध इस पर राजनैतिक घमाशन शुरू हो गया था। इसी दौरान कर्पूरी फार्मूला के तहत मंडल कमीशन के अनुशंसाओं से अलग हटकर एनेक्सचर 1 और 2 लागू किया गया। परन्तु उनके बाद जब रामसुंदर दास बिहार के मुख्यमंत्री बने तो बी पी मंडल के सलाह पर उन्होंने इस गलती की सुधार की।

इस विषय पर मंडल कमीशन के रिपोर्ट में भी स्पष्टीकरण देते हुए महत्वपूर्ण अनुशंसा की गयी है और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों और भारत सरकार के कार्मिक विभाग के आदेश पर स्थिति स्पष्ट है।

मंडल कमीशन की रिपोर्ट इस पर एक महत्वपूर्ण अनुशंसा करते हुए कहता है कि ^ अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित अभ्यर्थियों को एक खुली प्रतियोगिता में योग्यता के आधार पर भर्ती 27 प्रतिशत से उनके आरक्षण कोटे में समायोजित नहीं किया जाना चाहिए।^
(Candidates belonging to OBC recruited based on merit in an open competition should not be adjusted against their reservation quota of 27 per cent.)

इधर भारत सरकार के कार्मिक विभाग के 13 अगस्त, 1990 के आदेश संख्या "No. 36012/31/90-Estt. (SCT) के अनुसार ^ (iii) SEBC से संबंधित अभ्यर्थियों को सामान्य उम्मीदवारों के लिए निर्धारित एक ही मानकों पर एक खुली प्रतियोगिता में योग्यता के आधार पर भर्ती होने पर 27 प्रतिशत के आरक्षण कोटे में समायोजित नहीं किया जाएगा।
(iii ) Candidates belonging to SEBC recruited on the basis of merit in an open competition on the same standards prescribed for the general candidates shall not be adjusted against the reservation quota of 27 percent .


उम्मीद है इन मापदंडों पर ही आरक्षण नीति को क्रियान्वित किया जायेगा।

Thursday, December 6, 2012

राज्य सभा में FDI पर अरूण जेटली का प्रभावी भाषण -

आज राज्य सभा में नेता विपक्ष अरुण जेटली ने सिलसिलेवार ढंग से FDI पर मनमोहन सरकार के सभी दावों को निरस्त कर दिया। उन्होंने ने याद दिलाया की यही डा मनमोहन सिंह ठीक एक दशक पहले 6 दिसंबर,2002 को FDI को ख़ारिज करते हुए सदन में कहा था की इससे छोटे दुकानदार, रेहड़ी पटरी वालों के रोज़गार पर विपरीत असर होगा, बेरोज़गारी बढ़ेगी और हिंदुस्तान के लिए उपयुक्त नहीं है। अंतराष्ट्रीय व्यापारिक रियायतों में हमेशा कोई भी देश बदले में कुछ रियायतें प्राप्त करता है, जो दिख नहीं रहा है। सबसे महत्वपूर्ण, लगभग 12 वर्षों से हिंदुस्तान पर रिटेल में FDI लागू करने का अमरीकी दबाब है, परन्तु पता नहीं क्यों पिछले सत्र तक 'आम सहमती' बनाने की बात करने वाली सरकार अचानक इसे लागू कर दिया?

अरुण जेटली ने 'सुधार' के पश्चिमी परिभाषा को चुनौती देते हुए कहा की अमरीका भारत में नौकरियों के आउटसोर्स किये जाने को समाप्त करने की बात कर जब चाहे 'सुधार' को ठेंगा दिखा देता है, लगभग सभी पश्चिमी देश अपने किसानों को वालमार्ट जैसे स्टोर से निपटने के लिए और बाज़ार में अपने उत्पाद की सही कीमत दिए जाने ले लिए प्रतिदिन हजारों डॉलर सब्सिडी देता है, परन्तु हमें मना किया जाता है। ऐसे 'सुधार' को लागू नहीं करना हीं राष्ट्र हित में है।

यह अत्यंत हास्यास्पद हीं है की सत्ता पक्ष इस मुद्दे को ऐसे प्रस्तुत कर रहा था जैसे वालमार्ट कोई धार्मिक या स्वयंसेवी संस्था हो जो भारत आकर यहाँ परोपकार और लोक-कल्याण के कार्य करना चाहती है, और विपक्ष उन्हें रोक रहा है। अगर कांग्रेस नीत यु पी ए सरकार को खुली छूट मिले तो यह कहते हुए की यह भवन बहुत पुरानी हो चुकी है, संसद भवन को हीं वालमार्ट को स्टोर खोलने के लिए बेच दें।

वैसे जो लोग लोक सभा में इस मुद्दे पर अरुण जेटली के विद्यार्थी जीवन के समकालीन लालू प्रसाद अथवा अन्य कांग्रेसी वकील कपिल सिब्बल का भाषण भी सुने हों उन्हें फर्क पता चल गया होगा।



ध्यान दिलाना चाहूँगा की जब लालू प्रसाद पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे, उन्ही दिनों श्रीराम कालेज ऑफ़ कॉमर्स के विद्यार्थी अरुण जेटली भी दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे। दोनों 1974 में कांग्रेस और इंदिरा गाँधी द्वारा जबरन आपातकाल लागू कर तमाम विपक्ष के नेताओं को जेल भेजे जाने के विरोध में जय प्रकाश नारायण के आन्दोलन में शामिल थे। दोनों नेता कनून की डिग्री प्राप्त किये हैं। और जब 1977 में जनता पार्टी का गठन हुआ तो अरुण जेटली जनता पार्टी के सबसे युवा राष्ट्रिय कार्यकारिणी के सदस्य थे। परन्तु 1977 वे चुनाव नहीं लड़े। लालू प्रसाद को 1977 में बिहार में जनता पार्टी संसदीय दल के अध्यक्ष स्व बी पी मंडल ने, जय प्रकाश बाबु के अनुशंसा पर और बाबु सत्येन्द्र नारायण सिंह और कर्पूरी ठाकुर के आपत्ति के बावजूद, 'राजपूत सीट' छपरा से लोक सभा का टिकट दिया जहाँ से वे छोटे उम्र में सांसद चुने गए।

Monday, August 27, 2012

बी पी मंडल - सामाजिक न्याय के प्रणेता.....

आज स्व बी पी मंडल, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष, की ९४ वाँ जयंती है, जो बिहार सरकार द्वारा राजकीय समारोह के रूप में उनके पैत्रिक गाँव मुरहो, मधेपुरा और राजधानी पटना में मनाया जाता है. स्व बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल उस महान स्वंत्रता सेनानी और यादव जाति के विभूति स्व रासबिहारी लाल मंडल के पुत्र थे, जो ज़मींदार होते हुए भी कांग्रेस के पार्टी के बिहार से स्थापना सदस्यों में एक थे, अंग्रेजों से लोहा लिए और १९११ में बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश के अग्रणी यादवों को साथ लेकर अखिल भारतीय गोप जातीय महासभा (जिसे बाद में यादव महासभा कहा गया) की स्थापना की. रासबिहारी बाबू के अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई पर तत्कालीन प्रसिद्ध अख़बार अमृता बाज़ार पत्रिका ने १९०८ में अपने सम्पादकीय में उनकी तारीफ की, और दरभंगा महराज ने उन्हें 'मिथिला का शेर' कह कर संबोधित किया. १९१८ में बनारस में ५१ वर्ष की आयु में जब रासबिहारी बाबू का निधन हुआ तो वहीँ बी पी मंडल का जन्म हुआ. रासबिहारी लाल मंडल के बड़े पुत्र भुब्नेश्वरी प्रसाद मंडल थे जो १९२४ में बिहार-उड़ीसा विधान परिषद् के सदस्य थे, तथा १९४८ में अपने मृत्यु तक भागलपुर लोकल बोर्ड (जिला परिषद्) के अध्यक्ष थे. दूसरे पुत्र कमलेश्वरी प्रसाद मंडल आज़ादी की लड़ाई में जय प्रकाश बाबू वगैरह के साथ गिरफ्तार हुए थे और हजारीबाग सेन्ट्रल जेल में थे और १९३७ में बिहार विधान परिषद् के सदस्य चुने गए. बी पी मंडल १९५२ में मधेपुरा विधान सभा से सदस्य चुने गए. १९६२ पुनः चुने गए और १९६७ में मधेपुरा से लोक सभा सदस्य चुने गए. १९६५ में मधेपुरा क्षेत्र के पामा गाँव में हरिजनों पर सवर्णों एवं पुलिस द्वारा अत्याचार पर वे विधानसभा में गरजते हुए कांग्रेस को छोड़ सोशिअलिस्ट पार्टी में आ चुके थे. बड़े नाटकीय राजनैतिक उतार-चढ़ाव के बाद १ फ़रवरी,१९६८ में बिहार के पहले यादव मुख्यमंत्री बने. इसके लिए उन्होंने सतीश बाबू को एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनवाए. अतः सतीश बाबू को एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनाने वाले स्व बी पी मंडल ही थे. बी पी मंडल ६ महीने तक सांसद थे, और बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री भी थे. वे राम मनोहर लोहिया जी एवं श्रीमती इंदिरा गाँधी की इच्छा के विरुद्ध बिहार में पहले पिछड़े समाजके मुख्यमंत्री बनने जा रहे थे. परन्तु विधानसभा में बहुमत के बावजूद तत्कालीन ब्राह्मण राज्यपाल रांची जाकर बैठ गए और मंडल जी को शपथ दिलाने से इस आधार पर इंकार कर दिया कि बी पी मंडल बिहार में बिना किसी सदन के सदस्य बने ६ महीने तक मंत्री रह चुके है. परन्तु बी पी मंडल ने राज्यपाल को चुनौती दी और इस परिस्थिति से निकलने के लिए तय किया गया की सतीश बाबू एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बन कर इस्तीफा देंगे जिससे बी पी मंडल के मुख्यमंत्री बनने में राज्यपाल द्वारा खड़ा किया गया अरचन दूर किया जा सके. अब इंदिरा गाँधी और लोहिया जी सभी मंडल जी के व्यक्तित्व से डरते थे और नहीं चाहते थे की सतीश बाबू इस्तीफा दें. परन्तु सतीश बाबू ने बी पी मंडल का ही साथ दिया. आगे की कहानी और दिलचस्प है. उन्ही दिनों बरौनी रिफायनरी में तेल का रिसाव गंगा में हो गया और उसमें आग लग गयी. बिहार विधान सभा में पंडित बिनोदानंद झा ने कहा कि शुद्र मुख्यमंत्री बना है तो गंगा में आग ही लगेगी! साक्ष्य तो इस प्रकरण का बिहार विधानसभा के रिकार्ड में है - बात पहले बिहार विधान सभा की है, जब स्व बी पी मंडल ने आपत्ति की थी कि यादवों के लिए विधान सभा में 'ग्वाला' शब्द का प्रयोग किया गया. सभापति सहित कई सदस्यों ने कहा की यह असंसदीय कैसे हो सकता है क्योंकि यह शब्दकोष (Dictionary) में लिखा हुआ है. स्व मंडल ने कुछ गालियों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये भी तो शब्दकोष (Dictionary) में है, फिर इन्हें असंसदीय क्यों माना जाता है. सभापति ने स्व मंडल की बात मानते हुए, यादवों के लिए 'ग्वाला' शब्द के प्रयोग को असंसदीय मान लिया.लेकिन उन दिनों किन जातिवादी हालातों में बाते हो रही थी, इसका अंदाज़ मुश्किल है. १९६८ में उपचुनाव जीत कर पुनः लोक सभा सदस्य बने. १९७२ में मधेपुरा विधान सभा से सदस्य चुने गए. १९७७ में जनता पार्टी के टिकट पर मधेपुरा लोक सभा से सदस्य बने. १९७७ में जनता पार्टी के बिहार संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष के नाते लालू प्रसाद को कर्पूरी ठाकुर और सत्येन्द्र नारायण सिंह के विरोध के बावजूद छपरा से लोक सभा टिकट मंडल जी ने ही दिया. १९७८ में कर्णाटक के चिकमंगलूर से श्रीमती इंदिरा गाँधी के लोक सभा में आने पर जब उनकी सदस्यता रद्द की जा रही थी, तो मंडल जी ने इसका पुरजोर विरोध किया. १.१.१९७९ को प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने बी पी मंडल को पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया, जिस जबाबदेही को मानल जी ने बखूबी निभाया. इनके दिए गए रिपोर्ट को लाख कोशिश के बावजूद सर्वोच्च न्यायलय में ख़ारिज नहीं किया जा सका. खैर, उसके बाद की घटनाएं तो तात्कालिक इतिहास में दर्ज है और जो हममें से बहुतों को अच्छी तरह याद है. स्व बी पी मंडल जी की मृत्यु १३ अप्रैल.१९८२ को ६३ वर्ष की आयु में हो गयी. स्व बी पी मंडल के जयंती पर उनकी स्मृति को अनेकों बार नमन.

Sunday, August 26, 2012

Late Lamented Rash Behari Lal Mandal, the Yadav King and Lion of Mithila

The editorial of 27th April,1908 Amrita Bazar Patrika, the renowned daily of India then, published from Calcutta was all praise for Rash Bihari Lal Mandal, the Zamindar of Murho Estate, Madhepura for having taken headlong Mr FF Lyall, the haughty Disrtict Magistrate of Bhagalpur, and Mandal's petition at Calcutta High Court for transfer of his cases from Bhagalpur to Darbhanga on the ground of prejudiced attitude of Lyall had been accepted. Lyall raked the issue again by making defamatory comments against the Justices of Calcutta High Court on the order, and was again hauled for it. Before that the 22nd February, 1908 issue of Amrita Bazar Patrika had reported the issue, according to which Mr Jackson, the Lawyer of Rashbihari Lal Mandal had argued before Justice Geidt that since 1902, when Mandal had refused to part with a certain piece of Land at heart of Madhepura (where now Rashbihari Vidyalay stands) on the orders of the Mr Shirres, the then District Magistrate, had incurred the wrath of the administration and police. Since then series of criminal cases were brought against Mr Mandal and he had to move to High Court more than a dozen of times to save himself. It was not a mere coincidence that the first person to be granted bail before arrest (so common these days as Anticipatory Bail), on the orders of Calcutta High Court was Late Rashbihari Lal Mandal. The Gazetteer of Bhagalpur District has also mentioned the extraordinary case of Rashbihari Lal Mandal. Late Rashbihari Lal Mandal had many distinctions to his credit. Born in 1866 to Raghubar Dayal Mandal, the Zamindar of Murho, he had inherited considerable property at Ranipatti also. Rashbihari Lal's parents died when he was very young and he had to look after his estate since adolescence. He was educated till Class XI and knew many languages including Sanskrit, Hindi, Maithili, English, Urdu, Persian and French. Everyday newspaper in various languages were by his bedside at Murho. By 1908 Rashbihari Lal Mandal had come to the forefront of the National Movement, started his contribution in the Social Justice Movement and continued his legal crusade against the British rulers. However, late Rashbihari Lal Mandal also made history by attending the coronation of King GeorgeV at Delhi and also by leading a delegation of Yadav leaders to Montagu-Chelmsford Committee to demand rights for Yadav's and also to establish Ahir Regiment in the Army. Here he shook hands with Lord Chelmsford rather than rendering the traditional 'salami' to the Viceroy. Rashbihari Lal Mandal was the first leader of Yadav Community, nay the Backward Classes, to be the elected Member of Provincial Congress Committee and the All India Congress Committee from Bihar. He came in contact with Surendra Nath Bannerjea, Bipin Chandra Pal,Sachidanand Sinha and other Congress leaders at Calcutta, and remained on the forefront of the Congress leadership of Bihar till his death in 1918. Dr Rajendra Prasad had confided with Late B P Mamdal, the youngest son of late Rashbihari Lal Mandal in 1952, when he had gone to seek Congress ticket for Vidhan Sabha, that Rashbihari Babu used to be our inspiration and guide us at Calcutta when we were students. Rashbihari Lal Mandal organised the first GopeJatiy Mahasabha (later christened as Yadav Mahasabha) at Murho, Madhepura in December, 1911. The other Yadav leaders who had joined him in this endeavor included Keshav Lal, Devkumar Prasad, Sant Das(Pleader), Sita Ram, Mewa Lal from Bankipore (Patna), Kanhaiya Lal (Lucknow), Ram Narayan Raut (Gorakhpur), Shiv Nandan Prasad(Pleader), Jamuna Prasad(Chhapra), Feku Ram (Jaunpur), Nandlal Rai (Dashara, Darbhanga), Ram Dhani Gope, Ram Dhyan Prasad (Muzaffarpur), Syambhardas (Hazaribagh), Raghunandan Prasad (Saligrami,Munghyr), Brij Bihari lal Mandal, Shiv Nandan Prasad Mandal (Madhepura). The resolutions adopted at the Mahasabha included steps to improve education among Yadav's by establishing, Schools, Colleges, Boarding Houses and giving stipends, stopping Child-Marriage, ending Dowry System, staying away from Liquor consumption, improving Agriculture practices, protecting Cows, taking part in Commerce, avoid fight among themselves, establish Gope Jatiy Buildings and organisation in every district with a Secretary, bring out a Monthly Magazine "Gopal Mitr" and have a session of Mhasabha annually at different places. The most important step taken by the Mahasabha was what was later called "Sanskritisation" by Sociologists, or holding of 'Janaiu Dharan' ceremony. This was vehemently opposed by the upper caste and caste clashes took place at Munger while the Yadav's who had donned sacred thread were cauterised. It was a unique coincidence that when Late Rash Bihari Lal Mandal breathed his last at a young age of 51 at Benaras on 25th-26th
August 1918, it was here that his youngest son B P Mandal, former Chief Minister of Bihar was born. Rashbihari Babu's eldest son was Bhubneshwari Prasad Mandal, Member, Bihar-Orissa Legislative Council in 1924 and Chairman, Bhagalpur Local Board (District Board) till his death in 1948, and second son was Kamleshwari Prasad Mandal, member, Bihar Legislative Concil in 1937. His eldest grandson Justice Rajeshwar Prasad Mandal was the first Yadav Judge of Patna High Court. Other grandsons including Suresh Chandra Yadav was Ex-MLA, Ramesh Chandra Yadav, Advocate was Chairmn of Bhumi Vikas Bank, Director, Madhepura-Supaul Central Co-operative bank and Ward Commissioner, Madhepura Municiapality and Manindra kumar Mandal, Ex-MLA. *************************************************************************************
Rash Behari Lal Mandal v. Emperor 12 C.W.N. 117 : 6 C.L.J. 760 : 6 Cr. L.J. 408 where it was held that "the High Court has full jurisdiction under Section 437 of the Criminal Procedure Code to revise a commitment order made under Section 436 on points of law as well as of facts."
Rash Behari Lal Mandal and Ors. v. The Emperor (1907) 12 C.W.N. 117. Under the Codes of 1871 and 1892 it has been held that this Court will not exercise its power of revision on the ground that the lower Court has not rightly appreciated the evidence the reason being that it is for the Court called upon to determine whether the person charged is guilty or not, to consider and weigh the evidence, and any error as to the probative force and effect is not open to correction on revision, but only on appeal.
In Rash Behary Lal Mandal v. Emperor (1908) 35 Cal. 1076, it was held by a Bench of the Calcutta High Court that a warrant of arrest which had been illegally issued under Section 96, Criminal P.C., could not be treated as valid under Section 98.