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New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....
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Saturday, April 27, 2024

ओबीसी पर नरेंद्र मोदी और अमित शाह को जवाब।

ओबीसी विरोधी भाज पार्टी, आरएसएस, अडाणी, मोदी, शाह की #ईवीएम_सरकार। 

पिछले 10 वर्षों से ओबीसी के नाम पर सत्ता में आने वाले नरेंद्र मोदी और आरएसएस ने सबसे अधिक नुक्सान ओबीसी का ही किया है। 

कैसे? आईये सिलसिलेवार तरीके से देखें। 

1990 में वीपी सिंह की अगुवाई में बनी जनता दल की सरकार को भाज पार्टी और कम्युनिस्ट का समर्थन प्राप्त था। 

परन्तु चंद्रशेखर और चौ देवीलाल से राजनैतिक अनबन होने पर जब 7 अगस्त 1990 में लालू प्रसाद जी, शरद यादव और रामविलास पासवान के दबाब में वीपी सिंह ने जैसे ही मण्डल कमीशन रिपोर्ट का एक प्रावधान लागू किया, आरएसएस की त्योरियाँ चढ़ गई, और मण्डल कमीशन के निर्णय को खत्म करने के इरादे से लाल कृष्ण आडवाणी ने तुरंत "राम रथ यात्रा" शुरू कर दी। यात्रा को रोकने के लिए बतौर मुख्यमंत्री बिहार लालू प्रसाद जी ने जैसे आडवाणी जी को गिरफ्तार किया, भाज पार्टी ने तुरंत जनता दल सरकार से समर्थन वापस ले लिया और वीपी सिंह को इस्तीफा देना पड़ा। 

इस दौरान पूरे देश में भाज पार्टी और आरएसएस ने मण्डल कमीशन के खिलाफ अराजकता फैलाई और अपने प्रचार तंत्र से ओबीसी और दलितों के विरुद्ध माहौल बनाना शुरू किया। दुःख की बात थी की ओबीसी समाज अपने ही हक़ के लिए बने मण्डल कमीशन का रिपोर्ट का विरोध भी करने लगे। 

ओबीसी को यह समझने में की मण्डल कमीशन रिपोर्ट ही ओबीसी के मुक्ति का दस्तावेज है, लगभग एक दशक लग गए और आज भी कई ओबीसी जातियाँ ओबीसी समाज का सबसे बड़ा दुश्मन भाज पार्टी और आरएसएस का समर्थन करता है। 

2007 में ओबीसी के लिए एक और क्रांतिकारी कदम उठाया गया जब तत्कालीन कॉंग्रेस सरकार के शिक्षा मंत्री अर्जुन सिंह ने देश में केंद्र सरकार के अंतर्गत आने वाली सभी उच्च शैक्षिक संस्थानों के एडमिशन और प्रोफेसर एवं नॉन टीचिंग पदों की नियुक्तियों में मण्डल कमीशन के अनुशंसा केआधार पर 27% आरक्षण लागू कर दिया। 

यह आरएसएस के लिए सबसे बड़ा सदमा था और तुरंत ही ओबीसी को मिलने वाली इस बड़े हक़ को रोकने के लिए उनका षड़यंत्र शुरू किया गया। 

इससे पहले आप पाएंगे की 1990 में मण्डल कमीशन रिपोर्ट के एक प्रावधान लागू होने के बाद तीन फैसलों के अमल पर त्वरित गति से कार्यवाई शुरू हुई। 

पहला देश में ईवीएम से चुनाव की प्रक्रिया को संसद में कानून पास करके इसे क़ानूनी जामा पहना दिया गया। दूसरा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में Collegium System कॉलेजियम व्यवस्था शुरू की गई। और तीसरा देश में बड़े पैमाने पर निजीकरण यानि Privatisation शुरू कर दी गयी। यह तीनों कदम जहाँ एक और ओबीसी को अपने हक़ को रोकने के लिए था, वहीं यह असंवैधानिक भी था।  

खैर, 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में आई। 

भाज पार्टी और आरएसएस जानती थी की मण्डल कमीशन रिपोर्ट के अनुशंसा को लागू करने से इस देश के ओबीसी, जो तथाकथित "हिन्दू" के लगभग 70% लोगों के उत्थान का रास्ता खोलेगा तो पूरे ओबीसी समाज को ही उन्हें "हिन्दू" कहलाने का गर्व देने के नाम पर उनके हित के लिए लिए जाने वाली सभी रास्तों को रोक दिया। आज भी कई ओबीसी इस बात को समझ नहीं पा रहें हैं। उन्हें पता नहीं की ब्राह्मण धर्म में "हिन्दू" सिर्फ द्विज को कहा जाता है। द्विज मतलब जिन लोगों का जनेऊ धारण यानि यज्ञोपवीत संस्कार होता है। यज्ञोपवीत संस्कार ब्राह्मणों और क्षत्रिय में एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है, जिसमें जनेऊ धारण के बाद उन्हें द्विज भी कहा जाता है अर्थात जिसका दो बार जन्म हुआ हो। ऐसा कहा जाता है कि जनेऊ संस्कार करने से लड़का दोबारा जन्म लेता है और वही हिन्दू है। बाँकी ये "गर्व" करने वाले नासमझ शूद्र कहलाते हैं। 

अतः हिन्दू तब वे खुद को कहते जब वे मुसलमानों के मुक़ाबले खड़े होते। इसके लिए सबसे पहले राम मदिर के नाम पर बाबरी मस्जिद का ध्वंस किया गया जिसमें लगभग सभी ओबीसी ही थे। 

विडंबना देखिये राम मंदिर के नाम पर सर्वश्र लुटा देने वाले ओबीसी समाज में से एक भी व्यक्ति "राम मंदिर" ट्रस्ट में नहीं है। और यह ट्रस्ट तथाकथित ओबीसी पीएम मोदी की सरकार द्वारा बनाया गया है। 

तो मोदी शाह की सरकार ने सबसे पहले रोजगार ही समाप्त कर दिए, इसलिए की न रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी। यानि रोजगार ही नहीं तो फिर 27% आरक्षण कहाँ लोगे। बचे हुए सार्वजनिक प्रतिष्ठानों को त्वरित गति से अडाणी को बेच दिया गया। भाज पार्टी को इससे कई फायदे हुए : काफी बड़ी रिश्वत मिली, एक भी ओबीसी प्रायवेट में भी न आ पाए, इसकी तथा निजी क्षेत्र की सभी नियुक्तियाँ आरएसएस के ही टट्टे बट्टे का होने की गारंटी।

मोदी शाह के सरकार में ओबीसी विरोधी कुछ नई बातें देखने को आयी। एक बिना नियम, कानून और संवैधानिक प्रावधान के रोस्टर में फेर बदल करके ओबीसी आरक्षण खत्म कर देना। दूसरा  बिना नियम, कानून और संवैधानिक प्रावधान केओबीसी कोटा को सभी नियुक्तियों में 27% से कम कर देना तथा सवर्णो के लिए लागू EWS आरक्षण को नियमतः 10% से अधिक बढ़ा देना। तीसरा ओबीसी पदों पर NFS यानि नन फाउंड सूटेबल करके नियुक्ति ही रोक देना। 

इस तरह का गैर क़ानूनी और संस्थागत गुंडागर्दी दिल्ली पुलिस की नियुक्तियों से लेकर, UPSC सिविल सर्विसेस, कस्टम्स, इनकम टैक्स आदि में तो किये ही गए, पर सबसे अधिक आरएसएस की नियुक्ति गुंडागर्दी दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू तथा लगभग सभी केंद्र सरकार के उच्च शैक्षिक संस्थाओं में बिना रोक टोक के किये गए। 

इस तरह का ट्रेलर तो रोहित वेमुला शहादत या डॉ पायल तड़वी के स्यूसाइड में दिख गया था। 

फिर सभी आईआईटी और आईआईएम् की फ़ीस इतनी बढ़ा दी गयी की ओबीसी या कोई साधारण परिवार का बच्चा इन संस्थाओं में पढ़ ही नहीं सकें। 

NEET में तो ओबीसी को आरक्षण नहीं मिले इसके लिए मोदी शाह की सरकार ने 4 वर्षों तक लगभग 10 हज़ार ओबीसी पदों पर एडमिशन ही नहीं होने दी। 

मोदी शाह की सरकार द्वारा #जाति_जनगणना का विरोध का असल टारगेट ओबीसी ही हैं। 

एक केस में सुप्रीम कोर्ट ने National Commission for Backward Classes  से #जाति_जनगणना पर राय मांगी थी।

मोदी शाह के निर्देश के विपरीत #NCBC ने कोर्ट  से कहा दिया था है कि जाति जनगणना होना चाहिए।

नतीजा यह हुआ कि एक सदस्य सुधा यादव को छोड़कर, अध्यक्ष सहित किसी भी सदस्य को भाजपा आरएसएस अडाणी मोदी की मनुवादी #ईवीएम_सरकार ने फिर से राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का और न ही किसी भी आयोग या समिति का सदस्य नहीं बनाया। 

मोदी शाह के सरकार में पीएमओ का कोई भी वरिष्ठ अधिकारी ओबीसी नहीं है, किसी भी मंत्रालय का एक भी सेक्रेटरी ओबीसी नहीं है, किसी भी केंद्रीय विश्वविद्यालय का वीसी ओबीसी नहीं है, दिल्ली विश्वविद्यालय का एक भी कॉलेज का प्रिंसिपल ओबीसी नहीं है, एक्का दुक्का छोड़कर एक भी हाई कोर्ट जज, सुप्रीम कोर्ट जज, किसी भी पीएसयू का सीएमडी, किसी भी भारत सरकार के प्रतिष्ठान का सर्वोच्च अधिकारी ओबीसी नहीं है। 

ये नरेंद्र मोदी या अमित शाह क्या बोलेंगे ?

जय भीम, जय मण्डल, जय संविधान। 

#ईवीएम_हटाओ_देश_बचाओ

#BanEvmSaveIndia  

#DefeatBJPSaveIndia


#लोकसभाचुनाव2024

#संविधान_बचाओ_संघर्ष_समिति

Tuesday, November 10, 2015

समीक्षा क्यों नहीं ? भाजपा टिकट बिकता है ?


अगर लोक सभा चुनाव में बिहार के परिणाम की समीक्षा हुई होती तो विधान सभा चुनाव में भाजपा की यह फजीयत नहीं होती। दरअसल बात मोदी लहर में बिहार के इस इलाके से 7 - 8 सीटें हारने को लेकर है।
लोक सभा चुनाव से पहले समझा जा रहा था की बहुत ही व्यवस्थित ढंग से सर्वे वैगेरह करके भाजपा के प्रत्याशियों को चयनित किया जा रहा था। परन्तु वास्तविकता में सुशील मोदी और उनके गुट के नेता सब कुछ मैनेज कर रहे थे। और इसमें पैसों का ज़बरदस्त खेल था। यहाँ तक की पासवान-कुशवाहा को हैसियत से अधिक सीटें देने के पीछे पैसों की ही सेटिंग थी।
मधेपुरा से, जहाँ से मैं भी दावेदारी कर रहा था, वहाँ पता चला की नितीश सरकार की मंत्री रेनू कुशवाहा के पति, जिनका एक मात्र योगदान और परिचय यही है, को 4 करोड़ के सौदे में सुशील मोदी ने टिकट दिलवा दी।
मधेपुरा में यादवों की बड़ी संख्या और राजद उम्मीदवार पप्पू यादव और जद(यू) प्रत्याशी शरद यादव थे।
इस अनर्गल फैसले का विरोध मधेपुरा और सहरसा जिला भाजपा इकाई ने पुरजोर तरीके से किया। सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव कहा गया कि," मधेपुरा लोक सभा क्षेत्र से घोषित भा ज पा प्रत्याशी का संगठन के पंचायत स्तर से लेकर सहरसा और मधेपुरा ज़िला इकाई के एक एक कार्यकर्ता द्वारा विरोध हो रहा है और इकाइयों द्वारा चरणबद्ध आंदोलन भी हो रहा है।
श्रीमान से नम्र निवेदन है कि तत्काल केन्द्रीय नेतृत्व का एक शीर्ष नेता को ज़मीनी जानकारी लेने के लिए भेजा जाय और तब मधेपुरा से घोषित भा ज पा प्रत्याशी पर अंतिम निर्णय लिया जाय।
ज़िला इकाईयां किसी एक को टिकट देने के बारे में कोई माँग नहीं कर रही है, पर घोषित प्रत्याशी को बदलने कि मांग कर रहें हैं।
मधेपुरा संसदीय क्षेत्र में कुल वोटर संख्या 1507610 (पंद्रह लाख छिहत्तर हज़ार छह सौ दस) है। जिनमें 789566 पुरुष और 718044 महिला है।
एक अनुमान के अनुसार इनमें लगभग 5 लाख यादव मतदाता हैं। मुसलमान और दलित लगभग 2 - 2. 50 लाख हैं। यादव छोड़ अन्य पिछड़ी जातियाँ भी लगभग 3 लाख हैं। अन्य पिछड़ी जातियों में कोइरी सबसे कम लगभग 30 - 35 हज़ार हैं। वैश्य लगभग 1 लाख हैं। ब्राह्मणों की संख्या भी लगभग 78 हज़ार और राजपूत की संख्या भी लगभग 79 हज़ार है।
ऐसी परिस्थिति में मधेपुरा कि सीट पर किस समीकरण से कुशवाहा, जो मधेपुरा का है भी नहीं, और जिसे मधेपुरा के 200 लोग भी नहीं जानते हैं, उसे उम्मीदवार बनाया गया है, यह आम कार्यकर्ताओं के समझ से परे है, और भा ज पा को इससे आस पास के सभी सीटों पर नुकसान हो रहा है।
अतः आशा है की तमाम कार्यकर्ताओं के इस अनुरोध पर गहराई से विचार करेंगे और संगठन के हित में फैसला लेंगे।"
परन्तु किसी तरह की कोई कार्यवाई नहीं हुई।
नतीजा हुआ की मधेपुरा सीट पार्टी हार गयी और साथ में यह मानते हुए की राजनैतिक रूप से संवेदनशील मधेपुरा का असर दूसरे क्षेत्रों पर भी हुआ होगा, भाजपा सुपौल, पूर्णियां, अररिया, कटिहार, किशनगंज, भागलपुर, बाँका भी हार गयी। लेकिन मोदी लहर में जीत के जूनून में इस पर ध्यान देना ज़रूरी नहीं समझा गया।
अभी विधान सभा में सुशील जी के सीधे हस्तक्षेप से मधेपुरा विधान सभा क्षेत्र से एक विवादास्पद व्यक्ति को टिकट दिया गया, जो माना जाता है की ढाई करोड़ उन पर न्योछावर किया। जनाब 40 हज़ार वोटों से हारे हैं।
तो अब हम यही देखना चाहेंगे कि क्या कार्यवाई होती है।