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New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....
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Tuesday, November 10, 2015

समीक्षा क्यों नहीं ? भाजपा टिकट बिकता है ?


अगर लोक सभा चुनाव में बिहार के परिणाम की समीक्षा हुई होती तो विधान सभा चुनाव में भाजपा की यह फजीयत नहीं होती। दरअसल बात मोदी लहर में बिहार के इस इलाके से 7 - 8 सीटें हारने को लेकर है।
लोक सभा चुनाव से पहले समझा जा रहा था की बहुत ही व्यवस्थित ढंग से सर्वे वैगेरह करके भाजपा के प्रत्याशियों को चयनित किया जा रहा था। परन्तु वास्तविकता में सुशील मोदी और उनके गुट के नेता सब कुछ मैनेज कर रहे थे। और इसमें पैसों का ज़बरदस्त खेल था। यहाँ तक की पासवान-कुशवाहा को हैसियत से अधिक सीटें देने के पीछे पैसों की ही सेटिंग थी।
मधेपुरा से, जहाँ से मैं भी दावेदारी कर रहा था, वहाँ पता चला की नितीश सरकार की मंत्री रेनू कुशवाहा के पति, जिनका एक मात्र योगदान और परिचय यही है, को 4 करोड़ के सौदे में सुशील मोदी ने टिकट दिलवा दी।
मधेपुरा में यादवों की बड़ी संख्या और राजद उम्मीदवार पप्पू यादव और जद(यू) प्रत्याशी शरद यादव थे।
इस अनर्गल फैसले का विरोध मधेपुरा और सहरसा जिला भाजपा इकाई ने पुरजोर तरीके से किया। सर्वसम्मति से पारित प्रस्ताव कहा गया कि," मधेपुरा लोक सभा क्षेत्र से घोषित भा ज पा प्रत्याशी का संगठन के पंचायत स्तर से लेकर सहरसा और मधेपुरा ज़िला इकाई के एक एक कार्यकर्ता द्वारा विरोध हो रहा है और इकाइयों द्वारा चरणबद्ध आंदोलन भी हो रहा है।
श्रीमान से नम्र निवेदन है कि तत्काल केन्द्रीय नेतृत्व का एक शीर्ष नेता को ज़मीनी जानकारी लेने के लिए भेजा जाय और तब मधेपुरा से घोषित भा ज पा प्रत्याशी पर अंतिम निर्णय लिया जाय।
ज़िला इकाईयां किसी एक को टिकट देने के बारे में कोई माँग नहीं कर रही है, पर घोषित प्रत्याशी को बदलने कि मांग कर रहें हैं।
मधेपुरा संसदीय क्षेत्र में कुल वोटर संख्या 1507610 (पंद्रह लाख छिहत्तर हज़ार छह सौ दस) है। जिनमें 789566 पुरुष और 718044 महिला है।
एक अनुमान के अनुसार इनमें लगभग 5 लाख यादव मतदाता हैं। मुसलमान और दलित लगभग 2 - 2. 50 लाख हैं। यादव छोड़ अन्य पिछड़ी जातियाँ भी लगभग 3 लाख हैं। अन्य पिछड़ी जातियों में कोइरी सबसे कम लगभग 30 - 35 हज़ार हैं। वैश्य लगभग 1 लाख हैं। ब्राह्मणों की संख्या भी लगभग 78 हज़ार और राजपूत की संख्या भी लगभग 79 हज़ार है।
ऐसी परिस्थिति में मधेपुरा कि सीट पर किस समीकरण से कुशवाहा, जो मधेपुरा का है भी नहीं, और जिसे मधेपुरा के 200 लोग भी नहीं जानते हैं, उसे उम्मीदवार बनाया गया है, यह आम कार्यकर्ताओं के समझ से परे है, और भा ज पा को इससे आस पास के सभी सीटों पर नुकसान हो रहा है।
अतः आशा है की तमाम कार्यकर्ताओं के इस अनुरोध पर गहराई से विचार करेंगे और संगठन के हित में फैसला लेंगे।"
परन्तु किसी तरह की कोई कार्यवाई नहीं हुई।
नतीजा हुआ की मधेपुरा सीट पार्टी हार गयी और साथ में यह मानते हुए की राजनैतिक रूप से संवेदनशील मधेपुरा का असर दूसरे क्षेत्रों पर भी हुआ होगा, भाजपा सुपौल, पूर्णियां, अररिया, कटिहार, किशनगंज, भागलपुर, बाँका भी हार गयी। लेकिन मोदी लहर में जीत के जूनून में इस पर ध्यान देना ज़रूरी नहीं समझा गया।
अभी विधान सभा में सुशील जी के सीधे हस्तक्षेप से मधेपुरा विधान सभा क्षेत्र से एक विवादास्पद व्यक्ति को टिकट दिया गया, जो माना जाता है की ढाई करोड़ उन पर न्योछावर किया। जनाब 40 हज़ार वोटों से हारे हैं।
तो अब हम यही देखना चाहेंगे कि क्या कार्यवाई होती है।

Saturday, October 5, 2013

बच्चों का कुपोषण - बिहार में देश में सबसे अधिक कुपोषित बच्चे।


यह स्वागतयोग्य है की देश में कैग CAG रिपोर्ट के आधार पर बच्चों के कुपोषण पर बहस हो रही है। वरना यही राजनैतिक दल कैग के भ्रष्टाचार पर दिए गए रिपोर्ट को सिरे से नकार देते हैं, और कैग के रिपोर्ट को सम्बंधित विधान सभा में सिर्फ पेश कर देते हैं और उसपर कार्यवाई की संविधानिक प्रक्रिया को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता हैं। चुकी सम्बंधित सदन में सत्ता में जो दल है उसका बहुमत होता है, तो वह पाप वहीँ धुल जाता है और आज तक कैग के रिपोर्ट के आधार पर सदन द्वारा कार्यवाई नहीं हुई है। कैग के रिपोर्ट के आधार पर चारा घोटाले में कोर्ट की निगरानी में सी बी आई द्वारा दोषी को सजा दिलाने की घटना भी लालू प्रसाद एवं अन्य के मामले में शायद अकेला उधारण है।

जहाँ तक कैग के रिपोर्ट के में जो बच्चों के कुपोषण और अत्याधिक कुपोषण पर जो राज्यवाड़ आंकड़े उपलब्ध कराये हैं उस अनुसार 2005 के मुकाबले 2011 में गुजरात में स्थिति सुधारी है और दिल्ली जैसे राज्य में भी 2011 में स्थिति बदतर हुई है। लेकिन सबसे दिलचस्प मामला बिहार का है जिसके नेता पोशुआ हनुमान शिवानन्द तिवारी बढ़-चढ़ कर गुजरात सरकार पर हमले कर रहें है। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार जबकि नितीश कुमार के शासन के शुरू 2005-06 में कुपोषित बच्चों का प्रतिशत 55.9 और अत्याधिक कुपोषित की संख्या 24.1 प्रतिशत था, वहीँ सुशासन बाबू के 4-5 वर्ष शासन में रहने के बाद मार्च 2007 में कुपोषित बच्चों की संख्या भारत में सबसे अधिक 82.12 और अत्याधिक कुपोषित 25.94 प्रतिशत है। आश्चर्य है की विकास पुरुष और उनकी पार्टी जद(यू) इस डरावनी स्थिति पर कुछ क्यों नहीं कहते हैं।

CAG - कुपोषण और अत्याधिक कुपोषित के आंकड़े
बिहार 2005-06 55.9 24.1 मार्च 2007 NA NA मार्च 2011 82.12 25.94
दिल्ली 2005-06 26.1 8.7 मार्च 2007 54.36 0.07 मार्च 2011 49.91 0.03
गुजरात 2005-06 44.6 16.3 मार्च 2007 70.69 0.85 मार्च 2011 38.77 4.56
अखिल भारत 2005-06 42.5 15.8 मार्च 2007 50.1 0.55 मार्च 2011 41.16 3.33.

वैसे, विश्व बैंक एक अनुमान के अनुसार भारत में कुपोषण से पीड़ित बच्चों की संख्या दुनिया में सर्वोच्च रैंकिंग वाले देशों में से एक है। भारत में कम वजन वाले बच्चों की व्यापकता दुनिया में सबसे ऊंची है, और लगभग दोगुना है। 2011 वैश्विक भूख सूचकांक (GHI) रिपोर्ट के अनुसार बच्चों में भूख की स्थिति में प्रमुख देशों के बीच, भारत 15 वें स्थान पर है।



Name of the state/UT
Data provided by the Ministry (status as on) (Status for 2005-06) 31-March-2007 31-March-2011
Malnourished Severely Malnourished Malnourished Severely Malnourished Malnourished Severely Malnourished
Andhra Pradesh 32.5 9.9 53.23 0.13 48.72 0.08
Arunachal Pradesh 32.5 11.1 9.13 0.01 2.00 0.00
Assam 36.4 11.4 40.12 1.4 31.32 0.46
Bihar 55.9 24.1 NA NA 82.12 25.94
Chhattisgarh 47.1 16.4 54.14 1.18 38.47 1.97
Goa 25.0 6.7 41.41 0.15 34.11 0.04
Gujarat 44.6 16.3 70.69 0.85 38.77 4.56
Haryana 39.6 14.2 45.34 0.11 42.95 0.05
Himachal Pradesh 36.5 11.4 38.86 0.15 34.24 0.06
Jammu & Kashmir 25.6 8.2 32.61 0.78 31.12 0.06
Jharkhand 56.5 26.1 47.36 1.74 40.00 0.7
Karnataka 37.6 12.8 53.39 0.31 39.5 2.84
Kerala 22.9 4.7 38.8 0.07 36.92 0.08
Madhya Pradesh 60.0 27.3 49.61 0.75 28.49 1.88
Maharashtra 37.0 11.9 45.47 0.21 23.32 2.61
Manipur 22.1 4.7 10.06 0.19 13.83 0.24
Meghalaya 48.8 27.7 36.74 0.14 29.13 0.18
Mizoram 19.9 5.4 22.67 0.48 23.26 0.20
Nagaland 25.2 7.1 13.79 0.31 8.36 0.07
Odisha 40.7 13.4 56.54 0.82 50.43 0.72
Punjab 24.9 8.0 35.36 0.37 33.63 0.05
Rajasthan 39.9 15.3 54.09 0.27 43.13 0.33
Sikkim 19.7 4.9 27.17 0.08 10.72 0.86
Tamil Nadu 29.8 6.4 39.1 0.04 35.22 0.02
Tripura 39.6 15.7 14.83 0.19 36.89 0.35
Uttar Pradesh 42.4 16.4 53.36 1.09 40.93 0.21
Uttarakhand 38.0 15.7 45.71 0.23 24.93 1.19
West Bengal 38.7 11.1 52.75 0.68 36.92 4.08
Delhi 26.1 8.7 54.36 0.07 49.91 0.03
All India 42.5 15.8 50.1 0.55 41.16 3.33
[percentage of malnourished children covers all malnourished children including severely malnourished]

Sunday, June 30, 2013

बिहार में मनरेगा के लूट का खौफनाक सच -

नरेगा में लूट पर कार्यवाई की केंद्र सरकार द्वारा कोई तंत्र या क्रियाविधि तय नहीं है। सी बी आई का कहना है की चुकी क्रियानवन राज्य सरकार के हाथ में है, अतः वह कुछ नहीं कर सकती। राज्य सरकार कोई कार्यवाई करती ही नहीं, सिर्फ उसूली करती है।
इसमें सुशासन बाबु की सरकार सबसे आगे है।

नरेगा साईट पर दिए गए सूचना अनुसार केंद्र को (सभी दिक्कतों के बावजूद) २०१२ तक १७ वी आई पी और १८३ सामान्य शिकायत मिली, जिसे बिहार सरकार को अग्रसारित कर दिया गया, परन्तु जिसमें से एक पर भी कार्यवाई नहीं हुई।

सभी में लिखा है - जांच पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में अनियमितता प्रतिवेदित नहीं है।



This is the site for The Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act MGNAREGA-
Go to the option of Transparency & Accountability -
This is what you get -

Our apologies...
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Please double check the web address or use the search function on this page to find what you are looking for.
If you know you have the correct web address but are encountering an error, please contact the Site Administration.

Thank you.

404 Not Found

SO THE LOOT IS OFFICIAL. There is a splendid coordination between the Centre and the State.

Thursday, March 7, 2013

महिला दिवस - ऐ दादी माँ तुझे सलाम।


8 मार्च को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मैं उन सभी महिलाओं का इस्तेकबाल करता हूँ जिन्होंने अपने प्रकाश से किसी भी तरह से इस समाज, देश और मेरे जीवन को रौशन किया।

8 मार्च को महिला दिवस मनाये जाने की शुरुआत अमरीकी सोसलिस्ट पार्टी द्वारा पहली बार 28 फ़रवरी, 1909 को महिला दिवस मनाने से हुई। उसके बाद, रूस में 1917 में सोवियत क्रांति के उपरांत इस अवसर पर सरकारी छुट्टी दिए जाने एवं 1922 से चीन में कम्युनिस्टों और 1936 से स्पेनिश कम्युनिस्टों आदि कम्युनिस्ट और समाजवादी देशों में मुख्य रूप से मनाया जाने लगा।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस एक लोकप्रिय घटना के रूप में पहली बार 1977 के बाद मनाया गया जब संयुक्त राष्ट्र महासभा के सदस्य राज्यों में महिलाओं के अधिकारों और विश्व शांति के लिए संयुक्त राष्ट्र दिवस के रूप में 8 मार्च का प्रचार करने के लिए आमंत्रित किया गया।
वैसे तो कई महिलाओं, खास तौर से मेरी माँ का मुझ पर अमिट छाप रहा है, और अनेक महिलाओं से मैं प्रभावित रहा हूँ, जिनमें से कई फेसबुक पर भी हैं, लेकिन आज मैं एक विशेष व्यक्तित्व का यहाँ जिक्र कर रहा हूँ।

मेरे परदादा स्व रासबिहारी लाल मंडल के पिता स्व रघुवर दयाल मंडल एवं उनकी माता का देहांत तब हो गया था जब वे मात्र 6 वर्ष के थे। बिहार के मधेपुरा जिला की एक बड़ी ज़मींदारी मुरहो-रानीपट्टी का कार्यभार रासबिहारी बाबू की दादी जिनका नाम सकलवती मररायन था, के बूढ़े कंधो पर आ गयी। इस विशिष्ट महिला ने न सिर्फ अपने एक मात्र पोते का पालन-पोषण किया और श्रेष्ट शिक्षा दिलवाई, बल्कि ज़मींदारी का कार्य-भार भी बखूभी संभालीं। इसके लिए उस समय बिहार की सबसे विकट नदी कोसी के क्षेत्र में चांदी के हौदे में हाथी पर सवार होकर भ्रमण कर ज़मींदारी की देखरेख कीं। अकेले वारिस होने के कारण रासबिहारी बाबू की ज़िन्दगी पर भी अनेक खतरे थे, जिनका मुकाबला उनकी दादी माँ ने पूरी दृढ़ता से की।

महिला दिवस पर जानकी देवी की स्मृति को मेरी श्रद्धांजलि।

Friday, February 1, 2013

नया लोकपाल - The Lokpal Bill



लोकपाल बिल को अब यू पी ए द्वारा चर्चा का केंद्र बनाने का प्रयास जारी है। अब तक जो संकेत हैं, उस के अनुसार सोनिया-मनमोहन का लोकपाल दंतहीन, विषहीन, नखविहीन और भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देने वाला होगा। जैसे अगर आप शिकायत करेंगे, तो पहले उसकी प्रति सम्बंधित अधिकारी को जायेगा। जाहिर है शिकायत रसूखदार आईएस/ आईपीएस के विरुद्ध ही होगा, और सभी शिकायतकर्ता अरविन्द केजरीवाल की तरह मीडिया के ढाल के साथ नहीं होगा। अफसर को पहले ही संकेत रहेगा की निपटा लो। अब शिकायत निपटेगा या शिकायतकर्ता, यह तो आगे पता चलेगा।

सरकारी लोकपाल राजनीतिक दलो की जांच नही कर पाएगा,न धार्मिक संस्थाओ की,न सरकारी चंदे वाली NGO की।तो क्या वो नर्सरी के बच्चो की कापियां जांचेगा? सरकारी लोकपाल वैसा ही है जैसे बिल्ली अपने गले में डालने के लिए घंटी बनाए मगर उसमें घूंघरूं न डाले। सरकारी लोकपाल के कमजोर होने का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि उससे ज्यादा अधिकार तो मनमोहन सिंह के पास है। अतः सरकारी लोकपाल के रूप में सरकार ने देश को एक और मनमोहन सिंह दिया है।

और कहा जा रहा है की लोकायुक्त एक वर्ष के भीतर बन जाना चाहिए। मगर कैसा? अगर सुशासन बाबू का लोकायुक्त देखा जाय तो इस पद का ऐसा भौंडा मजाक कुछ और नहीं हो सकता है। एक-दो विशेषताएं अगर गिनाऊँ तो कहा जा सकता है की बिहार में लोकायुक्त के पास कोई शिकायत जाने पर उस शिकायत को गोपनीय रखा जायेगा। उस अफसर को पहले शिकायत जायेगा जिसके लिए सरकार का वकील पैरवी करेगा। अगर शिकायतकर्ता आरोप को साबित नहीं कर पायेगा तो शिकायतकर्ता को 6 महीने कैद-इ-बामुशक्कत की सजा होगी। नतीजा है की जबसे नितीश कुमार वर्जन का लोकायुक्त लागू हुआ है, एक भी शिकायत करने का किसी को हिम्मत नहीं हुआ है। टीम अन्ना ने जब इस लोकायुक्त को ख़ारिज किया तो विकास पुरुष बिफर पड़े थे। लेकिन कल अन्ना ने उनके दिल को छू लिया, क्योंकि नितीश के भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना ने मौन साध ली थी।

वैसे गुजरात जैसे राज्य में नरेन्द्र मोदी लोकायुक्त लाना ही नहीं चाहते हैं। पता नहीं क्यों?


पद शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल है,
उसका क्या जो दंतहीन विषरहित शक्तिहीन तरल हैI

Saturday, November 24, 2012

नितीश सरकार की रिपोर्ट कार्ड - मुख्यमंत्री का दावा खोखला और आंकड़े किताबी ...

अपने राजनैतिक स्वाभाव के अनुरूप नितीश कुमार अपने सरकार के कामकाज की मीडिया में आज तारीफ के पुल बाँध कर उसकी वाहवाही की डफली बजा रहें हैं. खैर, ऐसा सभी नेता करते हैं. लेकिन अगर इस सरकार की पिछले सरकार से इसलिए तुलना न की जाये क्योंकि तब ' सुशासन' का दावा नहीं था, तो 'सुशासन का सच' दिख जायेगा. मीडिया की तारीफ और सरज़मीन की सच्चाई का एक ट्रेलर तो पटना के अदालतगंज घाट की छठ पूजा की बद-इन्तजामी में हीं दिख गया था जब 20 नवम्बर को कुछ मिनटों पहले मुख्यमंत्री अपने काफिले में हाथ हिलाते गुजरे थे और तब ऐसी दुखद और हृदयविदारक त्रासदी हुई, जिसकी 'जांच' के आदेश देकर उसे भूलने के लिए कह दिया गया. गौरतलब है की जब छठ पूजा (बिहार के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण) की तैयारियां चल रही थी और उसके लिए पास राशियों की बंदरबांट हो रही थी, तब 'अल्पसंख्यक वोट' के लिए बेकरार विकास पुरुष पाकिस्तान में जिन्ना के मकबरे पर पुष्प श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे थे. 'जाँच' की विषादपूर्ण पहलू यह है की सुशासन बाबू के पहले टर्म में कोसी की भीषण त्रासदी, ( मानव अपराधिक लापरवाही से हुई दुर्घटना को त्रासदी कहते हैं), हुई थी, जिसमें आठ जिले प्रभावित के लाखों लोग प्रभावित हुए थे, और उनकी चल-अचल संपत्ति और पशु-मवेशी का भीषण नुकसान हुआ था. इस त्रासदी की जिम्मेदारी तत्कालीन जल संसाधन मंत्री और उनके रिश्तेदार ठेकेदार और दोषी अभियंताओं का माना गया था. इन लोगों को बचाने के उद्देश्य से एक सद्सीय न्यायिक जांच आयोग, राजेश वालिया कमीशन, गठित किया गया जिसे तीन महीने में रिपोर्ट देना था. आज उस त्रासदी के चार वर्ष से ऊपर हो गए हैं, और RTI जानकारी के अनुसार अब तक इस आयोग पर ढाई करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन रिपोर्ट का अता-पता नहीं है.


अगर कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर इस सरकार के कामकाज का विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है की मुख्यमंत्री का दावा खोखला है और आंकड़े किताबी हैं. कहा गया की राज्य में लोकायुक्त का गठन हुआ है. इसके प्रावधानों पर टीम अन्ना ने भी निराशा व्यक्त की थी. संक्षेप में कहा जाय तो यह बताना आवश्यक है की बिहार के लोकायुक्त के समक्ष आम आदमी किसी अधिकारी के भ्रष्टाचार की शिकायत कर हीं नहीं सकता, क्योंकि पहले दोषी अधिकारी के समक्ष वह शिकायत जायेगा, और तब वह अधिकारी अपनी सफाई प्रस्तुत करेगा एवं सरकारी वकील उस अधिकारी का बचाओ करेगा. अगर आपकी शिकायत साबित नहीं हुई ( शिकायत साबित कर हीं नहीं पाएंगे), तो शिकायतकर्ता को जुर्माना और दो साल की जेल बामुशक्कत दिए जाने का प्रावधान है. अधिकारीयों के संपत्ति का ब्यौरा आज कल सबसे हँसाने वाले चुटकुले हैं, और चंदा मामा की कहानियों को मात कर रही है. राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी का पटना के डाक बंगला चौराहे पर भारी संपत्ति और होटल के बारे में रिक्शा वाले भी जानते हैं, परन्तु सरकारी वेबसाइट पर उन्हें चढ़ने के लिए के कार भी नहीं है. ये जो कुछ भ्रष्ट अधिकारी के संपत्ति को जब्त करने की ढिंढोरा पीटा जा रहा है, यह उस समय बेईमानी लगती है जब आपको पता चलेगा की किस निर्लज्जता के साथ सरकार के मंत्री अधिकरियों से पैसों की मांग करते हैं, और बदले में उन्हें जनता और उनके विकास के लिए तय राशियों को लूटने की खुली छूट देते हैं. मधेपुरा जिला में यह आँखों देखी बता रहा हूँ की मंत्री किस तरह अधिकारीयों को बुला कर अपना 'कमीशन' उसूलते हैं. (मंत्रियों के नाम भी कभी सार्वजनिक करूंगा जब उनके कुकर्म का रिकार्डिंग भी मिल जायेगा). आलम यह है की केंद्र सरकार की मनरेगा सरीखे योजनाओं की बड़ी राशी गबन की जा रही है. इसी गबन को और बढ़ाने के लिए तथाकथित 'विशेष दर्जे' की मांग की जा रही है.

कैग ( भारत सरकार का महालेखाकार) के रिपोर्ट में कहा गया था की २००७-०८ तक बिहार सरकार ने ११,४१२ कड़ोड़ रूपये के विकास खर्च के लेख-जोखा में गड़बड़ी की है, और बाद में पटना उच्च न्यायलय ने भी इस पर संज्ञान लिया था और सी बी आई जांच की अनुशंसा की थी , जिसे manage कर लिया गया.
कैग की एक दुसरे रिपोर्ट में कहा गया है की बाढ़ सहायता में एक बड़ा घोटाला हुआ है और अगस्त - अक्तूबर २००७ में कुछ जिलों में ट्रक पर राशन भेजने के बजाय मोटर सायकल पर खाद्य सामग्री ढोए गए थे जिसमें बाढ़ राहत के लिए २७४.१५ quintal का गोल माल हुआ था. विधान सभा में पेश कैग के अन्य रिपोर्ट में दोपहर खाने, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना में भारी घोटाले के आरोप लगाये गए हैं जिन पर राज्य सरकार ने कोई कार्यवाई नहीं की है. कैग रिपोर्ट में राष्ट्रिय ग्रामीण स्वास्थ्य स्कीम, जननी सुरक्षा योजना अदि में भ्रष्ट अफसरशाही के कारण १४०० कड़ोड़ रूपये का घोटाला हुआ. शिक्षक ट्रेनिंग के लिए ८.७३ कड़ोड़ रूपये का कोई उपयोग ही नहीं हुआ.

बिहार पुलिस से अधिक भ्रष्ट शायद हीं किसी राज्य की पुलिस होगी. अगर किसी अपराध की रपट लिखाने थाना जायेंगे, तो उस समय तो आपकी प्रथम सूचना रपट तो हरगिज़ नहीं लिखी जाएगी. जिस पर केस बनता है, थानेदार पहले उससे पैसों की बात करेगा, और अगर बात नहीं बनी तो आपसे पैसे लेकर रिपोर्ट दर्ज की जाएगी. मुझे उस समय घोर आश्चर्य हुआ जब बिहार पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी से पता चला की अपने प्रमोशन के लिए फ़ाइल बढाने के लिए अपने ही मातहत एक कनीय अधिकारी को उन्होंने घूस दी, क्योंकि यही प्रचलन है.

सुशासन बाबू कह रहें है की RTI का प्रावधान किया गया. मैं यह बता देना आवश्यक समझता हूँ की बिहार शायद उन चंद राज्यों में है, जहाँ सबसे अधिक RTI के मामले लंबित है, जिनके जवाब नहीं दिए गए और उन पर अपील की जा रही है, जिसकी सुनवाई नहीं है. बिहार सरकार ने अपनी ओर से अलग प्रावधान किया है की एक बार में सिर्फ दो प्रश्न पूछे जा सकते हैं. दिलचस्प बात यह है की कई ऐसे मामले आये हैं जब RTI में पूछे गए प्रश्न का कोरे कागज़ भेज कर जवाब दिया गया है! यह बिहार सरकार के इस कानून के प्रति उदासीनता का हीं नतीजा है.

बिजली की बात में कई आंकड़े पेश किये गए. बताना चाहूँगा की मधेपुरा जैसे जगह में कई दिनों तो १२ में सिर्फ २ घंटे बिजली आती है. बिजली के दावे का खोखलापन का अंदाज़ा आप ऐसे लगा सकते हैं की अधिकांश जिला मुख्यालयों में सबसे अधिक डीजल की खपत वहां बैंक जैसे प्रतिष्ठानों और कार्यालयों के जेनरेटर चलाने में हीं होते हैं. बिजली की स्थिति का एक वाकया वैशाली जिला के पातेपुर थाना के अंतर्गत इमादपुर गाँव का है, जहाँ 2004 में गाँव का बिजली ट्रांसफर्मर जल गया था, और आज तक बदला नहीं गया क्योंकि गाँव वालों ने इस सुशासन में उसे बदलने के लिए बिजली विभाग के अधिकारीयों को घूस देने से मना कर दिया!
जो उलझ कर रह गई फाइलों के जाल में ,
गाँव तक वो रोशनी आयेगी कितने साल में.

अस्पतालों की स्थिति यह है की केंद्र सरकार से प्राप्त जिला अस्पतालों में उपलब्ध दवाईयों के लिए फंड जो पहले जिलों में जिला अधिकारी और सिविल सर्जन के पास होते थे, उसे स्वास्थ्य मंत्री ने कार्यकारी आदेश देकर केन्द्रीयकृत कर दिया है, और अपने पुत्र को एकमात्र एजेंसी नियुक्त किया है, जहाँ से दोयम दर्जे की दवाईयाँ लेना अनिवार्य है!

सडकों की स्थिति दिन पर दिन ख़राब हो रही है और केंद्र सरकार से प्राप्त राशियों पर बनी सडकों का श्रेय भी लेना अब दूभर हो रहा है.

अपने 'अधिकार यात्रा ' के दौरान जगह जगह पर नितीश कुमार पर जूते-चप्पल क्यों चले उस पर थोड़ी जानकारी दे दूं- बिहार में शिक्षा मित्र की शुरुआत तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के शासन काल में हुई थी लेकिन शिक्षामित्र फेज़ २ की शुरुआत वर्तमान मुख्यमंत्री नीतिश कुमार जी के कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ. जिसमे असीमित घोटाले हुए. कही कही तो उच्च अंक प्राप्त अभ्यर्थी की जगह पैसे लेकर ऐसे लोगो को शिक्षा मित्र बनाया गया है जो कही से भी उस पद के लायक नहीं थे. जिनका कोउन्सल्लिंग भी नहीं हुआ था, पैसे की माया ने इस मेघा घोटाले को पूरी तरह ढक दिया. अभी भी बिहार के प्रखंड से लेकर जिले तक और जिले से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक सेकडों की तादाद में शिकायत दर्ज है, जिसका निबटारा नीतिश जी के आदेश के बावजूद अभी तक नहीं हुआ है, क्यों की अभ्यर्थी और उनके रिश्तेदार साथ में पंचायत के मुखिया पंचायत सेवक प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी प्रखंड विकास पदाधिकारी आपस में मिलकर पैसे के बल पर गलत रिपोर्ट देते है या फिर रिपोर्ट भेजते ही नहीं जिससे बिहार का अब तक का सबसे बड़ा मेघा घोटाला आज भी फाइलों में ही बंद है, जिसका निष्पादन शायद संभव नहीं. इसके लिए जिस निति की ज़रुरत है वह निति नीतिश जी के पास नहीं है. शिक्षा मित्र की बहाली के लिए जो गाइड लाइन बनाये गए थे वह प्रकाशित होने के बाद हर बार, बार बार, लगातार इतनी बार की लिख नहीं सकते बदले गए, जिसके चलते हमेशा से शिक्षा मित्र फेज़ २ विवादस्पद रही है, कुछ और न सही कम से कम जिन लोगो के उपर शिकायत दर्ज की गयी है उनका तो निष्पादन हो जाये ताकि इस मेघा घोटाले के पाप से नीतिश जी को थोडी मुक्ति मिल जायेगी.

सबसे अधिक विकट स्थिति कृषि क्षेत्र और कृषि में सामुदायिक रिश्तों की है, जिसके बारे में सुशासन बाबू चुप हैं. इसपर विस्तार से अगले पोस्ट में चर्चा करूँगा. जिस राज्य के राजधानी में 'गंग रेप की कई घटनाएं हुई हैं, और खुद मुख्यमंत्री के समक्ष कानून और व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ाई गयी है, तो उस पर चर्चा करना हीं बेकार है।

सबसे रोचक मुख्यमंत्री का जनता दरबार है. मुख्यमंत्री के समक्ष जनता दरबार में दिए गए शिकायत में एक भी मामला ऐसा नहीं है जिसका तसल्लिबक्स निपटारा हुआ हो. कहा जा सकता है की सुशासन बाबू के दावे दुरुस्त नहीं है. अब प्रश्न है की क्या सुशासन में कानून व्यवस्था में व्यापक सुधार हुआ है? हम तो वही जानेंगे जो समाचारों में आयेगा. और सुशासन में समाचार वही छपता है जो सुशासन बाबू चाहते हैं. पहले छोटे या जिला स्तर के विज्ञापन जिले में ही तय होते थे. सुशासन बाबू ने इस व्यवस्था में फेर बदल करते हुए इसे केंद्रीकृत कर दिया है. अब छोटे-बड़े सभी विज्ञापन मुख्यमंत्री के यहाँ तय होता है, और छोटे-बड़े समाचार भी वहीँ से मोनिटर होता है. अगर किसी अख़बार ने गुस्ताखी की तो उसका विज्ञापन गया! आर टी आई द्वारा प्राप्त सुशासन में नितीश सरकार द्वारा विभिन्न अख़बार और न्यूज़ चैनलों को वितरित विज्ञापन राशी की २०१०-२०११ की विस्तृत जानकारी उपलब्ध है. गौरतलब है की टाइम्स आफ इंडिया और इकोनोमिक टाइम्स जैसे अख़बार, जो बिहार में अधिक साख नहीं रखतें हैं, उन्हें सबसे अधिक करोड़ों में विज्ञापन दिया गया है. दरअसल इकोनोमिक टाइम्स जैसे अखबार नए नए सर्वे करा कर कुछ आंकड़ें पकाते हैं, जिससे यह साबित हो की बिहार ज़बरदस्त तरक्की कर रहा है, सुशासन से वाकई बिहार में आर्थिक परिवर्तन हो रहा है, और सुशासन बाबू नितीश कुमार को मुख्यमंत्री नहीं, प्रधानमंत्री होना चाहिए.

दरअसल, सबसे अधिक कमी है निष्कपटता की. मैं मरहूम अदम गोंडवी के इन लाईनों से अपनी बात समाप्त करता हूँ –

तुम्हा्री फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है ,
मगर ये आकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है.
उधर जम्हूडरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो,
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है, नवाबी है.
लगी है होड़-सी देखो अमीरी औ गरीबी में,
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है.
तुम्हाधरी मेज चाँदी की तुम्हाबरे ज़ाम सोने के ,
यहाँ जुम्मदन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है.

Monday, August 27, 2012

बी पी मंडल - सामाजिक न्याय के प्रणेता.....

आज स्व बी पी मंडल, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष, की ९४ वाँ जयंती है, जो बिहार सरकार द्वारा राजकीय समारोह के रूप में उनके पैत्रिक गाँव मुरहो, मधेपुरा और राजधानी पटना में मनाया जाता है. स्व बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल उस महान स्वंत्रता सेनानी और यादव जाति के विभूति स्व रासबिहारी लाल मंडल के पुत्र थे, जो ज़मींदार होते हुए भी कांग्रेस के पार्टी के बिहार से स्थापना सदस्यों में एक थे, अंग्रेजों से लोहा लिए और १९११ में बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश के अग्रणी यादवों को साथ लेकर अखिल भारतीय गोप जातीय महासभा (जिसे बाद में यादव महासभा कहा गया) की स्थापना की. रासबिहारी बाबू के अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ाई पर तत्कालीन प्रसिद्ध अख़बार अमृता बाज़ार पत्रिका ने १९०८ में अपने सम्पादकीय में उनकी तारीफ की, और दरभंगा महराज ने उन्हें 'मिथिला का शेर' कह कर संबोधित किया. १९१८ में बनारस में ५१ वर्ष की आयु में जब रासबिहारी बाबू का निधन हुआ तो वहीँ बी पी मंडल का जन्म हुआ. रासबिहारी लाल मंडल के बड़े पुत्र भुब्नेश्वरी प्रसाद मंडल थे जो १९२४ में बिहार-उड़ीसा विधान परिषद् के सदस्य थे, तथा १९४८ में अपने मृत्यु तक भागलपुर लोकल बोर्ड (जिला परिषद्) के अध्यक्ष थे. दूसरे पुत्र कमलेश्वरी प्रसाद मंडल आज़ादी की लड़ाई में जय प्रकाश बाबू वगैरह के साथ गिरफ्तार हुए थे और हजारीबाग सेन्ट्रल जेल में थे और १९३७ में बिहार विधान परिषद् के सदस्य चुने गए. बी पी मंडल १९५२ में मधेपुरा विधान सभा से सदस्य चुने गए. १९६२ पुनः चुने गए और १९६७ में मधेपुरा से लोक सभा सदस्य चुने गए. १९६५ में मधेपुरा क्षेत्र के पामा गाँव में हरिजनों पर सवर्णों एवं पुलिस द्वारा अत्याचार पर वे विधानसभा में गरजते हुए कांग्रेस को छोड़ सोशिअलिस्ट पार्टी में आ चुके थे. बड़े नाटकीय राजनैतिक उतार-चढ़ाव के बाद १ फ़रवरी,१९६८ में बिहार के पहले यादव मुख्यमंत्री बने. इसके लिए उन्होंने सतीश बाबू को एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनवाए. अतः सतीश बाबू को एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनाने वाले स्व बी पी मंडल ही थे. बी पी मंडल ६ महीने तक सांसद थे, और बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री भी थे. वे राम मनोहर लोहिया जी एवं श्रीमती इंदिरा गाँधी की इच्छा के विरुद्ध बिहार में पहले पिछड़े समाजके मुख्यमंत्री बनने जा रहे थे. परन्तु विधानसभा में बहुमत के बावजूद तत्कालीन ब्राह्मण राज्यपाल रांची जाकर बैठ गए और मंडल जी को शपथ दिलाने से इस आधार पर इंकार कर दिया कि बी पी मंडल बिहार में बिना किसी सदन के सदस्य बने ६ महीने तक मंत्री रह चुके है. परन्तु बी पी मंडल ने राज्यपाल को चुनौती दी और इस परिस्थिति से निकलने के लिए तय किया गया की सतीश बाबू एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बन कर इस्तीफा देंगे जिससे बी पी मंडल के मुख्यमंत्री बनने में राज्यपाल द्वारा खड़ा किया गया अरचन दूर किया जा सके. अब इंदिरा गाँधी और लोहिया जी सभी मंडल जी के व्यक्तित्व से डरते थे और नहीं चाहते थे की सतीश बाबू इस्तीफा दें. परन्तु सतीश बाबू ने बी पी मंडल का ही साथ दिया. आगे की कहानी और दिलचस्प है. उन्ही दिनों बरौनी रिफायनरी में तेल का रिसाव गंगा में हो गया और उसमें आग लग गयी. बिहार विधान सभा में पंडित बिनोदानंद झा ने कहा कि शुद्र मुख्यमंत्री बना है तो गंगा में आग ही लगेगी! साक्ष्य तो इस प्रकरण का बिहार विधानसभा के रिकार्ड में है - बात पहले बिहार विधान सभा की है, जब स्व बी पी मंडल ने आपत्ति की थी कि यादवों के लिए विधान सभा में 'ग्वाला' शब्द का प्रयोग किया गया. सभापति सहित कई सदस्यों ने कहा की यह असंसदीय कैसे हो सकता है क्योंकि यह शब्दकोष (Dictionary) में लिखा हुआ है. स्व मंडल ने कुछ गालियों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये भी तो शब्दकोष (Dictionary) में है, फिर इन्हें असंसदीय क्यों माना जाता है. सभापति ने स्व मंडल की बात मानते हुए, यादवों के लिए 'ग्वाला' शब्द के प्रयोग को असंसदीय मान लिया.लेकिन उन दिनों किन जातिवादी हालातों में बाते हो रही थी, इसका अंदाज़ मुश्किल है. १९६८ में उपचुनाव जीत कर पुनः लोक सभा सदस्य बने. १९७२ में मधेपुरा विधान सभा से सदस्य चुने गए. १९७७ में जनता पार्टी के टिकट पर मधेपुरा लोक सभा से सदस्य बने. १९७७ में जनता पार्टी के बिहार संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष के नाते लालू प्रसाद को कर्पूरी ठाकुर और सत्येन्द्र नारायण सिंह के विरोध के बावजूद छपरा से लोक सभा टिकट मंडल जी ने ही दिया. १९७८ में कर्णाटक के चिकमंगलूर से श्रीमती इंदिरा गाँधी के लोक सभा में आने पर जब उनकी सदस्यता रद्द की जा रही थी, तो मंडल जी ने इसका पुरजोर विरोध किया. १.१.१९७९ को प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने बी पी मंडल को पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया, जिस जबाबदेही को मानल जी ने बखूबी निभाया. इनके दिए गए रिपोर्ट को लाख कोशिश के बावजूद सर्वोच्च न्यायलय में ख़ारिज नहीं किया जा सका. खैर, उसके बाद की घटनाएं तो तात्कालिक इतिहास में दर्ज है और जो हममें से बहुतों को अच्छी तरह याद है. स्व बी पी मंडल जी की मृत्यु १३ अप्रैल.१९८२ को ६३ वर्ष की आयु में हो गयी. स्व बी पी मंडल के जयंती पर उनकी स्मृति को अनेकों बार नमन.

Sunday, August 12, 2012

आमिर खान का नीतीश को पत्र, गया अश्विनी चौबे के कूड़े में..


सत्यमेव जयते जैसे कार्यक्रम से चर्चा में आये आमिर खान का एक एपिसोड जेनेरिक दवाओं को लेकर था। आमिर खान ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिखकर यह आग्रह किया है कि वे राज्य में आम लोगो के लिए जेनेरिक दवाओं को सुलभ कराने की दिशा में प्रयास करें।

आमिर ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि वे जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता बढ़ाए ताकि इससे मघ्य वर्ग और निम्नमघ्य वर्ग के लोगों को लाभ पहुंच सके। आमिर खान ने आगे लिखा है कि हाल में किए गए शोध से यह पता चला है कि जेनेरिक दवाऐं किसी भी सूरत में कमतर नहीं है और उनका असर मरीजों पर वही होता है जो महंगी दवाओं का होता है।


अब बेचारे आमिर हिन्दुस्तानी, क्यों सुशासन बाबु को राज्य में आम लोगो के लिए जेनेरिक दवाओं को सुलभ कराने की दिशा में प्रयास करने के आग्रह के लिए  पत्र लिख कर वक़्त बर्बाद कर रहे हैं? उन्हें कोई सूचना दे की बिहार में जेनेरिक दवाओं की क्या बात की जाये, सभी सदर और अन्य अस्पतालों में तमाम दवाइयों की सप्लाई स्वास्थ्य मंत्री के दफ्तर में केन्द्रित कर दिया गया है. यहाँ भी सप्लाई का एकाधिकार स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी चौबे (वही जो डाक्टरों के हाथ काटने जी बड़ी-बड़ी बातें करते हैं) के नजदीकी रिश्तेदारों के पास है, जो केंद्र सरकार द्वारा अस्पतालों को दवाई खरीदने के लिए भेजे गए फंड से सिर्फ इनसे घटिया दवाई खरीदने को बाध्य हैं. इसमें भी सभी सिविल सर्जन से मोटे कमीशन की मांग की जाती है, और मधेपुरा सदर अस्पताल जैसे कई अस्पताल के सिविल सर्जन कमीशन देने से मना कर देते हैं, तो वहां दवाइयों को खरीदा ही नहीं जाता है, जिससे आम रोगियों को बिना अस्पताल के दवाई के ही रहना पड़ता है अथवा बाज़ार से महंगे दवाई का ही सहारा रह जाता है. और यह सब होता है पुरुष नहीं, बल्कि विकास पुरुष नितीश कुमार के पूरे सूचना में. तो बताईये बेचारे जेनेरिक दवाई के लिए कौन आमिर खान के पत्र की सुधि लेगा?

ब्रांडेड दवाएं बनाने वाली कम्पनियां जेनेरिक दवाएं भी बनाती है। आमिर ने बताया कि हिन्दुस्तान से साल भर में 35 हजार करोड़ रूपये की जेनेरिक दवाओं का निर्यात होता है। इससे यह स्पष्ट है कि हमारी कम्पनियां जेनेरिक दवाएं बनाती है। किन्तु वे इसका व्यापार करती हैं। वे इसे अपने देश की जनता को उपलब्ध नहीं कराती है। आमिर ने आशा व्यक्त किया है कि मुख्यमंत्री इन जेनेरिक दवाओं को राज्य की जनता को उपलब्ध कराने में अच्छी भूमिका निभा सकतें है।

Friday, February 3, 2012

सुशासन का हाल - पटना के श्रीकृष्ण नगर में दल-दल, नागरिक बेहाल.

बिहार की राजधानी पटना में मुख्यमंत्री आवास से लगभग २ कि मी कि दूरी पर स्थित श्री कृष्ण नगर के रोड नंबर १४ में रहने वाले नागरिक लगभग एक महीने से घरों में शौच के गंदे पानी के ठहराव से बेहाल हैं. पटना के प्रतिष्ठित आवासीय क्षेत्र श्री कृष्ण नगर, जिसके पास में ही लगभग सभी चैनलों और मीडिया के दफ्तर हैं, के लोग पिछले एक महीने से नगरपालिका और अन्य सरकारी संस्थाओं के चक्कर काट-काट कर परेशान हैं. आलम यह है की ठण्ड के घटते ही कब बीमारी का आगमन हो जाय, कोई ठीक नहीं. और सिर्फ इतना होना है की कालोनी से सीवेज पाइप लाइन तक २०० फीट की पाइप लगनी है.
श्रीकृष्ण नगर के लोग सुशासन बाबू विकास पुरुष नितीश कुमार का उत्तर प्रदेश के बलिया में दिए गए उस बयान पर चुटकी ले रहे थे की वे उत्तर प्रदेश को बिहार के तरह चमका देंगे! जब मुख्यमंत्री आवास के करीब राजधानी-क्षेत्र में भी मल-प्रवाह की मूलभूत सुविधा भी वे प्रदान करने में सक्षम नहीं हैं, तो उत्तर-प्रदेश को कैसा चमकाएंगे यह समझना मुश्किल लगता है.
देखें कब सुशासन में इन परेशान नागरिकों की सुधि कौन और कब लेता है, या समस्या का समाधान होता है भी की नहीं?



Monday, January 16, 2012

Nitish Government fools the people of Bihar on crime.


The move of Nitish Government to post the names of convicts and other details on state Home Department's website aimed at checking crime rate in the state is grossly misleading, ridiculous and attacks just retired criminals while actually protecting the practicing 'goons'. This step of the Sushasan Babu is just meant to fool the people of Bihar on Government's seriousness on tackling crime in the state. It is beyond comprehension that, while the people are terrorstricken by criminals who are either not arrested or manage to bypass judicial process, Nitish Government tries to blow trumpets on criminals who have already been convicted long ago and do not matter anymore for proclaiming "Civil consequence of Crime".

To quote an example from Saharsa District Jail, the website has the names of Trivani Sharma, Lalan Sharma, Ashok Yadav, Upendera Sharma and Raghuni Sharma all of whome committed crime in 1997. Those also arrested at present include notorious criminals like Umesh Dahlan, Sashi Kumar Singh, Manoj Yadav and politically known Anand Mohan. Dreaded Manoj Yadav, main accused in Babhani Massacre and with 52 cases of heinous crime against him, do not figure in any list of the Home Department. Infact, Manoj Yadav contested and won as Pramukh of Patarghat Block, in the Panchayati elections. Now, such criminals will feel more safe that they are not in any 'list' of Home department.

If the Nitish Government would have been really serious in tackling crime rate, the Home Department would have released a list of criminals with many serious and heinous crime and taken action against them under Section 110 Cr P C. Therefore, the Government should refrain from making empty announcements and take real steps to work towards 'crime-free' Bihar.

Saturday, January 14, 2012

चुडा-दही और मानसी का कुत्ता.

चुडा-दही और मानसी का कुत्ता.

बात १९९९ लोक सभा चुनाव की है. मधेपुरा लोक सभा चुनाव क्षेत्र से मैं नव-गठित पार्टी एन सी पी से रा ज द अध्यक्ष लालू प्रसाद व जद(यु) अध्यक्ष शरद यादव के मुकाबले खड़ा था. दरअसल कुछ वर्षों से मेरे साथी और मैं, "मधेपुरा युवा मोर्चा" के तत्वाधान में 'बहरी नेता भगाओ - मधेपुरा बचाओ' मुहीम पर थे. हमारा कहना था की लालू प्रसाद और शरद यादव दोनों मधेपुरा के नहीं हैं, और राजनैतिक मलाई खाने के लिए मधेपुरा से चुनाव लड़ते है, जिससे मधेपुरा की अस्मिता को ठेस पहुंची है और स्थानीय नेतृत्व पूरी तरह कुंठित हो गयी है. सांसद के तौर पर इन दोनों ने मधेपुरा और उसके लोगों की अवहेलना ही की है.

दो राजनैतिक सांढ़ जब लड़ते थे तो तर्क और मुद्दे उस धूल मैं खो जाते थे और इनके निजी समर्थन पर सभी बहस सिमट कर रह जाती थी. उनके बीच अपनी बात को मैं एक वाकया सुना कर कहता था.

उन दिनों कोसी क्षेत्र के लोग गंगा-स्नान के लिए मानसी जाते थे. मानसी खगडिया के पास एक प्रमुख रेल जंक्सन है. गंगा-स्नान के बाद लोग चुडा- दही खाने के लिए प्लेटफार्म पर बैठते थे. चुडा- दही पडोसने के साथ ही कहीं से दो कुत्ते आस-पास बैठ जाते थे. अब जब तक ये चुप-चाप थे तो खाने वालों को क्या आपत्ति हो सकती थी. परन्तु पहला कौड़ लेने के साथ ही कुत्ते एक दूसरे पर गुर्राने लगते थे. गुर्राते-गुर्राते दोनों एक दुसरे से भिड जाते थे, और कुछ पलों में गुथम-गुथ हो जाते थे. उसके बाद लड़ते-लड़ते वे चुडा-दही पर गिर जाते थे.

कुत्ता से ख़राब किया हुआ चुडा-दही कौन खायेगा! गलियां देते हुए लोग चुडा-दही को छोड़ कर हट जाते थे. जैसे लोग चुडा-दही को छोड़ कर हटते थे, दोनों कुत्ते बिना किसी झगडे के मिल-बाँट कर चुडा-दही खा लेते थे, और सिल-सिला चलता रहता था.

मैं यही समझाने की कोशिश करता था कि मधेपुरा के लोग जानें कि अगर चुडा-दही मधेपुरा था तो वे कुत्ते कौन हैं?

Friday, January 13, 2012

Singham DIG at Saharsa.

Saharsa, 13th January, 2012. It is a typical replay of the scenes from Hindi block-bluster “Singham”, when an active, vigilant and dynamic Deputy Inspector General of Police Dr Paresh Saxena, a 1994-batch IPS officer widely known for his professional integrity and achievements, like the hero of the film is hounded by criminals in connivance with some Police officials and a section of Media, for cracking on criminals and taking corrupt, complacent and docile Police officers at sensitive Police Stations in Kosi Range to task. However, the common people are with the DIG for drastically reducing crime graph in the region. Even the simple villager in the area could guess the real reason when the Incharge of Saur Bazar Police Station, suspended for repeatedly ignoring the order to arrest some criminals, alleged nearly a month later before media that the DIG had verbally abused him and threatened to kill him.

Kosi region is the grazing ground for some notorious criminal turned politicians like Anand Mohan, Pappu Yadav, Kishore Kumar Munna et al. Anand Mohan and Pappu Yadav are in jail and Mohan is lodged at Saharsa Jail itself. It is more than evident that the command of Anand Mohan runs from the VIP ward of the jail itself and even in jail it is Mohan who decides the wards for the inmates. Mohan was visibly irritated over the raid in Jail in which several mobile phones, charger and sim card were seized even from VIP ward. The encore against the DIG, it seems is schemed at the VIP ward, which also houses Umesh Dahlan, another criminal turned politician arrested on the intervention of the DIG, and with support of Kishore Kumar Munna, otherwise at loggerheads with Anand Mohan. Kishore Kumar Munna enjoys excellent rapport with the Superintendent of Police at Saharsa Md Rahman.

Dr Paresh Saxena joined as DIG of the Kosi Range at Saharsa in August 2011. As a ‘no-nonsense’ tolerating officer he immediately got to the task of cleansing the Police system and crime at Saharsa. Several pending cases were taken up in the region and with Police finalizing their reports, trial were speeded up in most of the cases. Most important was arrest of notorious criminals like Manoj Yadav, Umesh Dahlan, Sashi Kumar Singh alias Chunnu et al. Manoj Yadav elected as Pramukh of Patarghat Block at Saharsa, the main accused in Bhabani Carnage and with nearly 52 heinous criminal cases against him and pending FIRs was moving around freely. Santosh Yadav, a dreaded criminal was killed in an encounter at Saharsa. With heat turning on against criminals, interestingly those who got most inconvenient were some Police Station Incharges, who otherwise had issued ‘free passes’ to most of the criminals.

Says Congress leader and Delhi University Associate Professor Suraj Yadav, “ Mr Saxena is one of the officers who are trying to reiterate rule of law against rule of jungle in the so-called ‘Su-shasan’ of Nitish regime. We are just keeping our fingers crossed that he is not prematurely removed to appease the criminal-police nexus”. Several law-abiding citizens of the area echo his concerns.



Dr Paresh Saxena has been in the eye of the storm in past also. In 2008, then an Assistant Inspector General (Inspection) he gave Bihar’s leading politicians goose bumps when he served a legal notice on Urban Development minister Bhola Singh of the BJP as a precursor to a defamation suit. A deeply upset Saxena, a medical doctor by training, wanted an apology from the minister for the insulting remarks Bhola Singh made about Saxena at a public ceremony in Gaya then. This was the first time in India that an IPS officer had served a legal notice alleging defamation by a sitting minister. The fire in him remains , it seems.

Thursday, January 12, 2012

सहरसा के पुलिस उप-महानिरीक्षक "सिन्घम" के अवतार में.

सहरसा, १२ जनवरी, २०१२. लोकप्रिय हिंदी फिल्म "सिन्घम" के दृश्य सहरसा में दोहराए जा रहे हैं और कोसी रेंज के पुलिस उप-महानिरीक्षक डा परेश सक्सेना, १९९४ बैच भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी, जो ईमानदारी और कर्त्तव्य-परायणता के लिए जाने जाते हैं, अपने कर्तव्य-पालन और अपराध से लोहा लेने पर फिल्म के नायक की तरह अपराधियों और उनसे सांठ- गाँठ रखने वाले पुलिस अधिकारीयों और मीडिया के एक वर्ग के निशाने पर हैं. हालाँकि आम नागरिक पुलिस उप-महानिरीक्षक के अपराधियों पर सिकंजा कसने के मुहीम की सराहना कर रहें हैं, परन्तु पुलिस के ही संगठन मीडिया में सक्सेना पर नित्य हमले कर रहे हैं. शुरुआत सोनवर्षा के निलंबित थाना प्रभारी के उस बयान से हुई जब निलंबन के लगभग एक महीने बाद उसने मीडिया में आरोप लगाये की पुलिस उप-महानिरीक्षक अभद्र भाषा में और उसे जान से मारने की धमकी दे कर उसकी प्रताड़ना कर रहें हैं. थाना प्रभारी महोदय पर आरोप था कि लगातार निर्देश मिलने पर भी उसने अपराधियों और एक कांड के आरोपियों को नहीं पकड़ा. वैसे देहात का साधारण आदमी और आम नागरिक भी जिनका थाने से वास्ता पड़ा है, वे थाना-प्रभारी के आरोप को हास्यास्पद मान रहें हैं. ऐसा माना जा रहा है की मीडिया में इसे उछालने के पीछे कई प्रभावशाली नेता बने अपराधी और सहरसा के पुलिस अधीक्षक मो. रहमान की मिलीभगत है!

कोशी क्षेत्र में कई पूर्व कुख्यात अपराधी नेता बन कर सामाजिक- राजनैतिक रूप से प्रभावशाली हैं. उनमें प्रमुख हैं आनंद मोहन, पप्पू यादव, किशोर कुमार मुन्ना इत्यादि. आनंद मोहन और पप्पू यादव सज़ायाफ्ता हैं और जेल में हैं. आनंद मोहन तो सहरसा जेल के वी आई पी वार्ड में हैं, और जेल से ही उनका फरमान चलता है. जेल में भी कैदियों के वार्ड का अनौपचारिक आवंटन वे ही करते हैं. कुछ दिनों से जेल में रेड के बाद वी आई पी वार्ड सहित अन्य वार्ड से मोबाइल, चार्जर और सिम ज़ब्त किये जाने पर तो वे नाराज़ थे हीं, साथ-साथ अपराधियों पर शिकंजा कसे जाने पर भी वे खुश नहीं थे. ऐसा माना जाता है की डी आई जी सक्सेना के विरुद्ध मीडिया के एक वर्ग द्वारा आग उगले जाने का साजिश वी आई पी वार्ड में ही रची गयी जहाँ एक अन्य अपराधी-नेता उमेश दहलान भी कैद हैं, तथा जिसे किशोर कुमार मुन्ना का भी समर्थन प्राप्त है, जो अन्यथा आनंद मोहन से असहमत ही रहते हैं. समझा जाता है की किशोर कुमार मुन्ना की सहरसा के पुलिस अधीक्षक मो. रहमान से बहुत अच्छे सम्बन्ध हैं.

डा परेश सक्सेना अगस्त २०११ में कोसी रेंज के पुलिस उप-महानिरीक्षक पदस्थापित होकर सहरसा आये. सहरसा आते के साथ ही बढ़ते अपराध को रोकने और पुलिस व्यवस्था को सुधारने के दिशा में सक्सेना ने कड़ी कार्यवाही शुरू कर दी. पुराने मामलों के अनुसन्धान को गति दी गयी, और कई मामले न्याय के लिए कोर्ट में गति दी गयी. यह महत्वपूर्ण था की की कई कुख्यात अपराधियों को गिरफ्तार किया गया जिनमें मनोज यादव, उमेश दहलान, शशि कुमार सिंह उर्फ़ चुन्नू आदि शामिल हैं. मनोज यादव, पतरघट प्रखंड का प्रमुख, बभनी नरसंहार का मुख्य आरोपी और जिसपर ५२ से अधिक मामलें दर्ज है, नए प्रथम सूचना रपट के बाद भी खुले आम घूम रहा था. सहरसा में कम उम्र में ही दहशत फ़ैलाने वाला कुख्यात अपराधी संतोष यादव को सहरसा में मुठभेड़ में मार दिया गया. अपराधियों पर शिकंजा कसने से सबसे अधिक विचलित कुछ थानेदार और कनीय पुलिस अधिकारी ही हुए जिनके छत्रछाया में वे खुलेआम संरक्षित थे.


परेश सक्सेना पहले भी विवाद में रहे हैं. सन २००८ में सहायक महानिरीक्षक (निरीक्षण) के पद पर गया के पित्र्पक्ष मेला के उद्घाटन समारोह में तत्कालीन नगर विकास मंत्री भोला सिंह को मंच पर माला पहनाने से मना करते हुए सैलूट दिया. मंत्री ने भाषण में कुछ ऐसे टिप्पण किये की आहत सक्सेना, जो मेडिकल डाक्टर भी हैं, मानहानि दावा करने के लिए मंत्री को कानूनी नोटिस दे दिए. यह भारत में पहली बार हुआ की एक भारतीय पुलिस सेवा के किसी अधिकारी ने वर्तमान मंत्री को क़ानूनी नोटिस दिया हो. वो जज्बा शायद आज भी डा परेश सक्सेना में है.

Friday, October 28, 2011

सुशासन बाबू का मीडिया पर शिकंजा विज्ञापन राशी बंदरबांट से.

आर टी आई द्वारा प्राप्त सुशासन में नितीश सरकार द्वारा विभिन्न अख़बार और न्यूज़ चैनलों को वितरित विज्ञापन राशी की २०१०-२०११ की विस्तृत जानकारी नीचे दी गयी है. अब प्रश्न है की क्या सुशासन में कानून व्यवस्था में व्यापक सुधार हुआ है? हम तो वही जानेंगे जो समाचारों में आयेगा. और सुशासन में समाचार वही छपता है जो सुशासन बाबू चाहते हैं. पहले छोटे या जिला स्तर के विज्ञापन जिले में ही तय होते थे. सुशासन बाबू ने इस व्यवस्था में फेर बदल करते हुए इसे केंद्रीकृत कर दिया है. अब छोटे-बड़े सभी विज्ञापन मुख्यमंत्री के यहाँ तय होता है, और छोटे-बड़े समाचार भी वहीँ से मोनिटर होता है. अगर किसी अख़बार ने गुस्ताखी की तो उसका विज्ञापन गया!
इसका दूसरा पहलू है जिसका निर्देशन एन के सिंह जैसे पूर्व नौकरशाह और जद(यु) नेता करते हैं. गौर करें की टाइम्स आफ इंडिया और इकोनोमिक टाइम्स जैसे अख़बार, जो बिहार में अधिक साख नहीं रखतें हैं, उन्हें सबसे अधिक करोड़ों में विज्ञापन दिया गया है. दरअसल इकोनोमिक टाइम्स जैसे अखबार नए नए सर्वे करा कर कुछ आंकड़ें पकाते हैं, जिससे यह साबित हो की बिहार ज़बरदस्त तरक्की कर रहा है, सुशासन से वाकई बिहार में आर्थिक परिवर्तन हो रहा है, और सुशासन बाबू नितीश कुमार को मुख्यमंत्री नहीं, प्रधानमंत्री होना चाहिए, और एन डी ए की ओर से मोदी नहीं नितीश दावेदार रहें, बेचारे अडवाणी बेकार मैं यात्रा पर हैं!
कुछ ऐसे अख़बार हैं, जिनके नाम भी आप नहीं सुने होंगे. कई तो घोटाले हो गए, और कुछ दलाल बने पत्रकारों को मिलता है.
बाकीं निष्कर्ष आप स्वयं निकालें.


वर्ष 2010-2011
विभिन्न समाचार पत्र/पत्रिकाओं/इलेक्ट्रॉनिक चैनलों को भुगतान की गई राशि का विवरण (गैर योजना मद)
क्रम सं. पत्र/पत्रिका/चैनल का नाम भुगतान राशि (रुपये) 1. हिंदुस्तान 10,12,13,999 2. हिंदुस्तान टाइम्स 58,63,454 3. दैनिक जागरण 5,33,68,449 4. आज 1,30,54,899 5. प्रभात खबर 1,10,08,037 6. राष्ट्रीय सहारा 67,41,602 7. रोजनामा राष्ट्रीय सहारा 1,47,313 8. टाइम्स ऑफ इंडिया+ईटी 1,13,52,332 9. प्रत्युष नव विहार, पटना 30,29,027 10. कौमी तंजीम 98,72,810 11. फारूकी तंजीम 62,35,314 12. पिंदार 44,11,220 13. संगम 13,80,890 14. इंकलाब-ए-जदीद 20,57,062 15. प्यारी उर्दू 16,30,667 16. मोसल्लस 4,21,899 17. प्रात: कमल 39,63,519 18. हालात-ए-बिहार 6,67,867 19. सन्मार्ग, कोलकाता 6,81,003 20. बिजनेस स्टैंडर्ड, दिल्ली 4,27,607 21. इंडियन एक्सप्रेस, दिल्ली 5,95,800 22. अमर उजाला, दिल्ली 3,88,493 23. पायनियर, दिल्ली 7,12,994 24. पंजाब केसरी दिल्ली 10,11,461 25. डीएनए, मुंबई 1,12,268 26. न्यू इंडियन एक्सप्रेस 27,776 27. झारखंड जागरण 1,42,503 28. स्टेट्‌समैन, कोलकाता 1,68,723 29. मेल टुडे, दिल्ली 7,07,635 30. नई बात, भागलपुर 22,11,150 31 देश विदेश, भागलपुर 7,22,536 32. दैनिक भास्कर, भोपाल 4,06,440 33. विश्वमित्र, कोलकाता 93,395 34. राजस्थान पत्रिका, जयपुर 6,07,904 35. रांची एक्सप्रेस, रांची 1,38,893 36. इंडिया टुडे ट्रैवल्स प्लस 7,50,000 37. दी वीक 15,20,000 38 ईस्टर्न क्रोनिकल 3,43,750 39. टुडे ट्रैवर्ल्स 4,50,000 40. न्यू ग्लोबल इंडिया 1,42,850 41. पांचवां स्तंभ 9,37,500 42. पांचजन्य 80,000 43. नई दुनिया 6,00,000 44. आलिया प्रोडक्शन 1,60,000 45. गुंजन मूवीज 1,26,883 46. प्रणव मोशन पिक्चर्स 1,77,583 47. आरुषि न्यूज नेटवर्क 4,00,000 48. ईटीवी 1,05,12,784 49. महुआ टीवी 98,77,537 50. आईबीएन-7 1,46,689 51. प्रसार भारती आकाशवाणी 16,37,289 52. प्रसार भारती (दूरदर्शन) 29,41,701 53. इंडपेंडेंट न्यूज सर्विस 3,14,286 54. रेडियो मिर्ची 9,41,000 55. सौभाग्य मिथिला 3,57,372 56. सहारा टीवी 1,40,300 57. साधना न्यूज 28,83,347 58. टीवी टुडे नेटवर्क 3,53,876 59. आईएनएक्स न्यूज 35,613 60. रेडियो धमाल 99,854 61. इन्साइट टीवी न्यूज 28,333 62. ब्रांड बिहार डॉट कॉम 56,666
योग 28,15,92,154 (अट्ठाइस करोड़ पंद्रह लाख बानवे हजार एक सौ चौवन रुपये)

Tuesday, July 19, 2011

Nitish Kumar in soup – Ugly face of “Sushasan Babu”, BIADA Scam.

While Nitish Kumar cleverly builds up his ‘image’ of a honest, idealist Chief Minister and his mangers have made the media falls in line, the real ‘appearance’ is not all that pleasant. At least with the Scam of Bihar Industrial Area Development Authority it is clear that the ugly side of his face is peeping behind ‘Sushasan Babu,” with valuable industrial plots distributed like booty among the sons, daughter, kith and kin of the members of his Ministry. The land was supposed to be distributed amongst the entrepreneurs to build up the industrial base of Bihar. But the fact that many of the beneficiaries are relatives of his Ministers, the question on his motive and character has naturally arisen. It is a different matter that his Ministry has not added a single Megawatt of power after coming to power, so important for the infrastructure development for an industrial base of the state.

The former Advocate general of Bihar Mr P K Shahi is the Human Resource Minister of Nitish Government supposed to be quite close to the Chief Minister. Nitish Government has given a valuable ‘gift’ to Ms Urvashi Shahi, the pampered daughter of the pampered Minister. The Bihar Industrial Area Development Authority allotted 87 thousand sq ft land for the lady. So, the land which was supposed to have been allotted to the Entrepeneurs fo setting up Industrial units to generate employment was gifted away to please the Minister’s daughter. The Minister went on record to say that the kith and kin of the Minister’s too had a right to earn a livelihood. Of course, Mr Minister, but this is graft and you termed the previous regime as "Jungle Raj", precisely because laws were not followed.

One of the Navratna IAS of Nitish regime happens to be Afzal Amanullah, who is the Principal Secretary in the Irrigation Department these days. He has also held the post of Home Secretary and Cabinet Secretary in the Bihar Government. His wife Praveen Amanullah got the (JDU) ticket, courtesy Nitish Kumar and was later appointed as the Social Welfare Minister. We are not sure about the welfare of the society, but the fact that ‘charity begins at home’ can be clearly seen. Nitish Government also showered largesse on the daughter of Amanullahs, and Rahmat Fatima accordingly has been given 87 thousand sq ft land.

Before becoming Minister Parveen Amanullah had filed several PILs to expose Corruption in the Nitish Government, but now she will certainly appreciate her daughters progress.

Jagdish Sharma is known ‘dabang’ of JD(U). He has been MLA right from 1977 to 2009. After he became MP his son Rahul Kumar represents Ghosi constituency in Bihar assembly. Nitish Government is already affectionate towards this family. Bihar Industrial Area Development Authority has allotted 15.5 thousand sq ft of land at Hajipur, near Patna to Msrs Devlok Agro Beverage Company Pvt Ltd belonging to Mr Rahul Kumar, probably to produce political clout and following!

When JD(U) people were blessed with the largesse, how could BJP be left behind, afterall the power is being shared and they are equal partners in Government. Former Minister and BJP MLC Avdhesh Narain Singh also hit the jackpot and Bihar Industrial Area Development Authority allotted 2 lakh 17 thousand sq ft land at Bihita to Mr Mahesh Kumar. Now names can change but official papers betrays identity because Mr Mahesh Kumar has been allotted land on the address - Trident Foundation, Verma Centre, 405406, Boring Road Crossing, Patna. This is the address of the office of Avdhesh Narain Singh.

Another plot allotted at Bihita is given to Mother Teresa Medical Trust for educational institute. According to informed sources this society belongs to Anand Kishore (IG Jail). It is atserial no & on the list.


The game of land scam continued. Another MLC of BJP Ashok Chowdhary also got land by Bihar Industrial Area Development Authority at Forbesganj. He got this for his son Saurabh Chowdhary. The first plot is of 13 lakh sq ft and second plot is of 2 lakh 46 thousand sq ft. This is the same plot where many minorities lost their life in the police violence.




The question is that it is not a mere coincidence that the near and dear ones of Nitish Government has been allotted land by Bihar Industrial Area Development Authority to those who have nothing to do with the Industrial development of the state. This is something what Yedurappa did in Karnatak. The allotment is a simple and shining example of graft by Nitish Government. Certainly, Bihar Industrial Area Development Authority has set rules for allotment. They have to advertise and get proposals, which has to be examined by a technical committee and put to the highest bidder. It is reliably learnt that most of these allot tees who are close to Nitish were the only ones to bid because no advertisement for these plots were made. So common people or the Entrepreneurs did not even know that these land will be allotted by the Government for Industrial Development and those who knew hit the jackpot.

Sunday, July 17, 2011

बिहार – विशेष दर्ज़ा या विशेष लूट .

जहाँ एक ओर बिहार सरकार केन्द्रीय सहायता को मार्च आ जाने तक भी पूरी तरह उपयोग नहीं कर पायी है, और दूसरी ओर केन्द्रीय योजनाओं में बेतहाशा लूट जारी है, यह समझना कठिन है की नितीश कुमार और उनके साथियों का बिहार को विशेष दर्ज़ा दिए जाने से उनका क्या तात्पर्य है. मनरेगा को चलाने वाले एक-एक ठेके पर बहाल कर्मचारी पटना में ५० - ६० लाख का घर ले रहें है, और सरकार दावा करती है की योजना में सहायता कम पड़ रही है. लालू प्रसाद की पिछले सरकार ने जहाँ एक ओर सिर्फ लूटने का काम किया था, यह सरकार काम भी कर रही है और लूट भी जारी है.
कैग ( भारत सरकार का महालेखाकार) के रिपोर्ट में कहा गया था की २००७-०८ तक बिहार सरकार ने ११,४१२ कड़ोड़ रूपये के विकास खर्च के लेख-जोखा में गड़बड़ी की है, और बाद में पटना उच्च न्यायलय ने भी इस पर संज्ञान लिया था और सी बी आई जांच की अनुशंसा की थी , जिसे manage कर लिया गया.
कैग की एक दुसरे रिपोर्ट में कहा गया है की बाढ़ सहायता में एक बड़ा घोटाला हुआ है और अगस्त - अक्तूबर २००७ में कुछ जिलों में ट्रक पर राशन भेजने के बजाय मोटर सायकल पर खाद्य सामग्री ढोए गए थे जिसमें बाढ़ राहत के लिए २७४.१५ quintal का गोल माल हुआ था. विधान सभा में पेश कैग के अन्य रिपोर्ट में दोपहर खाने, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना में भारी घोटाले के आरोप लगाये गए हैं जिन पर राज्य सरकार ने कोई कार्यवाई नहीं की है. कैग रिपोर्ट में राष्ट्रिय ग्रामीण स्वास्थ्य स्कीम, जननी सुरक्षा योजना अदि में भ्रष्ट अफसरशाही के कारण १४०० कड़ोड़ रूपये का घोटाला हुआ. शिक्षक ट्रेनिंग के लिए ८.७३ कड़ोड़ रूपये का कोई उपयोग ही नहीं हुआ.
कोशी त्रासदी की मार झेल चुकी जनता बाढ़ राहत के घोटाले की भुक्तभोगी है. आश्चर्य यह है की कोसी त्रसदी की जांच के लिए नियुक्त राजेश वालिया आयोग को तीन महीने में रिपोर्ट देना था परन्तु चार वर्ष बीत जाने पर भी रिपोर्ट का अता-पता नहीं है.
अधिकारीयों के संपत्ति का ब्यौरा आज कल सबसे हँसाने वाले चुटकुले हैं, और चंदा मामा की कहानियों को मात कर रही है. राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी का पटना के डाक बंगला चौराहे पर भारी संपत्ति और होटल के बारे में रिक्शा वाले भी जानते हैं, परन्तु सरकारी वेबसाइट पर उन्हें चढ़ने के लिए के कार भी नहीं है.
इनका जवाब नितीश कुमार जी ढूँढ लें, तो विशेस राज्य का दर्ज़ा स्वतः प्राप्त हो जायेगा, अन्यथा विशेस लूट जी जारी रहेगा.