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New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....
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Monday, September 30, 2013

लालू प्रसाद को चारा घोटाले में सजा - भ्रष्टाचार की हार, सामाजिक न्याय को झटका:


लालू प्रसाद को चारा घोटाले में सजा - भ्रष्टाचार की हार, सामाजिक न्याय को झटका:

चारा घोटाले से जुड़े एक मामले में यहां सीबीआई की विशेष अदालत ने आज बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राजद नेता लालू प्रसाद तथा पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र समेत सभी 45 आरोपियों को दोषी करार दिया है।

वैसे यह राजनीती में अहंकार की पराजय भी है और सत्ता का मद में चूड़ नेताओं के लिए सबक भी है। लालू प्रसाद के विरुद्ध भी रहा हूँ और दो चुनावों में साथ भी दिया हूँ। इसलिए गीता सार को याद कर रहा हूँ - जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।

इसलिए अफ़सोस सिर्फ इस बात का है कि अक्सर सामाजिक न्याय को बुलंद करने की बात जो नेता करते हैं वे भटक जाते हैं और भ्रष्टाचार के दलदल में फंस जाते हैं। इससे सामाजिक न्याय का आन्दोलन कमजोर पड़ता है।

पर इसमें खेल कांग्रेस का है जिसके कसीदे रोज़ लालू प्रसाद पढ़ रहे थे। क्या लालू प्रसाद कांग्रेस की चाल नहीं समझ पाए, तब भी जब उन्हें बचाने के यू पी ए अध्यादेश ड्रामे को राहुल बाबा ने नॉनसेंस करार दिया? और उन घोटालों का क्या जिसमें कांग्रेसी नेता शीला दिक्षित, सुरेश कलमाड़ी, चिदंबरम, सलमान खुर्शीद, और स्वयं प्रधान मंत्री हैं और जिनकी आंच 10 जनपथ तक आती है?



अब कांग्रेस बिहार में नितीश कुमार को अपनाएगी, और नितीश भी जानते हैं की चारा घोटाले से बचाने के लिए फिलहाल उन्हें कांग्रेस की खवासी करनी होगी।
दरअसल, इस घोटाले के आरोपी एसबी सिन्हा के बयान के अनुसार चारा घोटाले का पैसा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी मिला था। एके झा ने सीबीआइ के विशेष न्यायाधीश आरआर त्रिपाठी की अदालत में बताया कि घोटाले के आरोपी एसबी सिन्हा से बयान लिया गया था। इसी बयान में इसकी पुष्टि हुई है। एसबी सिन्हा ने बताया था कि 1995 के लोकसभा चुनाव में चारा घोटाले के आरोपी विजय कुमार मल्लिक द्वारा एक करोड़ रुपये नीतीश कुमार को भिजवाया गया। यह पैसा उन्हें दिल्ली के एक होटल में दिया गया। नीतीश ने पैसे लेकर धन्यवाद भी कहा। कुछ दिनों बाद फिर घोटाले के आरोपी एसबी सिन्हा ने नौकर महेंद्र प्रसाद के हाथ 10 लाख रुपये पटना में विधायक सुधा श्रीवास्तव के घर पर नीतीश कुमार के लिए भेजे। घोटाले के आरोपी आरके दास ने भी कोर्ट में दिये बयान में बताया था कि उसने पांच लाख रुपये नीतीश कुमार को दिये हैं। नीतीश कुमार 1995 में समता पार्टी के नेता थे। वह एसबी सिन्हा को कहते थे कि पैसा नहीं देने पर मामला उजागर कर दिया जाएगा। तत्कालीन विधायक शिवानंद तिवारी, राधाकांत झा, रामदास एवं गुलशन अजमानी को भी पैसा देने की बात सामने आई।

Friday, February 1, 2013

नया लोकपाल - The Lokpal Bill



लोकपाल बिल को अब यू पी ए द्वारा चर्चा का केंद्र बनाने का प्रयास जारी है। अब तक जो संकेत हैं, उस के अनुसार सोनिया-मनमोहन का लोकपाल दंतहीन, विषहीन, नखविहीन और भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देने वाला होगा। जैसे अगर आप शिकायत करेंगे, तो पहले उसकी प्रति सम्बंधित अधिकारी को जायेगा। जाहिर है शिकायत रसूखदार आईएस/ आईपीएस के विरुद्ध ही होगा, और सभी शिकायतकर्ता अरविन्द केजरीवाल की तरह मीडिया के ढाल के साथ नहीं होगा। अफसर को पहले ही संकेत रहेगा की निपटा लो। अब शिकायत निपटेगा या शिकायतकर्ता, यह तो आगे पता चलेगा।

सरकारी लोकपाल राजनीतिक दलो की जांच नही कर पाएगा,न धार्मिक संस्थाओ की,न सरकारी चंदे वाली NGO की।तो क्या वो नर्सरी के बच्चो की कापियां जांचेगा? सरकारी लोकपाल वैसा ही है जैसे बिल्ली अपने गले में डालने के लिए घंटी बनाए मगर उसमें घूंघरूं न डाले। सरकारी लोकपाल के कमजोर होने का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि उससे ज्यादा अधिकार तो मनमोहन सिंह के पास है। अतः सरकारी लोकपाल के रूप में सरकार ने देश को एक और मनमोहन सिंह दिया है।

और कहा जा रहा है की लोकायुक्त एक वर्ष के भीतर बन जाना चाहिए। मगर कैसा? अगर सुशासन बाबू का लोकायुक्त देखा जाय तो इस पद का ऐसा भौंडा मजाक कुछ और नहीं हो सकता है। एक-दो विशेषताएं अगर गिनाऊँ तो कहा जा सकता है की बिहार में लोकायुक्त के पास कोई शिकायत जाने पर उस शिकायत को गोपनीय रखा जायेगा। उस अफसर को पहले शिकायत जायेगा जिसके लिए सरकार का वकील पैरवी करेगा। अगर शिकायतकर्ता आरोप को साबित नहीं कर पायेगा तो शिकायतकर्ता को 6 महीने कैद-इ-बामुशक्कत की सजा होगी। नतीजा है की जबसे नितीश कुमार वर्जन का लोकायुक्त लागू हुआ है, एक भी शिकायत करने का किसी को हिम्मत नहीं हुआ है। टीम अन्ना ने जब इस लोकायुक्त को ख़ारिज किया तो विकास पुरुष बिफर पड़े थे। लेकिन कल अन्ना ने उनके दिल को छू लिया, क्योंकि नितीश के भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना ने मौन साध ली थी।

वैसे गुजरात जैसे राज्य में नरेन्द्र मोदी लोकायुक्त लाना ही नहीं चाहते हैं। पता नहीं क्यों?


पद शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल है,
उसका क्या जो दंतहीन विषरहित शक्तिहीन तरल हैI

Saturday, November 24, 2012

नितीश सरकार की रिपोर्ट कार्ड - मुख्यमंत्री का दावा खोखला और आंकड़े किताबी ...

अपने राजनैतिक स्वाभाव के अनुरूप नितीश कुमार अपने सरकार के कामकाज की मीडिया में आज तारीफ के पुल बाँध कर उसकी वाहवाही की डफली बजा रहें हैं. खैर, ऐसा सभी नेता करते हैं. लेकिन अगर इस सरकार की पिछले सरकार से इसलिए तुलना न की जाये क्योंकि तब ' सुशासन' का दावा नहीं था, तो 'सुशासन का सच' दिख जायेगा. मीडिया की तारीफ और सरज़मीन की सच्चाई का एक ट्रेलर तो पटना के अदालतगंज घाट की छठ पूजा की बद-इन्तजामी में हीं दिख गया था जब 20 नवम्बर को कुछ मिनटों पहले मुख्यमंत्री अपने काफिले में हाथ हिलाते गुजरे थे और तब ऐसी दुखद और हृदयविदारक त्रासदी हुई, जिसकी 'जांच' के आदेश देकर उसे भूलने के लिए कह दिया गया. गौरतलब है की जब छठ पूजा (बिहार के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण) की तैयारियां चल रही थी और उसके लिए पास राशियों की बंदरबांट हो रही थी, तब 'अल्पसंख्यक वोट' के लिए बेकरार विकास पुरुष पाकिस्तान में जिन्ना के मकबरे पर पुष्प श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे थे. 'जाँच' की विषादपूर्ण पहलू यह है की सुशासन बाबू के पहले टर्म में कोसी की भीषण त्रासदी, ( मानव अपराधिक लापरवाही से हुई दुर्घटना को त्रासदी कहते हैं), हुई थी, जिसमें आठ जिले प्रभावित के लाखों लोग प्रभावित हुए थे, और उनकी चल-अचल संपत्ति और पशु-मवेशी का भीषण नुकसान हुआ था. इस त्रासदी की जिम्मेदारी तत्कालीन जल संसाधन मंत्री और उनके रिश्तेदार ठेकेदार और दोषी अभियंताओं का माना गया था. इन लोगों को बचाने के उद्देश्य से एक सद्सीय न्यायिक जांच आयोग, राजेश वालिया कमीशन, गठित किया गया जिसे तीन महीने में रिपोर्ट देना था. आज उस त्रासदी के चार वर्ष से ऊपर हो गए हैं, और RTI जानकारी के अनुसार अब तक इस आयोग पर ढाई करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं, लेकिन रिपोर्ट का अता-पता नहीं है.


अगर कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर इस सरकार के कामकाज का विश्लेषण किया जाये तो पता चलता है की मुख्यमंत्री का दावा खोखला है और आंकड़े किताबी हैं. कहा गया की राज्य में लोकायुक्त का गठन हुआ है. इसके प्रावधानों पर टीम अन्ना ने भी निराशा व्यक्त की थी. संक्षेप में कहा जाय तो यह बताना आवश्यक है की बिहार के लोकायुक्त के समक्ष आम आदमी किसी अधिकारी के भ्रष्टाचार की शिकायत कर हीं नहीं सकता, क्योंकि पहले दोषी अधिकारी के समक्ष वह शिकायत जायेगा, और तब वह अधिकारी अपनी सफाई प्रस्तुत करेगा एवं सरकारी वकील उस अधिकारी का बचाओ करेगा. अगर आपकी शिकायत साबित नहीं हुई ( शिकायत साबित कर हीं नहीं पाएंगे), तो शिकायतकर्ता को जुर्माना और दो साल की जेल बामुशक्कत दिए जाने का प्रावधान है. अधिकारीयों के संपत्ति का ब्यौरा आज कल सबसे हँसाने वाले चुटकुले हैं, और चंदा मामा की कहानियों को मात कर रही है. राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी का पटना के डाक बंगला चौराहे पर भारी संपत्ति और होटल के बारे में रिक्शा वाले भी जानते हैं, परन्तु सरकारी वेबसाइट पर उन्हें चढ़ने के लिए के कार भी नहीं है. ये जो कुछ भ्रष्ट अधिकारी के संपत्ति को जब्त करने की ढिंढोरा पीटा जा रहा है, यह उस समय बेईमानी लगती है जब आपको पता चलेगा की किस निर्लज्जता के साथ सरकार के मंत्री अधिकरियों से पैसों की मांग करते हैं, और बदले में उन्हें जनता और उनके विकास के लिए तय राशियों को लूटने की खुली छूट देते हैं. मधेपुरा जिला में यह आँखों देखी बता रहा हूँ की मंत्री किस तरह अधिकारीयों को बुला कर अपना 'कमीशन' उसूलते हैं. (मंत्रियों के नाम भी कभी सार्वजनिक करूंगा जब उनके कुकर्म का रिकार्डिंग भी मिल जायेगा). आलम यह है की केंद्र सरकार की मनरेगा सरीखे योजनाओं की बड़ी राशी गबन की जा रही है. इसी गबन को और बढ़ाने के लिए तथाकथित 'विशेष दर्जे' की मांग की जा रही है.

कैग ( भारत सरकार का महालेखाकार) के रिपोर्ट में कहा गया था की २००७-०८ तक बिहार सरकार ने ११,४१२ कड़ोड़ रूपये के विकास खर्च के लेख-जोखा में गड़बड़ी की है, और बाद में पटना उच्च न्यायलय ने भी इस पर संज्ञान लिया था और सी बी आई जांच की अनुशंसा की थी , जिसे manage कर लिया गया.
कैग की एक दुसरे रिपोर्ट में कहा गया है की बाढ़ सहायता में एक बड़ा घोटाला हुआ है और अगस्त - अक्तूबर २००७ में कुछ जिलों में ट्रक पर राशन भेजने के बजाय मोटर सायकल पर खाद्य सामग्री ढोए गए थे जिसमें बाढ़ राहत के लिए २७४.१५ quintal का गोल माल हुआ था. विधान सभा में पेश कैग के अन्य रिपोर्ट में दोपहर खाने, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना में भारी घोटाले के आरोप लगाये गए हैं जिन पर राज्य सरकार ने कोई कार्यवाई नहीं की है. कैग रिपोर्ट में राष्ट्रिय ग्रामीण स्वास्थ्य स्कीम, जननी सुरक्षा योजना अदि में भ्रष्ट अफसरशाही के कारण १४०० कड़ोड़ रूपये का घोटाला हुआ. शिक्षक ट्रेनिंग के लिए ८.७३ कड़ोड़ रूपये का कोई उपयोग ही नहीं हुआ.

बिहार पुलिस से अधिक भ्रष्ट शायद हीं किसी राज्य की पुलिस होगी. अगर किसी अपराध की रपट लिखाने थाना जायेंगे, तो उस समय तो आपकी प्रथम सूचना रपट तो हरगिज़ नहीं लिखी जाएगी. जिस पर केस बनता है, थानेदार पहले उससे पैसों की बात करेगा, और अगर बात नहीं बनी तो आपसे पैसे लेकर रिपोर्ट दर्ज की जाएगी. मुझे उस समय घोर आश्चर्य हुआ जब बिहार पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी से पता चला की अपने प्रमोशन के लिए फ़ाइल बढाने के लिए अपने ही मातहत एक कनीय अधिकारी को उन्होंने घूस दी, क्योंकि यही प्रचलन है.

सुशासन बाबू कह रहें है की RTI का प्रावधान किया गया. मैं यह बता देना आवश्यक समझता हूँ की बिहार शायद उन चंद राज्यों में है, जहाँ सबसे अधिक RTI के मामले लंबित है, जिनके जवाब नहीं दिए गए और उन पर अपील की जा रही है, जिसकी सुनवाई नहीं है. बिहार सरकार ने अपनी ओर से अलग प्रावधान किया है की एक बार में सिर्फ दो प्रश्न पूछे जा सकते हैं. दिलचस्प बात यह है की कई ऐसे मामले आये हैं जब RTI में पूछे गए प्रश्न का कोरे कागज़ भेज कर जवाब दिया गया है! यह बिहार सरकार के इस कानून के प्रति उदासीनता का हीं नतीजा है.

बिजली की बात में कई आंकड़े पेश किये गए. बताना चाहूँगा की मधेपुरा जैसे जगह में कई दिनों तो १२ में सिर्फ २ घंटे बिजली आती है. बिजली के दावे का खोखलापन का अंदाज़ा आप ऐसे लगा सकते हैं की अधिकांश जिला मुख्यालयों में सबसे अधिक डीजल की खपत वहां बैंक जैसे प्रतिष्ठानों और कार्यालयों के जेनरेटर चलाने में हीं होते हैं. बिजली की स्थिति का एक वाकया वैशाली जिला के पातेपुर थाना के अंतर्गत इमादपुर गाँव का है, जहाँ 2004 में गाँव का बिजली ट्रांसफर्मर जल गया था, और आज तक बदला नहीं गया क्योंकि गाँव वालों ने इस सुशासन में उसे बदलने के लिए बिजली विभाग के अधिकारीयों को घूस देने से मना कर दिया!
जो उलझ कर रह गई फाइलों के जाल में ,
गाँव तक वो रोशनी आयेगी कितने साल में.

अस्पतालों की स्थिति यह है की केंद्र सरकार से प्राप्त जिला अस्पतालों में उपलब्ध दवाईयों के लिए फंड जो पहले जिलों में जिला अधिकारी और सिविल सर्जन के पास होते थे, उसे स्वास्थ्य मंत्री ने कार्यकारी आदेश देकर केन्द्रीयकृत कर दिया है, और अपने पुत्र को एकमात्र एजेंसी नियुक्त किया है, जहाँ से दोयम दर्जे की दवाईयाँ लेना अनिवार्य है!

सडकों की स्थिति दिन पर दिन ख़राब हो रही है और केंद्र सरकार से प्राप्त राशियों पर बनी सडकों का श्रेय भी लेना अब दूभर हो रहा है.

अपने 'अधिकार यात्रा ' के दौरान जगह जगह पर नितीश कुमार पर जूते-चप्पल क्यों चले उस पर थोड़ी जानकारी दे दूं- बिहार में शिक्षा मित्र की शुरुआत तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के शासन काल में हुई थी लेकिन शिक्षामित्र फेज़ २ की शुरुआत वर्तमान मुख्यमंत्री नीतिश कुमार जी के कर कमलों द्वारा संपन्न हुआ. जिसमे असीमित घोटाले हुए. कही कही तो उच्च अंक प्राप्त अभ्यर्थी की जगह पैसे लेकर ऐसे लोगो को शिक्षा मित्र बनाया गया है जो कही से भी उस पद के लायक नहीं थे. जिनका कोउन्सल्लिंग भी नहीं हुआ था, पैसे की माया ने इस मेघा घोटाले को पूरी तरह ढक दिया. अभी भी बिहार के प्रखंड से लेकर जिले तक और जिले से लेकर मुख्यमंत्री कार्यालय तक सेकडों की तादाद में शिकायत दर्ज है, जिसका निबटारा नीतिश जी के आदेश के बावजूद अभी तक नहीं हुआ है, क्यों की अभ्यर्थी और उनके रिश्तेदार साथ में पंचायत के मुखिया पंचायत सेवक प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी प्रखंड विकास पदाधिकारी आपस में मिलकर पैसे के बल पर गलत रिपोर्ट देते है या फिर रिपोर्ट भेजते ही नहीं जिससे बिहार का अब तक का सबसे बड़ा मेघा घोटाला आज भी फाइलों में ही बंद है, जिसका निष्पादन शायद संभव नहीं. इसके लिए जिस निति की ज़रुरत है वह निति नीतिश जी के पास नहीं है. शिक्षा मित्र की बहाली के लिए जो गाइड लाइन बनाये गए थे वह प्रकाशित होने के बाद हर बार, बार बार, लगातार इतनी बार की लिख नहीं सकते बदले गए, जिसके चलते हमेशा से शिक्षा मित्र फेज़ २ विवादस्पद रही है, कुछ और न सही कम से कम जिन लोगो के उपर शिकायत दर्ज की गयी है उनका तो निष्पादन हो जाये ताकि इस मेघा घोटाले के पाप से नीतिश जी को थोडी मुक्ति मिल जायेगी.

सबसे अधिक विकट स्थिति कृषि क्षेत्र और कृषि में सामुदायिक रिश्तों की है, जिसके बारे में सुशासन बाबू चुप हैं. इसपर विस्तार से अगले पोस्ट में चर्चा करूँगा. जिस राज्य के राजधानी में 'गंग रेप की कई घटनाएं हुई हैं, और खुद मुख्यमंत्री के समक्ष कानून और व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ाई गयी है, तो उस पर चर्चा करना हीं बेकार है।

सबसे रोचक मुख्यमंत्री का जनता दरबार है. मुख्यमंत्री के समक्ष जनता दरबार में दिए गए शिकायत में एक भी मामला ऐसा नहीं है जिसका तसल्लिबक्स निपटारा हुआ हो. कहा जा सकता है की सुशासन बाबू के दावे दुरुस्त नहीं है. अब प्रश्न है की क्या सुशासन में कानून व्यवस्था में व्यापक सुधार हुआ है? हम तो वही जानेंगे जो समाचारों में आयेगा. और सुशासन में समाचार वही छपता है जो सुशासन बाबू चाहते हैं. पहले छोटे या जिला स्तर के विज्ञापन जिले में ही तय होते थे. सुशासन बाबू ने इस व्यवस्था में फेर बदल करते हुए इसे केंद्रीकृत कर दिया है. अब छोटे-बड़े सभी विज्ञापन मुख्यमंत्री के यहाँ तय होता है, और छोटे-बड़े समाचार भी वहीँ से मोनिटर होता है. अगर किसी अख़बार ने गुस्ताखी की तो उसका विज्ञापन गया! आर टी आई द्वारा प्राप्त सुशासन में नितीश सरकार द्वारा विभिन्न अख़बार और न्यूज़ चैनलों को वितरित विज्ञापन राशी की २०१०-२०११ की विस्तृत जानकारी उपलब्ध है. गौरतलब है की टाइम्स आफ इंडिया और इकोनोमिक टाइम्स जैसे अख़बार, जो बिहार में अधिक साख नहीं रखतें हैं, उन्हें सबसे अधिक करोड़ों में विज्ञापन दिया गया है. दरअसल इकोनोमिक टाइम्स जैसे अखबार नए नए सर्वे करा कर कुछ आंकड़ें पकाते हैं, जिससे यह साबित हो की बिहार ज़बरदस्त तरक्की कर रहा है, सुशासन से वाकई बिहार में आर्थिक परिवर्तन हो रहा है, और सुशासन बाबू नितीश कुमार को मुख्यमंत्री नहीं, प्रधानमंत्री होना चाहिए.

दरअसल, सबसे अधिक कमी है निष्कपटता की. मैं मरहूम अदम गोंडवी के इन लाईनों से अपनी बात समाप्त करता हूँ –

तुम्हा्री फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है ,
मगर ये आकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है.
उधर जम्हूडरियत का ढोल पीटे जा रहे हैं वो,
इधर परदे के पीछे बर्बरीयत है, नवाबी है.
लगी है होड़-सी देखो अमीरी औ गरीबी में,
ये गांधीवाद के ढाँचे की बुनियादी खराबी है.
तुम्हाधरी मेज चाँदी की तुम्हाबरे ज़ाम सोने के ,
यहाँ जुम्मदन के घर में आज भी फूटी रक़ाबी है.

Sunday, August 12, 2012

आमिर खान का नीतीश को पत्र, गया अश्विनी चौबे के कूड़े में..


सत्यमेव जयते जैसे कार्यक्रम से चर्चा में आये आमिर खान का एक एपिसोड जेनेरिक दवाओं को लेकर था। आमिर खान ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को पत्र लिखकर यह आग्रह किया है कि वे राज्य में आम लोगो के लिए जेनेरिक दवाओं को सुलभ कराने की दिशा में प्रयास करें।

आमिर ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि वे जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता बढ़ाए ताकि इससे मघ्य वर्ग और निम्नमघ्य वर्ग के लोगों को लाभ पहुंच सके। आमिर खान ने आगे लिखा है कि हाल में किए गए शोध से यह पता चला है कि जेनेरिक दवाऐं किसी भी सूरत में कमतर नहीं है और उनका असर मरीजों पर वही होता है जो महंगी दवाओं का होता है।


अब बेचारे आमिर हिन्दुस्तानी, क्यों सुशासन बाबु को राज्य में आम लोगो के लिए जेनेरिक दवाओं को सुलभ कराने की दिशा में प्रयास करने के आग्रह के लिए  पत्र लिख कर वक़्त बर्बाद कर रहे हैं? उन्हें कोई सूचना दे की बिहार में जेनेरिक दवाओं की क्या बात की जाये, सभी सदर और अन्य अस्पतालों में तमाम दवाइयों की सप्लाई स्वास्थ्य मंत्री के दफ्तर में केन्द्रित कर दिया गया है. यहाँ भी सप्लाई का एकाधिकार स्वास्थ्य मंत्री अश्विनी चौबे (वही जो डाक्टरों के हाथ काटने जी बड़ी-बड़ी बातें करते हैं) के नजदीकी रिश्तेदारों के पास है, जो केंद्र सरकार द्वारा अस्पतालों को दवाई खरीदने के लिए भेजे गए फंड से सिर्फ इनसे घटिया दवाई खरीदने को बाध्य हैं. इसमें भी सभी सिविल सर्जन से मोटे कमीशन की मांग की जाती है, और मधेपुरा सदर अस्पताल जैसे कई अस्पताल के सिविल सर्जन कमीशन देने से मना कर देते हैं, तो वहां दवाइयों को खरीदा ही नहीं जाता है, जिससे आम रोगियों को बिना अस्पताल के दवाई के ही रहना पड़ता है अथवा बाज़ार से महंगे दवाई का ही सहारा रह जाता है. और यह सब होता है पुरुष नहीं, बल्कि विकास पुरुष नितीश कुमार के पूरे सूचना में. तो बताईये बेचारे जेनेरिक दवाई के लिए कौन आमिर खान के पत्र की सुधि लेगा?

ब्रांडेड दवाएं बनाने वाली कम्पनियां जेनेरिक दवाएं भी बनाती है। आमिर ने बताया कि हिन्दुस्तान से साल भर में 35 हजार करोड़ रूपये की जेनेरिक दवाओं का निर्यात होता है। इससे यह स्पष्ट है कि हमारी कम्पनियां जेनेरिक दवाएं बनाती है। किन्तु वे इसका व्यापार करती हैं। वे इसे अपने देश की जनता को उपलब्ध नहीं कराती है। आमिर ने आशा व्यक्त किया है कि मुख्यमंत्री इन जेनेरिक दवाओं को राज्य की जनता को उपलब्ध कराने में अच्छी भूमिका निभा सकतें है।

Friday, February 3, 2012

सुशासन का हाल - पटना के श्रीकृष्ण नगर में दल-दल, नागरिक बेहाल.

बिहार की राजधानी पटना में मुख्यमंत्री आवास से लगभग २ कि मी कि दूरी पर स्थित श्री कृष्ण नगर के रोड नंबर १४ में रहने वाले नागरिक लगभग एक महीने से घरों में शौच के गंदे पानी के ठहराव से बेहाल हैं. पटना के प्रतिष्ठित आवासीय क्षेत्र श्री कृष्ण नगर, जिसके पास में ही लगभग सभी चैनलों और मीडिया के दफ्तर हैं, के लोग पिछले एक महीने से नगरपालिका और अन्य सरकारी संस्थाओं के चक्कर काट-काट कर परेशान हैं. आलम यह है की ठण्ड के घटते ही कब बीमारी का आगमन हो जाय, कोई ठीक नहीं. और सिर्फ इतना होना है की कालोनी से सीवेज पाइप लाइन तक २०० फीट की पाइप लगनी है.
श्रीकृष्ण नगर के लोग सुशासन बाबू विकास पुरुष नितीश कुमार का उत्तर प्रदेश के बलिया में दिए गए उस बयान पर चुटकी ले रहे थे की वे उत्तर प्रदेश को बिहार के तरह चमका देंगे! जब मुख्यमंत्री आवास के करीब राजधानी-क्षेत्र में भी मल-प्रवाह की मूलभूत सुविधा भी वे प्रदान करने में सक्षम नहीं हैं, तो उत्तर-प्रदेश को कैसा चमकाएंगे यह समझना मुश्किल लगता है.
देखें कब सुशासन में इन परेशान नागरिकों की सुधि कौन और कब लेता है, या समस्या का समाधान होता है भी की नहीं?



Monday, January 16, 2012

Nitish Government fools the people of Bihar on crime.


The move of Nitish Government to post the names of convicts and other details on state Home Department's website aimed at checking crime rate in the state is grossly misleading, ridiculous and attacks just retired criminals while actually protecting the practicing 'goons'. This step of the Sushasan Babu is just meant to fool the people of Bihar on Government's seriousness on tackling crime in the state. It is beyond comprehension that, while the people are terrorstricken by criminals who are either not arrested or manage to bypass judicial process, Nitish Government tries to blow trumpets on criminals who have already been convicted long ago and do not matter anymore for proclaiming "Civil consequence of Crime".

To quote an example from Saharsa District Jail, the website has the names of Trivani Sharma, Lalan Sharma, Ashok Yadav, Upendera Sharma and Raghuni Sharma all of whome committed crime in 1997. Those also arrested at present include notorious criminals like Umesh Dahlan, Sashi Kumar Singh, Manoj Yadav and politically known Anand Mohan. Dreaded Manoj Yadav, main accused in Babhani Massacre and with 52 cases of heinous crime against him, do not figure in any list of the Home Department. Infact, Manoj Yadav contested and won as Pramukh of Patarghat Block, in the Panchayati elections. Now, such criminals will feel more safe that they are not in any 'list' of Home department.

If the Nitish Government would have been really serious in tackling crime rate, the Home Department would have released a list of criminals with many serious and heinous crime and taken action against them under Section 110 Cr P C. Therefore, the Government should refrain from making empty announcements and take real steps to work towards 'crime-free' Bihar.

Friday, October 28, 2011

सुशासन बाबू का मीडिया पर शिकंजा विज्ञापन राशी बंदरबांट से.

आर टी आई द्वारा प्राप्त सुशासन में नितीश सरकार द्वारा विभिन्न अख़बार और न्यूज़ चैनलों को वितरित विज्ञापन राशी की २०१०-२०११ की विस्तृत जानकारी नीचे दी गयी है. अब प्रश्न है की क्या सुशासन में कानून व्यवस्था में व्यापक सुधार हुआ है? हम तो वही जानेंगे जो समाचारों में आयेगा. और सुशासन में समाचार वही छपता है जो सुशासन बाबू चाहते हैं. पहले छोटे या जिला स्तर के विज्ञापन जिले में ही तय होते थे. सुशासन बाबू ने इस व्यवस्था में फेर बदल करते हुए इसे केंद्रीकृत कर दिया है. अब छोटे-बड़े सभी विज्ञापन मुख्यमंत्री के यहाँ तय होता है, और छोटे-बड़े समाचार भी वहीँ से मोनिटर होता है. अगर किसी अख़बार ने गुस्ताखी की तो उसका विज्ञापन गया!
इसका दूसरा पहलू है जिसका निर्देशन एन के सिंह जैसे पूर्व नौकरशाह और जद(यु) नेता करते हैं. गौर करें की टाइम्स आफ इंडिया और इकोनोमिक टाइम्स जैसे अख़बार, जो बिहार में अधिक साख नहीं रखतें हैं, उन्हें सबसे अधिक करोड़ों में विज्ञापन दिया गया है. दरअसल इकोनोमिक टाइम्स जैसे अखबार नए नए सर्वे करा कर कुछ आंकड़ें पकाते हैं, जिससे यह साबित हो की बिहार ज़बरदस्त तरक्की कर रहा है, सुशासन से वाकई बिहार में आर्थिक परिवर्तन हो रहा है, और सुशासन बाबू नितीश कुमार को मुख्यमंत्री नहीं, प्रधानमंत्री होना चाहिए, और एन डी ए की ओर से मोदी नहीं नितीश दावेदार रहें, बेचारे अडवाणी बेकार मैं यात्रा पर हैं!
कुछ ऐसे अख़बार हैं, जिनके नाम भी आप नहीं सुने होंगे. कई तो घोटाले हो गए, और कुछ दलाल बने पत्रकारों को मिलता है.
बाकीं निष्कर्ष आप स्वयं निकालें.


वर्ष 2010-2011
विभिन्न समाचार पत्र/पत्रिकाओं/इलेक्ट्रॉनिक चैनलों को भुगतान की गई राशि का विवरण (गैर योजना मद)
क्रम सं. पत्र/पत्रिका/चैनल का नाम भुगतान राशि (रुपये) 1. हिंदुस्तान 10,12,13,999 2. हिंदुस्तान टाइम्स 58,63,454 3. दैनिक जागरण 5,33,68,449 4. आज 1,30,54,899 5. प्रभात खबर 1,10,08,037 6. राष्ट्रीय सहारा 67,41,602 7. रोजनामा राष्ट्रीय सहारा 1,47,313 8. टाइम्स ऑफ इंडिया+ईटी 1,13,52,332 9. प्रत्युष नव विहार, पटना 30,29,027 10. कौमी तंजीम 98,72,810 11. फारूकी तंजीम 62,35,314 12. पिंदार 44,11,220 13. संगम 13,80,890 14. इंकलाब-ए-जदीद 20,57,062 15. प्यारी उर्दू 16,30,667 16. मोसल्लस 4,21,899 17. प्रात: कमल 39,63,519 18. हालात-ए-बिहार 6,67,867 19. सन्मार्ग, कोलकाता 6,81,003 20. बिजनेस स्टैंडर्ड, दिल्ली 4,27,607 21. इंडियन एक्सप्रेस, दिल्ली 5,95,800 22. अमर उजाला, दिल्ली 3,88,493 23. पायनियर, दिल्ली 7,12,994 24. पंजाब केसरी दिल्ली 10,11,461 25. डीएनए, मुंबई 1,12,268 26. न्यू इंडियन एक्सप्रेस 27,776 27. झारखंड जागरण 1,42,503 28. स्टेट्‌समैन, कोलकाता 1,68,723 29. मेल टुडे, दिल्ली 7,07,635 30. नई बात, भागलपुर 22,11,150 31 देश विदेश, भागलपुर 7,22,536 32. दैनिक भास्कर, भोपाल 4,06,440 33. विश्वमित्र, कोलकाता 93,395 34. राजस्थान पत्रिका, जयपुर 6,07,904 35. रांची एक्सप्रेस, रांची 1,38,893 36. इंडिया टुडे ट्रैवल्स प्लस 7,50,000 37. दी वीक 15,20,000 38 ईस्टर्न क्रोनिकल 3,43,750 39. टुडे ट्रैवर्ल्स 4,50,000 40. न्यू ग्लोबल इंडिया 1,42,850 41. पांचवां स्तंभ 9,37,500 42. पांचजन्य 80,000 43. नई दुनिया 6,00,000 44. आलिया प्रोडक्शन 1,60,000 45. गुंजन मूवीज 1,26,883 46. प्रणव मोशन पिक्चर्स 1,77,583 47. आरुषि न्यूज नेटवर्क 4,00,000 48. ईटीवी 1,05,12,784 49. महुआ टीवी 98,77,537 50. आईबीएन-7 1,46,689 51. प्रसार भारती आकाशवाणी 16,37,289 52. प्रसार भारती (दूरदर्शन) 29,41,701 53. इंडपेंडेंट न्यूज सर्विस 3,14,286 54. रेडियो मिर्ची 9,41,000 55. सौभाग्य मिथिला 3,57,372 56. सहारा टीवी 1,40,300 57. साधना न्यूज 28,83,347 58. टीवी टुडे नेटवर्क 3,53,876 59. आईएनएक्स न्यूज 35,613 60. रेडियो धमाल 99,854 61. इन्साइट टीवी न्यूज 28,333 62. ब्रांड बिहार डॉट कॉम 56,666
योग 28,15,92,154 (अट्ठाइस करोड़ पंद्रह लाख बानवे हजार एक सौ चौवन रुपये)

Tuesday, July 19, 2011

Nitish Kumar in soup – Ugly face of “Sushasan Babu”, BIADA Scam.

While Nitish Kumar cleverly builds up his ‘image’ of a honest, idealist Chief Minister and his mangers have made the media falls in line, the real ‘appearance’ is not all that pleasant. At least with the Scam of Bihar Industrial Area Development Authority it is clear that the ugly side of his face is peeping behind ‘Sushasan Babu,” with valuable industrial plots distributed like booty among the sons, daughter, kith and kin of the members of his Ministry. The land was supposed to be distributed amongst the entrepreneurs to build up the industrial base of Bihar. But the fact that many of the beneficiaries are relatives of his Ministers, the question on his motive and character has naturally arisen. It is a different matter that his Ministry has not added a single Megawatt of power after coming to power, so important for the infrastructure development for an industrial base of the state.

The former Advocate general of Bihar Mr P K Shahi is the Human Resource Minister of Nitish Government supposed to be quite close to the Chief Minister. Nitish Government has given a valuable ‘gift’ to Ms Urvashi Shahi, the pampered daughter of the pampered Minister. The Bihar Industrial Area Development Authority allotted 87 thousand sq ft land for the lady. So, the land which was supposed to have been allotted to the Entrepeneurs fo setting up Industrial units to generate employment was gifted away to please the Minister’s daughter. The Minister went on record to say that the kith and kin of the Minister’s too had a right to earn a livelihood. Of course, Mr Minister, but this is graft and you termed the previous regime as "Jungle Raj", precisely because laws were not followed.

One of the Navratna IAS of Nitish regime happens to be Afzal Amanullah, who is the Principal Secretary in the Irrigation Department these days. He has also held the post of Home Secretary and Cabinet Secretary in the Bihar Government. His wife Praveen Amanullah got the (JDU) ticket, courtesy Nitish Kumar and was later appointed as the Social Welfare Minister. We are not sure about the welfare of the society, but the fact that ‘charity begins at home’ can be clearly seen. Nitish Government also showered largesse on the daughter of Amanullahs, and Rahmat Fatima accordingly has been given 87 thousand sq ft land.

Before becoming Minister Parveen Amanullah had filed several PILs to expose Corruption in the Nitish Government, but now she will certainly appreciate her daughters progress.

Jagdish Sharma is known ‘dabang’ of JD(U). He has been MLA right from 1977 to 2009. After he became MP his son Rahul Kumar represents Ghosi constituency in Bihar assembly. Nitish Government is already affectionate towards this family. Bihar Industrial Area Development Authority has allotted 15.5 thousand sq ft of land at Hajipur, near Patna to Msrs Devlok Agro Beverage Company Pvt Ltd belonging to Mr Rahul Kumar, probably to produce political clout and following!

When JD(U) people were blessed with the largesse, how could BJP be left behind, afterall the power is being shared and they are equal partners in Government. Former Minister and BJP MLC Avdhesh Narain Singh also hit the jackpot and Bihar Industrial Area Development Authority allotted 2 lakh 17 thousand sq ft land at Bihita to Mr Mahesh Kumar. Now names can change but official papers betrays identity because Mr Mahesh Kumar has been allotted land on the address - Trident Foundation, Verma Centre, 405406, Boring Road Crossing, Patna. This is the address of the office of Avdhesh Narain Singh.

Another plot allotted at Bihita is given to Mother Teresa Medical Trust for educational institute. According to informed sources this society belongs to Anand Kishore (IG Jail). It is atserial no & on the list.


The game of land scam continued. Another MLC of BJP Ashok Chowdhary also got land by Bihar Industrial Area Development Authority at Forbesganj. He got this for his son Saurabh Chowdhary. The first plot is of 13 lakh sq ft and second plot is of 2 lakh 46 thousand sq ft. This is the same plot where many minorities lost their life in the police violence.




The question is that it is not a mere coincidence that the near and dear ones of Nitish Government has been allotted land by Bihar Industrial Area Development Authority to those who have nothing to do with the Industrial development of the state. This is something what Yedurappa did in Karnatak. The allotment is a simple and shining example of graft by Nitish Government. Certainly, Bihar Industrial Area Development Authority has set rules for allotment. They have to advertise and get proposals, which has to be examined by a technical committee and put to the highest bidder. It is reliably learnt that most of these allot tees who are close to Nitish were the only ones to bid because no advertisement for these plots were made. So common people or the Entrepreneurs did not even know that these land will be allotted by the Government for Industrial Development and those who knew hit the jackpot.

Sunday, July 17, 2011

बिहार – विशेष दर्ज़ा या विशेष लूट .

जहाँ एक ओर बिहार सरकार केन्द्रीय सहायता को मार्च आ जाने तक भी पूरी तरह उपयोग नहीं कर पायी है, और दूसरी ओर केन्द्रीय योजनाओं में बेतहाशा लूट जारी है, यह समझना कठिन है की नितीश कुमार और उनके साथियों का बिहार को विशेष दर्ज़ा दिए जाने से उनका क्या तात्पर्य है. मनरेगा को चलाने वाले एक-एक ठेके पर बहाल कर्मचारी पटना में ५० - ६० लाख का घर ले रहें है, और सरकार दावा करती है की योजना में सहायता कम पड़ रही है. लालू प्रसाद की पिछले सरकार ने जहाँ एक ओर सिर्फ लूटने का काम किया था, यह सरकार काम भी कर रही है और लूट भी जारी है.
कैग ( भारत सरकार का महालेखाकार) के रिपोर्ट में कहा गया था की २००७-०८ तक बिहार सरकार ने ११,४१२ कड़ोड़ रूपये के विकास खर्च के लेख-जोखा में गड़बड़ी की है, और बाद में पटना उच्च न्यायलय ने भी इस पर संज्ञान लिया था और सी बी आई जांच की अनुशंसा की थी , जिसे manage कर लिया गया.
कैग की एक दुसरे रिपोर्ट में कहा गया है की बाढ़ सहायता में एक बड़ा घोटाला हुआ है और अगस्त - अक्तूबर २००७ में कुछ जिलों में ट्रक पर राशन भेजने के बजाय मोटर सायकल पर खाद्य सामग्री ढोए गए थे जिसमें बाढ़ राहत के लिए २७४.१५ quintal का गोल माल हुआ था. विधान सभा में पेश कैग के अन्य रिपोर्ट में दोपहर खाने, स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना में भारी घोटाले के आरोप लगाये गए हैं जिन पर राज्य सरकार ने कोई कार्यवाई नहीं की है. कैग रिपोर्ट में राष्ट्रिय ग्रामीण स्वास्थ्य स्कीम, जननी सुरक्षा योजना अदि में भ्रष्ट अफसरशाही के कारण १४०० कड़ोड़ रूपये का घोटाला हुआ. शिक्षक ट्रेनिंग के लिए ८.७३ कड़ोड़ रूपये का कोई उपयोग ही नहीं हुआ.
कोशी त्रासदी की मार झेल चुकी जनता बाढ़ राहत के घोटाले की भुक्तभोगी है. आश्चर्य यह है की कोसी त्रसदी की जांच के लिए नियुक्त राजेश वालिया आयोग को तीन महीने में रिपोर्ट देना था परन्तु चार वर्ष बीत जाने पर भी रिपोर्ट का अता-पता नहीं है.
अधिकारीयों के संपत्ति का ब्यौरा आज कल सबसे हँसाने वाले चुटकुले हैं, और चंदा मामा की कहानियों को मात कर रही है. राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी का पटना के डाक बंगला चौराहे पर भारी संपत्ति और होटल के बारे में रिक्शा वाले भी जानते हैं, परन्तु सरकारी वेबसाइट पर उन्हें चढ़ने के लिए के कार भी नहीं है.
इनका जवाब नितीश कुमार जी ढूँढ लें, तो विशेस राज्य का दर्ज़ा स्वतः प्राप्त हो जायेगा, अन्यथा विशेस लूट जी जारी रहेगा.

Saturday, July 16, 2011

Criminalisation from below – the Irony of Panchayati Raj in Bihar.

I am quoting a few examples of winning candidates at Madhepura in the three tier Panchayati Raj Election held recently in Bihar. Some of the seats of Chairman, Zila Parishad(District level), Pramukh (Block level) and Mukhiya (Village level) are reserved for weaker sections and women. So, many of these are proxy candidates and wives of the actual aspirant and the ones who would like to exercise power.
So, the Chairperson of Zila Parishad at Madhepura is Ms.Milan Devi (wife of Mr Siyaram Yadav, which one not sure because he has married more than once, and keeps many). Now Mr Siyaram Yadav runs a Theatre ( Nautanki group, which have in recent years become just a vulgar display of nautch (dance) by girls. It is said he married second time from amongst them). The Deputy Chairperson is Mr Ranbeer Kumar Yadav (a person with criminal background). But the case in point is the election of one Manoj Yadav as Pramukh of Patarghat Block of the neighbouring Saharsa District.His election only proves that criminalisation of politics begins from below and the law abiding citizens have no safeguard against criminal tactics and intimidation, and as such are under fear even to mention this before the authorities.
Manoj Yadav has 52 cases of murder, decoity, rape, ransoming, extortion etc., none of them can be considered anything less than ‘heinous’ crime. Manoj Yadav is a dreaded criminal who has been in jail for more than 6 months on several counts. He has committed crime across the state in many districts including Saharsa, Madhepura, Purnea. He is the main accused in Babhni Carnage in which many people were killed. He has broken away from jail and absconded. Manoj Yadav has managed to come out of Jail because there is no one to appear as witness in any of the case in which he is involved for the fear of life and property being targeted by this dreaded criminal and his gang.
Now, just to see how there is no law to stop such criminals from launching their political careers in Panchayati Raj institutions, so that they can rise to become ardent protectors of Criminalisation of Politics. So, any attempt by Election Commission to challenge criminalization often meets dead end.
After the 73rd Constitutional Amendment Act., Government of Bihar enacted the Bihar Panchyat Raj Act, 1993 (Replaced by Bihar Panchayati Raj Act,2006) and a three tier system of Panchayat Raj (Zila Parishad, Panchayat Samiti and Gram Panchayats) started functioning after general election in April/ May 2001.
There are 38 Zila Parishads (ZPs), 531 Panchayat Samitis (PSs) and 8471 Gram Panchayats (GPs) in the State of Bihar covering a rural population of about 7,43,21,103. At the state level the Panchayat Raj Department coordinates the functioning of the PRIs.
The 73rd (panchayati raj) amendment to the Constitution of India mandates the transfer of decision-making powers and resources in rural areas to local democratic bodies called panchayats. It aims at giving women, scheduled castes and scheduled tribes wider representation. The amendment was a revolutionary step in enabling true local self-governance.
However, the aims are not being achieved. Just to show how the Bihar Government has enacted the law to debar Teachers, Advocates, Professors et al from contesting the Panchayat Elections and made all arrangement for criminals to have a free for them in contesting, I’d like to quote Section 136 of the Panchayat Act 2006 which shows who can be disqualified. Section 136,(g)reads as,"has been sentenced by a criminal court whether within or out of India to imprisonment for an offence, other than a political offence, for a term exceeding six months or has been ordered to furnish security for good behavior under section 109 or section 110 of the Code of Criminal
Procedure 1973 (Act 2, 1974) and such sentence or order not having subsequently been reversed;".

Now we can see that criminals like Manoj Yadav, who have not been sentenced, or are not likely to be sentenced can go on contesting, and intimidating their way to victory. However, if any respectable person, who has been charged of being a threat to ‘law and order’ and on any occasion asked to pay a fine under Section 109 or 110 of Cr P C, will be debarred from contesting or will be disqualified if he wins.
It is pertinent to mention that Sh Nitish Kumar claimed to have countered “Jungle Raj” and allowed ‘Rule of Law’, which has now been restored in Bihar. But such laws and their implementation seriously raises questions on the motive of “Sushasan Babu” Nitish Kumar. However, more importantly it raises bigger questions on the political system in India being insensitive to the menace of “CRIMINALISATION” of Politics, rather functioning as its perpetuator. So, hopes are on movements like “fighting corruption in India” of Anna Hazare also taking up crutches of “fighting Criminalisation of political system in India.”