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New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....
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Tuesday, June 23, 2015

आपातकाल और बी पी मंडल : Emergency and B P Mandal :

26 जून को आपातकाल की 40 वीं वर्षगांठ है। दरअसल, संविधान के अनुसार देश पर बाहरी खतरे (युद्ध) या आतंरिक (राजद्रोह या विद्रोह) खतरे से उत्पन्न विशेष स्थिति का सामना करने के लिए सरकार आपकाल लागू कर सकती है जब वह नागरिक अधिकार और साधारण कानून निलंबित करती है। सरकार के पास असीमित अधिकार मिल जाते हैं जिसका दुरपयोग भी किया जा सकता है। और हुआ भी यही था।
मामला 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था, जिसमें उन्होंने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी राज नारायण को पराजित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राज नारायण ने इलाहबाद हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। उनकी दलील थी कि इंदिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग किया, तय सीमा से अधिक खर्च किए और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए ग़लत तरीकों का इस्तेमाल किय। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया। इंदिरा हगंधी की इस्तीफे की मांग उठ गयी और कानूनन उन्हें ऐसा ही करना चाहिए था। फैसले में इंदिरा गांधी को चुनाव में धांधली करने का दोषी पाया गया और उन पर छह वर्षों तक कोई भी पद संभालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। परन्तु इसके बावजूद इंदिरा गांधी टस से मस नहीं हुईं और इस फ़ैसले को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की। 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी गई। तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी। यहाँ तक कि कांग्रेस पार्टी ने खुले आम कहने लगी कि इंदिरा का नेतृत्व पार्टी के लिए अपरिहार्य है।
इस तरह 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 मास की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल था। आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए तथा नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई। इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया और प्रेस पर प्रतिबंधित कर दिया गया। प्रधानमंत्री के बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान चलाया गया। जयप्रकाश नारायण ने इसे भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि' कहा था।
आपातकाल लागू होते ही आंतरिक सुरक्षा क़ानून (मीसा) के तहत राजनीतिक विरोधियों की गिरफ़्तारी की गई, इनमें जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, जॉर्ज फ़र्नांडिस, अटल बिहारी वाजपेयी आदि भी शामिल थे।
जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर सम्पूर्ण क्रांति के नारे को लेकर छात्र संघर्ष समिति का गठन हुआ। पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष लालू प्रसाद और सचिव सुशील मोदी, छात्र नेता रामविलास पासवान, दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष अरुण जेटली आदि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
18 मार्च 1974 को छात्र संघर्ष समिति ने बिहार विधान सभा का घेराव किया। फिर छात्र संघर्ष समिति ने बिहार विधान सभा के सभी सदस्यों से इस्तीफा देने आह्वान किया। उन्होंने मांग की मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर को बर्खास्त किया जाए।
उस समय 318 सदस्यीय बिहार विधान सभा में मुख्य पार्टियों की संख्या इस प्रकार थी : कांग्रेस (इंदिरा) 167, सी पी आई 35, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी 33, भारतीय जान संघ 25, कांग्रेस (ओ) 30, निर्दलीय 17, हिंदुस्तानी शोषित दल 3, झारखण्ड 1, झारखण्ड पार्टी 3, बिहार प्रान्त झारखण्ड पार्टी 2 आदि।
कर्पूरी ठाकुर और बी पी मंडल संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में थे। विधायक बदलते हुए राजनैतिक परिस्थितियों में धीरे-धीरे इस्तीफा देने लगे। भारतीय जन संघ में इस्तीफे के प्रश्न पर दो फाड़ हो गए। इसी तरह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के अधिकांश विधायक कर्पूरी ठाकुर के इस्तीफा बाद बी पी मंडल को नेता मान लिए।
मधेपुरा में राजनैतिक आंदोलन हो रहे थे और छात्र संघर्ष समिति के स्थानीय टी पी कॉलेज के नेता बी पी मंडल के इस्तीफा देने की मांग को लेकर एस डी ओ कंपाउंड (SDO Compound) में "यज्ञ आंदोलन" करते हुए इंदिरा - अब्दुल गफूर विरोधी अन्य मन्त्रों के साथ साथ "बी पी मंडल स्वाहा" कह कर आहुति दे रहे थे। मैं भी यह मंजर देखने वहां पहुंचा था। उसी दौरान विरोध प्रदर्शन में शामिल युवक सदानंद पुलिस की गोली का शिकार हो गए।
आपातकाल घोषणा एवं मधेपुरा में हुए इन घटनाओं के समय ही लगभग जय प्रकाश बाबू के आग्रह पर बी पी मंडल और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के लहभग सभी सदस्य बिहार विधान सभा से इस्तीफा दे दिए।
अब बिहार के कांग्रेस विरोधी नेताओं की भी धड़-पकड़ शुरू हो गयी। बी पी मंडल अपने गॉव मुरहो में थे। पर मंडल परिवार के पुराने रुतबे के कारण और मुरहो में तब जल्दी पुलिस का पदार्पण नहीं होने की परंपरा से संभवतः पुलिस इस ताक में रहती थी कब मंडल जी मधेपुरा आएं और कोई कार्यवाई हो। इस दौरान लगभग डेढ़ महीने तक दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश भी गिरफ़्तारी से परहेज रखने के लिए मंडल जी के साथ ही मुरहो में थे। कुछ दिनों तक चौधरी ब्रह्म प्रकाश मंडल जी के मधेपुरा आवास पर भी बतौर मेहमान रहें। (स्व बी पी मंडल और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री राव बिरेन्द्र सिंह भी अभिन्न मित्र थे)।
आपातकाल लागू करने के लगभग दो साल बाद 1977 में अपने पक्ष में ख़ुफ़िया रिपोर्ट के मद्देनज़र प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी। आपातकाल समाप्त कर दिया गया। चुनाव में आपातकाल लागू करने का फ़ैसला कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ। ख़ुद इंदिरा गांधी अपने गढ़ रायबरेली से चुनाव हार गईं। जनता पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। संसद में कांग्रेस के सदस्यों की संख्या 350 से घट कर 153 पर सिमट गई और 30 वर्षों के बाद केंद्र में किसी ग़ैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ।
बिहार में जनता पार्टी के सांसदीय समिति के अध्यक्ष होने के नाते, और जय प्रकाश बाबू के आग्रह पर, कर्पूरी ठाकुर और सत्येन्द्र बाबू के आपत्ति बावजूद, बी पी मंडल ने लालू प्रसाद को छपरा से लोक सभा टिकट के लिए अनुमोदन किए।
1977 में बिहार के 54 सीट में से 52 जनता पार्टी के पक्ष में थे और एक एक सीट निर्दलीय और झारखण्ड पार्टी को मिली।
बिहार से जीतने वाले दिग्गजों में बी पी मंडल के अलावे बाबू जगजीवन राम (कांग्रेस छोड़ कर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी बनाए थे), सत्येन्द्र नारायण सिंह, कर्पूरी ठाकुर, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडिस, हुकुमदेव नारायण यादव और पहली बार जीतने वालों में कम उम्र के लालू प्रसाद और रिकार्ड वोट के साथ राम विलास थे।
विडम्बना यह है की लालू प्रसाद आज भी अपने टिकट के लिए बी पी मंडल की स्मृति के प्रति अहसानमंद होने की जगह उनके प्रति उपेक्षा का भाव रखते हैं।

Saturday, November 16, 2013

कांग्रेस लीला के शिकार लालू प्रसाद: (Laloo Prasad)


सियासी ज़िन्दगी में हाल के दिनों में रोज़ कांग्रेस-सोनिया का नाम जपने वाले लालू प्रसाद को सी बी आई कोर्ट ने सजा सुनायी और उन्हें राहत देने वाले अध्यादेश को राहुल बाबा ने नॉनसेंस कह कर उसकी हवा निकल दी। इधर कांग्रेस जद(यू) से ताल-मेल की बात का खंडन नहीं किया। इस बेवफाई के बावजूद रा ज द का कांग्रेस-प्रेम बरक़रार रहा।

इधर हुंकार रैली में जैसे ही नरेंद्र मोदी ने यदुवंशियों से उन्हें समर्थन देने की अपील की,कांग्रेस कि नींद उड़ गयी। राजनैतिक जोड़-घटाओ करते हुए उन्हें नज़र आया कि अगर यादवों का एक अंश भी नरेंद्र मोदी के साथ हो जाता है तो बिहार में चुनाव नतीजों को भा ज पा के पक्ष में एक तरफ़ा माना जा सकता है।

तब उन्हें लगा कि बिना लालू प्रसाद को जेल से बाहर निकले और रा ज द से ताल-मेल किये , बात नहीं बनेगी।

इसके लिए माहौल बनाने का भार कांग्रेस नीत पत्रिका तहलका को सौंपा गया जिसमें इसके संवाददाता अजित शाही लिखते हैं:
चारा घोटाले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को सजा दिए जाने का कोई विशेष आधार नहीं है और फैसला अस्पष्ट, हलके और विकृत सबूत पर आधारित है।

निचले अदालत से सजायाफ्ता आजीवन कारावास पाये हुए पप्पू यादव उच्च न्यायलय से बाइज्जत बरी हुए हैं। तो क्या लालू प्रसाद को बचाना कांग्रेस के लिए बड़ी बात थी?



पहले फंसाओ और फिर बचा कर अहसान के बोझ तले दबा कर काम निकालो, कांग्रेस की निति रही है। लालू प्रसाद यह समझे कि नहीं, उनके समर्थक तो ज़रूर समझ रहें होंगे।

Saturday, November 9, 2013

मंडल कमीशन:


दरअसल कई साथी यह जानना चाहेंगे कि मंडल कमीशन क्या है?

देश की आज़ादी के बाद समाज के सबसे कमजोर तपके, जिन्हें अनुसूचित जाति और जनजाति कहा गया, के बारे में यह मानते हुए कि यह वर्ग समाज में वर्षों से कई बाधाओं और विकृतियों से जूझ रहा है और उनके उत्थान के लिए विशेष अवसरों कि आवश्यकता होगी, उन्हें आरक्षण और विशेष अवसरों का प्रावधान किया गया। लेकिन इसके पीछे एक इतिहास थी और यह इतना आसान भी नहीं था क्योंकि आज़ादी के संघर्ष के दौरान दलित नेता डा बी आर आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच हुए समझौतों के कारण, खास तौर से हिन्दू समाज को एक रखने के लिए संविधान में यह आया।

परन्तु यह भी बात उठी कि इन वर्गों के अलावे कई और सामाजिक तपके हैं, जिन्हें भी विशेष अवसरों कि आवश्यकता होगी। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से इन पिछड़े वर्गों का पता लगाने के लिए संविधान के धारा 340 के अनुसार एक आयोग बनाने का प्रावधान किया गया, जिसे पिछड़ा वर्ग आयोग कहा जाना था।

पंडित नेहरू पर इस बात का दबाब बढ़ने पर 29 जनवरी, 1953 को काका कालेलकर की अध्यक्षता में पहले पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया जिसने 30 मार्च 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी।इस रिपोर्ट के अनुसार 2,399 जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया, जिनमें 837 जातियों को अति-पिछड़ा घोषित किया गया। लेकिन इस आयोग के रिपोर्ट कि सबसे दिलचस्प पहलु यह थी कि आयोग के अध्यक्ष ने रिपोर्ट के साथ माननीय राष्ट्रपति को दिए गए अपने पत्र में अपनी ही रिपोर्ट को ख़ारिज कर दी।

इसी पत्र के आधार पर वर्षों तक पिछड़े वर्ग के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। 1977 के लोक सभा चुनाव में नवगठित जनता पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में पिछड़े वर्ग के लिए विशेष उपाय पूरे संजीदगी से उठाया गया और उस चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस को पहली और करारी हार दी।

जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं में बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री बी पी मंडल भी थे जो बिहार में जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष भी थे।(उन्होंने ने ही लालू प्रसाद को उस चुनाओ में टिकट दी थी)। बी पी मंडल मधेपुरा लोक सभा क्षेत्र से शानदार विजय प्राप्त किये और इस बात का कयास लगाया जा रहा था की जनता पार्टी कि पहली गैर-कांग्रेसी केंद की सरकार उन्हें कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय दी जायेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

इसी बीच पैर टूटने के इलाज़ के दौरान मंडल जी बम्बई के जसलोक अस्पताल में भरती थे, जहाँ उनसे मिलने प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई पहुंचे। मोरारजी भाई ने बी पी मंडल से कहा की मैंने आपको मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया क्योंकि आपको एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देना चाहता हूँ। मंत्री तो कई लोग बनते हैं लेकिन यह जिम्मेदारो इतना विशेष है की मरने के बाद भी लोग आपको याद करेंगे।

राष्ट्रपति ने 1 जनवरी, 1979 को पिछड़ा वर्ग आयोग कि गठन कि अधिसूचना जारी की जिसके अध्यक्ष बिहार के पूर्व मुख्य-मंत्री बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल (बी पी मंडल) को बनाया गया। उन्हीं के नाम पर इस आय़ोग को मंडल आयोग के नाम से जाना गया। बी पी मंडल ने 31 दिसंबर,1980 को नई दिल्ली के विज्ञानं भवन में राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह को रिपोर्ट सौंप दी।

मंडल कमीशन रिपोर्ट तो पूरे विज्ञानिक आधार के बनायी गयी की वर्षों बाद सर्वोच्च न्यायलय के सम्पूर्ण बेंच द्वारा भी इसमें किसी तरह कि कमी नहीं निकाली जा सकी। रिपोर्ट में 1931 में हुए आखिरी जाति आधारित जनगणना के अनुसार भारत के 52% जनसंख्या जिसमें 3,743 अलग अलग जातियों को समाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा या ‘backward’ घोषित किया गया। परन्तु चुकी पहले से अनुसूचित जाति/जनजाति को 22.5% आरक्षण प्राप्त था अतः कई अन्य अनुशंसाओं के साथ साथ उनके लिए 27% आरक्षण का प्रावधान करने के लिए कहा गया, जिसे जोड़ने के बाद आरक्षण का कुल प्रतिशत 49.5 होता था जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय सीलिंग 50% से कम था।

स्व बी पी मंडल की मृत्यु रिपोर्ट सौंपने के लगभग एक वर्ष बाद 13 अप्रैल, 1982 को हो गयी। इस तरह कांग्रेस के सरकार में रिपोर्ट को ढंडे बस्ते में डाल दिया गया।
1989 का लोकसभा चुनाव पूर्ण हुआ। कांग्रेस को भारी क्षति उठानी पड़ी। उसे मात्र 197 सीटें ही प्राप्त हुईं। विश्वनाथ प्रताप सिंह के राष्ट्रीय मोर्चे को 146 सीटें मिलीं। भाजपा के 86 सांसद थे और वामदलों के पास 52 सांसद के समर्थन से राष्ट्रीय मोर्चे को 248 सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो गया और वी. पी.सिंह प्रधानमंत्री बने। दिसंबर 1980 से ठन्डे बस्ते में पड़ी मंडल आयोग के रिपोर्ट को 9 अगस्त, 1990 को आंशिक रूप से लागू कर इस देश के 52% से भी अधिक पिछड़े वर्ग को केंद्र सरकार की नौकरियों में 27% आरक्षण देकर समाजिक न्याय दिलाने का प्रयास किया, जिससे तमाम उच्च जातियां उनकी 'दुश्मन' बन बैठे, की उनकी मृत्यु पर भी उन्हें मिलने वाले सम्मान से वंचित किया गया।

और उधर 1991 में मंडल कमीशन का भीषण विरोध शुरू हो गया। परन्तु देश का बड़ा मौन प्रतिशत में भी इसकी प्रतिक्रिया हो रही थी और बिहार में लालू प्रसाद एवं उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव इसी मंडल आंदोलन के कारन मुख्य मंत्री बने और बने रहे। अतः वास्तव में मंडल कमीशन की सिफारिशों से भारतीय राजनीति और समाज में भूचाल आया।



आज भारतीय राजनीति में पिछड़े वर्ग की पहचान भी मंडल कमीशन से जुडी हुई है। यहाँ तक की राजनैतिक और ऐतिहासिक तौर पर आज़ाद भारत को मंडल पूर्व और मंडल पश्चात जाना जाने लगा है।

Monday, September 30, 2013

लालू प्रसाद को चारा घोटाले में सजा - भ्रष्टाचार की हार, सामाजिक न्याय को झटका:


लालू प्रसाद को चारा घोटाले में सजा - भ्रष्टाचार की हार, सामाजिक न्याय को झटका:

चारा घोटाले से जुड़े एक मामले में यहां सीबीआई की विशेष अदालत ने आज बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राजद नेता लालू प्रसाद तथा पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र समेत सभी 45 आरोपियों को दोषी करार दिया है।

वैसे यह राजनीती में अहंकार की पराजय भी है और सत्ता का मद में चूड़ नेताओं के लिए सबक भी है। लालू प्रसाद के विरुद्ध भी रहा हूँ और दो चुनावों में साथ भी दिया हूँ। इसलिए गीता सार को याद कर रहा हूँ - जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।

इसलिए अफ़सोस सिर्फ इस बात का है कि अक्सर सामाजिक न्याय को बुलंद करने की बात जो नेता करते हैं वे भटक जाते हैं और भ्रष्टाचार के दलदल में फंस जाते हैं। इससे सामाजिक न्याय का आन्दोलन कमजोर पड़ता है।

पर इसमें खेल कांग्रेस का है जिसके कसीदे रोज़ लालू प्रसाद पढ़ रहे थे। क्या लालू प्रसाद कांग्रेस की चाल नहीं समझ पाए, तब भी जब उन्हें बचाने के यू पी ए अध्यादेश ड्रामे को राहुल बाबा ने नॉनसेंस करार दिया? और उन घोटालों का क्या जिसमें कांग्रेसी नेता शीला दिक्षित, सुरेश कलमाड़ी, चिदंबरम, सलमान खुर्शीद, और स्वयं प्रधान मंत्री हैं और जिनकी आंच 10 जनपथ तक आती है?



अब कांग्रेस बिहार में नितीश कुमार को अपनाएगी, और नितीश भी जानते हैं की चारा घोटाले से बचाने के लिए फिलहाल उन्हें कांग्रेस की खवासी करनी होगी।
दरअसल, इस घोटाले के आरोपी एसबी सिन्हा के बयान के अनुसार चारा घोटाले का पैसा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी मिला था। एके झा ने सीबीआइ के विशेष न्यायाधीश आरआर त्रिपाठी की अदालत में बताया कि घोटाले के आरोपी एसबी सिन्हा से बयान लिया गया था। इसी बयान में इसकी पुष्टि हुई है। एसबी सिन्हा ने बताया था कि 1995 के लोकसभा चुनाव में चारा घोटाले के आरोपी विजय कुमार मल्लिक द्वारा एक करोड़ रुपये नीतीश कुमार को भिजवाया गया। यह पैसा उन्हें दिल्ली के एक होटल में दिया गया। नीतीश ने पैसे लेकर धन्यवाद भी कहा। कुछ दिनों बाद फिर घोटाले के आरोपी एसबी सिन्हा ने नौकर महेंद्र प्रसाद के हाथ 10 लाख रुपये पटना में विधायक सुधा श्रीवास्तव के घर पर नीतीश कुमार के लिए भेजे। घोटाले के आरोपी आरके दास ने भी कोर्ट में दिये बयान में बताया था कि उसने पांच लाख रुपये नीतीश कुमार को दिये हैं। नीतीश कुमार 1995 में समता पार्टी के नेता थे। वह एसबी सिन्हा को कहते थे कि पैसा नहीं देने पर मामला उजागर कर दिया जाएगा। तत्कालीन विधायक शिवानंद तिवारी, राधाकांत झा, रामदास एवं गुलशन अजमानी को भी पैसा देने की बात सामने आई।

Thursday, December 6, 2012

राज्य सभा में FDI पर अरूण जेटली का प्रभावी भाषण -

आज राज्य सभा में नेता विपक्ष अरुण जेटली ने सिलसिलेवार ढंग से FDI पर मनमोहन सरकार के सभी दावों को निरस्त कर दिया। उन्होंने ने याद दिलाया की यही डा मनमोहन सिंह ठीक एक दशक पहले 6 दिसंबर,2002 को FDI को ख़ारिज करते हुए सदन में कहा था की इससे छोटे दुकानदार, रेहड़ी पटरी वालों के रोज़गार पर विपरीत असर होगा, बेरोज़गारी बढ़ेगी और हिंदुस्तान के लिए उपयुक्त नहीं है। अंतराष्ट्रीय व्यापारिक रियायतों में हमेशा कोई भी देश बदले में कुछ रियायतें प्राप्त करता है, जो दिख नहीं रहा है। सबसे महत्वपूर्ण, लगभग 12 वर्षों से हिंदुस्तान पर रिटेल में FDI लागू करने का अमरीकी दबाब है, परन्तु पता नहीं क्यों पिछले सत्र तक 'आम सहमती' बनाने की बात करने वाली सरकार अचानक इसे लागू कर दिया?

अरुण जेटली ने 'सुधार' के पश्चिमी परिभाषा को चुनौती देते हुए कहा की अमरीका भारत में नौकरियों के आउटसोर्स किये जाने को समाप्त करने की बात कर जब चाहे 'सुधार' को ठेंगा दिखा देता है, लगभग सभी पश्चिमी देश अपने किसानों को वालमार्ट जैसे स्टोर से निपटने के लिए और बाज़ार में अपने उत्पाद की सही कीमत दिए जाने ले लिए प्रतिदिन हजारों डॉलर सब्सिडी देता है, परन्तु हमें मना किया जाता है। ऐसे 'सुधार' को लागू नहीं करना हीं राष्ट्र हित में है।

यह अत्यंत हास्यास्पद हीं है की सत्ता पक्ष इस मुद्दे को ऐसे प्रस्तुत कर रहा था जैसे वालमार्ट कोई धार्मिक या स्वयंसेवी संस्था हो जो भारत आकर यहाँ परोपकार और लोक-कल्याण के कार्य करना चाहती है, और विपक्ष उन्हें रोक रहा है। अगर कांग्रेस नीत यु पी ए सरकार को खुली छूट मिले तो यह कहते हुए की यह भवन बहुत पुरानी हो चुकी है, संसद भवन को हीं वालमार्ट को स्टोर खोलने के लिए बेच दें।

वैसे जो लोग लोक सभा में इस मुद्दे पर अरुण जेटली के विद्यार्थी जीवन के समकालीन लालू प्रसाद अथवा अन्य कांग्रेसी वकील कपिल सिब्बल का भाषण भी सुने हों उन्हें फर्क पता चल गया होगा।



ध्यान दिलाना चाहूँगा की जब लालू प्रसाद पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे, उन्ही दिनों श्रीराम कालेज ऑफ़ कॉमर्स के विद्यार्थी अरुण जेटली भी दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे। दोनों 1974 में कांग्रेस और इंदिरा गाँधी द्वारा जबरन आपातकाल लागू कर तमाम विपक्ष के नेताओं को जेल भेजे जाने के विरोध में जय प्रकाश नारायण के आन्दोलन में शामिल थे। दोनों नेता कनून की डिग्री प्राप्त किये हैं। और जब 1977 में जनता पार्टी का गठन हुआ तो अरुण जेटली जनता पार्टी के सबसे युवा राष्ट्रिय कार्यकारिणी के सदस्य थे। परन्तु 1977 वे चुनाव नहीं लड़े। लालू प्रसाद को 1977 में बिहार में जनता पार्टी संसदीय दल के अध्यक्ष स्व बी पी मंडल ने, जय प्रकाश बाबु के अनुशंसा पर और बाबु सत्येन्द्र नारायण सिंह और कर्पूरी ठाकुर के आपत्ति के बावजूद, 'राजपूत सीट' छपरा से लोक सभा का टिकट दिया जहाँ से वे छोटे उम्र में सांसद चुने गए।

Saturday, January 14, 2012

चुडा-दही और मानसी का कुत्ता.

चुडा-दही और मानसी का कुत्ता.

बात १९९९ लोक सभा चुनाव की है. मधेपुरा लोक सभा चुनाव क्षेत्र से मैं नव-गठित पार्टी एन सी पी से रा ज द अध्यक्ष लालू प्रसाद व जद(यु) अध्यक्ष शरद यादव के मुकाबले खड़ा था. दरअसल कुछ वर्षों से मेरे साथी और मैं, "मधेपुरा युवा मोर्चा" के तत्वाधान में 'बहरी नेता भगाओ - मधेपुरा बचाओ' मुहीम पर थे. हमारा कहना था की लालू प्रसाद और शरद यादव दोनों मधेपुरा के नहीं हैं, और राजनैतिक मलाई खाने के लिए मधेपुरा से चुनाव लड़ते है, जिससे मधेपुरा की अस्मिता को ठेस पहुंची है और स्थानीय नेतृत्व पूरी तरह कुंठित हो गयी है. सांसद के तौर पर इन दोनों ने मधेपुरा और उसके लोगों की अवहेलना ही की है.

दो राजनैतिक सांढ़ जब लड़ते थे तो तर्क और मुद्दे उस धूल मैं खो जाते थे और इनके निजी समर्थन पर सभी बहस सिमट कर रह जाती थी. उनके बीच अपनी बात को मैं एक वाकया सुना कर कहता था.

उन दिनों कोसी क्षेत्र के लोग गंगा-स्नान के लिए मानसी जाते थे. मानसी खगडिया के पास एक प्रमुख रेल जंक्सन है. गंगा-स्नान के बाद लोग चुडा- दही खाने के लिए प्लेटफार्म पर बैठते थे. चुडा- दही पडोसने के साथ ही कहीं से दो कुत्ते आस-पास बैठ जाते थे. अब जब तक ये चुप-चाप थे तो खाने वालों को क्या आपत्ति हो सकती थी. परन्तु पहला कौड़ लेने के साथ ही कुत्ते एक दूसरे पर गुर्राने लगते थे. गुर्राते-गुर्राते दोनों एक दुसरे से भिड जाते थे, और कुछ पलों में गुथम-गुथ हो जाते थे. उसके बाद लड़ते-लड़ते वे चुडा-दही पर गिर जाते थे.

कुत्ता से ख़राब किया हुआ चुडा-दही कौन खायेगा! गलियां देते हुए लोग चुडा-दही को छोड़ कर हट जाते थे. जैसे लोग चुडा-दही को छोड़ कर हटते थे, दोनों कुत्ते बिना किसी झगडे के मिल-बाँट कर चुडा-दही खा लेते थे, और सिल-सिला चलता रहता था.

मैं यही समझाने की कोशिश करता था कि मधेपुरा के लोग जानें कि अगर चुडा-दही मधेपुरा था तो वे कुत्ते कौन हैं?