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New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....
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Sunday, July 28, 2013

आरक्षण पर भ्रम -


आरक्षण के लागू किये जाने में कई तरह के भ्रम पैदा किये जाते रहें हैं और कई बार ऐसा जान-बूझ कर किया जाता है, जिससे उल्टा आरक्षण लागू होता है। उधारण के लिए 100 पदों पर अगर नियुक्ति होनी है तो पहले 50 पर प्रतियोगिता में सफल कोई भी उम्मीदवार भले वह सामान्य, अनुसूचित जाति / जनजाति, पिछड़े वर्ग से हो शामिल होंगे। उसके बाद के 50 पदों पर 27% पर पिछड़े वर्ग और फिर 22.5 % पर अनुसूचित जाति। जनजाति नियुक्त होंगे।

परन्तु अक्सर पहले सभी आवेदकों में से अनुसूचित जाति/ जनजाति के 22.5 % और पिछड़े वर्ग के 27% छाँट दिए जाते हैं और बचे 50.5 % के लिए उन्हें अलग रखा जाता है जिससे सामान्य वर्ग के लगभग 15% उच्च जातियों के लिए यह 50.5 % एक तरह से अरक्षित हो जाता है।

मंडल कमीशन के रिपोर्ट दिए जाने के समय बिहार में कर्पूरी ठाकुर द्वारा पिछड़े वर्ग के आरक्षण के लिए लगभग इसी तरह व्याख्या की गयी थी, और उधर कर्पूरी ठाकुर के उच्च जाति के पक्ष में किये गए क्रियान्वन के बावजूद उनके विरुद्ध इस पर राजनैतिक घमाशन शुरू हो गया था। इसी दौरान कर्पूरी फार्मूला के तहत मंडल कमीशन के अनुशंसाओं से अलग हटकर एनेक्सचर 1 और 2 लागू किया गया। परन्तु उनके बाद जब रामसुंदर दास बिहार के मुख्यमंत्री बने तो बी पी मंडल के सलाह पर उन्होंने इस गलती की सुधार की।

इस विषय पर मंडल कमीशन के रिपोर्ट में भी स्पष्टीकरण देते हुए महत्वपूर्ण अनुशंसा की गयी है और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों और भारत सरकार के कार्मिक विभाग के आदेश पर स्थिति स्पष्ट है।

मंडल कमीशन की रिपोर्ट इस पर एक महत्वपूर्ण अनुशंसा करते हुए कहता है कि ^ अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित अभ्यर्थियों को एक खुली प्रतियोगिता में योग्यता के आधार पर भर्ती 27 प्रतिशत से उनके आरक्षण कोटे में समायोजित नहीं किया जाना चाहिए।^
(Candidates belonging to OBC recruited based on merit in an open competition should not be adjusted against their reservation quota of 27 per cent.)

इधर भारत सरकार के कार्मिक विभाग के 13 अगस्त, 1990 के आदेश संख्या "No. 36012/31/90-Estt. (SCT) के अनुसार ^ (iii) SEBC से संबंधित अभ्यर्थियों को सामान्य उम्मीदवारों के लिए निर्धारित एक ही मानकों पर एक खुली प्रतियोगिता में योग्यता के आधार पर भर्ती होने पर 27 प्रतिशत के आरक्षण कोटे में समायोजित नहीं किया जाएगा।
(iii ) Candidates belonging to SEBC recruited on the basis of merit in an open competition on the same standards prescribed for the general candidates shall not be adjusted against the reservation quota of 27 percent .


उम्मीद है इन मापदंडों पर ही आरक्षण नीति को क्रियान्वित किया जायेगा।

Saturday, July 27, 2013

सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर के विवादास्पद फैसले -


सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर के विवादास्पद फैसले -

जज और खास तौर से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को विवाद से परे होना चाहिए। इसके पहले 22 सितम्बर, 2012 के अपने Facebook पोस्ट में अल्तमस कबीर साहब के ऍफ़ डी आई पर सरकार समर्थक खुले विचारों पर मैंने टिप्पणी की थी।

अब भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर अपने कार्यालय demit करने से कुछ घंटे पहले दिए गए शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश और आरक्षण पर दो महत्वपूर्ण फैसले के कारण ताजा विवाद में फंस गए हैं।

पहले फैसले में अल्तमस कबीर ने कहा है की अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में सुपर स्पेशियलिटी स्तर पर आरक्षण की कोई छूट नहीं किया जा सकता है। मेरिट केवल मापदंड होना चाहिए। कार्यकर्ता वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि कबीर साहब के फैसले में संभवतः हितों का टकराव था क्योंकि मुख्य न्यायाधीश महोदय उसी समय अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान सुपर स्पेशियलिटी पदों में आरक्षण के मुद्दे से प्रभावित होने वाले डाक्टरों के इलाज़ में थे। वैसे भी पद छोड़ने से कुछ घंटे पहले ऐसे महत्वपूर्ण फैसले को टाला जा सकता था।

दूसरा फैसला भारतीय चिकित्सा परिषद द्वारा देश के सभी मेडिकल और बीडीएस पाठ्यक्रमों के लिए एक एकल राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा को रद्द करने को लेकर है। इस फैसले से सरकारी मेडिकल कालेजों के प्रवेश प्रक्रिया में फेर बदल से सरकार और आम लोगों का नुकसान हुआ, वहीं निजी मेडिकल कालेजों की चंडी हो गयी है।
पर विवाद इस बात पर था की यह फैसला निजी मेडिकल कालेजों को लीक कर दिया गया था जिससे कपिटेशन फीस में वे भरी रकम कमा लिए। एक कानूनी वेबसाइट ने तो यह भी पहले ही कह दिया था की तीन न्यायाधीशों में एक कौन इस फैसले के खिलाफ जायेगा।

सरकार को चाहिये की इन विवादास्पद फैसलों पर पुनर्विचार याचिका दाखिल करें। लेकिन क्या भ्रष्टाचार और सामाजिक न्याय विरोधी यू पी ए सरकार और उसके कानून मंत्री कपिल सिब्बल ऐसा करेंगे? शायद नहीं।

http://economictimes.indiatimes.com/photo/21155845.cms

My Facebook Post of 22nd September, 2012 -

Justices are freely praising 'reforms'. So will they not be prejudiced in their dealing cases on these issues? Is it not against judicial propriety?
Former Chief Jusitice Y K Sabharwal had observed in ' Canons of Judicial Ethics
- Speech as part of MC Setalvad Memorial Lectures Series' -
" Almost every public servant is governed by certain basic Code of Conduct
which includes expectation that he shall.... not take part in party politics; not be
associated with activities that are pre-judicial to the interests of the sovereignty
and integrity of India or public order; ...A just and humane Judge will always be non-partisan...... He would be above narrow considerations and not prone to external influences......Regard for the public welfare is the highest law (SALUS
POPULI EST SUPREMA LEX)....."
Hoping that Justice is seen to be done.

CJI S.H. Kapadia and CJI-designate Altamas Kabir praise Prime ...
indiatoday.intoday.in › India › North‎

Tuesday, July 24, 2012

छत्रपति शाहूजी महाराज - रियासत कोल्हापुर के शासक

इतिहास के पन्ने से....आरक्षण के बारे में दो शब्द...
विंध्य के दक्षिण में प्रेसीडेंसी क्षेत्रों और रियासतों के एक बड़े क्षेत्र में पिछड़े वर्गो (बीसी) के लिए आजादी से बहुत पहले आरक्षण की शुरुआत हुई थी. महाराष्ट्र में कोल्हापुर के महाराजा छत्रपति साहूजी महाराज ने 1902 में पिछड़े वर्ग से गरीबी दूर करने और राज्य प्रशासन में उन्हें उनकी हिस्सेदारी देने के लिए आरक्षण का प्रारम्भ किया था. कोल्हापुर राज्य में पिछड़े वर्गों/समुदायों को नौकरियों में आरक्षण देने के लिए 1902 की अधिसूचना जारी की गयी थी. यह अधिसूचना भारत में दलित वर्गों के कल्याण के लिए आरक्षण उपलब्ध कराने वाला पहला सरकारी आदेश है.
पिछड़े वर्गों का आंदोलन भी सबसे पहले दक्षिण भारत, विशेषकर तमिलनाडु में जोर पकड़ा. देश के कुछ समाज सुधारकों के सतत प्रयासों से अगड़े वर्ग द्वारा अपने और अछूतों के बीच बनायी गयी दीवार पूरी तरह से ढह गयी; उन सुधारकों में शामिल हैं रेत्तामलई श्रीनिवास पेरियार, अयोथीदास पंडितर, ज्योतिबा फुले, बाबा साहेब अम्बेडकर, छत्रपति साहूजी महाराज और अन्य.

  • 1901- महाराष्ट्र के सामंती रियासत कोल्हापुर में शाहू महाराज द्वारा आरक्षण शुरू किया गया. सामंती बड़ौदा और मैसूर की रियासतों में आरक्षण पहले से लागू थे.
  • 1979 - सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए मंडल आयोग को स्थापित किया गया. आयोग के पास उपजाति, जो अन्य पिछड़े वर्ग (ओबीसी (OBC)) कहलाती है, का कोई सटीक आंकड़ा था और ओबीसी की 52% आबादी का मूल्यांकन करने के लिए 1930 की जनगणना के आंकड़े का इस्तेमाल करते हुए पिछड़े वर्ग के रूप में 1,257 समुदायों का वर्गीकरण किया.
  • 1980 - आयोग ने एक रिपोर्ट पेश की, और मौजूदा कोटा में बदलाव करते हुए 22% से 49.5% वृद्धि करने की सिफारिश की.
  • 1990 मंडल आयोग की सिफारिशें विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा सरकारी नौकरियों में लागू किया गया.
छत्रपति साहू महाराज (अंग्रेज़ी: Chhatrapati Shahu Maharaj, जन्म- 26 जुलाई, 1874; मृत्यु- 10 मई, 1922, मुम्बई) को एक भारत में सच्चे प्रजातंत्रवादी और समाज सुधारक के रूप में जाना जाता था। वे कोल्हापुर के इतिहास में एक अमूल्य मणि के रूप में आज भी प्रसिद्ध हैं। छत्रपति साहू महाराज ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने राजा होते हुए भी दलित और शोषित वर्ग के कष्ट को समझा और सदा उनसे निकटता बनाए रखी। उन्होंने दलित वर्ग के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा प्रदान करने की प्रक्रिया शुरू की थी। गरीब छात्रों के छात्रावास स्थापित किये और बाहरी छात्रों को शरण प्रदान करने के आदेश दिए। साहू महाराज के शासन के दौरान 'बाल विवाह' पर ईमानदारी से प्रतिबंधित लगाया गया। उन्होंने अंतरजातिय विवाह और विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में समर्थन की आवाज उठाई थी। इन गतिविधियों के लिए महाराज साहू को कड़ी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। साहू महाराज ज्योतिबा फुले से प्रभावित थे और लंबे समय तक 'सत्य शोधक समाज', फुले द्वारा गठित संस्था के संरक्षण भी रहे।
छत्रपति साहू महाराज का जन्म 26 जुलाई, 1874 ई. को हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीमंत जयसिंह राव आबासाहब घाटगे था। छत्रपति साहू महाराज का बचपन का नाम 'यशवंतराव' था। छत्रपति शिवाजी महाराज (प्रथम) के दूसरे पुत्र के वंशज शिवाजी चतुर्थ कोल्हापुर में राज्य करते थे। ब्रिटिश षडयंत्र और अपने ब्राह्मण दीवान की गद्दारी की वजह से जब शिवाजी चतुर्थ का कत्ल हुआ तो उनकी विधवा आनंदीबाई ने अपने जागीरदार जयसिंह राव आबासाहेब घाटगे के पुत्र यशवंतराव को मार्च, 1884 ई. में गोद ले लिया। बाल्य-अवस्था में ही यशवंतराव को साहू महाराज की हैसियत से कोल्हापुर रियासत की राजगद्दी को सम्भालना पड़ा। यद्यपि राज्य का नियंत्रण उनके हाथ में काफ़ी समय बाद अर्थात 2 अप्रैल, सन 1894 में आया था।
छत्रपति साहू महाराज का विवाह बड़ौदा के मराठा सरदार खानवीकर की बेटी लक्ष्मीबाई से हुआ था।
साहू महाराज की शिक्षा राजकोट के 'राजकुमार महाविद्यालय' और धारवाड़ में हुई थी। वे 1894 ई. में कोल्हापुर रियासत के राजा बने। उन्होंने देखा कि जातिवाद के कारण समाज का एक वर्ग पिस रहा है। अतः उन्होंने दलितों के उद्धार के लिए योजना बनाई और उस पर अमल आरंभ किया। छत्रपति साहू महाराज ने दलित और पिछड़ी जाति के लोगों के लिए विद्यालय खोले और छात्रावास बनवाए। इससे उनमें शिक्षा का प्रचार हुआ और सामाजिक स्थिति बदलने लगी। परन्तु उच्च वर्ग के लोगों ने इसका विरोध किया। वे छत्रपति साहू महाराज को अपना शत्रु समझने लगे। उनके पुरोहित तक ने यह कह दिया कि- "आप शूद्र हैं और शूद्र को वेद के मंत्र सुनने का अधिकार नहीं है। छत्रपति साहू महाराज ने इस सारे विरोध का डट कर सामना किया।
साहू महाराज हर दिन बड़े सबेरे ही पास की नदी में स्नान करने जाया करते थे। परम्परा से चली आ रही प्रथा के अनुसार, इस दौरान ब्राह्मण पंडित मंत्रोच्चार किया करता था। एक दिन बंबई से पधारे प्रसिद्ध समाज सुधारक राजाराम शास्त्री भागवत भी उनके साथ हो लिए थे। महाराजा कोल्हापुर के स्नान के दौरान ब्राह्मण पंडित द्वारा मंत्रोच्चार किये गए श्लोक को सुनकर राजाराम शास्त्री अचम्भित रह गए। पूछे जाने पर ब्राह्मण पंडित ने कहा की- "चूँकि महाराजा शूद्र हैं, इसलिए वे वैदिक मंत्रोच्चार न कर पौराणिक मंत्रोच्चार करते है।" ब्राह्मण पंडित की बातें साहू महाराज को अपमानजनक लगीं। उन्होंने इसे एक चुनौती के रूप में लिया। महाराज साहू के सिपहसालारों ने एक प्रसिद्ध ब्राह्मण पंडित नारायण भट्ट सेवेकरी को महाराजा का यज्ञोपवीत संस्कार करने को राजी किया। यह सन 1901 की घटना है। जब यह खबर कोल्हापुर के ब्राह्मणों को हुई तो वे बड़े कुपित हुए। उन्होंने नारायण भट्ट पर कई तरह की पाबंदी लगाने की धमकी दी। तब इस मामले पर साहू महाराज ने राज-पुरोहित से सलाह ली, किंतु राज-पुरोहित ने भी इस दिशा में कुछ करने में अपनी असमर्थता प्रगट कर दी। इस पर साहू महाराज ने गुस्सा होकर राज-पुरोहित को बर्खास्त कर दिया।
आरक्षण की व्यवस्था:
सन 1902 के मध्य में साहू महाराज इंग्लैण्ड गए हुए थे। उन्होंने वहीं से एक आदेश जारी कर कोल्हापुर के अंतर्गत शासन-प्रशासन के 50 प्रतिशत पद पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित कर दिये। महाराज के इस आदेश से कोल्हापुर के ब्राह्मणों पर जैसे गाज गिर गयी। उल्लेखनीय है कि सन 1894 में, जब साहू महाराज ने राज्य की बागडोर सम्भाली थी, उस समय कोल्हापुर के सामान्य प्रशासन में कुल 71 पदों में से 60 पर ब्राह्मण अधिकारी नियुक्त थे। इसी प्रकार लिपिकीय पद के 500 पदों में से मात्र 10 पर गैर-ब्राह्मण थे। साहू महाराज द्वारा पिछड़ी जातियों को अवसर उपलब्ध कराने के कारण सन 1912 में 95 पदों में से ब्राह्मण अधिकारियों की संख्या अब 35 रह गई थी। सन 1903 में साहू महाराज ने कोल्हापुर स्थित शंकराचार्य मठ की सम्पत्ति जप्त करने का आदेश दिया। दरअसल, मठ को राज्य के ख़ज़ाने से भारी मदद दी जाती थी। कोल्हापुर के पूर्व महाराजा द्वारा अगस्त, 1863 में प्रसारित एक आदेश के अनुसार, कोल्हापुर स्थित मठ के शंकराचार्य को अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति से पहले महाराजा से अनुमति लेनी आवश्यक थी, परन्तु तत्कालीन शंकराचार्य उक्त आदेश को दरकिनार करते हुए संकेश्वर मठ में रहने चले गए थे, जो कोल्हापुर रियासत के बाहर था। 23 फ़रवरी, 1903 को शंकराचार्य ने अपने उत्तराधिकारी की नियुक्ति की थी। यह नए शंकराचार्य लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के क़रीबी थे। 10 जुलाई, 1905 को इन्हीं शंकराचार्य ने घोषणा की कि- "चूँकि कोल्हापुर भोसले वंश की जागीर रही है, जो कि क्षत्रिय घराना था। इसलिए राजगद्दी के उत्तराधिकारी छत्रपति साहू महाराज स्वाभविक रूप से क्षत्रिय हैं।"
स्कूलों व छात्रावासों की स्थापना:
मंत्री ब्राह्मण हो और राजा भी ब्राह्मण या क्षत्रिय हो तो किसी को कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन राजा की कुर्सी पर वैश्य या फिर शूद्र शख्स बैठा हो तो दिक्कत होती थी। छत्रपति साहू महाराज क्षत्रिय नहीं, शूद्र मानी गयी जातियों में आते थे। कोल्हापुर रियासत के शासन-प्रशासन में पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व नि:संदेह उनकी अभिनव पहल थी। छत्रपति साहू महाराज ने सिर्फ यही नहीं किया, अपितु उन्होंने पिछड़ी जातियों समेत समाज के सभी वर्गों मराठा, महार, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ईसाई, मुस्लिम और जैन सभी के लिए अलग-अलग सरकारी संस्थाएँ खोलने की पहल की। साहू महाराज ने उनके लिए स्कूल और छात्रावास खोलने के आदेश जारी किये। जातियों के आधार पर स्कूल और छात्रावास असहज लग सकते हैं, किंतु नि:संदेह यह अनूठी पहल थी उन जातियों को शिक्षित करने के लिए, जो सदियों से उपेक्षित थीं। उन्होंने दलित-पिछड़ी जातियों के बच्चों की शिक्षा के लिए ख़ास प्रयास किये थे। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई। साहू महाराज के प्रयासों का परिणाम उनके शासन में ही दिखने लग गया था। स्कूल और कॉलेजों में पढ़ने वाले पिछड़ी जातियों के लड़के-लड़कियों की संख्या में उल्लेखनीय प्रगति हुई थी। कोल्हापुर के महाराजा के तौर पर साहू महाराज ने सभी जाति और वर्गों के लिए काम किया। उन्होंने 'प्रार्थना समाज' के लिए भी काफ़ी काम किया था। 'राजाराम कॉलेज' का प्रबंधन उन्होंने 'प्रार्थना समाज' को दिया था।
कथन:
छत्रपति साहू महाराज के कार्यों से उनके विरोधी भयभीत थे और उन्हें जान से मारने की धमकियाँ दे रहे थे। इस पर उन्होंने कहा था कि- "वे गद्दी छोड़ सकते हैं, मगर सामाजिक प्रतिबद्धता के कार्यों से वे पीछे नहीं हट सकते।"
साहू महाराज जी ने 15 जनवरी, 1919 के अपने आदेश में कहा था कि- "उनके राज्य के किसी भी कार्यालय और गाँव पंचायतों में भी दलित-पिछड़ी जातियों के साथ समानता का बर्ताव हो, यह सुनिश्चित किया जाये। उनका स्पष्ट कहना था कि- "छुआछूत को बर्दास्त नहीं किया जायेगा। उच्च जातियों को दलित जाति के लोगों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही चाहिए। जब तक आदमी को आदमी नहीं समझा जायेगा, समाज का चौतरफा विकास असम्भव है।"
15 अप्रैल, 1920 को नासिक में 'उदोजी विद्यार्थी' छात्रावास की नीव का पत्थर रखते हुए साहू महाराज ने कहा था कि- "जातिवाद का अंत ज़रूरी है. जाति को समर्थन देना अपराध है। हमारे समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा जाति है। जाति आधारित संगठनों के निहित स्वार्थ होते हैं। निश्चित रूप से ऐसे संगठनों को अपनी शक्ति का उपयोग जातियों को मजबूत करने के बजाय इनके खात्मे में करना चाहिए।
समानता की भावना:
छत्रपति साहू महाराज ने कोल्हापुर की नगरपालिका के चुनाव में अछूतों के लिए भी सीटें आरक्षित की थी। यह पहला मौका था की राज्य नगरपालिका का अध्यक्ष अस्पृश्य जाति से चुन कर आया था। उन्होंने हमेशा ही सभी जाति वर्गों के लोगों को समानता की नज़र से देखा। साहू महाराज ने जब देखा कि अछूत-पिछड़ी जाति के छात्रों की राज्य के स्कूल-कॉलेजों में पर्याप्त संख्या हैं, तब उन्होंने एक आदेश से इनके लिए खुलवाये गए पृथक स्कूल और छात्रावासों को बंद करा करवा दिया और उन्हें सामान्य व उच्च जाति के छात्रों के साथ ही पढने की सुविधा प्रदान की।
भीमराव अम्बेडकर के मददगार:
ये छत्रपति साहू महाराज ही थे, जिन्होंने 'भारतीय संविधान' के निर्माण में महत्त्वपूर्व भूमिका निभाने वाले भीमराव अम्बेडकर को उच्च शिक्षा के लिए विलायत भेजने में अहम भूमिका अदा की। महाराजाधिराज को बालक भीमराव की तीक्ष्ण बुद्धि के बारे में पता चला तो वे खुद बालक भीमराव का पता लगाकर मुम्बई की सीमेंट परेल चाल में उनसे मिलने गए, ताकि उन्हें किसी सहायता की आवश्यकता हो तो दी जा सके। साहू महाराज ने डॉ. भीमराव अम्बेडकर के 'मूकनायक' समाचार पत्र के प्रकाशन में भी सहायता की। महाराजा के राज्य में कोल्हापुर के अन्दर ही दलित-पिछड़ी जातियों के दर्जनों समाचार पत्र और पत्रिकाएँ प्रकाशित होती थीं। सदियों से जिन लोगों को अपनी बात कहने का हक नहीं था, महाराजा के शासन-प्रशासन ने उन्हें बोलने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी थी।
निधन:
छत्रपति साहूजी महाराज का निधन 10 मई, 1922 मुम्बई में हुआ। महाराज ने पुनर्विवाह को क़ानूनी मान्यता दी थी। उनका समाज के किसी भी वर्ग से किसी भी प्रकार का द्वेष नहीं था। साहू महाराज के मन में दलित वर्ग के प्रति गहरा लगाव था। उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की दिशा में जो क्रन्तिकारी उपाय किये थे, वह इतिहास में याद रखे जायेंगे।