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New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....

Sunday, March 23, 2014

शहीद दिवस - 23 मार्च : भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को श्रद्धांजलि।


सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है ।
देख सकता है तो देख ले तू भी ऐ आसमान ,
हौसला ये देख कर क़ातिल बड़ी मुश्किल में है।।

23 मार्च, 1931 के तड़के सुबह भगत सिंह , सुखदेव थापड़ और शिवराम राजगुरु को लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी दे दी गई थी।

सरदार भगतसिंह का नाम अमर शहीदों में सबसे प्रमुख रूप से लिया जाता है। भगतसिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को पंजाब के जिला लायलपुर में बंगा गांव (जो अभी पाकिस्तान में है) के एक देशभक्त सिख परिवार में हुआ था,जिसका अनुकूल प्रभाव उन पर पड़ा था। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था।
भगत सिंह भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। इन्होंने केन्द्रीय संसद (सेण्ट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया। जिसके फलस्वरूप इन्हें २३ मार्च, १९३१ को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फाँसी पर लटका दिया गया। सारे देश ने उनके बलिदान को बड़ी सिद्दत से याद करते हैं। काकोरी काण्ड में ४ क्रान्तिकारियों को फाँसी व १६ अन्य को कारावास की सजाओं से भगत सिंह इतने अधिक उद्विग्न हुए कि उन्होंने १९२८ में अपनी पार्टी नौजवान भारत सभा का हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन में विलय कर दिया और उसे एक नया नाम दिया हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन। पहले लाहौर में साण्डर्स-वध और उसके बाद दिल्ली की केन्द्रीय असेम्बली में चन्द्रशेखर आजाद व पार्टी के अन्य सदस्यों के साथ बम-विस्फोट करके ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध खुले विद्रोह को बुलन्दी प्रदान की।
सुखदेव थापर का जन्म पंजाब के शहर लायलपुर में श्रीयुत् रामलाल थापर व श्रीमती रल्ली देवी के घर विक्रमी सम्वत १९६४ के फाल्गुन मास में शुक्ल पक्ष सप्तमी तदनुसार १५ मई १९०७ को अपरान्ह पौने ग्यारह बजे हुआ था । जन्म से तीन माह पूर्व ही पिता का स्वर्गवास हो जाने के कारण इनके ताऊ अचिन्तराम ने इनका पालन पोषण करने में इनकी माता को पूर्ण सहयोग किया। सुखदेव की तायी जी ने भी इन्हें अपने पुत्र की तरह पाला। इन्होंने भगत सिंह, कॉमरेड रामचन्द्र एवम् भगवती चरण बोहरा के साथ लाहौर में नौजवान भारत सभा का गठन किया था ।
लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिये जब योजना बनी तो साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा राजगुरु का पूरा साथ दिया था। यही नहीं, सन् १९२९ में जेल में कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार किये जाने के विरोध में राजनीतिक बन्दियों द्वारा की गयी व्यापक हड़ताल में बढ-चढकर भाग भी लिया था । गान्धी-इर्विन समझौते के सन्दर्भ में इन्होंने एक खुला खत गान्धी के नाम अंग्रेजी में लिखा था जिसमें इन्होंने महात्मा जी से कुछ गम्भीर प्रश्न किये थे। उनका उत्तर यह मिला कि निर्धारित तिथि और समय से पूर्व जेल मैनुअल के नियमों को दरकिनार रखते हुए २३ मार्च १९३१ को सायंकाल ७ बजे सुखदेव, राजगुरु और भगत सिंह तीनों को लाहौर सेण्ट्रल जेल में फाँसी पर लटका कर मार डाला गया। इस प्रकार भगत सिंह तथा राजगुरु के साथ सुखदेव भी मात्र २३वर्ष की आयु में शहीद हो गये ।
हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी की पहली बैठक में सुखदेव शामिल नहीं थे। बैठक में भगत सिंह ने कहा कि सेंट्रल असेंबली में बम वह फेंकेंगे। लेकिन नेतृत्व संभाल रहे चंद्रशेखर ‌‌‌आज़ाद ने उन्हें इजाजत नहीं दी और कहा कि पार्टी को उनकी बहुत जरूरत है। दूसरी बैठक में सुखदेव पहुंचे। ‌‌‌उन्होंने बम न फेंकने पर भगत सिंह को ताना दिया। उन्होंने कहा कि तुम्हारे अंदर जिंदगी जीने की ललक जाग उठी है इसलिए तुम बम नहीं फेंकना चाहते। इस पर भगत सिंह ने कहा कि बम वह ही फेंकेंगे और अपनी गिरफ्तारी भी देंगे। बैठक के बाद अगले दिन जब सब मिले तो सुखदेव की आंखों पर सूजन थी। वे भगत को ‌‌‌ ताना देकर रातभर सो नहीं पाए। उन्हें अहसास हो गया कि गिरफ्तारी का मतलब फांसी है। सुखदेव ने भगत से माफी मांगी। सुखदेव ने सांडर्स हत्याकांड में भगत सिंह और राजगुरु का साथ दिया। उन्हें भी भगत और राजगुरु के साथ फांसी की सजा सुनाई गई थी।
शिवराम हरि राजगुरु (मराठी: शिवराम हरी राजगुरू, जन्म:१९०८-मृत्यु:१९३१) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे । इन्हें भगत सिंह और सुखदेव के साथ २३ मार्च १९३१ को फाँसी पर लटका दिया गया था । भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में राजगुरु की शहादत एक महत्वपूर्ण घटना थी ।
शिवराम हरि राजगुरु का जन्म भाद्रपद के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी सम्वत् १९६५ (विक्रमी) तदनुसार सन् १९०८ में पुणे जिला के खेडा गाँव में हुआ था । ६ वर्ष की आयु में पिता का निधन हो जाने से बहुत छोटी उम्र में ही ये वाराणसी विद्याध्ययन करने एवं संस्कृत सीखने आ गये थे । इन्होंने हिन्दू धर्म-ग्रंन्थों तथा वेदो का अध्ययन तो किया ही लघु सिद्धान्त कौमुदी जैसा क्लिष्ट ग्रन्थ बहुत कम आयु में कण्ठस्थ कर लिया था। इन्हें कसरत (व्यायाम) का बेहद शौक था और छत्रपति शिवाजी की छापामार युद्ध-शैली के बडे प्रशंसक थे ।
वाराणसी में विद्याध्ययन करते हुए राजगुरु का सम्पर्क अनेक क्रान्तिकारियों से हुआ । चन्द्रशेखर आजाद से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से तत्काल जुड़ गये। आजाद की पार्टी के अन्दर इन्हें रघुनाथ के छद्म-नाम से जाना जाता था; राजगुरु के नाम से नहीं। पण्डित चन्द्रशेखर आज़ाद, सरदार भगत सिंह और यतीन्द्रनाथ दास आदि क्रान्तिकारी इनके अभिन्न मित्र थे। राजगुरु एक अच्छे निशानेबाज भी थे। साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव का पूरा साथ दिया था जबकि चन्द्रशेखर आज़ाद ने छाया की भाँति इन तीनों को सामरिक सुरक्षा प्रदान की थी।
२३ मार्च १९३१ को इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेण्ट्रल जेल में फाँसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को हिन्दुस्तान के अमर शहीदों की सूची में अहमियत के साथ दर्ज करा दिया ।

Tuesday, January 14, 2014

मकर संक्रान्ति की शुभकामनायें- क्या अब सक्रांति १५ जनवरी को होगा?


मकर संक्रान्ति की शुभकामनायें-
क्या अब सक्रांति १५ जनवरी को होगा?


मकर संक्रान्ति हिन्दुओं का प्रमुख पर्व है। मकर संक्रान्ति पूरे भारत और नेपाल में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। पौष मास में जब सूर्य मकर राशि पर आता है तभी इस पर्व को मनाया जाता है। यह त्योहार जनवरी माह के चौदहवें या पन्द्रहवें दिन ही पड़ता है क्योंकि इसी दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ मकर राशि में प्रवेश करता है। मकर संक्रान्ति के दिन से ही सूर्य की उत्तरायण गति भी प्रारम्भ होती है। इसलिये इस पर्व को कहीं-कहीं उत्तरायणी भी कहते हैं। तमिलनाडु में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में मनाते हैं जबकि कर्नाटक, केरल तथा आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं। मकर संक्रांति ऐसा दिन है, जबकि धरती पर अच्छे दिन की शुरुआत होती है। ऐसा इसलिए कि सूर्य दक्षिण के बजाय अब उत्तर को गमन करने लग जाता है।

जब तक सूर्य पूर्व से दक्षिण की ओर गमन करता है तब तक उसकी किरणों का असर खराब माना गया है, लेकिन जब वह पूर्व से उत्तर की ओर गमन करते लगता है तब उसकी किरणें सेहत और शांति को बढ़ाती हैं।

भगवान श्रीकृष्ण ने भी उत्तरायण का महत्व बताते हुए गीता में कहा है कि उत्तरायण के छह मास के शुभ काल में, जब सूर्य देव उत्तरायण होते हैं और पृथ्वी प्रकाशमय रहती है तो इस प्रकाश में शरीर का परित्याग करने से व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता, ऐसे लोग ब्रह्म को प्राप्त हैं। इसके विपरीत सूर्य के दक्षिणायण होने पर पृथ्वी अंधकारमय होती है और इस अंधकार में शरीर त्याग करने पर पुनः जन्म लेना पड़ता है।



कुछ ज्योतिषियों का मनना जै कि मकर संक्राति का पर्व 15 जनवरी माघ कृष्ण पक्ष सप्तमी को मनाया जाएगा। ज्योतिषाचार्य डॉ. उद्धव श्याम केसरी ने बताया कि भारत के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्यो व पंचागों के आधार पर पृथ्वी में कपंन आने से मकर संक्राति की तारीख में अंतर पड़ रहा है।

हर चौथे वर्ष सूर्य एवं पृथ्वी के बीच 20 व 22 मिनट के अंतर आने से यह बढ़ते हुए 60 से 70 वर्षों में एक दिन के बराबर हो जाता है। आने वाले सालों में यह पर्व 15 जनवरी को पड़ेगा।

मकर संक्राति पर सू्‌र्य देव के मकर राशि में प्रवेश करने के बाद ही पुण्यकारी फल मिलता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, तिल से बनी हुई वस्तुओं का दान एवं सेवन, जप,तप, पूजा पाठ विशेष फलदायी व पुण्यकारी होता है।

वहीं इस पर्व को पंजाब में लोहड़ी, दक्षिण भारत में पोंगल, यूपी व बिहार में खिचड़ी के नाम से जाना जाता है।

Sunday, January 12, 2014

स्वामी विवेकानन्द की 151 वे जयन्ती पर उनका नमन - Swami Vivekanand Remembered.


जब सन्‌ १८९३ में शिकागो (अमरीका) में विश्व धर्म परिषद् में स्वामी विवेकानन्द भारत के प्रतिनिधि के रूप में अपने भाषण की शुरुआत "मेरे अमरीकी भाइयो एवं बहनों" के साथ कि तो उनके संबोधन के इस प्रथम वाक्य ने सबका दिल जीत लिया था। तीन वर्ष वे अमरीका में रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान की। उनकी वक्तृत्व-शैली तथा ज्ञान को देखते हुए वहाँ के मीडिया ने उन्हें साइक्लॉनिक हिन्दू का नाम दिया।

स्वामी विवेकानन्द का जन्म १२ जनवरी सन् १८६३ (विद्वानों के अनुसार मकर संक्रान्ति संवत् १९२०) कोकलकत्ता में हुआ था। उनके बचपन का नाम नरेन्द्रनाथ दत्त था। 1879 में वे प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिए, 1880 में जनरल असेम्बली इंस्टीट्यूशन में प्रवेश लिए, नवंबर 1881 में उनकी रामकृष्ण परमहंस से प्रथम भेंट हुई, 1882-86 रामकृष्ण परमहंस से सम्बद्ध रहे,1884 स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण की और उसी वर्ष उनके पिता का स्वर्गवास हुआ। २५ वर्ष की अवस्था में नरेन्द्र ने गेरुआ वस्त्र धारण कर लिए थे। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी जो आज भी अपना काम कर रहा है। वे रामकृष्ण परमहंस के सुयोग्य शिष्य थे।

विवेकानंद ओजस्वी और सारगर्भित व्याख्यानों की प्रसिद्धि विश्व भर में है। जीवन के अन्तिम दिन उन्होंने शुक्ल यजुर्वेद की व्याख्या की और कहा-"एक और विवेकानन्द चाहिये, यह समझने के लिये कि इस विवेकानन्द ने अब तक क्या किया है।" उनके शिष्यों के अनुसार जीवन के अन्तिम दिन ४ जुलाई १९०२ को भी उन्होंने अपनी ध्यान करने की दिनचर्या को नहीं बदला और प्रात: दो तीन घण्टे ध्यान किया और ध्यानावस्था में ही अपने ब्रह्मरन्ध्र को भेदकर महासमाधि ले ली। बेलूर में गंगा तट पर चन्दन की चिता पर उनकीअंत्येष्टि की गयी। इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का सोलह वर्ष पूर्व अन्तिम संस्कार हुआ था।

उनके शिष्यों और अनुयायियों ने उनकी स्मृति में वहाँ एक मन्दिर बनवाया और समूचे विश्व में विवेकानन्द तथा उनके गुरु रामकृष्ण के सन्देशों के प्रचार के लिये १३० से अधिक केन्द्रों की स्थापना की।

Swami Vivekananda (12 January 1863 – 4 July 1902), born Narendranath Dutta, was the chief disciple of the 19th century saint Ramakrishna Paramahansa and the founder of the Ramakrishna Math and the Ramakrishna Mission. He is considered a key figure in the introduction of Indian philosophies of Vedanta and Yoga to the "Western" World, mainly in America and Europe and is also credited with raising interfaith awareness, bringing Hinduism to the status of a major world religion during the end of the 19th century C.E. Vivekananda is considered to be a major force in the revival of Hinduism in modern India. He is perhaps best known for his inspiring speech which began: "Sisters and Brothers of America," through which he introduced Hinduism at the Parliament of the World's Religions at Chicago in 1893.

Tuesday, December 10, 2013

संघ लोक सेवा आयोग की मनमानी और अभ्यर्थियों का जायज विरोध -


भारत के संविधान द्वारा स्थापित संघ लोक सेवा आयोग का एक महत्व्पूर्ण कार्य देश की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए सिविल सेवा परीक्षा के द्वारा आईएस, आईपीएस, इनकम टैक्स अधिकारी आदि उच्च पदो पर नियुक्तियों की अनुशंसा करती है।

विगत एक-दो वर्षों से संघ लोक सेवा आयोग के काम काज पर लगातार प्रश्न-चिन्ह लग रहे हैं और नवन्युक्त एक-दो सदस्यों के क्रियाकलाप तो बहुत संदिग्ध है. देश के सर्वोच्च सेवा की नियुक्तिओं में धांधली से सिर्फ परीक्षार्थियों का मनोबल ही नहीं गिर रहा है, बल्कि देश के प्रशासन के भविष्व पर भी सवालिया निशान लग चुका है. अपनी गलतियों को छुपाने के लिए संघ लोक सेवा आयोग बेवजह गोपिनियता को अपना हथियार बनाते हैं, जिसे देश के सर्वोच्च न्यायलय द्वारा ख़ारिज किया जा चुका है।
संघ लोक सेवा आयोग, सिविल सेवा परीक्षा में बारबार परिवर्तन कर ग्रामीण और पिछड़े प्रतियोगियों के लिए बाधाएं उत्पन्न कर रहा है। सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा में 2011 से बदलाव किए जा चुके हैं। इसमें वैकल्पिक विषयों को खत्म किया जा चुका है। इस वर्ष भी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं क्योंकि तय समय पर संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने इसका विज्ञापन नहीं निकाला है। इसलिए यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि इस बार मुख्य परीक्षा में बदलाव का ऐलान हो सकता है।

ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के प्रतियोगियों को परीक्षा का पैटर्न समझने में ही समय (उनका उम्र) निकल जाता है। जब तक वे परीक्षा के कायदे और बर्रेकियों को समझते हैं तब तक संघ लोक सेवा आयोग 'प्रतियोगिता के नियमों' को ही बदल देता है।(They change the rules of the game). इससे कम से कम ग्रामीण क्षेत्र के उम्मीदवारों का चयन हो पता है।

मौजूदा 26 वैकल्पिक विषयों को हटाकर सिर्फ दो प्रश्न पत्र रखे जाएं। ये दोनों प्रश्न पत्र कॉमन और वस्तुनिष्ठ होने चाहिए। पहला प्रश्न पत्र सामान्य अध्ययन एवं दूसरा उपरोक्त 26 विषयों का कॉमन प्रश्न पत्र होगा। इसके अलावा भाषा के प्रश्न पत्रों को पूर्ववत रखे जाने की संभावना है।

संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा में अंग्रेजी के पर्चे को मेरिट में जोड़ने के खिलाफ राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी के सदस्यों ने लोकसभा में जमकर हंगामा किया।

इधर 9 दिसंबर, 2013 को दिल्ली में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के परीक्षा प्रारूप में बदलाव की मांग करते हुए सैकड़ों छात्रों ने संसद भवन के बाहर सोमवार को प्रदर्शन किया। इनका कहना था कि ''परीक्षा का प्रारूप भेदभावपूर्ण है। इसकी समीक्षा की जानी चाहिए।''

हम मांग करते हैं कि संघ लोक सेवा आयोग द्वारा परीक्षा प्रारूप में की गयी उलट फेर को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाय और तब तक इससे प्रभावित अभियर्थियों को एक अतिरिक्त मौका दिया जाय। 2010 से किया गए परीक्षा पैटर्न में परिवर्तन कि जांच उच्च स्तरीय समिति द्वारा की जनि चाहिए जिसकी रिपोर्ट संसद के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
http://navbharattimes.indiatimes.com/photo/27165143.cms

Union Public Service Commission under scanner : Damaging prospects of Rural and Regional Candidates.



Union Public Service Commission damaging prospects of Rural and Regional Candidates.

Union Public Service Commission has been establishes by the Constitution of India, among other duties to hold Civil Services Examination for recruitment and appointment to highest posts including IAS, IPS, IRS etc.

However, during past 5 years the conduct of UPSC has been highly autocratic, partial and its decisions have been pointedly against candidates who come from rural areas, and have educational background in regional and Hindi mediums. The most important thing is that since 2010, UPSC has repeatedly changed the pattern of Examination without holding proper discussions, debate and with some hidden agenda which is obviously against the national interest and the common people, and ostensibly at the instance of the Coaching mafia.

It is a matter of concern that during this period there has been repeated protest by candidates on the authenticity, impartiality and transparency of results affecting the future of candidates as well as the nation`s administrative structure. There have been complaints on the functioning of Union Public Service Commission for past few years and the activities of one or two newly appointed members have been under scanner. The UPSC repeatedly takes refuge in the garb of 'Secrecy' to cover up its misdeeds, which has been summarily rejected by the highest Courts of the nation.
Then there was a furor in Lok Sabha on 15th March, 2013, after UPSC decided to make English compulsory and delete regional languages including Hindi as the medium of examination.

Now the candidates have protested on repeated change and demanded additional attempts. A hundred student activists and civil services aspirants were rounded up by police on Monday morning when they tried to march towards Parliament demanding changes in theUnion Public Services Commission examination pattern. Student organizations have demonstrated at Jantar Mantar demanding change in the UPSC examination format. The protestors were demanding three extra chances in the UPSC entrance examinations, a review of the examination pattern, and inclusion of certain subjects in the syllabus which were dropped this year.

The students demanded a three-year age limit relaxation be provided and that the government take steps to stop discrimination against candidates from regional and rural backgrounds.

We support the demand of the students and demand a high level Inquiry into the functioning of UPSC, basis of changes made and the role of controversial members of UPSC. Till the report is submitted UPSC should continue with the pre-2010 pattern and arrangements of Civil Service Examination.

Sunday, November 17, 2013

भारत रत्न :(Bharat Ratna)


भारत रत्न भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान है। यह सम्मान राष्ट्रीय सेवा के लिए दिया जाता है। इन सेवाओं में कला, साहित्य, विज्ञान या सार्वजनिक सेवा शामिल है। 2011 से इसमें खेल भी जोड़ दिया गया। इस सम्मान की स्थापना २ जनवरी १९५४ में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति श्री राजेंद्र प्रसाद द्वारा की गई थी। अन्य अलंकरणों के समान इस सम्मान को भी नाम के साथ पदवी के रूप में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। प्रारम्भ में इस सम्मान को मरणोपरांत देने का प्रावधान नहीं था, यह प्रावधान १९५५ में बाद में जोड़ा गया। बाद में यह १० व्यक्तियों को मरणोपरांत प्रदान किया गया। एक वर्ष में अधिकतम तीन व्यक्तियों को ही भारत रत्न दिया जा सकता है।
अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कारों में पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री,का नाम लिया जा सकता है ।

१९९२ में नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को इस पुरस्कार से मरणोपरान्त सम्मानित किया गया था। लेकिन उनकी मृत्यु विवादित होने के कारण पुरस्कार के मरणोपरान्त स्वरूप को लेकर प्रश्न उठाया गया था। इसीलिए भारत सरकार ने यह पुरस्कार वापस ले लिया। यह पुरस्कार वापस लिये जाने का यह एकमेव उदाहरण है|

भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री श्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को जब भारत रत्न देने की बात आयी तो उन्होंने जोर देकर मना कर दिया, कारण कि जो लोग इसकी चयन समिति में रहे हों, उनको यह सम्मान नहीं दिया जाना चाहिये। बाद में १९९२ में उन्हें मरणोपरांत दिया गया।

मूल रूप में इस सम्मान के पदक का डिजाइन ३५ मिमि गोलाकार स्वर्ण मैडल था। जिसमें सामने सूर्य बना था, ऊपर हिन्दी में भारत रत्न लिखा था, और नीचे पुष्प हार था। और पीछे की तरफ़ राष्ट्रीय चिह्न और मोटो था। फिर इस पदक के डिज़ाइन को बदल कर तांबे के बने पीपल के पत्ते पर प्लेटिनम का चमकता सूर्य बना दिया गया। जिसके नीचे चाँदी में लिखा रहता है "भारत रत्न", और यह सफ़ेद फीते के साथ गले में पहना जाता है।



इन हस्तियों को मिला है भारत रत्न
क्रमांक नाम साल
1 चक्रवर्ती राजगोपालाचारी 1954
2 सी.वी. रमन 1954
3 सर्वपल्ली राधाकृष्णण 1954
4 भगवान दास 1955
5 एम. विसवेशरैय्या 1955
6 जवारहलाल नेहरू 1955
7 गोविंद वल्लभ पंत 1957
8 डी. केसव कर्वे 1958
9 बिधान चंद्र रॉय 1961
10 पुरुषोत्तम दास टंडन 1961
11 राजेंद्र प्रसाद 1962
12 जाकिर हुसैन 1963
13 पांडुरंग वामन काने 1963
14 लाल बहादुर शास्त्री 1966
15 इंदिरा गांधी 1971
16 वी.वी. गिरी 1975
17 के. कामराज 1976
18 मदर टेरेसा 1980
19 विनोवा भावे 1983
20 खान अब्दुल गफ्फार खान 1987
21 एम.जी. रामचंद्रन 1988
22 बी.आर. अंबेडकर 1990
23 नेल्सन मंडेला 1990
24 राजीव गांधी 1991
25 सरदार वल्लभभाई पटेल 1991
26 मोरारजी देसाई 1991
27 अब्दुल कलाम आजाद 1992
28 जे.आर.डी. टाटा 1992
29 सत्यजीत राय 1992
30 ए.पी.जे. अब्दुल कलाम 1997
31 गुलजारी लाल नंदा 1997
32 अरुणा आसफ अली 1997
33 एम.एस.सुबुलक्ष्मी 1998
34 चिदंबरम सुब्रमण्यम 1998
35 जयप्रकाश नारायण 1999
36 रवि शंकर 1999
37 अमर्त्य सेन 1999
38 गोपीनाथ बारदोलई 1999
39 लता मांगेशकर 2001
40 बिस्मिल्लाह खान 2001
41 भीमसेन जोशी 2008
42 प्रो. सी.एन.आर. राव 2013
43 सचिन तेंडुलकर 2013
44 पंडित मदन मोहन मालवीय 2014
45 अटल बिहारी वाजपेयी 2014.

Saturday, November 16, 2013

कांग्रेस लीला के शिकार लालू प्रसाद: (Laloo Prasad)


सियासी ज़िन्दगी में हाल के दिनों में रोज़ कांग्रेस-सोनिया का नाम जपने वाले लालू प्रसाद को सी बी आई कोर्ट ने सजा सुनायी और उन्हें राहत देने वाले अध्यादेश को राहुल बाबा ने नॉनसेंस कह कर उसकी हवा निकल दी। इधर कांग्रेस जद(यू) से ताल-मेल की बात का खंडन नहीं किया। इस बेवफाई के बावजूद रा ज द का कांग्रेस-प्रेम बरक़रार रहा।

इधर हुंकार रैली में जैसे ही नरेंद्र मोदी ने यदुवंशियों से उन्हें समर्थन देने की अपील की,कांग्रेस कि नींद उड़ गयी। राजनैतिक जोड़-घटाओ करते हुए उन्हें नज़र आया कि अगर यादवों का एक अंश भी नरेंद्र मोदी के साथ हो जाता है तो बिहार में चुनाव नतीजों को भा ज पा के पक्ष में एक तरफ़ा माना जा सकता है।

तब उन्हें लगा कि बिना लालू प्रसाद को जेल से बाहर निकले और रा ज द से ताल-मेल किये , बात नहीं बनेगी।

इसके लिए माहौल बनाने का भार कांग्रेस नीत पत्रिका तहलका को सौंपा गया जिसमें इसके संवाददाता अजित शाही लिखते हैं:
चारा घोटाले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को सजा दिए जाने का कोई विशेष आधार नहीं है और फैसला अस्पष्ट, हलके और विकृत सबूत पर आधारित है।

निचले अदालत से सजायाफ्ता आजीवन कारावास पाये हुए पप्पू यादव उच्च न्यायलय से बाइज्जत बरी हुए हैं। तो क्या लालू प्रसाद को बचाना कांग्रेस के लिए बड़ी बात थी?



पहले फंसाओ और फिर बचा कर अहसान के बोझ तले दबा कर काम निकालो, कांग्रेस की निति रही है। लालू प्रसाद यह समझे कि नहीं, उनके समर्थक तो ज़रूर समझ रहें होंगे।