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New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....
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Tuesday, March 6, 2018

संसद की फाइल से : एट्रोसिटी ऑन हॉरिजंस (हरिजनों पर अत्याचार डिबेट में बी पी मण्डल) #BPMandal


बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री, सामाजिक न्याय के प्रणेता, पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष स्व बी पी मंडल कई बार विधान सभा व संसद के लिए चुने गए।
6 अप्रैल,1978 को पार्लियामेंट (लोक सभा) में "Atrocities on Harijans" पर उनका भाषण। ( अब 'हरिजन' के जगह 'दलित' शब्द का प्रयोग होता है।) 24 मार्च 1977 को मोरारजी मंत्रिमंडल ने शपथ ली। बमुश्किल 2 महीने बाद ही 27 मई 1977 को बिहार का बहुचर्चित बेलछी कांड हो गया। 1 दर्जन दलितों का नरसंहार किया गया था। इंदिरा गांधी ने बेलछी का दौरा किया। वे हाथी पर सवार होकर बेलछी पहुंची थीं। इसके बाद भी दलितों पर एट्रोसिटी हुए। इसी के सन्दर्भ में लोक सभा में चर्चा थी।
ध्यान दें, बिहार और केंद्र में जनता पार्टी की सरकार थी और श्री मंडल जनता पार्टी के ही सांसद थे।
श्री बी पी मण्डल (मधेपुरा) :
सभापति महोदय, मैं पहले आपको धन्यवाद दूँ जो आपने मेरा नाम लिया।
सभापति महोदय, मुझे इस बात अफ़सोस होता है जबकि हमारे ट्रेजरी बेंच से होम मिनिस्टर या उनके स्टेट मिनिस्टर लोग बिहार में हरिजन पर होने वाले अत्याचार को छिपाना चाहते हैं। और सभापति जी, यह कोई स्टेट की रिस्पॉन्सिबिलिटी नहीं हो सकती है। अगर अमरीका में नीग्रो पर जुल्म होता है, तो उससे कम जुल्म हमारे यहाँ हरिजन पर नहीं होता है। अमरीका की फेडरल गवर्नमेंट और प्रेसिडेंट यह कहें कि फलाँ स्टेट में जुल्म होता है, हमारी रिस्पॉन्सिबिलिटी नहीं है, यह कभी टेनेबल नहीं हो सकता। इसलिए जो जुल्म हरिजनों पर होता है, जिस धर्म में हमलोग हैं, उस धर्म की बुनियाद इसीपर है। मैं काँग्रेस वालों को क्या दोष दूँ। कोई सरकार रहे, चाहे अँगरेज़ रहे, मुसलमान रहे या हिन्दू पीरियड रहा हो, हज़ारों साल से हरिजनों पर जुल्म इस देश में हो रहे हैं। दुनिया के किसी भी देश से कम जुल्म नहीं, यहाँ सबसे ज्यादा ज़ुल्म होता है। मैं इसका एक उदहारण दूँगा।
दुनिया का कौन सा ऐसा देश है जिसमें खानदान के खानदान, बाबा, बेटा, पोता, परपोता जाति के आधार पर बरसों से पखाना माथे पर ढोए। हमलोग हरिजनों से यह काम करा रहें हैं। आपकी म्युनिसिपैलिटी में भी किसी दूसरी जाति के लोग पखाना नहीं ढोते। यह हमारे समाज की जड़ में है। इसको यह कह देना मखौल है कि काँग्रेस में क्या हुआ, महाराष्ट्र में क्या हुआ, फलाँ जगह क्या हुआ। इस आड में हम नहीं बच सकते। यह काँग्रेस या जनता पार्टी की बात नहीं है। हमारे समाज की जड़-जड़ में, अंग-अंग में और कण-कण में यह है कि जात-पात के द्वेष के आधार पर हमारा समाज बना हुआ है। किसी भी सरकार के लिए यह शर्म की बात है, खासकर जनता पार्टी के लिए अगर हम पुरानी लकीर के फ़क़ीर हों।
हिन्दुस्तान में ऐसी बड़ी क्रांति हुई, रेवोल्यूशन हुआ, जनता पार्टी यहाँ आई, काँग्रेस वालों को हटा कर जनता पार्टी को लाया गया और हम अब भी पुराने लकीर के फ़क़ीर हों, यह कहाँ की बात है? आंध्र में कितना होता है, कर्नाटक में कितना होता है, इससे हमारा कोई भी केस सुधरने वाला नहीं है। यह हमारे लिए शर्म की बात है। आज हमको टोटल रिस्पॉन्सिबिलिटी लेनी चाहिए कि ईस समाज को हम परिवर्तित करेंगे और हरिजनों पर ज़ुल्म नहीं होंगे।
एक माननीय सदस्य : अगर हरिजन ज़ुल्म कर दें हम पर तो ?
श्री बी पी मण्डल : जितना ज़ुल्म हमने हरिजनों पर किया है, अगर कोई हरिजन थोड़ा सा भी ज़ुल्म करता है, बदला लेता है तो वह जस्टीफाईड है। आपने हज़ारों वर्षों तक पुश्तैनी तरीके से ज़ुल्म किया है। अगर एक आध ज़ुल्म हरिजन करता है तो कोई बात नहीं, लेकिन अगर ज़ुल्म नहीं करता है तो यह आश्चर्य की बात है कि क्यों नहीं करता है ? इसलिए हरिजनों पर ज़ुल्म होता है।
कार्लमार्क्स का जन्म हिंदुस्तान में होता तो सोशलिज्म की डेफिनिशन में वह भी इकनॉमिक आधार नहीं मानते, सोशल एक्सप्लॉयटेशन का आधार मानते। जगजीवन बाबू इकनॉमिक आधार में किसी से कम नहीं, पॉलीटिकल आधार में बहुत ज्यादा, हिंदुस्तान में जीनियस, उन्होंने एक मूर्ति, स्टेचू का उदघाटन किया, अनावरण किया तो उस मूर्ति को गंगाजल से धोया गया। तो इसमें इकनॉमिक आधार नहीं है। हमारे देश में डबल एक्सप्लोइटेशन है और और दुनियाँ के देशों में एक एक्सप्लॉइटेशन है, वह है इकनॉमिक एक्सप्लॉयटेशन। हमारे यहाँ डबल एक्सप्लॉयटेशन है, एक है इकनॉमिक और दूसरी सोशल एक्सप्लॉयटेशन है। हरिजनों पर ज़ुल्म होता है। और भी बहुत सी जातियाँ हैं जो हरिजनों के समकक्ष जातियाँ हैं। हरिजन हरिजन में भी आपस में लड़ाई होती है, लेकिन समाज की बनावट ही ऐसी है कि ऊपर में एक जाति है ब्राह्मण और नीचे में एक जाति है हरिजन और बीच में 3 हज़ार जातियाँ हैं। इनसे पहले देश में 4 वर्ण थे लेकिन गुप्त वंश के बाद डेढ़ हज़ार वर्ष से हज़ारों जातियाँ ले गई। समाज का बनावट ही ऐसा है कि जाति जाति में लड़ाई होती है, लेकिन इसका सूत्रधार हरिजन नहीं है, पिछड़ा वर्ग नहीं है। इसके सूत्रधार वर्ण-व्यस्था को बनाने वाले मनु स्मृति है।
(हंगामा शोर-गुल व्यवधान )
इसलिए हम अपनी सरकार को कहेंगे कि यह आंकड़े न दें कि एक परसेंट हरिजन है और 15 परसेंट हरिजन हैं एक परसेंट भी ज़ुल्म हुआ, यह शर्म की बात है। इस किस्म के आंकड़ें देना ठीक नहीं होगा। इस पर हमें पार्टी लाइन से ऊपर उठना होगा। यह देश के नेशनल इंटरेस्ट का सवाल है, इसको हम पार्टी के दायरे में नहीं लेंगे। हमारे साथी ने जो कहा, इसका मतलब यह है कि 15 परसेंट तक क्राइम जस्टीफाईड होगा हरिजन पर ? जो लोग यह जवाब देते हैं, इन आंकड़ों को बनाने ब्यूरोक्रेट्स हैं, वह सब अपर क्लास के हैं और इन पर जो ज़ुल्म होता है, उसमें इनका हाथ रहता है। वही लोग परदे के पीछे से स्ट्रिंग पुल करते हैं, और जो ज़ुल्म होता है, उसको वे देखते हैं।
हरिजनों की नियुक्तियों के सम्बन्ध में तो रिजर्वेशन दिया गया है, लेकिन प्रोमोशन के मामले में उनके लिए कोई रिजर्वेशन नहीं है। पटना हाई कोर्ट साठ वर्ष से बना हुआ है। वहाँ आज तक एक भी हरिजन, आदिवासी या पिछड़े वर्ग का जज नहीं हुआ है। पिछड़े वर्ग का एक जज वहाँ हुआ, जब मैं मुख्य मंत्री था। मैंने जस्टिस कन्हैया जी को जज बनाया। उसके बाद किसी ने नहीं बनाया।
हरिजनों को जो रिजर्वेशन दिया गया है, वह तो एक मखौल है। टॉप ऑफिसर्स, जो अपर कास्ट के होते हैं, हरिजन और वीकर सेक्शनस के सर्विस रिकार्ड्स को खराब कर देते हैं, जिससे उनका प्रोमोशन नहीं होता है। सरकार कहती है कि प्रोमोशन में रिजर्वेशन का सवाल ही नहीं उठता है, सिर्फ एपॉइंटमेंट में ही रिजर्वेशन है। इसलिए प्रोमोशन में भी रिजर्वेशन का कोटा फिक्स करना होगा।
हमने सुना है कि तमिलनाडु में जब डीएमके सरकार थी, तो उसने पहले के सब सर्विस रिकार्ड्स को कैंसल कर दिया, जो ब्राह्मण टॉप ऑफिसर्स द्वारा लिखे गए थे - वहाँ पर सिर्फ ब्राह्मण और नॉन-ब्राह्मण हैं, जब कि हमारे यहाँ चार पाँच अपर कास्ट्स हैं -, जिसके कारण आज वहाँ पर हरिजन टॉप ऑफिसर्स भी है।
बिहार में हाई कोर्ट जज को तो छोड़ दीजिए, एक भी डिस्ट्रिक्ट जज नहीं है। मुंसिफ हैं, सब-जज तक तो वे जाते हैं, लेकिन हाई कोर्ट तक, जो अपर कास्ट की मोनोपॉली है, उन्हें नहीं जाने दिया जाता है।
मैं कहना चाहता हूँ कि हरिजनों पर ज़ुल्म के मामले को इस तरह से नहीं लेना चाहिए कि 15 परसेंट और 1 परसेंट वगैरह पर्सेंटेज बता दिया, काँग्रेस शासन से तुलना कर दी, और दुनियाँ के सामने एक मखौल हो गया। उनकों इसमें पूरी दिलचस्पी लेनी चाहिए। ऐसा न हो कि "अति संघर्ष करे जो कोई, अनल प्रकट चन्दन से होई"। उनको आप दबाते चले जा रहें हैं, समझते हैं कि कुछ नहीं है। अगर आपका ऐसा ही रवैय्या रहा, तो जैसे की उस दिन श्री रामधन से कहा था, यह मामला यूएनओ में ले जायेंगे, ले ही जाना चाहिए। मैं हरिजन नहीं हूँ। लेकिन मैं समझता हूँ कि यह ह्यूमन राइट्स का सवाल है। अमरीका में निग्रोस की जो हालत है, हमारे यहाँ हरिजनों की हालत उससे भी बदतर है। इसलिए मैं समझता हूँ कि अगर इस सवाल को यूएनओ में ले जाया जाय, तो हमलोगों का भी उसमें समर्थन होगा।
इस बारे में एक कमीशन बैठा देने से काम नहीं चलेगा, अगर सिंसियरिटी ऑफ परपज नहीं है। वही लहँगा, वही साड़ी जो पहले थी, वह अब भी है। उनकी जगह पर आप बैठ गए, बड़ी बड़ी कोठियों में चले गए, बड़ी बड़ी गाड़ियों में बैठते हैं, इमरजेंसी में जो मारपीट हुई थी, वह सब भूल गए, और फिर वही जवाब देने लग गये, मैं इसको अच्छा समझता हूँ।
मैंने एक अमेंडमेंट दिया है, जिसका मतलब है कि पार्लियामेंट के रेस्पांसिबल मेम्बरों की एक कमिटी बनाई जाये, जो इस समस्या पर विचार करे।
श्री चंद्रशेखर सिंह (वाराणसी) :
सभापति महोदय, यह बहुत सीरियस बात है। क्या यहाँ कोई मेम्बर इरेस्पोंसिबल भी है ? माननीय सदस्य ने कहा है कि रेस्पोंसिबल मेमबर्स की एक कमिटी बनाई जाये।
श्री बी पी मण्डल : अगर मैंने रेस्पोंसिबल कह दिया, तो मेरा मतलब यह नहीं था कि बाँकी मेमबर्स इरेस्पोंसिबल हैं। इस तरह समझने का नतीजा है कि हिंदुस्तान में ये ज़ुल्म हो रहें हैं। बात बात पर भिनक जाते हैं।
मैंने यह अमेंडमेंट दिया है :
That in the Motion, ---
add at the end ---
"and recommends that a Committee of MPs be appointed to go into its causes and suggest preventive measures."

मैं फिर से यह कहना चाहता हूँ कि इस रेवोल्यूशन के बाद जनता पार्टी की जो रिस्पांसिबिलिटी है, उसको देखते हुए यह बिलकुल अवांछनीय है कि एक भी हरिजन को जलाया जाये। अगर ऐसी बात होती रहे, तो यह शर्म की बात है।
संकलन -
डा सूरज मण्ड़ल (SSN College, University of Delhi)
डा रतन लाल (Hindu College, University of Delhi).

Tuesday, June 23, 2015

आपातकाल और बी पी मंडल : Emergency and B P Mandal :

26 जून को आपातकाल की 40 वीं वर्षगांठ है। दरअसल, संविधान के अनुसार देश पर बाहरी खतरे (युद्ध) या आतंरिक (राजद्रोह या विद्रोह) खतरे से उत्पन्न विशेष स्थिति का सामना करने के लिए सरकार आपकाल लागू कर सकती है जब वह नागरिक अधिकार और साधारण कानून निलंबित करती है। सरकार के पास असीमित अधिकार मिल जाते हैं जिसका दुरपयोग भी किया जा सकता है। और हुआ भी यही था।
मामला 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था, जिसमें उन्होंने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी राज नारायण को पराजित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राज नारायण ने इलाहबाद हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। उनकी दलील थी कि इंदिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग किया, तय सीमा से अधिक खर्च किए और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए ग़लत तरीकों का इस्तेमाल किय। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया। इंदिरा हगंधी की इस्तीफे की मांग उठ गयी और कानूनन उन्हें ऐसा ही करना चाहिए था। फैसले में इंदिरा गांधी को चुनाव में धांधली करने का दोषी पाया गया और उन पर छह वर्षों तक कोई भी पद संभालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। परन्तु इसके बावजूद इंदिरा गांधी टस से मस नहीं हुईं और इस फ़ैसले को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की। 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी गई। तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की धारा 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा कर दी। यहाँ तक कि कांग्रेस पार्टी ने खुले आम कहने लगी कि इंदिरा का नेतृत्व पार्टी के लिए अपरिहार्य है।
इस तरह 26 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक का 21 मास की अवधि में भारत में आपातकाल घोषित था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल था। आपातकाल में चुनाव स्थगित हो गए तथा नागरिक अधिकारों को समाप्त करके मनमानी की गई। इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधियों को कैद कर लिया गया और प्रेस पर प्रतिबंधित कर दिया गया। प्रधानमंत्री के बेटे संजय गांधी के नेतृत्व में बड़े पैमाने पर नसबंदी अभियान चलाया गया। जयप्रकाश नारायण ने इसे भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि' कहा था।
आपातकाल लागू होते ही आंतरिक सुरक्षा क़ानून (मीसा) के तहत राजनीतिक विरोधियों की गिरफ़्तारी की गई, इनमें जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, जॉर्ज फ़र्नांडिस, अटल बिहारी वाजपेयी आदि भी शामिल थे।
जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर सम्पूर्ण क्रांति के नारे को लेकर छात्र संघर्ष समिति का गठन हुआ। पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष लालू प्रसाद और सचिव सुशील मोदी, छात्र नेता रामविलास पासवान, दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष अरुण जेटली आदि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
18 मार्च 1974 को छात्र संघर्ष समिति ने बिहार विधान सभा का घेराव किया। फिर छात्र संघर्ष समिति ने बिहार विधान सभा के सभी सदस्यों से इस्तीफा देने आह्वान किया। उन्होंने मांग की मुख्यमंत्री अब्दुल गफूर को बर्खास्त किया जाए।
उस समय 318 सदस्यीय बिहार विधान सभा में मुख्य पार्टियों की संख्या इस प्रकार थी : कांग्रेस (इंदिरा) 167, सी पी आई 35, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी 33, भारतीय जान संघ 25, कांग्रेस (ओ) 30, निर्दलीय 17, हिंदुस्तानी शोषित दल 3, झारखण्ड 1, झारखण्ड पार्टी 3, बिहार प्रान्त झारखण्ड पार्टी 2 आदि।
कर्पूरी ठाकुर और बी पी मंडल संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में थे। विधायक बदलते हुए राजनैतिक परिस्थितियों में धीरे-धीरे इस्तीफा देने लगे। भारतीय जन संघ में इस्तीफे के प्रश्न पर दो फाड़ हो गए। इसी तरह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के अधिकांश विधायक कर्पूरी ठाकुर के इस्तीफा बाद बी पी मंडल को नेता मान लिए।
मधेपुरा में राजनैतिक आंदोलन हो रहे थे और छात्र संघर्ष समिति के स्थानीय टी पी कॉलेज के नेता बी पी मंडल के इस्तीफा देने की मांग को लेकर एस डी ओ कंपाउंड (SDO Compound) में "यज्ञ आंदोलन" करते हुए इंदिरा - अब्दुल गफूर विरोधी अन्य मन्त्रों के साथ साथ "बी पी मंडल स्वाहा" कह कर आहुति दे रहे थे। मैं भी यह मंजर देखने वहां पहुंचा था। उसी दौरान विरोध प्रदर्शन में शामिल युवक सदानंद पुलिस की गोली का शिकार हो गए।
आपातकाल घोषणा एवं मधेपुरा में हुए इन घटनाओं के समय ही लगभग जय प्रकाश बाबू के आग्रह पर बी पी मंडल और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के लहभग सभी सदस्य बिहार विधान सभा से इस्तीफा दे दिए।
अब बिहार के कांग्रेस विरोधी नेताओं की भी धड़-पकड़ शुरू हो गयी। बी पी मंडल अपने गॉव मुरहो में थे। पर मंडल परिवार के पुराने रुतबे के कारण और मुरहो में तब जल्दी पुलिस का पदार्पण नहीं होने की परंपरा से संभवतः पुलिस इस ताक में रहती थी कब मंडल जी मधेपुरा आएं और कोई कार्यवाई हो। इस दौरान लगभग डेढ़ महीने तक दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्म प्रकाश भी गिरफ़्तारी से परहेज रखने के लिए मंडल जी के साथ ही मुरहो में थे। कुछ दिनों तक चौधरी ब्रह्म प्रकाश मंडल जी के मधेपुरा आवास पर भी बतौर मेहमान रहें। (स्व बी पी मंडल और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री राव बिरेन्द्र सिंह भी अभिन्न मित्र थे)।
आपातकाल लागू करने के लगभग दो साल बाद 1977 में अपने पक्ष में ख़ुफ़िया रिपोर्ट के मद्देनज़र प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी। आपातकाल समाप्त कर दिया गया। चुनाव में आपातकाल लागू करने का फ़ैसला कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ। ख़ुद इंदिरा गांधी अपने गढ़ रायबरेली से चुनाव हार गईं। जनता पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। संसद में कांग्रेस के सदस्यों की संख्या 350 से घट कर 153 पर सिमट गई और 30 वर्षों के बाद केंद्र में किसी ग़ैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ।
बिहार में जनता पार्टी के सांसदीय समिति के अध्यक्ष होने के नाते, और जय प्रकाश बाबू के आग्रह पर, कर्पूरी ठाकुर और सत्येन्द्र बाबू के आपत्ति बावजूद, बी पी मंडल ने लालू प्रसाद को छपरा से लोक सभा टिकट के लिए अनुमोदन किए।
1977 में बिहार के 54 सीट में से 52 जनता पार्टी के पक्ष में थे और एक एक सीट निर्दलीय और झारखण्ड पार्टी को मिली।
बिहार से जीतने वाले दिग्गजों में बी पी मंडल के अलावे बाबू जगजीवन राम (कांग्रेस छोड़ कर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी बनाए थे), सत्येन्द्र नारायण सिंह, कर्पूरी ठाकुर, मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडिस, हुकुमदेव नारायण यादव और पहली बार जीतने वालों में कम उम्र के लालू प्रसाद और रिकार्ड वोट के साथ राम विलास थे।
विडम्बना यह है की लालू प्रसाद आज भी अपने टिकट के लिए बी पी मंडल की स्मृति के प्रति अहसानमंद होने की जगह उनके प्रति उपेक्षा का भाव रखते हैं।

Wednesday, June 25, 2014

देश में आपातकाल (Emergency) 26 जून 1975 से 22 मार्च,1977.


देश में आपातकाल (Emergency) 26 जून 1975 से 22 मार्च,1977.

आज के नौजवान साथियों को वह दौर समझने में थोड़ी मुश्किल ज़रूर हो सकती है। पूरे इमरजेंसी का निचोड़ जॉर्ज फर्नांडिस की यह तस्वीर है, जो उनका 1977 के आम चुनाव में उनका पोस्टर था। जेल से चुनाव लड़े और उत्तर भारत में जनता पार्टी के अन्य प्रत्याशियों की तरह चुनाव स्वीप कर लिए।

मामला 1971 में हुए लोकसभा चुनाव का था, और सोशलिस्ट पार्टी के नेता हमेशा की तरह इंदिरा गांधी के विरुद्ध राय बरेली से चुनाव लड़ते थे। इस चुनाव में इंदिरा अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी राज नारायण को पराजित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के चार साल बाद राज नारायण ने हाईकोर्ट में चुनाव परिणाम को चुनौती दी। उनकी दलील थी कि इंदिरा गांधी ने चुनाव में सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग किया, तय सीमा से अधिक खर्च किए और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए ग़लत तरीकों का इस्तेमाल किय। अदालत ने इन आरोपों को सही ठहराया। इंदिरा गांधी पर इस्तीफे का दवाब था। परन्तु उन्होंने इसे फ़ासिस्ट ताक़तों का षड़यंत्र (जे पी,जॉर्ज आदि नेतओं को फासिस्ट कहती थी) मानते हुए इस्तीफा देने से इंकार कर दिया और एक बड़े जन आंदोलन की सम्भावना को देखते हुए देश के संविधान में सशस्त्र विद्रोह से निपटने के प्रावधान -इमरजेंसी को लागू कर दिया। इस तरह इंदिरा गांधी ने इस फ़ैसले को मानने से इनकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की घोषणा की और 26 जून को आपातकाल लागू करने की घोषणा कर दी गई।आकाशवाणी पर प्रसारित अपने संदेश में इंदिरा गांधी ने कहा, "जब से मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील क़दम उठाए हैं, तभी से मेरे ख़िलाफ़ गहरी साजिश रची जा रही थी।" और तब शुरू हुआ इंदिरा -संजय गांधी के नेतृत्व में देश में तानाशाही का खौफनाक और शर्मनाक दौर।
आपातकाल लागू होते ही आंतरिक सुरक्षा क़ानून (मीसा) के तहत हज़ारों की तायदाद में राजनीतिक विरोधियों की गिरफ़्तारी की गई, इनमें जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चौ चरण सिंह, जॉर्ज फ़र्नांडिस और अटल बिहारी वाजपेयी भी शामिल थे।

आपातकाल लागू करने के लगभग दो साल बाद विरोध की लहर तेज़ होती देख प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर चुनाव कराने की सिफारिश कर दी। चुनाव में आपातकाल लागू करने का फ़ैसला कांग्रेस के लिए घातक साबित हुआ. ख़ुद इंदिरा गांधी अपने गढ़ रायबरेली से चुनाव हार गईं।

1977 में 16 से 20 मार्च के बीच लोक सभा चुनाव हुए।1977 के चुनाव में 32 करोड़ मतदाताओं से 60% ने वोट किया। 23 मार्च को घोषित परिणाम में कह गया की 43.2% लोकप्रिय वोट और 271 सीटें हासिल करके जनता पार्टी ने एक व्यापक और अभूतपूर्व विजय हासिल की थी। अकाली दल और कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी के समर्थन के साथ, यह एक दो तिहाई, या 345 सीटों की पूर्ण बहुमत बन चुक था। कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी ने 28 सीटें जीती और जगजीवन राम एक राष्ट्रीय दलित नेता के रूप में जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को दलित वोट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मिलने के लिये काफी बड़ा प्रभाव डाला था।जनता पार्टी भारी बहुमत से सत्ता में आई और मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने।



संसद में कांग्रेस के सदस्यों की संख्या 350 से घट कर 153 पर सिमट गई और 30 वर्षों के बाद केंद्र में किसी ग़ैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ। कांग्रेस को उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में एक भी सीट नहीं मिली। नई सरकार ने आपातकाल के दौरान लिए गए फ़ैसलों की जाँच के लिए शाह आयोग गठित की गई। हालाँकि नई सरकार दो साल ही टिक पाई और अंदरूनी अंतर्विरोधों के कारण १९७९ में सरकार गिर गई. उप प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने कुछ मंत्रियों की दोहरी सदस्यता का सवाल उठाया जो जनसंघ के भी सदस्य थे। इसी मुद्दे पर चरण सिंह ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया और कांग्रेस के समर्थन से उन्होंने सरकार बनाई लेकिन चली सिर्फ़ पाँच महीने. उनके नाम कभी संसद नहीं जाने वाले प्रधानमंत्री का रिकॉर्ड दर्ज हो गया।

1977 में बिहार से सांसद चुने जाने वालों में अन्य प्रमुख नेतओं में पूर्व मुख्यमंत्री स्व बी पी मंडल -मधेपुरा,कर्पूरी ठाकुर -समस्तीपुर, सत्येन्द्र नारायण सिंह - औरंगाबाद, जॉर्ज फर्नांडिस - मुजफ्फरपुर, लालू प्रसाद -छपरा, राम विलास पासवान - हाजीपुर। इत्यादि।

Saturday, May 10, 2014

क्या नरेन्द्र मोदी 1977 को दोहराएंगे ?


1977 में पहली बार केंद्र में गैर-काँग्रेसी सरकार बनी, जब जनता पार्टी ने सरकार बनायीं थी। जनता पार्टी इंदिरा गांधी के प्रधान मंत्रित्व काल में 1974 में लागू की गयी आपातकाल की ज्यादतियों के विरुद्ध कई पार्टियों के साथ आने पर बनी थी। चौ चरण सिंह के नेतृत्व की भारतीय लोक दल जिसमें भारतीय क्रांति दल(चौ चरण सिंह), स्वतन्त्र पार्टी (गायत्री देवी, मीनू मसानी, पीलू मोदी आदि), सोशलिस्ट पार्टी ( जे पी , जॉर्ज फर्नांडिस आदि), उत्कल काँग्रेस (बीजू पटनायक), भारतीय जन संघ (अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी), काँग्रेस(ओ) (मोरारजी देसाई, नीलम संजीव रेड्डी, सत्येन्द्र नारायण सिन्हा आदि), काँग्रेस फॉर डेमोक्रसी (जगजीवन राम, हेमवती नंदन बहुगुणा आदि) तथा काँग्रेस पार्टी से विद्रोह करने वाले चन्द्रशेखर, कृष्णकांत, मोहन धारिया, रामधन, चंद्रजीत यादव आदि शामिल हुए। बाद में काँग्रेस(अर्स) के देवराज अर्स भी शमिल हो गये।

1977 में 16 से 20 मार्च के बीच लोक सभा चुनाव हुए।1977 के चुनाव में 32 करोड़ मतदाताओं से 60% ने वोट किया। 23 मार्च को घोषित परिणाम में कह गया की 43.2% लोकप्रिय वोट और 271 सीटें हासिल करके जनता पार्टी ने एक व्यापक और अभूतपूर्व विजय हासिल की थी। अकाली दल और कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी के समर्थन के साथ, यह एक दो तिहाई, या 345 सीटों की पूर्ण बहुमत बन चुक था। कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी ने 28 सीटें जीती और जगजीवन राम एक राष्ट्रीय दलित नेता के रूप में जनता पार्टी और उसके सहयोगी दलों को दलित वोट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मिलने के लिये काफी बड़ा प्रभाव डाला था।

इसके विपरीत दक्षिण भारत में जहाँ इमरजेंसी का क़ोई खास प्रभाव नहीं था, वहाँ मुख्य रूप से कांग्रेस पार्टी ने 153 सीटों को जीता। जनता पार्टी भारत के दक्षिणी राज्यों से केवल छह सीटें जीती। हालांकि, जनता पार्टी के उम्मीदवारों ने उत्तरी "हिंदी बेल्ट",विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार में कांग्रेस के उम्मीदवारों को हरा दिया। चुनाव का सबसे चौंकाने वाला परिणामों में से एक रायबरेली क था जहाँ कॉँग्रेस की अध्यक्षा और प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी अपने 1971 चुनाव से प्रतिद्वंदी रज नारायण से 55,200 मतों के अंतर से हार गयी। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में कोई सीट जीत नहीं था और जनता उम्मीदवारों द्वारा 10 राज्यों और क्षेत्रों से उसका नामो- निशान मिटा दिया गया था।

इस तरह 1989 के लोक सभा चुनाव में विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुवाई में जनता पार्टी ने 17.79 % के वोटों के साथ 143 जीता। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को 11.36 % वोट एवं 85 सीटें प्राप्त हुई। वाम दलों में सी पी आई को 2.57 % वोट और 12 सीट तथा मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को 6.33 % वोट एवं 33 सीट मिली। इस तरह 39.33 % वोट और 197 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल होने के बावजूद भा ज पा और वाम दलों के सहयोग से वी पी सिंह के नेतृत्व में केन्द्र में जनता दल कि गैर काँग्रेसी सरकर बनी।

1999 के लोक सभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी को 23.7% वोट और 182 सीटें मिली। सहयोगी दलों के साथ NDA को 40.8% वोट और 299 सीटें मिली।




अब 16 मई का इंतज़ार है और देखना है की नरेन्द्र मोदी के लहर से भा ज पा और NDA को कितने प्रतिशत वोट और सीटेँ मिलती है।

Saturday, November 9, 2013

मंडल कमीशन:


दरअसल कई साथी यह जानना चाहेंगे कि मंडल कमीशन क्या है?

देश की आज़ादी के बाद समाज के सबसे कमजोर तपके, जिन्हें अनुसूचित जाति और जनजाति कहा गया, के बारे में यह मानते हुए कि यह वर्ग समाज में वर्षों से कई बाधाओं और विकृतियों से जूझ रहा है और उनके उत्थान के लिए विशेष अवसरों कि आवश्यकता होगी, उन्हें आरक्षण और विशेष अवसरों का प्रावधान किया गया। लेकिन इसके पीछे एक इतिहास थी और यह इतना आसान भी नहीं था क्योंकि आज़ादी के संघर्ष के दौरान दलित नेता डा बी आर आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच हुए समझौतों के कारण, खास तौर से हिन्दू समाज को एक रखने के लिए संविधान में यह आया।

परन्तु यह भी बात उठी कि इन वर्गों के अलावे कई और सामाजिक तपके हैं, जिन्हें भी विशेष अवसरों कि आवश्यकता होगी। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से इन पिछड़े वर्गों का पता लगाने के लिए संविधान के धारा 340 के अनुसार एक आयोग बनाने का प्रावधान किया गया, जिसे पिछड़ा वर्ग आयोग कहा जाना था।

पंडित नेहरू पर इस बात का दबाब बढ़ने पर 29 जनवरी, 1953 को काका कालेलकर की अध्यक्षता में पहले पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया जिसने 30 मार्च 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी।इस रिपोर्ट के अनुसार 2,399 जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया, जिनमें 837 जातियों को अति-पिछड़ा घोषित किया गया। लेकिन इस आयोग के रिपोर्ट कि सबसे दिलचस्प पहलु यह थी कि आयोग के अध्यक्ष ने रिपोर्ट के साथ माननीय राष्ट्रपति को दिए गए अपने पत्र में अपनी ही रिपोर्ट को ख़ारिज कर दी।

इसी पत्र के आधार पर वर्षों तक पिछड़े वर्ग के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। 1977 के लोक सभा चुनाव में नवगठित जनता पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में पिछड़े वर्ग के लिए विशेष उपाय पूरे संजीदगी से उठाया गया और उस चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस को पहली और करारी हार दी।

जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं में बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री बी पी मंडल भी थे जो बिहार में जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष भी थे।(उन्होंने ने ही लालू प्रसाद को उस चुनाओ में टिकट दी थी)। बी पी मंडल मधेपुरा लोक सभा क्षेत्र से शानदार विजय प्राप्त किये और इस बात का कयास लगाया जा रहा था की जनता पार्टी कि पहली गैर-कांग्रेसी केंद की सरकार उन्हें कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय दी जायेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

इसी बीच पैर टूटने के इलाज़ के दौरान मंडल जी बम्बई के जसलोक अस्पताल में भरती थे, जहाँ उनसे मिलने प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई पहुंचे। मोरारजी भाई ने बी पी मंडल से कहा की मैंने आपको मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया क्योंकि आपको एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देना चाहता हूँ। मंत्री तो कई लोग बनते हैं लेकिन यह जिम्मेदारो इतना विशेष है की मरने के बाद भी लोग आपको याद करेंगे।

राष्ट्रपति ने 1 जनवरी, 1979 को पिछड़ा वर्ग आयोग कि गठन कि अधिसूचना जारी की जिसके अध्यक्ष बिहार के पूर्व मुख्य-मंत्री बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल (बी पी मंडल) को बनाया गया। उन्हीं के नाम पर इस आय़ोग को मंडल आयोग के नाम से जाना गया। बी पी मंडल ने 31 दिसंबर,1980 को नई दिल्ली के विज्ञानं भवन में राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह को रिपोर्ट सौंप दी।

मंडल कमीशन रिपोर्ट तो पूरे विज्ञानिक आधार के बनायी गयी की वर्षों बाद सर्वोच्च न्यायलय के सम्पूर्ण बेंच द्वारा भी इसमें किसी तरह कि कमी नहीं निकाली जा सकी। रिपोर्ट में 1931 में हुए आखिरी जाति आधारित जनगणना के अनुसार भारत के 52% जनसंख्या जिसमें 3,743 अलग अलग जातियों को समाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा या ‘backward’ घोषित किया गया। परन्तु चुकी पहले से अनुसूचित जाति/जनजाति को 22.5% आरक्षण प्राप्त था अतः कई अन्य अनुशंसाओं के साथ साथ उनके लिए 27% आरक्षण का प्रावधान करने के लिए कहा गया, जिसे जोड़ने के बाद आरक्षण का कुल प्रतिशत 49.5 होता था जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय सीलिंग 50% से कम था।

स्व बी पी मंडल की मृत्यु रिपोर्ट सौंपने के लगभग एक वर्ष बाद 13 अप्रैल, 1982 को हो गयी। इस तरह कांग्रेस के सरकार में रिपोर्ट को ढंडे बस्ते में डाल दिया गया।
1989 का लोकसभा चुनाव पूर्ण हुआ। कांग्रेस को भारी क्षति उठानी पड़ी। उसे मात्र 197 सीटें ही प्राप्त हुईं। विश्वनाथ प्रताप सिंह के राष्ट्रीय मोर्चे को 146 सीटें मिलीं। भाजपा के 86 सांसद थे और वामदलों के पास 52 सांसद के समर्थन से राष्ट्रीय मोर्चे को 248 सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो गया और वी. पी.सिंह प्रधानमंत्री बने। दिसंबर 1980 से ठन्डे बस्ते में पड़ी मंडल आयोग के रिपोर्ट को 9 अगस्त, 1990 को आंशिक रूप से लागू कर इस देश के 52% से भी अधिक पिछड़े वर्ग को केंद्र सरकार की नौकरियों में 27% आरक्षण देकर समाजिक न्याय दिलाने का प्रयास किया, जिससे तमाम उच्च जातियां उनकी 'दुश्मन' बन बैठे, की उनकी मृत्यु पर भी उन्हें मिलने वाले सम्मान से वंचित किया गया।

और उधर 1991 में मंडल कमीशन का भीषण विरोध शुरू हो गया। परन्तु देश का बड़ा मौन प्रतिशत में भी इसकी प्रतिक्रिया हो रही थी और बिहार में लालू प्रसाद एवं उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव इसी मंडल आंदोलन के कारन मुख्य मंत्री बने और बने रहे। अतः वास्तव में मंडल कमीशन की सिफारिशों से भारतीय राजनीति और समाज में भूचाल आया।



आज भारतीय राजनीति में पिछड़े वर्ग की पहचान भी मंडल कमीशन से जुडी हुई है। यहाँ तक की राजनैतिक और ऐतिहासिक तौर पर आज़ाद भारत को मंडल पूर्व और मंडल पश्चात जाना जाने लगा है।