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New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....
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Tuesday, December 15, 2015

स्व भुवनेश्वरी प्रसाद मंडल की पुण्यतिथि 15 December, 1948

दादाजी स्व भुवनेश्वरी प्रसाद मंडल की पुण्यतिथि 15 December, 1948 :
महान स्वतंत्रता सेनानी व देशभक्त, बिहार कांग्रेस के संस्थापक नेता, सामाजिक न्याय के प्रणेता, यादव शिरोमणि, मुरहो एस्टेट के ज़मींदार स्व रासबिहारी लाल मंडल के ज्येष्ठ पुत्र 1924 में बिहार उड़ीसा विधान परिषद में चुने गए तथा अपने मृत्यु 1948 तक भागलपुर लोकल बोर्ड के चेयरमैन बाबू भुवनेश्वरी प्रसाद मंडल थे, जिनसे छोटे दो भाई 1937 में निर्वाचित बिहार विधान परिषद के सदस्य स्व कमलेश्वरी प्रसाद मंडल व बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष स्व बीपी मंडल थे।
बाबू भुवनेश्वरी प्रसाद मंडल की मृत्यु मधेपुरा स्थित अपने आवास "भुवनेश्वरी हवेली", वार्ड संख्या 18 पर 15 दिसंबर 1948 को हुई। वे अपनी डायरी लिखते थे, जिसमें श्री हनुमान जी / बजरंगबली जी को "महावीर स्वामी" लिखते थे। आखिर समय पर उनके बड़े पुत्र पटना हाई कोर्ट के जज जस्टिस राजेश्वर प्रसाद मंडल ने उनके बीमार हालत के बारे में लिखे हैं। फिर 15 दिसंबर को मझले पुत्र पूर्व विधायक स्व श्री सुरेश चन्द्र यादव ने उनके मृत्यु के बारे में लिखे हैं। छोटे पुत्र स्व रमेश चन्द्र यादव उस समय सिर्फ 7 - 8 वर्ष के थे।
Pages of Diary :
29 नवम्बर,1948, सोमवार :
From Madhipura at 6 A.M. to Baijnathpur 10A.M. with Sumrit to Mansi to Bihpur to Bhagalpur 11 P.M..
Halt at Mundichak Lodge."
मधेपुरा से 6 बजे प्रातः बैजनाथपुर के लिए सुमरित (उनका निजी स्टाफ) के साथ प्रस्थान, फिर मानसी से बिहपुर से भागलपुर 11 बजे रात्रि को पहुंचे। वहां मुंदीचक में अपने निज आवास ( 2 तल्ले की हवेली थी, जिसे बासा कहते थे) पर आराम।
30 नवम्बर, 1948, मंगलवार :
Mundichak, Bhagalpur : Attended District Board Meeting.
Suresh to (TNB) College. Halt at Mundichak Lodge.
मुंदीचक, भागलपुर : जिला परिषद की बैठक में शरीक हुआ।
सुरेश (द्वितीय पुत्र) को कॉलेज (टीएनबी कॉलेज) भेजा। रात्रि विश्राम मुंदीचक बासा पर।
Mundichak, Bhagalpur : Sent Sumrita to College to see and give Ghee to Suresh. Weather bad. Feeling feverish.
मुंदीचक, भागलपुर : सुमरित को सुरेश को देखने व घी देने के लिए कॉलेज भेजा। मौसम ख़राब। बुखार जैसा लग रहा है।
11 दिसंबर, 1948, शनिवार :
"I reached Madhipura at about 11 P.M. I saw father lying. He saw me and bowed his head towards Lord Shiva, whose photo was hanging just beside his bed.
- Rajeshwar."
" मैं लगभग 11 बजे रात्रि को मधेपुरा पहुंचा। मैंने देखा की पिताजी लेते हुए थे। वे मुझे देखे और उनके बिस्तर के ठीक बगल में टंगे भगवान शिव जी के फोटो की ओर अपना शीश नवाए।
- राजेश्वर। "
15 दिसंबर, 1948 बुधवार।
"Father expired today at 12-47 A.M. and left us in the vast ocean of sorrow.
:-Suresh."
"पिताजी आज 12-47 प्रातः को मृत्यु को प्राप्त हो गए और हमें दुःख के अथाह सागर में छोड़ गए।
:-सुरेश। "
"The End".
"इतिश्री" .

Sunday, December 13, 2015

बाबू कमलेश्वरी प्रसाद यादव : सदस्य, भारत का संविधान सभा (1946).

बाबू कमलेश्वरी प्रसाद यादव,

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद जुलाई 1945 में ब्रिटेन में एक नयी सरकार बनी। इस नयी सरकार ने भारत संबन्धी अपनी नई नीति की घोषणा की तथा एक संविधान निर्माण करने वाली समिति बनाने का निर्णय लिया। भारत की आज़ादी के सवाल का हल निकालने के लिए ब्रिटिश कैबिनेट के तीन मंत्री भारत भेजे गए। मंत्रियों के इस दल को कैबिनेट मिशन के नाम से जाना जाता है। 15 अगस्त 1947 को भारत के आज़ाद हो जाने के बाद यह संविधान सभा पूर्णतः प्रभुतासंपन्न हो गई। इस सभा ने अपना कार्य 9 दिसम्बर 1947 से आरम्भ कर दिया। संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे।
भारत की संविधान सभा का चुनाव भारतीय संविधान की रचना के लिए किया गया था। ग्रेट ब्रिटेन से स्वतंत्र होने के बाद संविधान सभा के सदस्य ही प्रथम संसद के सदस्य बने।जवाहरलाल नेहरू, डॉ राजेन्द्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे। अनुसूचित वर्गों से 30 से ज्यादा सदस्य इस सभा में शामिल थे। सच्चिदानन्द सिन्हा इस सभा के प्रथम सभापति थे। किन्तु बाद में डॉ राजेन्द्र प्रसाद को सभापति निर्वाचित किया गया। भीमराव रामजी आंबेडकर को निर्मात्री सिमित का अध्यक्ष चुना गया था। संविधान सभा ने 2 वर्ष, 11 माह, 19 दिन में कुल 166 दिन बैठक की। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की स्वतन्त्रता थी।
बिहार से निर्वाचित सदस्यों में अमियो कुमार घोष, अनुग्रह नारायण सिन्हा, बनारसी प्रसाद झुनझुनवाला, भागवत प्रसाद, बोनिफेस लाकड़ा, ब्रजेश्वर प्रसाद, चंडिका राम, लालकृष्ण टी. शाह, देवेंद्र नाथ सामंत, डुबकी नारायण सिन्हा, गोपीनाथ सिंह, जदुबंस सहाय, जगत नारायण लाल, जगजीवन राम, जयपाल सिंह, दरभंगा के कामेश्वर सिंह, महेश प्रसाद सिन्हा, कृष्ण वल्लभ सहाय, रघुनंदन प्रसाद, राजेन्द्र प्रसाद, रामेश्वर प्रसाद सिन्हा, रामनारायण सिंह, सच्चिदानंद सिन्हा, सारंगधर सिन्हा, सत्यनारायण सिन्हा, बिनोदानन्द झा, पी. लालकृष्ण सेन, श्रीकृष्ण सिंह, श्री नारायण महथा, श्यामानन्द सहाय, हुसैन इमाम, सैयद जफर इमाम, लतीफुर रहमान, मोहम्मद ताहिर, ताजमुल हुसैन, चौधरी आबिद हुसैन, पंडित हरगोविन्द मिश्रा.सहित मधेपुरा के कमलेश्वरी प्रसाद यादव थे।
कमलेश्वरी बाबू चतरा (मधेपुरा) के जमींदार श्री राम लाल मंडल के पुत्र थे जिनका परिवार मधेपुरा के प्रतिष्ठित परिवारों में था।
कमलेश्वरी बाबू के ताऊ (बड़े बाबूजी) श्री राम लाल मंडल के बड़े भाई श्री संत लाल मंडल का विवाह कुमारखंड के पास कोरलाही - सुखसान के श्री गर्जुमन यादव की बहन यशोदा देवी से हुआ था। यशोदा देवी की बड़ी बहन श्रीमति सुमित्रा देवी का विवाह मुरहो एस्टेट के बाबू भुवनेश्वरी प्रसाद मंडल, ज्येष्ठ पुत्र बाबू रासबिहारी लाल मंडल से हुआ था।
बाबू कमलेश्वरी प्रसाद यादव संविधान सभा के लिए खगडिया क्षेत्र से निर्वाचित हुए थे। इस चुनाव में निर्वाचित होने के बाद संविधान सभा के सभी बैठकों में महत्वपूर्ण सुझाओं के साथ शामिल हुए और उनके भाषण प्रोसीडिंग्स में शामिल हैं। फिर चुकी यह सभा आज़ाद भारत के संसद के तौर पर मान लिया गया, तो बतौर मधेपुरा -खगडिया क्षेत्र का प्रतिनिधित्व उन्होंने बखूबी किया।
1952 के बिहार विधान सभा चुनाव में कमलेश्वरी बाबू उदा-किशनगंज क्षेत्र से विधायक बने और क्षेत्र के समस्याओं को पूरी जिम्मेदारी के साथ उठाये। इस समय 1952 में मधेपुरा के विधायक मुरहो एस्टेट के यादव शिरोमणि स्व रासबिहारी लाल मंडल के सबसे छोटे सुपुत्र स्व बी पी मंडल थे।
कमलेश्वरी बाबू फिर 1972 में भी निर्वाचित हुए।
बाबू कमलेश्वरी प्रसाद यादव पटना विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र (Political Science) और बी एच यू (बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय) से हिंदी में डबल एम ए किए थे। वे पटना विश्वविद्यालय से कानून की डिग्री भी प्राप्त किए थे।
पहले ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय और अब बी एन मंडल विश्वविद्यालय से मुरलीगंज (मधेपुरा) के पास कमलेश्वरी प्रसाद कॉलेज (www.kpcollege.co.in) आज भी शिक्षा से उनकी स्मृति के जुड़ाव को दर्शाता है।
1902 के लगभग में जन्म लिए बाबू कमलेश्वरी प्रसाद मंडल की मृत्यु 15 नवम्बर, 1989 को हुई।
उनका पुत्र श्री अभय कुमार यादव चतरा - मधेपुरा के राजनैतिक - सामाजिक जीवन में सक्रीय हैं।

Sunday, March 22, 2015

अधिग्रहण की बात :




मुहाजिर हैं मगर एक दुनिया छोड़ आए हैं,
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं।
अब अपनी जल्दबाजी पर बोहत अफ़सोस होता है,
कि एक खोली की खातिर राजवाड़ा छोड़ आए हैं।।
2007 के जून में मुरहो, मधेपुरा में रेल फैक्ट्री बनाने के लिए भूमि अधिग्रहण का विरोध मैंने इसलिए किया था, क्योंकि खाली ज़मीन होने के बावजूद खेती की ज़मीन को ली जा रही थी। उस जगह के बजाए जहाँ अंततः अधिग्रहण हुआ वहाँ आज भी कई समस्याएँ हैं।
अभी हाल में मधेपुरा ग्रीन फील्ड रेल इंजन कारखाने के लिए अधिग्रहित की गई भूमि का कम मुआवजे को लेकर भूदाता किसानों ने चकला रेल क्रासिंग के निकट धरना दिया। भूदाता भूअर्जन कानून 2013 के आलोक में मुआवजा भुगतान की मांग कर रहे थे। ज्ञातव्य है कि रेलवे द्वारा 2008 में स्वीकृत इस योजना के तहत 1116.66 एकड़ भूमि का अधिग्रहण अधिसूचना 2008 में ही प्रकाशित किया गया था। किसानों की मांग थी कि अभी नौ हजार रूपये प्रति कट्ठा की दर से मुआवजा दिया जा रहा है जबकि नये दर पर 38 हजार रूपये प्रति कट्ठा की दर से उसका चौगुना मुआवजा नियमानुसार मिलना चाहिए। इसके लिए किसानों ने उच्च न्यायालय में रिट याचिका भी दायर की है।
इसके पहले मुरहो गाँव के लगभग सभी क्षेत्र का अधिग्रहण होना था, और जून 2007 को हमIरे धरना के बाद स्व बी पी मंडल जी का समाधी स्थल को छोड़ दिया गया था। यह भी एक संयोग था की इस नक़्शे के अनुसार मुरहो गांव में मेरा घर व ज़मीन अधिग्रहण क्षेत्र में नहीं थे। फिर आन्दोलन का दौर शुरू हुआ। इधर अफवाह यह थी क़ी सरकार २७ लाख प्रति एकड़ का भुगतान करेगी, जबकि सच्चाई यह थी क़ी यह रेट असल में 1 लाख 80 हज़ार प्रति बीघा थी।
पूरे प्रकरण में मीडिया का साथ रहा। सहारा समय टी वी ने मुरहो से भूमि अधिग्रहण पर 30 जनवरी,2008 को एक ज़ोरदार कार्यक्रम का सीधा प्रसारण किया, जिसका शीर्षक था - 'मंडल पर वार'। इस कार्यक्रम में लगभग 150 ग्रामीण ने हिस्सा लिया और सभी ने एक स्वर में इस अधिग्रहण का विरोध किया। शायद लालू जी तक मेसेज पहुँच गया था। अंततः रेल मंत्रालय ने अधिग्रहण क्षेत्र दूसरे जगह बदले जाने की घोषणा क़ी।
दिनांक १४ जुलाई,2008 को इस फैसले पर मैंने लालू प्रसाद जी को धन्यवाद् देते हुए कुछ सुझाव प्रस्तुत किये. मैंने अपने ज्ञापन में लिखा -
"आपसे सादर निम्नलिखित निवेदन कर रहा हूँ, जिस पर आशा करता हूँ क़ी सहानुभूतिपूर्वक विचार करेंगे -
१. रेल इंजन कारखाना हेतु भूमि अधिग्रहण को कम से कम किये जाने का प्रावधान करने क़ी कृपा जाये.(९०० एकड़ का प्रस्ताव था).
२. भूमि अधिग्रहण के कवायद में कम से कम कृषि योग्य भूमि, घरों, मंदिर, मस्जिद को नुकसान पहुंचे.
३. अधिग्रहण किये गए भूमि का अधिक से अधिक बाज़ार भाव के मूल्य पर मुआवजा दिया जाये. मुआवजा पूर्णतः नगद न होकर बांड के माध्यम से किये जाने का प्रावधान किया जाये.
४. जिनकी भूमि का अधिग्रहण हो उनके परिवार जनों को उनके योग्यता के अनुरूप रेलवे द्वारा नौकरी दिया जाये.
५. अगर किसी कारण वस् कारखाना शुरू न हो सके अथवा किसी समय बंद हो तो इसे वापस भूस्वामियों को देने का एकरारनामा किया जाये.
......................................सेज के अंतर्गत किसानो के कृषि योग्य भूमि अधिग्रहण किये जाने के विवाद में भी एक उचित दिशा-निर्देश देंगे."

Sunday, August 24, 2014

25 अगस्त : सामाजिक न्याय के प्रणेता स्व बी पी मंडल की जयन्ती पर।

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और भारत सरकार के पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष रहे स्व बी पी मंडल की जयन्ती बिहार सरकार के राजकीय समारोह के तौर पर उनके पैतृक गाँव मुरहो (मधेपुरा) और राजधानी पटना में मनाया जाता है।

स्व बिन्ध्येश्वरी प्रसाद मंडल का जन्म 25 अगस्त,1918 को बनारस में हुआ था। वे बिहार के आधुनिक इतिहास में पिछड़े वर्ग के और यादव समाज के संभवतः प्रथम क्रन्तिकारी व्यकित्व, मुरहो एस्टेट के ज़मींदार होते हुए भी स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रीय और कांग्रेस पार्टी में बिहार से स्थापना सदस्यों में एक, सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, बिपिन चन्द्र पाल, सच्चिदानंद सिन्हा जैसे प्रमुख नेताओं के साथी, 1907 से 1918 तक बिहार प्रांतीय कांग्रेस कमिटी और ए आई सी सी के बिहार से निर्वाचित सदस्य, 1911 में गोप जातीय महासभा (बाद में यादव महासभा) की संस्थापक स्व रासबिहारी लाल मंडल के सबसे छोटे पुत्र थे। रासबिहारी बाबू यादवों के लिए जनेऊ धारण आन्दोलन और 1917 में मोंटेग-चेल्म्फोर्ड समिति के समक्ष यादवों के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए, वायसरॉय चेल्म्फोर्ड को परंपरागत 'सलामी'देने की जगह उनसे हाथ मिलते हुए जब यादवों के लिए नए राजनैतिक सुधारों में उचित स्थान और सेना में यादवों के लिए रेजिमेंट की मांग किए थे। 1911 में सम्राट जार्ज पंचम के हिंदुस्तान में ताजपोशी के दरबार में प्रतिष्टित जगह से शामिल हो कर वह उन अँगरेज़ अफसरों को भी दंग कर दिए जिनके विरुद्ध वे वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।1917 में कांग्रेस के कलकत्ता विशेष अधिवेशन में वे सबसे पहले पूर्ण स्वराज्य की मांग की थी। कलकत्ता से छपने वाली हिंदुस्तान का तत्कालीन प्रतिष्टित अंग्रेजी दैनिक अमृता बाज़ार पत्रिका ने रासबिहारी लाल मंडल की अदम्य साहस और अभूतपूर्व निर्भीकता की प्रशंसा की और अनेक लेख और सम्पादकीय लिखी, और दरभंगा महराज ने उन्हें 'मिथिला का शेर' कह कर संबोधित किया था। 27 अप्रैल, 1908 के सम्पादकीय में अमृता बाज़ार पत्रिका ने कलकत्ता उच्च न्यायलय के उस आदेश पर विस्तृत टिप्पणी की थी जिसमें भागलपुर के जिला पदाधिकारी लायल के रासबिहारी बाबू के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित व्यवहार को देखते हुए उनके विरुद्ध सभी मामलों पर संज्ञान लिया और उन मामलों को रासबिहारी बाबू के वकील मिस्टर जैक्सन के निवेदन पर दरभंगा हस्तांतरित कर दिया था।

1918 में बनारस में ५१ वर्ष की आयु में जब रासबिहारी बाबू का निधन हुआ तो वहीँ बी पी मंडल का जन्म हुआ। रासबिहारी लाल मंडल के बड़े पुत्र भुब्नेश्वरी प्रसाद मंडल थे जो १९२४ में बिहार-उड़ीसा विधान परिषद् के सदस्य थे, तथा १९४८ में अपने मृत्यु तक भागलपुर लोकल बोर्ड (जिला परिषद्) के अध्यक्ष थे। दूसरे पुत्र कमलेश्वरी प्रसाद मंडल आज़ादी की लड़ाई में जय प्रकाश बाबू वगैरह के साथ गिरफ्तार हुए थे और हजारीबाग सेन्ट्रल जेल में थे और १९३७ में बिहार विधान परिषद् के सदस्य चुने गए थे।

कहते हैं की एक समय कलकत्ता में रासबिहारी बाबू से राजनैतिक रूप से जुड़े प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के कारण मधेपुरा विधान सभा से 1952 के प्रथम चुनाव में बी पी मंडल काँग्रेस के प्रत्याशी बने और 1952 में बहुत काम उम्र में मधेपुरा विधान सभा से सदस्य चुने गए। 1962 में पुनः चुने गए और 1967 में मधेपुरा से लोक सभा सदस्य चुने गए1965 में मधेपुरा क्षेत्र के पामा गाँव में हरिजनों पर सवर्णों एवं पुलिस द्वारा अत्याचार पर वे विधानसभा में गरजते हुए कांग्रेस को छोड़ सोशिअलिस्ट पार्टी में आ चुके थे। बड़े नाटकीय राजनैतिक उतार-चढ़ाव के बाद १ फ़रवरी,१९६८ में बिहार के पहले यादव मुख्यमंत्री बने। इसके लिए उन्होंने सतीश बाबू को एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनवाए। अतः सतीश बाबू को एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बनाने वाले स्व बी पी मंडल ही थे। बी पी मंडल ६ महीने तक सांसद थे, और बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री भी थे। वे राम मनोहर लोहिया जी एवं श्रीमती इंदिरा गाँधी की इच्छा के विरुद्ध बिहार में पहले पिछड़े समाजके मुख्यमंत्री बनने जा रहे थे। परन्तु विधानसभा में बहुमत के बावजूद तत्कालीन राज्यपाल अयंगर साहेब रांची जाकर बैठ गए और मंडल जी को शपथ दिलाने से इस आधार पर इंकार कर दिया कि बी पी मंडल बिहार में बिना किसी सदन के सदस्य बने ६ महीने तक मंत्री रह चुके है। परन्तु बी पी मंडल ने राज्यपाल को चुनौती दी और इस परिस्थिति से निकलने के लिए तय किया गया की सतीश बाबू एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बन कर इस्तीफा देंगे जिससे बी पी मंडल के मुख्यमंत्री बनने में राज्यपाल द्वारा खड़ा किया गया अरचन दूर किया जा सके। अब इंदिरा गाँधी और लोहिया जी सभी मंडल जी के व्यक्तित्व से डरते थे और नहीं चाहते थे की सतीश बाबू इस्तीफा दें। परन्तु सतीश बाबू ने बी पी मंडल का ही साथ दिया। आगे की कहानी और दिलचस्प है। उन्ही दिनों बरौनी रिफायनरी में तेल का रिसाव गंगा में हो गया और उसमें आग लग गयी। बिहार विधान सभा में पंडित बिनोदानंद झा ने कहा कि शुद्र मुख्यमंत्री बना है तो गंगा में आग ही लगेगी!

साक्ष्य तो इस प्रकरण का बिहार विधानसभा के रिकार्ड में है - बात पहले बिहार विधान सभा की है, जब स्व बी पी मंडल ने आपत्ति की थी कि यादवों के लिए विधान सभा में 'ग्वाला' शब्द का प्रयोग किया गया।सभापति सहित कई सदस्यों ने कहा की यह असंसदीय कैसे हो सकता है क्योंकि यह शब्दकोष (Dictionary) में लिखा हुआ है। स्व मंडल ने कुछ गालियों का उल्लेख करते हुए कहा कि ये भी तो शब्दकोष (Dictionary) में है, फिर इन्हें असंसदीय क्यों माना जाता है. सभापति ने स्व मंडल की बात मानते हुए, यादवों के लिए 'ग्वाला' शब्द के प्रयोग को असंसदीय मान लिया। लेकिन उन दिनों किन जातिवादी हालातों में बाते हो रही थी, इसका अंदाज़ मुश्किल है।

१९६८ में उपचुनाव जीत कर पुनः लोक सभा सदस्य बने।१९७२ में मधेपुरा विधान सभा से सदस्य चुने गए। १९७७ में जनता पार्टी के टिकट पर मधेपुरा लोक सभा से सदस्य बने। १९७७ में जनता पार्टी के बिहार संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष के नाते लालू प्रसाद को कर्पूरी ठाकुर और सत्येन्द्र नारायण सिंह के विरोध के बावजूद छपरा से लोक सभा टिकट मंडल जी ने ही दिया। १९७८ में कर्णाटक के चिकमंगलूर से श्रीमती इंदिरा गाँधी के लोक सभा में आने पर जब उनकी सदस्यता रद्द की जा रही थी, तो मंडल जी ने इसका पुरजोर विरोध किया। १.१.१९७९ को प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई ने बी पी मंडल को पिछड़ा वर्ग आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया, जिस जबाबदेही को मानल जी ने बखूबी निभाया।इनके दिए गए रिपोर्ट को लाख कोशिश के बावजूद सर्वोच्च न्यायलय में ख़ारिज नहीं किया जा सका।खैर, उसके बाद की घटनाएं तो तात्कालिक इतिहास में दर्ज है और जो हममें से बहुतों को अच्छी तरह याद है.

स्व बी पी मंडल जी की मृत्यु १३ अप्रैल.१९८२ को ६३ वर्ष की आयु में हो गयी।

स्व बी पी मंडल के जयंती पर उनकी स्मृति को अनेकों बार नमन.

Saturday, November 9, 2013

मंडल कमीशन:


दरअसल कई साथी यह जानना चाहेंगे कि मंडल कमीशन क्या है?

देश की आज़ादी के बाद समाज के सबसे कमजोर तपके, जिन्हें अनुसूचित जाति और जनजाति कहा गया, के बारे में यह मानते हुए कि यह वर्ग समाज में वर्षों से कई बाधाओं और विकृतियों से जूझ रहा है और उनके उत्थान के लिए विशेष अवसरों कि आवश्यकता होगी, उन्हें आरक्षण और विशेष अवसरों का प्रावधान किया गया। लेकिन इसके पीछे एक इतिहास थी और यह इतना आसान भी नहीं था क्योंकि आज़ादी के संघर्ष के दौरान दलित नेता डा बी आर आंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच हुए समझौतों के कारण, खास तौर से हिन्दू समाज को एक रखने के लिए संविधान में यह आया।

परन्तु यह भी बात उठी कि इन वर्गों के अलावे कई और सामाजिक तपके हैं, जिन्हें भी विशेष अवसरों कि आवश्यकता होगी। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से इन पिछड़े वर्गों का पता लगाने के लिए संविधान के धारा 340 के अनुसार एक आयोग बनाने का प्रावधान किया गया, जिसे पिछड़ा वर्ग आयोग कहा जाना था।

पंडित नेहरू पर इस बात का दबाब बढ़ने पर 29 जनवरी, 1953 को काका कालेलकर की अध्यक्षता में पहले पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया जिसने 30 मार्च 1955 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी।इस रिपोर्ट के अनुसार 2,399 जातियों को पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया, जिनमें 837 जातियों को अति-पिछड़ा घोषित किया गया। लेकिन इस आयोग के रिपोर्ट कि सबसे दिलचस्प पहलु यह थी कि आयोग के अध्यक्ष ने रिपोर्ट के साथ माननीय राष्ट्रपति को दिए गए अपने पत्र में अपनी ही रिपोर्ट को ख़ारिज कर दी।

इसी पत्र के आधार पर वर्षों तक पिछड़े वर्ग के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। 1977 के लोक सभा चुनाव में नवगठित जनता पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र में पिछड़े वर्ग के लिए विशेष उपाय पूरे संजीदगी से उठाया गया और उस चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस को पहली और करारी हार दी।

जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं में बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री बी पी मंडल भी थे जो बिहार में जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष भी थे।(उन्होंने ने ही लालू प्रसाद को उस चुनाओ में टिकट दी थी)। बी पी मंडल मधेपुरा लोक सभा क्षेत्र से शानदार विजय प्राप्त किये और इस बात का कयास लगाया जा रहा था की जनता पार्टी कि पहली गैर-कांग्रेसी केंद की सरकार उन्हें कोई महत्वपूर्ण मंत्रालय दी जायेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

इसी बीच पैर टूटने के इलाज़ के दौरान मंडल जी बम्बई के जसलोक अस्पताल में भरती थे, जहाँ उनसे मिलने प्रधान मंत्री मोरारजी देसाई पहुंचे। मोरारजी भाई ने बी पी मंडल से कहा की मैंने आपको मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया क्योंकि आपको एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देना चाहता हूँ। मंत्री तो कई लोग बनते हैं लेकिन यह जिम्मेदारो इतना विशेष है की मरने के बाद भी लोग आपको याद करेंगे।

राष्ट्रपति ने 1 जनवरी, 1979 को पिछड़ा वर्ग आयोग कि गठन कि अधिसूचना जारी की जिसके अध्यक्ष बिहार के पूर्व मुख्य-मंत्री बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल (बी पी मंडल) को बनाया गया। उन्हीं के नाम पर इस आय़ोग को मंडल आयोग के नाम से जाना गया। बी पी मंडल ने 31 दिसंबर,1980 को नई दिल्ली के विज्ञानं भवन में राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह को रिपोर्ट सौंप दी।

मंडल कमीशन रिपोर्ट तो पूरे विज्ञानिक आधार के बनायी गयी की वर्षों बाद सर्वोच्च न्यायलय के सम्पूर्ण बेंच द्वारा भी इसमें किसी तरह कि कमी नहीं निकाली जा सकी। रिपोर्ट में 1931 में हुए आखिरी जाति आधारित जनगणना के अनुसार भारत के 52% जनसंख्या जिसमें 3,743 अलग अलग जातियों को समाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा या ‘backward’ घोषित किया गया। परन्तु चुकी पहले से अनुसूचित जाति/जनजाति को 22.5% आरक्षण प्राप्त था अतः कई अन्य अनुशंसाओं के साथ साथ उनके लिए 27% आरक्षण का प्रावधान करने के लिए कहा गया, जिसे जोड़ने के बाद आरक्षण का कुल प्रतिशत 49.5 होता था जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय सीलिंग 50% से कम था।

स्व बी पी मंडल की मृत्यु रिपोर्ट सौंपने के लगभग एक वर्ष बाद 13 अप्रैल, 1982 को हो गयी। इस तरह कांग्रेस के सरकार में रिपोर्ट को ढंडे बस्ते में डाल दिया गया।
1989 का लोकसभा चुनाव पूर्ण हुआ। कांग्रेस को भारी क्षति उठानी पड़ी। उसे मात्र 197 सीटें ही प्राप्त हुईं। विश्वनाथ प्रताप सिंह के राष्ट्रीय मोर्चे को 146 सीटें मिलीं। भाजपा के 86 सांसद थे और वामदलों के पास 52 सांसद के समर्थन से राष्ट्रीय मोर्चे को 248 सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो गया और वी. पी.सिंह प्रधानमंत्री बने। दिसंबर 1980 से ठन्डे बस्ते में पड़ी मंडल आयोग के रिपोर्ट को 9 अगस्त, 1990 को आंशिक रूप से लागू कर इस देश के 52% से भी अधिक पिछड़े वर्ग को केंद्र सरकार की नौकरियों में 27% आरक्षण देकर समाजिक न्याय दिलाने का प्रयास किया, जिससे तमाम उच्च जातियां उनकी 'दुश्मन' बन बैठे, की उनकी मृत्यु पर भी उन्हें मिलने वाले सम्मान से वंचित किया गया।

और उधर 1991 में मंडल कमीशन का भीषण विरोध शुरू हो गया। परन्तु देश का बड़ा मौन प्रतिशत में भी इसकी प्रतिक्रिया हो रही थी और बिहार में लालू प्रसाद एवं उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव इसी मंडल आंदोलन के कारन मुख्य मंत्री बने और बने रहे। अतः वास्तव में मंडल कमीशन की सिफारिशों से भारतीय राजनीति और समाज में भूचाल आया।



आज भारतीय राजनीति में पिछड़े वर्ग की पहचान भी मंडल कमीशन से जुडी हुई है। यहाँ तक की राजनैतिक और ऐतिहासिक तौर पर आज़ाद भारत को मंडल पूर्व और मंडल पश्चात जाना जाने लगा है।

Thursday, March 7, 2013

महिला दिवस - ऐ दादी माँ तुझे सलाम।


8 मार्च को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मैं उन सभी महिलाओं का इस्तेकबाल करता हूँ जिन्होंने अपने प्रकाश से किसी भी तरह से इस समाज, देश और मेरे जीवन को रौशन किया।

8 मार्च को महिला दिवस मनाये जाने की शुरुआत अमरीकी सोसलिस्ट पार्टी द्वारा पहली बार 28 फ़रवरी, 1909 को महिला दिवस मनाने से हुई। उसके बाद, रूस में 1917 में सोवियत क्रांति के उपरांत इस अवसर पर सरकारी छुट्टी दिए जाने एवं 1922 से चीन में कम्युनिस्टों और 1936 से स्पेनिश कम्युनिस्टों आदि कम्युनिस्ट और समाजवादी देशों में मुख्य रूप से मनाया जाने लगा।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस एक लोकप्रिय घटना के रूप में पहली बार 1977 के बाद मनाया गया जब संयुक्त राष्ट्र महासभा के सदस्य राज्यों में महिलाओं के अधिकारों और विश्व शांति के लिए संयुक्त राष्ट्र दिवस के रूप में 8 मार्च का प्रचार करने के लिए आमंत्रित किया गया।
वैसे तो कई महिलाओं, खास तौर से मेरी माँ का मुझ पर अमिट छाप रहा है, और अनेक महिलाओं से मैं प्रभावित रहा हूँ, जिनमें से कई फेसबुक पर भी हैं, लेकिन आज मैं एक विशेष व्यक्तित्व का यहाँ जिक्र कर रहा हूँ।

मेरे परदादा स्व रासबिहारी लाल मंडल के पिता स्व रघुवर दयाल मंडल एवं उनकी माता का देहांत तब हो गया था जब वे मात्र 6 वर्ष के थे। बिहार के मधेपुरा जिला की एक बड़ी ज़मींदारी मुरहो-रानीपट्टी का कार्यभार रासबिहारी बाबू की दादी जिनका नाम सकलवती मररायन था, के बूढ़े कंधो पर आ गयी। इस विशिष्ट महिला ने न सिर्फ अपने एक मात्र पोते का पालन-पोषण किया और श्रेष्ट शिक्षा दिलवाई, बल्कि ज़मींदारी का कार्य-भार भी बखूभी संभालीं। इसके लिए उस समय बिहार की सबसे विकट नदी कोसी के क्षेत्र में चांदी के हौदे में हाथी पर सवार होकर भ्रमण कर ज़मींदारी की देखरेख कीं। अकेले वारिस होने के कारण रासबिहारी बाबू की ज़िन्दगी पर भी अनेक खतरे थे, जिनका मुकाबला उनकी दादी माँ ने पूरी दृढ़ता से की।

महिला दिवस पर जानकी देवी की स्मृति को मेरी श्रद्धांजलि।

Sunday, August 26, 2012

रासबिहारी लाल मंडल (१८६६-१९१८) - मिथिला के यादव शेर.

अगर बिहार के आधुनिक इतिहास में पिछड़े वर्ग के और यादव समाज के प्रथम क्रन्तिकारी व्यकित्व का उल्लेख किया जाये तो मुरहो एस्टेट के ज़मींदार रासबिहारी लाल मंडल का ही नाम आयेगा. ज़मींदार होते हुए भी स्वतंत्रता आन्दोलन में सक्रीय और कांग्रेस पार्टी में बिहार से स्थापना सदस्यों में एक रासबिहारी बाबू का साथ सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, बिपिन चन्द्र पाल, सच्चिदानंद सिन्हा जैसे प्रमुख नेताओं से था. १९०८ से १९१८ तक प्रदेश कांग्रेस कमिटी और ए आई सी सी के बिहार से निर्वाचित सदस्य थे. १९११ में गोप जातीय महासभा (बाद में यादव महासभा) की स्थापना के साथ, यादवों के लिए जनेऊ धारण आन्दोलन और १९१७ में मोंटेग-चेल्म्फोर्ड समिति के समक्ष यादवों के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए, वायसरॉय चेल्म्फोर्ड को परंपरागत 'सलामी'देने की जगह उनसे हाथ मिलते हुए जब यादवों के लिए नए राजनैतिक सुधारों में उचित स्थान और सेना में यादवों के लिए रेजिमेंट की मांग की तो वे भी दंग रह गए. १९११ सम्राट जार्ज पंचम के हिंदुस्तान में ताजपोशी के दरबार में प्रतिष्टित जगह से शामिल हो कर वह उन अँगरेज़ अफसरों को भी दंग कर दिए जिनके विरुद्ध वे वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे. कांग्रेस के अधिवेशन में वे सबसे पहले पूर्ण स्वराज्य की मांग की. कलकत्ता से छपने वाली हिंदुस्तान का तत्कालीन प्रतिष्टित अंग्रेजी दैनिक अमृता बाज़ार पत्रिका ने रासबिहारी लाल मंडल की अदम्य साहस और अभूतपूर्व निर्भीकता की प्रशंसा की और अनेक लेख और सम्पादकीय लिखी, और दरभंगा महराज ने उन्हें 'मिथिला का शेर' कह कर संबोधित किया . २७ अप्रैल, १९०८ के सम्पादकीय में अमृता बाज़ार पत्रिका ने कलकत्ता उच्च न्यायलय के उस आदेश पर विस्तृत टिप्पणी की थी जिसमें भागलपुर के जिला पदाधिकारी लायल के रासबिहारी बाबू के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित व्यवहार को देखते हुए उनके विरुद्ध सभी मामले को दरभंगा हस्तांतरित कर दिया था. रासबिहारी बाबू के वकील जैक्सन ने न्यायलय को बताया था की चूँकि तत्कालीन जिला पदाधिकारी सीरीज को १९०२ में मधेपुरा में अदालत और डाक बंगले के निर्माण के लिए काफी भूमि देने के बाद भी, लायब्रेरी के लिए एक बड़े भूखंड (जहाँ अभी रासबिहारी विद्यालय स्थित है) मांगे जाने पर उसे देने से इनकार कर दिया, तब से स्थानीय प्रशासन और पुलिस के निशाने पर आ गए हैं, और उनके विरुद्ध १०० से अधिक मामले दर्ज किये गए हैं, और लगभग एक दर्ज़न बार बचने के लिए उन्हें उच्च न्यायालय के शरण में आना पड़ा है. यह संयोग नहीं है की गिरफ्तार होने से पहले ज़मानत (जिसे आज कल अग्रिम ज़मानत कहते हैं, और जो आम है) हिंदुस्तान के काननों के इतिहास में सबसे पहले रासबिहारी लाल मंडल को ही दिया गया. रासबिहारी लाल मंडल का जन्म मुरहो, मधेपुरा के ज़मींदार रघुबर दयाल मंडल के एकमात्र पुत्र के रूप में हुआ. बचपन में ही उनके माँ-बाप की मृत्यु हो गयी, और तब रानीपट्टी में उनकी नानी ने उनका लालन-पालन किया. रासबिहारी बाबू ११वी तक पढ़े, और हिंदी, उर्दू, मैथिलि, फारसी, संस्कृत, अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा का उन्हें ज्ञान था, और हर रोज़ मुरहो में उनके पलंग के बगल में तीन-चार अख़बार उनके पढने के लिए रखा रहता था. रासबिहारी लाल मंडल ने १९११ में यादव जाति के उत्थान के लिए मुरहो, मधेपुरा (बिहार) में गोप जातीय महासभा की स्थापना की. इस महान कार्य में उनका साथ दिया बांकीपुर(पटना) के श्रीयुत्त केशवलाल जी, देवकुमार प्रसादजी, संतदास जी वकील, सीताराम जी, मेवा लाल जी, दसहरा दरभंगा के नन्द लाल राय जी,गोरखपुर के रामनारायण राउत जी, छपरा के शिवनंदन जी वकील, जमुना प्रसाद जी, जौनपुर के फेकूराम जी, सलिग्रामी मुंगेर के रघुनन्दन प्रसाद मुख़्तार जी, हजारीबाग से स्वय्म्भर दासजी, लखनऊ के कन्हैय्यालाल जी, मुरहो, मधेपुरा से ब्रिज बिहारी लाल मंडल जी, रानीपट्टी से शिवनंदन प्रसाद मंडल जी एवं मधेपुरा से लक्ष्मीनारायण मंडल जी. रासबिहारी बाबू ने अपने स्वागत भाषण में इस सभा के उद्देश्य को रेखांकित किया - सनातनधर्मपरायणता, विद्याप्रचार, विवाह विषयक संशोधन, सामाजिक आचरण संसोधन, कृषि, गोरक्ष वान्निज्यो - व्रती, पारस्परिक सम्मलेन, मद्य निषेध तथा अनुचित व्यय निषेध. यह महासभा के संस्थापकों की दूरदृष्टी ही थी जिसके अनुरूप उन्होंने शिक्षा प्रसार को महत्व दिया और स्कूल कालेजों की स्थापना के साथ साथ यादव छात्र- छात्राओं के लिए होस्टलों एवं वजीफे क इंतजाम करने का प्रयास किया जिससे डाक्टर, इंजीनियर बनने के अलावे आई ए एस व आई पी एस भी बनें. प्रत्येक जिले में यादव भवन व संगठन बनाये जाने और 'गोपाल-मित्र' मासिक पत्रिका का मुद्रण का लक्ष्य रखा गया. अपने भाषण के समाप्ति में उन्होंने कहा -" उत्थवयं , जागृतवयं,जोक्तवयं भूति कर्माषु. भावोष्यतीत्येव मनः कृत्वा सततमव्यथै. - उठाना चाहिए जागना चाहिए सत कार्यों में सदैव प्रवृत रहना चाहिए और ढृढ़ विश्वास रखना चहिये की सफलता हमें अवश्य प्राप्त होगी." इस प्रयास पर रासबिहारी बाबू के पौत्र न्यायमूर्ति राजेश्वर प्रसाद मंडल ( पटना उच्च न्यायलय के प्रथम यादव न्यायाधीश) ने कहा था - " अंग्रेजों ने शिक्षा को मंदिर मस्जिद से निकाल कर जनता की झोली में डाल दिया. किन्तु धर्म के द्वारा स्थापित बंधनों पर सबसे बड़ा अघात तब लगा जब बाबू रासबिहारी लाल मंडल ने आवाज़ दी की तोड़ डालों इन बंधनों को, मिटा दो शोषण के इस रीति-रिवाजों को. ब्राहमण ग्रंथों के अनुसार शुद्र समुदाय की श्राद्ध क्रिया को एक माह तक चलनी चाहिए. जनेऊ संस्कार के हकदार ऊँची जाति के ही लोग हुआ करते थे. मंडल जी ने इन पाबंदियों को तोड़ डाला. इनके प्रोत्साहन पर जन समुदाय बारह दिनों में ही श्राद्ध क्रम करने लगे. जेनू धारण करने लगे. एक नया संस्कार जग उठा, एक नया जागरण हुआ." बाद में समाजशास्त्रियों ने इसे "संस्कृतिकरण" कहा. वैसे इसका उच्च जातियों द्वारा पुरजोर विरोध भी हुआ. मुंगेर जिला में यादवों और भुमियारों के बीच संघर्ष हुआ. दरभंगा में तो जनेऊ धारण करने वाले यादवों को दाग दिया गया था. परन्तु रासबिहारी बाबू अपने प्रयास में आगे बढ़ते रहे. उन्होंने ब्राह्मो-समाज के साथ मिलकर ग्राम-सुधार कार्यक्रम भी चलाये. सांप्रदायिक ईर्ष्या-द्वेष, जाति-व्यवस्था, अस्पृश्यता,सती-प्रथा, बाल-विवाह, अपव्यय और ऋण, निरक्षरता और मद्यपान, जसी सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध कई सभाएं की. कांग्रेस के १९१८ के कलकत्ता अधिवेशन के दौरान वे बीमार पद गए और ५१ वर्ष की अल्प-आयु में बनारस में २५-२६ अगस्त,१९१८ को रासबिहारी लाल मंडल का निधन हो गया. यह संयोग ही था की उसी दिन बनारस में ही रासबिहारी बाबू के सबे छोटे पुत्र बी पी मंडल का जन्म हुआ. रासबिहारी लाल मंडल के बड़े पुत्र भुब्नेश्वरी प्रसाद मंडल थे जो १९२४ में बिहार-उड़ीसा विधान परिषद् के सदस्य थे, तथा १९४८ में अपने मृत्यु तक भागलपुर लोकल बोर्ड (जिला परिषद्) के अध्यक्ष थे. दूसरे पुत्र कमलेश्वरी प्रसाद मंडल आज़ादी की लड़ाई में जय प्रकाश बाबू वगैरह के साथ गिरफ्तार हुए थे और हजारीबाग सेन्ट्रल जेल में थे और १९३७ में बिहार विधान परिषद् के सदस्य चुने गए.
बी पी मंडल १९५२ में मधेपुरा विधान सभा से सदस्य चुने गए. १९६२ पुनः चुने गए और १९६७ में मधेपुरा से लोक सभा सदस्य चुने गए. १९६५ में मधेपुरा क्षेत्र के पामा गाँव में हरिजनों पर सवर्णों एवं पुलिस द्वारा अत्याचार पर वे विधानसभा में गरजते हुए कांग्रेस को छोड़ सोशिअलिस्ट पार्टी में आ चुके थे. बड़े नाटकीय राजनैतिक उतार-चढ़ाव के बाद १ फ़रवरी,१९६८ में बिहार के पहले यादव मुख्यमंत्री बने. Rash Behari Lal Mandal v. Emperor 12 C.W.N. 117 : 6 C.L.J. 760 : 6 Cr. L.J. 408 where it was held that "the High Court has full jurisdiction under Section 437 of the Criminal Procedure Code to revise a commitment order made under Section 436 on points of law as well as of facts." In Rash Behary Lal Mandal v. Emperor (1908) 35 Cal. 1076, it was held by a Bench of the Calcutta High Court that a warrant of arrest which had been illegally issued under Section 96, Criminal P.C., could not be treated as valid under Section 98.