"There is equality only among equals. To equate unequals is to perpetuate inequality." ~ Bindheshwari Prasad Mandal "All epoch-making revolutionary events have been produced not by written but by spoken word."-~ADOLF HITLER.
About Me
- Suraj Yadav
- New Delhi, NCR of Delhi, India
- I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....
Monday, December 5, 2011
यादें देव साहब से मुलाक़ात की....
इसके लिए देव साब को एक दिन पूर्व रात के नौ बजे नई दिल्ली के मौर्या शेराटन में स्वागत करना था. देव साब की उडान दो घंटे लेट हो गई. इंतज़ार करते-करते रात के लगभग १२ बज गए. देव साब आये और उनके स्वागत की औपचारिकता पूरा करते एक-ढेढ़ घंटे और बीत गए. नींद आ रही थी, तो देव साब को कहा कि 'आप थक गयें होंगे, आराम करें'. सुनते ही देव साब तपाक से बोले, ' तुम लोग थक गए हो, आराम करो. मेरी चिंता मत करो'. उस समय ६७ वर्ष के नायक २२-२४ साल के छात्रों को जो कह रहे थे, अजीब लगा. वे उर्जा से भरे, और खुशमिजाज थे- इसीलिए उन्हें सदा-बहार कहते थे.
दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय(Arts Faculty) के नई दीक्षांत सभागार(New Convocation Hall) में दिख रहा था की देव आनंद सभी पीढ़ी के दिलों की धड़कन हैं - एक और कुलपति सहित विश्वविद्यालय प्रशासन के लगभग सभी प्रोफ़ेसर १०.३० बजे ही अपने स्थान पर बैठे थे, तो दूसरी और छात्र- छात्राएं ११०० लोगों के लिए बने सभागार के अन्दर - बहार भरे हुए थे. छात्रों की एक अकेस्त्रा को हम लोगों ने मंच पर देव आनंद के गानों को सुनाने के लिए कह रखा था, यह सोच कर की अगर वे विलम्ब से आएंगे तो श्रोताओं का ध्यान बटा रहेगा. परन्तु वे एक दम सही वक़्त पर ११ बजे पहुँच गए और हॉल में सभी लोगों ने खड़े होकर जोरदार तालियों के साथ उनका स्वागत किया, और उधर मंच पर उनके ही फिल्म का गाना , "पल भर के लिए कोई मुझे प्यार कर ले....." गाया जा रहा था. वो पल शानदार था, और देव आनंद का स्वागत अविस्मर्णीय बन गया.
देव साहब के मंच पर आते ही लगा की बिजली कौंध गयी. जब वे "Flying Kiss" देने लगे तो, पीछे से एक छात्रा कुर्सियों पर से कूदते हुए, कुलपति को लांघते हुए मंच तक पहुँच गयी, जब एक महिला पुलिस ने उसे रोक लिया. देव साब मुझे कहे की उसे आने दें, पर मैंने अदब से कहा की पूरा हॉल मंच पर आ जायेगा, और हम किसी को रोक नहीं पाएंगे. देव साब मान गए. लेकिन संबोधन उसी छात्रा का जिक्र करते शुरू किया.
उसके बाद हम लोग University Guest House में लंच पर गए. भीड़ इतनी थी की मेरे कंधे पर लटका हुआ कैमरा(Nikkon
MF II) कोई काट लिया. देव आनंद साहब खाने में सिर्फ सलाद खाए और बोले की चावल खाए मुझे बरसों बीत गए.
कल उनके ८८ वर्ष की उम्र में दुखद देहांत की खबर सुन कर वो पल एक-एक कर याद आने लगे, जिसे मैं आपसे बाँट रहा हूँ. इश्वर देव आनंद साहब के आत्मा को शांति दें. उनके जीवन और फिल्म से सीख हमेशा मिलती रहेगी.
Sunday, October 30, 2011
भारत में मोटर स्पोर्ट्स - किस कीमत पर?
नॉएडा में आज भारतीय ऍफ़ वोन ग्रांड प्रिक्स मोटर स्पोर्ट्स की शुरुआत होगी. जिस जगह पर यह रेस होगी उसे जे पी ग्रुप ने बनाया है, और पहले इसका नाम जेपी ग्रुप सर्किट रखा गया परन्तु, संभवतः उत्तर प्रदेश में बहन मायावती के शासन के प्रभाव में इसका नाम बुद्ध अन्तरराष्ट्रीय परिपथ (Buddh International Circuit) रखा गया. अतः भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के नोएडा में बना फॉर्मूला वन दौड़ का परिपथ (रास्ते का लूप) है। इसका उद्घाटन १८ अक्टूबर, २०११ को किया गया।
दो हजार करोड़ रुपए की लागत से बने इस सर्किट में ऐसे सभी अत्याधुनिक उपकरण व तकनीक इस्तेमाल की गई हैं जो किसी अंतरराष्ट्रीय सर्किट के लिए जरूरी हैं। इस ट्रैक को जर्मनी के हर्मन टिल्के द्वारा 5000 कामगारों, 300 इंजीनियरों एवं देश विदेश के नामी एफ1 सर्किट विशेषज्ञों की मदद से ढाई वर्ष में तैयार किया गया है। यमुना एक्सप्रेस मार्ग पर 250 एकड़ जमीन पर बनाए गए बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट की कुल दर्शक क्षमता एक लाख लोगों की है, जिसमें नार्थ से ईस्ट तक का 1.4 किमी का ट्रैक सबसे तेज है। इस पर कार 317 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से भी दौड़ सकती है। इस ट्रैक पर करीब 210 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ने वाली फार्मूला वन कार एक मिनट 27 सेकंड में एक लैप पूरा कर सकेंगी। रेस में कुल 60 लैप होंगे।
इस रेस लूप को बनाने के लिए तक़रीबन ३०० किसानों की ज़मीन ली गयी, जिनकी शिकायत है की उन्हें उचित मुआवजा नहीं दिया गया.
एक विवाद दिलचस्प रूप से सामने आया है कि भारतीय खेल मंत्री अजय माकन ने आरोप लगाये की उन्हें निमंत्रण नहीं दिया गया क्योंकि जे पी ग्रुप ने १०० करोड़ रूपये की कर में छूट मांगी, जिसे उन्होंने ख़ारिज कर दिया था.
The first BRG! 1903 Napier Since motor racing was illegal in Great Britain, ...(In photo..)
Friday, October 28, 2011
सुशासन बाबू का मीडिया पर शिकंजा विज्ञापन राशी बंदरबांट से.
इसका दूसरा पहलू है जिसका निर्देशन एन के सिंह जैसे पूर्व नौकरशाह और जद(यु) नेता करते हैं. गौर करें की टाइम्स आफ इंडिया और इकोनोमिक टाइम्स जैसे अख़बार, जो बिहार में अधिक साख नहीं रखतें हैं, उन्हें सबसे अधिक करोड़ों में विज्ञापन दिया गया है. दरअसल इकोनोमिक टाइम्स जैसे अखबार नए नए सर्वे करा कर कुछ आंकड़ें पकाते हैं, जिससे यह साबित हो की बिहार ज़बरदस्त तरक्की कर रहा है, सुशासन से वाकई बिहार में आर्थिक परिवर्तन हो रहा है, और सुशासन बाबू नितीश कुमार को मुख्यमंत्री नहीं, प्रधानमंत्री होना चाहिए, और एन डी ए की ओर से मोदी नहीं नितीश दावेदार रहें, बेचारे अडवाणी बेकार मैं यात्रा पर हैं!
कुछ ऐसे अख़बार हैं, जिनके नाम भी आप नहीं सुने होंगे. कई तो घोटाले हो गए, और कुछ दलाल बने पत्रकारों को मिलता है.
बाकीं निष्कर्ष आप स्वयं निकालें.
वर्ष 2010-2011
विभिन्न समाचार पत्र/पत्रिकाओं/इलेक्ट्रॉनिक चैनलों को भुगतान की गई राशि का विवरण (गैर योजना मद)
क्रम सं. पत्र/पत्रिका/चैनल का नाम भुगतान राशि (रुपये) 1. हिंदुस्तान 10,12,13,999 2. हिंदुस्तान टाइम्स 58,63,454 3. दैनिक जागरण 5,33,68,449 4. आज 1,30,54,899 5. प्रभात खबर 1,10,08,037 6. राष्ट्रीय सहारा 67,41,602 7. रोजनामा राष्ट्रीय सहारा 1,47,313 8. टाइम्स ऑफ इंडिया+ईटी 1,13,52,332 9. प्रत्युष नव विहार, पटना 30,29,027 10. कौमी तंजीम 98,72,810 11. फारूकी तंजीम 62,35,314 12. पिंदार 44,11,220 13. संगम 13,80,890 14. इंकलाब-ए-जदीद 20,57,062 15. प्यारी उर्दू 16,30,667 16. मोसल्लस 4,21,899 17. प्रात: कमल 39,63,519 18. हालात-ए-बिहार 6,67,867 19. सन्मार्ग, कोलकाता 6,81,003 20. बिजनेस स्टैंडर्ड, दिल्ली 4,27,607 21. इंडियन एक्सप्रेस, दिल्ली 5,95,800 22. अमर उजाला, दिल्ली 3,88,493 23. पायनियर, दिल्ली 7,12,994 24. पंजाब केसरी दिल्ली 10,11,461 25. डीएनए, मुंबई 1,12,268 26. न्यू इंडियन एक्सप्रेस 27,776 27. झारखंड जागरण 1,42,503 28. स्टेट्समैन, कोलकाता 1,68,723 29. मेल टुडे, दिल्ली 7,07,635 30. नई बात, भागलपुर 22,11,150 31 देश विदेश, भागलपुर 7,22,536 32. दैनिक भास्कर, भोपाल 4,06,440 33. विश्वमित्र, कोलकाता 93,395 34. राजस्थान पत्रिका, जयपुर 6,07,904 35. रांची एक्सप्रेस, रांची 1,38,893 36. इंडिया टुडे ट्रैवल्स प्लस 7,50,000 37. दी वीक 15,20,000 38 ईस्टर्न क्रोनिकल 3,43,750 39. टुडे ट्रैवर्ल्स 4,50,000 40. न्यू ग्लोबल इंडिया 1,42,850 41. पांचवां स्तंभ 9,37,500 42. पांचजन्य 80,000 43. नई दुनिया 6,00,000 44. आलिया प्रोडक्शन 1,60,000 45. गुंजन मूवीज 1,26,883 46. प्रणव मोशन पिक्चर्स 1,77,583 47. आरुषि न्यूज नेटवर्क 4,00,000 48. ईटीवी 1,05,12,784 49. महुआ टीवी 98,77,537 50. आईबीएन-7 1,46,689 51. प्रसार भारती आकाशवाणी 16,37,289 52. प्रसार भारती (दूरदर्शन) 29,41,701 53. इंडपेंडेंट न्यूज सर्विस 3,14,286 54. रेडियो मिर्ची 9,41,000 55. सौभाग्य मिथिला 3,57,372 56. सहारा टीवी 1,40,300 57. साधना न्यूज 28,83,347 58. टीवी टुडे नेटवर्क 3,53,876 59. आईएनएक्स न्यूज 35,613 60. रेडियो धमाल 99,854 61. इन्साइट टीवी न्यूज 28,333 62. ब्रांड बिहार डॉट कॉम 56,666
योग 28,15,92,154 (अट्ठाइस करोड़ पंद्रह लाख बानवे हजार एक सौ चौवन रुपये)
Saturday, August 13, 2011
कांगेस में फैसला किसका? नेतृत्व का संकट?
कांग्रेस का ही फैसला कहें की अन्ना हजारे को अनशन करने के लिए २२ शर्तों के साथ तीन दिन के लिए, मात्र ५- ६ हज़ार लोगों के साथ जे पी पार्क में इज़ाज़त देने का नाटक किया जा रहा है. सभी समझ रहे हैं कि अन्ना के अनशन की शानदार कामयाबी के लिए कांग्रेस आधार तैयार कर रही है.
दुष्यंत कुमार की चार लाइन हैं - हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिएइI
आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिएईII
मैं इसलिए याद दिला दूं कि हिंदुस्तान के लोगों, और खास तौर से युवाओं की फितरत है की अगर उन्हें लगता है की किसी के साथ अन्याय हो रहा है तो वे पूरे ताक़त के साथ उसके साथ खड़े हो जाते हैं. मुझे याद आ रहा है कि २४ जुलाई, १९८७ को वी पी सिंह कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध दिल्ली विश्वविद्यालय में सिंहनाद आयोजित किया गया था. २३ जुलाई के शाम को दिल्ली विश्वविद्यालय के ही सेंट स्टीफंस कालेज के छात्रावास में प्राचार्य जॉन हाला द्वारा अनुमति नहीं दिए जाने पर, वार्डेन प्रो दिवेदी द्वारा अपने आवास पर परिचर्चा पर राजा साहेब को बुलाये थे. कांग्रेस के छात्र इकाई के कुछ अति उत्साही गुट ने वी पी सिंह पर पेट्रोल बम से हमला किया जिसमें वे बाल-बाल बचे. मुझे लगा कि अगले दिन दिल्ली विश्वविद्यालय कि सभा में कोई नहीं आयेगा. परन्तु अगले दिन जो सभा हुई वह दिल्ली विश्वविद्यालय कि इतिहास में अभूतपूर्व था. सभा में धन्यवाद ज्ञापन देते हुए मैंने कहा कि "...हार कर मजबूर होकर यह सभा हमें वहीँ करनी पड़ रही है जहाँ पहली पर जे पी ने सभा की थी जिसके परिणामस्वरुप श्रीमती गाँधी सत्ता से हटी थीं. आज के सभा के परिणाम यही होगा कि राजीव गाँधी सत्ता से हटेंगे और भावी प्रधान मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का मैं स्वागत करता हूँ."
अब जे पी पार्क में कई शर्तों के साथ अगर अन्ना हजारे को इजाजत दी जा रही है , तो यह तय है की हिंदुस्तान की इतिहास में एक मोड़ आने वाला है! कहने का अर्थ यह है कि कांग्रेस के फैसला लेने वाले अन्ना हजारे से डर कर कई तरह कि बाधाएं खड़ी कर रहें हैं, जो निश्चित तौर से लोगों को अन्ना के प्रति सहानुभूति बढ़ाएंगे और उनके मांगों को लोगों के बीच में और अधिक लोकप्रिय करेंगे. एक वकील बेशर्मी से कानून का ज्ञान बघार रहें हैं, और दूसरा वकील दलीलें देते हुए आम जनता को मूर्खों कि जमात समझ रहें हैं. परन्तु क्या कांग्रेस में वकीलों की ही चल रही है?
हम सब जानते हैं के कांग्रेस का अर्थ है सोनिया गाँधी या राहुल गाँधी - यानि आदेश इन्ही का चलेगा. परन्तु सच्चाई शायद यह नहीं है. कांग्रेस में दो- तीन सत्ता के केंद्र हैं. सोनिया और राहुल तो औपचारिक (De jure) सत्ता के केंद्र हैं ही, दुसरे वास्तविक (de facto) सत्ता पंजाबी खत्रियों के एक गुट के पास है जो प्रधान मंत्री डा.मनमोहन सिंह के इर्द-गिर्द हैं. इस गुट में गृह मंत्री चिदंबरम भी शामिल हैं. अन्य मंत्री हैं - डा. मनमोहन सिंह का खासम-खास कपिल सिबल, सूचना और प्रसारण मंत्री अम्बिका सोनी, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया.
अब जो यह गुट हैं उनके फैसले कैसे प्रभावी हैं यह उन सभी मसलों पर दीखता है जिन्हें जन-विरोधी फैसले कहा जा सकता है, या यूं कहें की जिससे कांग्रेस की किर-किरी हुई हो. उधाहरण के लिए अन्ना हजारे से बात-चीत के बीच में ही एक शिखंडी बिल प्रस्तुत किया जाना, पहले बाबा रामदेव से समझौता और फिर रामलीला मैदान में उनके शिविर में हमला इत्यादि.
परन्तु भाजपा कुछ बोले तो अच्छा नहीं लगता है, खास तौर से अन्ना के समर्थन में उन्हें आने का नैतिक आधार ही नहीं है. सभी समझते हैं की लोकपाल विधेयक पर उनका रुख क्या है. और जब गुजरात में सही बात कहने के लिए IPS अधिकारीयों के विरुद्ध कार्यवाई हो रही है तो ताक़तवर लोकपाल को ये कैसे बर्दाश्त करेंगे? कपिल सिबल के तार जातिगत आधार पर ही भाजपा से भी जुड़े हुए हैं.
यह आम धरना है की देश में आपात काल जैसे हालत बन रहे हैं. यह संयोग ही है की आपात काल के पहले-दौर में भी संजय गाँधी के साथ अम्बिका सोनी का योगदान था. अब करेला पर नीम चढ़ा हैं कपिल सिबल जैसे धुरंधर जो कभी भी आम जनता से जुड़े नहीं रहे हैं. पैसे के लिए किसी भी मुअक्किल के लिए काम करना ही इनका ईमान है. दरअसल इनके जैसे लोगों का राजनीती में पदार्पण लालू प्रसाद जैसे नेताओं के पाप से ही हुआ है. कपिल सिबल चारा घोटाले में लालू प्रसाद के वकील थे. फीस में राज्य सभा की सदस्यता लालू प्रसाद से ली और बाद में कांग्रेस ज्वाइन कर लिये. यह जो 'ब्लेकमेल' का आरोप अन्ना हजारे पर यह लगते हैं , यह खुद उसमें माहिर हैं और इसके भुक्तभोगी शोइब इकबाल हैं जो चांदनी चौक चुनाव-क्षेत्र से सिबल के विरुद्ध लोजपा के प्रत्यासी थे, और जिन्हें रास्ते से हटाने के लिए हर कुकर्म सिबल ने किये.
अन्ना हजारे की मुहीम कांग्रेस के विरुद्ध है या कांग्रेस खामखा भ्रष्टाचारियों का संरक्षक बन रही है. दोनों वकील - चिदंबरम और सिबल - अपराधियों का ही बचाओ करते रहें हैं और अब भी वही कर रहे है. बाबा रामदेव प्रकरण में इन्होने दिखा दिया की विदेशों में काला धन जमा करने वालों को डरने ज़रुरत नहीं - कांग्रेस का हाथ, सदा उनके साथ! या बताया जा रहा है की समय रहते भैया स्विस बैंक से पैसे निकाल लो!
निष्कर्ष यह है की अगर नुकसान कांग्रेस का होता है तो इसके भुक्तभोगी सोनिया गाँधी या राहुल गाँधी होंगे. डा. मनमोहन सिंह अपनी पारी खेल चुके हैं. अब खेल बिगर जायें तो उनका या सिबल का क्या बिगड़ेगा? जो बिगड़ेगा वो राहुल गाँधी का ही होगा, क्योंकि उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में कांग्रेस को सत्ता में लाने का उनका सपना ज़रूर बिखर जायेगा. सिबल तो तुरंत दूसरा मुअक्किल दूंढ़ लेंगे. नुकसान ऐसे तमाम कांग्रेसियों का है जो निष्ठां से पार्टी के लिए काम करते हैं.
Tuesday, August 9, 2011
२०११ के लन्दन दंगे. क्या हैं?
वहां बसे भारतीयों को सतर्क रहना होगा. दरअसल, भारतीयों को दोनों - श्वेतों व अश्वेतों- ओर से खतरा रहता है.
माना जाता है की अशां
ति फ़ैलाने में सोसल नेटवर्क ब्लैक बेर्री मेसेजिंग और ट्वीटर ने नकारात्मक भूमिका निभाई है.
Sunday, August 7, 2011
suraj_yadav2005's photostream
suraj_yadav2005's photostream on Flickr.
All India Backward Students Federation observed 21 years of Mandal Commission today, the 7th August, 2011 at SSS-1 Audi JNU, New Delhi. Shri Sharad Yadav, Shri Ram Vilas Paswan, Dr Ambumani Ramdoss, Shri Ram Avdhesh Singh, Prof RavivermaKumar, Shri D. Subba Rao, Prof Lobiyal were main speakers. Dr Ambumani Ramdoss was at his eloquence best.
Thursday, August 4, 2011
लोकपाल- विधेयक से कानून तक. दिल्ली दूर है.
दरअसल प्रथम लोकपाल विधेयक १९६८ में पेश किया गया और लोक सभा में पारित होने के बावजूद राज्य सभा में पारित नहीं होने पर कानून नहीं बन पाया. फिर १९७१, १९७७ में तत्कालीन कानून मंत्री और लोकपाल विधेयक समिति के वर्तमान सदस्य शांति भूषण द्वारा, १९८५, १९८९, १९९६, १९९८, २००१, २००५ तथा २००८ में प्रस्तुत किये गए. इस तरह प्रस्तुत होने के ४२ वर्ष बाद भी लोकपाल विधेयक कानून नहीं बन सका. अब अन्ना हजारे ने जन लोकपाल की मुहीम शुरू की तो विधेयक प्रस्तुत कर सरकार ने यह बताने की कोशिश की है कि ढाक के तीन पात. अब अगर यह कानून भी बन जायेगा तो क्या? यह एक शिखंडी लोकपाल होगा और भ्रष्ट नेताओं को चिंतित होने कि जरूरत नहीं.
संसदीय परंपरा में विधेयक को कानून बनने के लिए उसे संसद के दोनों सदनों - लोक सभा और राज्य सभा - में पारित होकर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो जाने के बाद कानून का दर्जा मिल जाता है. साधारणतया संसद के दोनों सदनों में समान कार्यविधि की व्यवस्था होती है। प्रत्येक विधेयक को कानून बनने से पहले प्रत्येक सदन में अलग अलग पांच स्थितियों से गुजरना पड़ता है और उसके तीन वाचन (Reading) होते हैं। पाँचों स्थितियाँ इस प्रकार हैं पहला वाचन, दूसरा वाचन, प्रवर समिति की स्थिति, प्रतिवेदन काल (report stage) तथा तीसरा वाचन। जब दोनों सदनों में इन पाँचों स्थितियों से विधेयक गुजर कर बहुमत से प्रत्येक सदन में पारित हो जाता है तब विधेयक सर्वोच्च कार्यपालिका (राष्ट्रपति) के हस्ताक्षर के लिए भेजा जाता है. इस बीच में विधेयक संसदीय समिति (Standing Committee) के अवलोकन तथा आवश्यक सुधIर के लिए भी भेजा जाता है. तो समय बड़ा बलवान है, और कोई नहीं जनता कि इस लोक सभा कि कार्यकाल कब तक है, यानि सरकार कब तक रहे.
और प्रणब मुख़र्जी ने बराबर यह कतिपय शब्दों में स्पष्ट किया है कि सरकार भ्रष्टाचारियों और विदेशों में कला धन जमा करने वालों के साथ है. और संसदीय परंपरा के पक्षधर प्रणब बाबु जाने कितने बार बिना बहस किये विधेयेकों को कानून बनाये है, खास तौर से जब अमेरिका के साथ परमाणु संधि जैसे मसलें हों.
संसदीय व्यवस्था में गिरावट कोई शोध का विषय नहीं है, यह सर्व विदित है. गिरावट का निष्कर्ष इससे भी निकलता है कि पूर्व में संसद का ४९% समय कानून बनाने में जाता था और अब मात्र १३%. सदस्य उपस्थित ही नहीं रहते हैं. पिछले ३० वर्षों में सदस्यों का एक भी निजी बिल कानून नहीं बन पाया है और सरकारी बिल बिना सोचे-समझे और बहस के पारित होते रहें हैं. तो अन्ना के जन लोकपाल को सदस्यों के निजी बिल के तौर पर भी पारित होने के आसार नहीं है. और कौन सदस्य चाहेगे की भ्रष्टाचार मिटे, घाटा उन्हें भी हो सकता है.
अन्ना के सामने रास्ता कठिन है. एक दायरे (सिविल सोसाइटी) में रह कर कोई आन्दोलन नहीं हो सकता है. जे पी और वि पी , हाल में भ्रष्टाचार के विरूद्ध योद्धाओं ने, युवाओं के बीच जाकर ही हुंकार कर बढे और विजयी बने.सबसे महत्वपूर्ण विषय है की सिविल सोसाइटी द्वारा सामाजिक न्याय पक्ष को साथ नहीं ले सकने से एक बड़े तपके इस मुहीम से नदारद है और इसका फायदा सरकार ले रही है.
हम यह तहे दिल से चाहते हैं और हमारी इच्छा है की अन्ना की मुहीम कामयाब हो और एक सशक्त लोकपाल बने जिससे सुरसा जैसे मुह फाड़े भ्रष्टाचार पर लगाम लगे. इसके लिए आवश्यक है की या तो अन्ना अपने मुहीम को पैना बनाये या संसद सदस्यों के द्वारा प्रस्तुत बिल में व्यापक फेर बदल कर इसे शिखंडी के जगह अर्जुन का तीर बनाया जाये.








