About Me

My photo
New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....

Sunday, June 30, 2013

बिहार में मनरेगा के लूट का खौफनाक सच -

नरेगा में लूट पर कार्यवाई की केंद्र सरकार द्वारा कोई तंत्र या क्रियाविधि तय नहीं है। सी बी आई का कहना है की चुकी क्रियानवन राज्य सरकार के हाथ में है, अतः वह कुछ नहीं कर सकती। राज्य सरकार कोई कार्यवाई करती ही नहीं, सिर्फ उसूली करती है।
इसमें सुशासन बाबु की सरकार सबसे आगे है।

नरेगा साईट पर दिए गए सूचना अनुसार केंद्र को (सभी दिक्कतों के बावजूद) २०१२ तक १७ वी आई पी और १८३ सामान्य शिकायत मिली, जिसे बिहार सरकार को अग्रसारित कर दिया गया, परन्तु जिसमें से एक पर भी कार्यवाई नहीं हुई।

सभी में लिखा है - जांच पदाधिकारी के जाँच प्रतिवेदन में अनियमितता प्रतिवेदित नहीं है।



This is the site for The Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act MGNAREGA-
Go to the option of Transparency & Accountability -
This is what you get -

Our apologies...
The item you requested does not exist on this server or cannot be served.
Please double check the web address or use the search function on this page to find what you are looking for.
If you know you have the correct web address but are encountering an error, please contact the Site Administration.

Thank you.

404 Not Found

SO THE LOOT IS OFFICIAL. There is a splendid coordination between the Centre and the State.

Sunday, April 28, 2013

Himalyan Blunder हिमालयन ब्लंडर या हिमालय भूल।




हिमालय ब्लंडर ब्रिगेडियर जॉन दलवी द्वारा लिखा गया एक बेहद विवादास्पद युद्ध संस्मरण था. यह चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी द्वारा भारत पर थोपा गया करारी और शर्मनाक हार का क्षुब्द विवरण था जिसे भारत सरकार ने तत्काल प्रतिबंधित कर दिया। यह सीमा पर तैनात एक सैन्य अधिकारी द्वारा 1962 के भारत चीन युद्ध के कारण, परिणाम औरउसके बाद का विस्तृत विवरण था।. पुस्तक के प्रकाशित होने के बाद संयोग से, शब्द 'हिमालय गलती', भारतीय राजनीति के संदर्भ में भारी विफलता के लिए एक पर्याय के रूप में जाना जाने लगा।

पुस्तक ब्रिगेडियर के DSSC, Wellington के दिनों के उस कथन के साथ शुरू होता है जब एक गेस्ट फेकल्टी, जो एक रिटायर्ड ब्रिटिश सैन्य अधिकारी थे, जब सुना कि नेहरू ने चीन के साथ पंचशील समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं और ब्रिटिश द्वारा तिब्बत में चीन के साथ अग्रिम स्थिति बनाये रखने के लिए सेना की चौकी को चीनियों को सौंपने का फैसला किया है तो कहा कि भारत और चीन जल्दी ही युद्ध की स्थिति में हो सकता है। ब्रिगेडियर. दलवी वह अपने देश के नेता की आलोचना करने सज्जन पर गुस्सा आया और उसके कथन को तुरंत चुनौती दी।

ब्रिगेडियर दलवी तिब्बत के सन्दर्भ में भारत और चीन की स्थिति की तुलना करते हैं। वे मानते हैं की ब्रिटिश को चीन की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा कीअंतर्दृष्टि थी, इसलिए तिब्बत को एक बफर राज्य के रूप में रखा गया था। उम्मीद के मुताबिक, चीनी 1950 में तिब्बत पर हमला किया और उस पर कब्ज़ा कर लिया. भारत ने, नेहरू की चीन के अनुकूल नीति के कारण कोई विरोध नहीं किया था।

चीनी तिब्बत से लद्दाख के पास अक्साई चिन में अग्रणी स्थिति के लिए सड़कों का निर्माण शुरू किया। उसके बाद चीन ने दो प्रमुख भारतीय प्रदेशों पर अपना दावा किया -
1 ) जम्मू एवं कश्मीर के लद्दाख जिले के पूर्वोत्तर भाग में अक्साई चिन पर, और
2) ब्रिटिश नामित पूर्वोत्तर फ्रंटियर एजेंसी (नेफा), जो वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश है।

जब 8 सितंबर, 1962 को युद्ध शुरू हुआ तो आदतन नेहरू भारत में नहीं थे। चीनी लद्दाख क्षेत्र और नेफा पर एक साथ हमला कर दिया था। चीन अक्साई चिन और नेफा (अरुणाचल प्रदेश) में 11,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा करने में कामयाब रहे।

चतुर्थ कोर के कमांडर जनरल बी.एम. कौल सीमा के अग्रणी लाइनों पर नहीं था और दिल्ली के सैन्य अस्पताल में भर्ती था। दलवी आगे आरोप है कि बी.एम. कौल नेहरू के व्यक्तिगत और जातिय पसंद था क्योंकि अधिक सक्षम और वरिष्ठ अधिकारियों को नज़रंदाज़ कर उसे जनरल के पद पर पदोन्नत किया गया था।
दलवी के अनुसार, भारतीय सेना को पहाड़ युद्ध के लिए उपकरण, हथियार, और गर्म कपड़े, बर्फ जूते, और चश्मे आदि आवश्यक उपकरणों की बुनियादी कमी थी. ब्रिगेडिअर दलवी ने अपनी ब्रिगेड के साहस, वीरता, और दुश्मनों को मुहतोड़ जबाब देने की और उनके आक्रमण का सामना करने की धैर्य और सहस की भूरी-भूरी प्रशंसा की।

क्षेत्र पर कब्ज़ा करने के बावजूद चीनी सेना ने यथास्थिति बनाए रखते हुए एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा की। ब्रिगेडियर दलवी को अपनी ब्रिगेड के सैनिकों के साथ चीन द्वारा युद्ध कैदी के रूप में गिरफ्तार कर लिया गया था। और बाद में उन्हें छह महीने के लिए जेल में डाल दिया गया था।

दलवी ने रिकार्ड किया है की कैसे चीन सावधानी से हमले की योजना बनाई थी, जबकि आधिकारिक तौर पर यह एक अलग मुद्रा बनाए रखा था।

ब्रिगेडिअर दलवी ने युद्ध के बाद की स्थिति पर टिपण्णी करते हुए लिखा है कि प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के आलोचकों ने पराजय के लिए नेहरु सहित रक्षा मंत्री कृष्ण मेनन और जनरल बृज मोहन कौल जिम्मेदार ठहराया और मेनन एवं कौल को इस्तीफा देना पड़ा।

Wednesday, April 24, 2013

चीन का भारत पर हमला, सरकार खामोश।


1962 के चीनी विश्वासघात और हमले के बाद यह पहली बार नहीं है की चीन ने खुले तौर से भारत में घुसपैठ किया हो। गौरतलब है की 1962 में पंडित नेहरु और तात्कालिक रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन को लगा की उनके साथ विश्वासघात हुआ, परन्तु पिछले 10 वर्षों से हो रहे चीनी घुसपैठ और दादागिरी पर मौनी बाबा प्रधान मंत्री खामोश हैं, और आका सोनिया गाँधी को शायद कोई फर्क नहीं पर रहा है। नहीं, मैं यह नहीं कहता की उनके विदेशी मूल का कोई प्रभाव है, परन्तु भारत माता के निरंतर अपमान को सहना भी समझ में नहीं आ रहा है। और विपक्ष एवं मीडिया का भी इसे तवज्जो नहीं देना दुखद है।

पूरे प्रकरण में चीन अपने इतिहास के उस समझ से प्रेरित है जिसके अनुसार वे मानते हैं की चीन दुनिया का केंद्र है, और सम्पूर्ण 'सभ्य' दुनिया पर उनका अधिकार है। इस तरह से वे अँगरेज़ के समय के भारत-चीन सीमा तय करने वाली रेखा मैक-मोहन लाईन के वजूद को ही नकारते हुए, जम्मू व कश्मीर के क्षेत्र अक्साई-चिन और पूर्वोत्तर भारत के अरुणाचल पर अपना दावा करते हैं। तदनुसार 15 अप्रैल, 2013 को 13 किलोमीटर लद्दाख में किये घुसपैठ को अपने क्षेत्र का मानते हुए, घुसपैठ से ही इनकार कर रहे हैं। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर विवादित इलाके में अपने सैनिकों की टेंट चौकी खड़ी कर चीन ने हद लांघने के साथ ही 2005 में हुए समझौते को भी तोड़ा है। सीमा पर बीते नौ दिन से जारी तनाव को कम करने के लिए भारत ने चीन को सीमा पर 15 अप्रैल से पहले की स्थिति में लौटने के लिए कहा है। चीन ने भारत को दो टूक सुनाते हुए कहा कि हम अपने ही क्षेत्र में हैं हमने घुसपैठ नहीं किया है। हम वापस नहीं लौटेंगे। चीन ने अपनी पिछली स्थिति पर लौटने की भारतीय मांग मानने से मना कर दिया।

चीन इतना पर नहीं रुका है। पाकिस्तान, श्री लंका, नेपाल, बंगला देश, मालदीव में अपनी सैन्य उपस्थिति मजबूत कर वह भारत की घेराबंदी कर चूका है। साउथ चाइना सागर से भारत को हटने की चेतावनी दे चूका है. नित्य उसके युद्ध पोत भारतीय समुद्री क्षेत्र में और हेलीकाप्टर भारतीय आकाश में घुसपैठ कर रहें हैं। और यह सरकार खामोश है।

लद्दाख में चीन के घुसपैठ पर भारत के विदेश मंत्री खुर्शीद का यह बयान की यह एक 'स्थानीय समस्या' है, यह दर्शाता है की वे या तो तीसरे दर्जे के मुर्ख हैं, अथवा जानबूझ कर देश को बर्गला रहे हैं। इस तरह के बयान नेहरु भी 1962 के चीनी आक्रमण के पहले दे रहे थे। अपंगों के बैसाखी गोलमाल करने वाले खुर्शीद कह रहे हैं की मई में वे चीन जायेंगे और 'शायद' चीनी घुसपैठ के मासले को उठा सकते हैं। ऐसी स्थिति में चीन जाने का औचित्य क्या है? खुर्शीद का कहना है चीन भारत की बात सुन नही रहा और इस बीच खबर आया है कि खुद चीन जाएंगे। उन्हे क्या लगता है यहां से उनकी आवाज चीन तक नही पहुंच रही? और चीनी प्रधान मंत्री भी भारत आएंगे, और यहाँ से पाकिस्तान जायेंगे। क्या खुर्शीद को हिम्मत है की चीन के बाद वे जापान,( आज कल चीन से जापान का सम्बन्ध ठीक नहीं है), जाने की हिमाकत कर सकते हैं? इधर, चीन का कहना है कि लद्दाख मे हुई घुसपैठ का भारत-चीन मे जारी बातचीत पर कोई असर नही पडेगा। अगर चीनी सेना दिल्ली तक भी आ जाएं तब भी वो यही कहेगे। और भारत उन्हें चाय को पूछेगा। दरअसल, भारत सरकार कोमा में है। देश की प्रतिष्ठता और सीमाएं को बचने वाला अभी कोई नहीं है। जागिये साथियों, जागिये।

भ्रष्टाचार को चरम सीमा पर लाने वाली यह सोनिया- मौन मोहन की सरकार देश के सरहदों की रक्षा करने में भी अक्षम साबित हो रही है। क्या जनता जागेगी?

Status on Sunday, the 5th May, 2013 -
अपने ही ज़मीन छोड़, पीछे हटी भारतीय सेना - जय बोलो बेईमान देशद्रोही कांग्रेस सरकार की।
चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के 50 सैनिक वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारतीय क्षेत्र दौलत बेग ओल्डी सेक्टर में 19 किलोमीटर भीतर घुस आए थे और 15-16 अप्रैल की रात में वहां तंबू लगाकर चौकी बना ली थी। अब मीडिया में खबर आ रही है की दोनों सेनाएं पीछे हट रही है। गतिरोध बिन्दु दौलत बेग ओल्डी क्षेत्र से रविवार को भारत और चीन के सैनिकों के पीछे हट जाने के बारे में विस्मय यह है की चीनी सैनिकों के पीछे हटने की बात तो समझ में आती है, लेकिन वह यह बात समझ में नहीं आ रही है कि भारतीय सैनिक क्षेत्र में कहां से हटे हैं? देश को जानने का अधिकार है कि भारत कहां से हटा और भारत को कहां से हटना था क्योंकि यह हमारा क्षेत्र है, यह वास्तविक नियंत्रण रेखा का हमारा क्षेत्र है। वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारतीय क्षेत्र में चीनी सैनिकों की मौजूदगी से विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की चीन यात्रा पर सवाल खड़ा हो गया था, और अब तो भारत सरकार की यह बड़ी झूठ और साजिश उनकी देशभक्ति (अगर हो तो) पर ही सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। निश्चित ही देश बेईमानों और गद्दारों के हाथों में सुरक्षित नहीं।

Thursday, March 7, 2013

महिला दिवस - ऐ दादी माँ तुझे सलाम।


8 मार्च को अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मैं उन सभी महिलाओं का इस्तेकबाल करता हूँ जिन्होंने अपने प्रकाश से किसी भी तरह से इस समाज, देश और मेरे जीवन को रौशन किया।

8 मार्च को महिला दिवस मनाये जाने की शुरुआत अमरीकी सोसलिस्ट पार्टी द्वारा पहली बार 28 फ़रवरी, 1909 को महिला दिवस मनाने से हुई। उसके बाद, रूस में 1917 में सोवियत क्रांति के उपरांत इस अवसर पर सरकारी छुट्टी दिए जाने एवं 1922 से चीन में कम्युनिस्टों और 1936 से स्पेनिश कम्युनिस्टों आदि कम्युनिस्ट और समाजवादी देशों में मुख्य रूप से मनाया जाने लगा।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस एक लोकप्रिय घटना के रूप में पहली बार 1977 के बाद मनाया गया जब संयुक्त राष्ट्र महासभा के सदस्य राज्यों में महिलाओं के अधिकारों और विश्व शांति के लिए संयुक्त राष्ट्र दिवस के रूप में 8 मार्च का प्रचार करने के लिए आमंत्रित किया गया।
वैसे तो कई महिलाओं, खास तौर से मेरी माँ का मुझ पर अमिट छाप रहा है, और अनेक महिलाओं से मैं प्रभावित रहा हूँ, जिनमें से कई फेसबुक पर भी हैं, लेकिन आज मैं एक विशेष व्यक्तित्व का यहाँ जिक्र कर रहा हूँ।

मेरे परदादा स्व रासबिहारी लाल मंडल के पिता स्व रघुवर दयाल मंडल एवं उनकी माता का देहांत तब हो गया था जब वे मात्र 6 वर्ष के थे। बिहार के मधेपुरा जिला की एक बड़ी ज़मींदारी मुरहो-रानीपट्टी का कार्यभार रासबिहारी बाबू की दादी जिनका नाम सकलवती मररायन था, के बूढ़े कंधो पर आ गयी। इस विशिष्ट महिला ने न सिर्फ अपने एक मात्र पोते का पालन-पोषण किया और श्रेष्ट शिक्षा दिलवाई, बल्कि ज़मींदारी का कार्य-भार भी बखूभी संभालीं। इसके लिए उस समय बिहार की सबसे विकट नदी कोसी के क्षेत्र में चांदी के हौदे में हाथी पर सवार होकर भ्रमण कर ज़मींदारी की देखरेख कीं। अकेले वारिस होने के कारण रासबिहारी बाबू की ज़िन्दगी पर भी अनेक खतरे थे, जिनका मुकाबला उनकी दादी माँ ने पूरी दृढ़ता से की।

महिला दिवस पर जानकी देवी की स्मृति को मेरी श्रद्धांजलि।

Friday, February 8, 2013

सिविल सेवा परीक्षा में ग्रामीण और पिछड़े प्रतियोगियों के लिए बाधाएं - Civil Services Exam Format Change handicap for rural aspirants



संघ लोक सेवा आयोग, सिविल सेवा परीक्षा में बारबार परिवर्तन कर ग्रामीण और पिछड़े प्रतियोगियों के लिए बाधाएं उत्पन्न कर रहा है। सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा में 2011 से बदलाव किए जा चुके हैं। इसमें वैकल्पिक विषयों को खत्म किया जा चुका है। इस वर्ष भी सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं क्योंकि तय समय पर संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने इसका विज्ञापन नहीं निकाला है। इसलिए यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि इस बार मुख्य परीक्षा में बदलाव का ऐलान हो सकता है।

ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के प्रतियोगियों को परीक्षा का पैटर्न समझने में ही समय (उनका उम्र) निकल जाता है। जब तक वे परीक्षा के कायदे और बर्रेकियों को समझते हैं तब तक संघ लोक सेवा आयोग 'प्रतियोगिता के नियमों' को ही बदल देता है।(They change the rules of the game). इससे कम से कम ग्रामीण क्षेत्र के उम्मीदवारों का चयन हो पता है।

मौजूदा 26 वैकल्पिक विषयों को हटाकर सिर्फ दो प्रश्न पत्र रखे जाएं। ये दोनों प्रश्न पत्र कॉमन और वस्तुनिष्ठ होने चाहिए। पहला प्रश्न पत्र सामान्य अध्ययन एवं दूसरा उपरोक्त 26 विषयों का कॉमन प्रश्न पत्र होगा। इसके अलावा भाषा के प्रश्न पत्रों को पूर्ववत रखे जाने की संभावना है।

इसके पहले कांग्रेस नीत सोनिया-मनमोहन की यू पी सरकार शिक्षा का बाजारीकरण, आई आई टी और आई आई एम् के फीस व्यवश्ता में भीषण बढ़ोतरी कर यह सन्देश दिया है की शिक्षा, विशेष रूप से उच्च शिक्षा, गरीबों के लिए नहीं है। औब यह भी तय किया जा रहा है की कलक्टर , एस पी और इनकम टैक्स अफसर होना भी गरीबों के बूते नहीं रहे।

दूसरी ओर चुकी पिछड़े क्षेत्रों के अधिक प्रतियोगी अरक्षित वर्ग के होते हैं, इसलिए सामान्य श्रेणी में वे नहीं आ पाते हैं। नियमतः सभी प्रतियोगी पहले 50% सीटों के लिए चयनित हो सकते हैं, लेकिन उसके बाद वे आरक्षण के आधार पर ही आ सकते हैं। आरक्षित वर्गों के साथ भेदभाव साक्षात्कार के नियमों में भी हो रहा है। नियमों के विरुद्ध अरक्षित वर्गों का साक्षात्कार दोपहर बाद अलग से लिया जा रहा है। गौरतलब है की सिविल सेवा से देश के सर्वोच्च पदों के लिए नौकरशाह चयनित होते हैं, और अगर फेक्टरी में ही खराबी हो तो उत्पाद अच्छा कैसे मिलेगा?

2011 के सिविल सेवा परीक्षा में 25 शीर्ष उम्मीदवारों में 13 दिल्ली से परीक्षा दिए थे, 2 से 3 जयपुर, मुंबई और चंडीगढ़ से, और 1 -1 हैदराबाद, चेन्नई, दिसपुर, पटना और जम्मू केन्द्रों से। इनमें से अधिकांश IIT, IIM और यहाँ तक की लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के पूर्व छात्र थे।

और संघ लोक सेवा आयोग की


संरचना देखा जाय - डा डी पी अग्रवाल (अध्यक्ष), प्रो पुरषोत्तम अग्रवाल ( आरक्षण विरोध के कारण ही कांग्रेस द्वारा मनोनीत), प्रशान्त कुमार मिश्र, डा वेंकटरामी रेड्डी, रजनी राजदान, डा के के पॉल, विजय सिंह (पूर्व आईएस), मनबीर सिंह (पूर्व आई ऍफ़ एस), अलका सिरोही, आई एम् जी खान, डेविड र सिएम्लिएह। इन सदस्यों में अन्य पिछड़े वर्ग से एक भी सदस्य नहीं है, और न ही शायद दलित समुदाय से। तो इस फेक्टरी से कैसा समान निकलेगा, यह समझा जा सकता है। और इनके नीतियों से हमारी आशंकाओं को और बल मिलता है।

Friday, February 1, 2013

नया लोकपाल - The Lokpal Bill



लोकपाल बिल को अब यू पी ए द्वारा चर्चा का केंद्र बनाने का प्रयास जारी है। अब तक जो संकेत हैं, उस के अनुसार सोनिया-मनमोहन का लोकपाल दंतहीन, विषहीन, नखविहीन और भ्रष्ट अफसरों को संरक्षण देने वाला होगा। जैसे अगर आप शिकायत करेंगे, तो पहले उसकी प्रति सम्बंधित अधिकारी को जायेगा। जाहिर है शिकायत रसूखदार आईएस/ आईपीएस के विरुद्ध ही होगा, और सभी शिकायतकर्ता अरविन्द केजरीवाल की तरह मीडिया के ढाल के साथ नहीं होगा। अफसर को पहले ही संकेत रहेगा की निपटा लो। अब शिकायत निपटेगा या शिकायतकर्ता, यह तो आगे पता चलेगा।

सरकारी लोकपाल राजनीतिक दलो की जांच नही कर पाएगा,न धार्मिक संस्थाओ की,न सरकारी चंदे वाली NGO की।तो क्या वो नर्सरी के बच्चो की कापियां जांचेगा? सरकारी लोकपाल वैसा ही है जैसे बिल्ली अपने गले में डालने के लिए घंटी बनाए मगर उसमें घूंघरूं न डाले। सरकारी लोकपाल के कमजोर होने का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है कि उससे ज्यादा अधिकार तो मनमोहन सिंह के पास है। अतः सरकारी लोकपाल के रूप में सरकार ने देश को एक और मनमोहन सिंह दिया है।

और कहा जा रहा है की लोकायुक्त एक वर्ष के भीतर बन जाना चाहिए। मगर कैसा? अगर सुशासन बाबू का लोकायुक्त देखा जाय तो इस पद का ऐसा भौंडा मजाक कुछ और नहीं हो सकता है। एक-दो विशेषताएं अगर गिनाऊँ तो कहा जा सकता है की बिहार में लोकायुक्त के पास कोई शिकायत जाने पर उस शिकायत को गोपनीय रखा जायेगा। उस अफसर को पहले शिकायत जायेगा जिसके लिए सरकार का वकील पैरवी करेगा। अगर शिकायतकर्ता आरोप को साबित नहीं कर पायेगा तो शिकायतकर्ता को 6 महीने कैद-इ-बामुशक्कत की सजा होगी। नतीजा है की जबसे नितीश कुमार वर्जन का लोकायुक्त लागू हुआ है, एक भी शिकायत करने का किसी को हिम्मत नहीं हुआ है। टीम अन्ना ने जब इस लोकायुक्त को ख़ारिज किया तो विकास पुरुष बिफर पड़े थे। लेकिन कल अन्ना ने उनके दिल को छू लिया, क्योंकि नितीश के भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना ने मौन साध ली थी।

वैसे गुजरात जैसे राज्य में नरेन्द्र मोदी लोकायुक्त लाना ही नहीं चाहते हैं। पता नहीं क्यों?


पद शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल है,
उसका क्या जो दंतहीन विषरहित शक्तिहीन तरल हैI

Wednesday, January 30, 2013

एक आन्दोलन का बिखराव - इंडिया अगेंस्ट करप्शन से जनतत्र मोर्चा तक.....


भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ अन्ना हजारे की जनतंत्र रैली को लेकर पटना की जनता पर कोई ख़ास उत्साह नहीं दिखा। स्थानीय गांधी मैदान में दोपहर बाद आयोजित इस रैली में बहुत ज़्यादा भीड़ नहीं दिखी।

दरअसल शुरुआत ही पटना में गलत हुआ। सुशासन बाबू से तालमेल के बाद इस रैली को भ्रष्टाचार विरोध की जगह जनतंत्र रैली कहा गया। बिहार में सुशासन बाबू की भ्रष्टाचार से त्रस्त लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ की नितीश कुमार अन्ना की तारीफ कर यह सन्देश दे रहे थे की उन्ही के छत्रछाया में यह रैली हो रही है। अगर अन्ना आज नितीश के विरुद्ध हुंकार भरते तो बेशक उनका जादू चल जाता। वैसे, बिहार की जनता ने इतना ज़रूर याद रखा है की राज ठाकरे जैसे कलुषित बोल नेता के बिहार विरोधी अनर्गल प्रलाप का अन्ना ने विरोध नहीं किया।

टीम अन्ना के एक सदस्य के अनुसार , “यह तक साफ नहीं है कि यह रैली किसकी है और कौन इसे करवा रहा है। यह जनरल वी. के. सिंह की प्रायोजित रैली है या फिर उनके करीबी बिजनेसमैन इसकी फंडिंग कर रहे हैं। पहले पटना प्रशासन भी रैली के लिए सहयोग नहीं कर रहा था, अब वहां के मुख्यमंत्री खुद इसमें रुचि ले रहे हैं। इस रैली में इंडिया अगेंस्ट करप्शन के नाम का भी इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है।”

अन्ना के आन्दोलन का यह हश्र होने से हम जैसे भ्रष्टाचार विरोधियों को निराशा हुई है। जो आन्दोलन कांग्रेस जैसी पार्टी के आगे नहीं झुकी, जिसे स्वामी अग्निवेश(कपिल मुनि!) जैसे भीतरघातियों तोड़ने में कामयाब नहीं हुए, वह अपने ही टीम के अहम् और महत्वकांक्षा का शिकार हो गयी है।

इसमें मैं अरविन्द केजरीवाल का उतना ही दोष मानता हूँ जितना उन्होंने पार्टी की गठन की जल्दीबाजी में दिखाई। अगर रोज़ दिग्विजय सिंह जैसे नेता यह चुनौती दें की आप चुनाव लड़ कर आओ और तब कुछ बोलो, तो चुनाव के लिए तैयार होने के अलावे कोई चारा नहीं बच रहा था। लेकिन जब अरविन्द ने कांग्रेस के साथ-साथ भा जा पा को भी निशाने पर लिया तो उनका एजेंट किरण बेदी को यह नागवार गुजरा। अन्ना के आन्दोलन के बिखराव के लिए किरण बेदी ही अधिक जिम्मेदार है। जो पुलिस सेवा के दौरान इनके राजनैतिक ताल मेल से वाकिफ हैं, वे मुझसे ज़रूर सहमत होंगे।


किंतु इसी बीच यह खबर भी आ रही है कि टीम अन्ना का दिल्ली कार्यालय बंद हो रहा है। मकान मालिक महेश शर्मा के अनुसार , “हम अब नए किराएदार की तलाश कर रहे हैं। कार्यालय का अनुबंध भ्रष्टाचार विरोधी जनआंदोलन (रालेगण सिद्धि) के श्याम सुंदर के नाम से है। किरन बेदी इसमें गवाह बनी थीं। उन्होंने हमसे कहा कि 1 लाख रुपये सुरक्षा राशि में से 50 हजार रुपये इस महीने का किराया काट कर बाकी के 50 हजार का चेक बना कर उन्हें दे दें। हम दुविधा में हैं क्योंकि अनुबंध में किसी और का नाम है।”