ऐसा पहली बार हो रहा है कि इस तरह की शिकायत पर बिना संसद की किसी समिति के समक्ष अपनी बात रखने का मौका मिले, किसी सांसद को इस तरह से सभापति के समक्ष खुद (वकील रखने की इज़ाज़त नहीं दी गयी है) हाज़िर होने कहा जा रहा है।
विजय माल्या, जिसे मोदी सरकार द्वारा सरकारी बैंकों का ₹9,000 करोड़ (US$1.4 billion) लेकर फरार होने दिया गया, उसे भी अपनी बात कहने का मौका दिया गया। आखिर में प्रक्रिया शुरू होने के साल भर के बाद जेटली साहब के इशारे पर उसने राज्य सभा से इस्तीफा दे दिया। क्या यही तत्परता कैप्टन जय नारायण निषाद, विजय माल्या या इसाम सिंह के मामले में दिखाई गई? यदि नहीं तो जल्दीबाजी क्या थी? इस मामले में राजनीतिक प्रक्रिया का उल्लंघन करने की हड़बड़ी क्या थी? इसी तरह से गंभीर आरोप लगे सांसदों पर ऐसी जल्दबाज़ी नहीं दिखाई गयी है, कई प्रक्रिया ही अपमानजनक लग रहा है।
शरद यादव को भारतीय संसद से ही सर्वश्रेष्ठ सांसद के तौर पर सम्मानित किया गया है।
पहली बार जय प्रकाश नारायण के आंदोलन की शुरुआत में 1974 में मध्य प्रदेश के जबलपुर से संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार के रूप में इंजीयनियरिंग कॉलेज के छात्र संघ अध्यक्ष के रूप में जीते। 1977 में दोबारा यहीं से जीते। 1986 में राज्य सभा में जीत कर सदस्य बने। 1989 में उत्तर प्रदेश के बदायूँ से लोक सभा सदस्य बने। 1991, 1996, 1999 and 2009 में बिहार के मधेपुरा से जहाँ कभी आचार्य कृपलानी, भूपेंद्र बाबू, बीपी मंडल, लालू प्रसाद सांसद थे, वहाँ से लोक सभा सांसद बने। 2004 में और फिर 2014 में राज्य सभा सदस्य निर्वाचित हुए।
दो बार इन्होने राज्य सभा से इस्तीफा भी दिया है।
वर्तमान संसद सदस्यों में कुछ ही सदस्य होंगें जिनका संसद में इतने समय का अनुभव और वरिष्ठता होगी।
फिर यह कदम क्यों ?
इसका जवाब मोदी और अमित शाह का डर है। डर इसलिए क्योंकि राजनीति में वे अपने प्रतिद्वंदियों की कमियों, कमजोरियों और पाप को हथियार बना कर या तो चुप कर दिए हैं अथवा लालू प्रसाद जैसे नेता जो चुप नहीं बैठें हैं, उन्हें मुक़दमें में उलझा कर जेल भेजने की तैयारी है।
इसके साथ देश में मोदी के विरुद्ध युवाओं की जो नई बयार बह रही है, परपम्परागत नेताओं में सिर्फ शरद यादव ने इसे पहचानते हुए लोगों के बीच अपना दौरा कर रहें हैं।
पर सबसे अधिक मोदी के लिए परेशानी की बात है कि #साझी_विरासत_बचाओ के तहत शरद यादव ने जो मुहीम छेड़ रखी है, वह विपक्षी दलों की एकता का भी मंच बन गया है।
यह ध्यान में रखना ज़रूरी है कि गुजरात राज्य सभा चुनाव में जिसमें अमित शाह ने अहमद पटेल को हराने के लिए हर तरह की तिकड़म किये, लेकिन अंततः मात खाए शरद यादव के पुराने साथी और जद यू विधायक छोटुभाई वसावा के उस वोट पर, जिसपर नितीश कुमार के एजेंट आरसीपी 50 करोड़ उठा चुके थे, जो उन्होंने भाजपा के विरूद्ध दिया और बाद में प्रेस के समक्ष इसकी घोषणा भी की।
वैसे, मोदी सरकार द्वारा #शरद_यादव की #राज्य_सभा समाप्त करने की मुहीम और नवम्बर 1978 में #इंदिरा_गाँधी की #लोक_सभा सदस्य्ता समाप्त किए जाने में एक बात कॉमन है:
दोनों बार मुहीम में पूरी सरकार लगी हुई थी।
नेहरु अपने विरोधियों को भी संसद में रखते थे ! शरद यादव (Sharad Yadav) जी से आप इतना डर गए?
उनकी सदस्यता का 'खात्मा' आपके शासन में आखरी कील ठोकेगा!!
यह भी समझना होगा की गुजरात में अगर भाजपा को शिकस्त दी जाती है, तो वह अकेले कांग्रेस से संभव नहीं है। दलित, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के उभरते नए नेतृत्व को साथ रख कर होगा, जिसे एक मंच पर लाने में शरद यादव महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इसके लिए ज़रूरी है कि शरद यादव को मोदी सरकार द्वारा किये जा रहे अपमान का जवाब संसद और सड़क दोनों जगह दिए जाएँ।
हम अपील करते हैं की 30 अक्टूबर, 2017 को अली अनवर साहेब और शरद यादव को हाज़िर होने की नोटिस का जवाब सभी विपक्षी दल दें और इस प्रकरण को संसद की एथिक्स, प्रिविलेज या अन्य कमिटी को रेफेर किये जाने के लिए बाध्य करें। अली अनवर, शरद यादव हाज़िर हो।
जनाब अली अनवर और शरद यादव को 30 अक्टूबर, 2017 को 9 बजे और 10 बजे सभापति वेंकय्याह नायडू के समक्ष सरकारी जद यू के "बाबू", आरसीपी सिंह के शिकायत पर हाज़िर होने के लिए कहा गया है।
ऐसा पहली बार हो रहा है कि इस तरह की शिकायत पर बिना संसद की किसी समिति के समक्ष अपनी बात रखने का मौका मिले, किसी सांसद को इस तरह से सभापति के समक्ष खुद (वकील रखने की इज़ाज़त नहीं दी गयी है) हाज़िर होने कहा जा रहा है।
विजय माल्या, जिसे मोदी सरकार द्वारा सरकारी बैंकों का ₹9,000 करोड़ (US$1.4 billion) लेकर फरार होने दिया गया, उसे भी अपनी बात कहने का मौका दिया गया। आखिर में प्रक्रिया शुरू होने के साल भर के बाद जेटली साहब के इशारे पर उसने राज्य सभा से इस्तीफा दे दिया। क्या यही तत्परता कैप्टन जय नारायण निषाद, विजय माल्या या इसाम सिंह के मामले में दिखाई गई? यदि नहीं तो जल्दीबाजी क्या थी? इस मामले में राजनीतिक प्रक्रिया का उल्लंघन करने की हड़बड़ी क्या थी? इसी तरह से गंभीर आरोप लगे सांसदों पर ऐसी जल्दबाज़ी नहीं दिखाई गयी है, कई प्रक्रिया ही अपमानजनक लग रहा है।
शरद यादव को भारतीय संसद से ही सर्वश्रेष्ठ सांसद के तौर पर सम्मानित किया गया है।
पहली बार जय प्रकाश नारायण के आंदोलन की शुरुआत में 1974 में मध्य प्रदेश के जबलपुर से संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार के रूप में इंजीयनियरिंग कॉलेज के छात्र संघ अध्यक्ष के रूप में जीते। 1977 में दोबारा यहीं से जीते। 1986 में राज्य सभा में जीत कर सदस्य बने। 1989 में उत्तर प्रदेश के बदायूँ से लोक सभा सदस्य बने। 1991, 1996, 1999 and 2009 में बिहार के मधेपुरा से जहाँ कभी आचार्य कृपलानी, भूपेंद्र बाबू, बीपी मंडल, लालू प्रसाद सांसद थे, वहाँ से लोक सभा सांसद बने। 2004 में और फिर 2014 में राज्य सभा सदस्य निर्वाचित हुए।
दो बार इन्होने राज्य सभा से इस्तीफा भी दिया है।
वर्तमान संसद सदस्यों में कुछ ही सदस्य होंगें जिनका संसद में इतने समय का अनुभव और वरिष्ठता होगी।
फिर यह कदम क्यों ?
इसका जवाब मोदी और अमित शाह का डर है। डर इसलिए क्योंकि राजनीति में वे अपने प्रतिद्वंदियों की कमियों, कमजोरियों और पाप को हथियार बना कर या तो चुप कर दिए हैं अथवा लालू प्रसाद जैसे नेता जो चुप नहीं बैठें हैं, उन्हें मुक़दमें में उलझा कर जेल भेजने की तैयारी है।
इसके साथ देश में मोदी के विरुद्ध युवाओं की जो नई बयार बह रही है, परपम्परागत नेताओं में सिर्फ शरद यादव ने इसे पहचानते हुए लोगों के बीच अपना दौरा कर रहें हैं।
पर सबसे अधिक मोदी के लिए परेशानी की बात है कि #साझी_विरासत_बचाओ के तहत शरद यादव ने जो मुहीम छेड़ रखी है, वह विपक्षी दलों की एकता का भी मंच बन गया है।
यह ध्यान में रखना ज़रूरी है कि गुजरात राज्य सभा चुनाव में जिसमें अमित शाह ने अहमद पटेल को हराने के लिए हर तरह की तिकड़म किये, लेकिन अंततः मात खाए शरद यादव के पुराने साथी और जद यू विधायक छोटुभाई वसावा के उस वोट पर, जिसपर नितीश कुमार के एजेंट आरसीपी 50 करोड़ उठा चुके थे, जो उन्होंने भाजपा के विरूद्ध दिया और बाद में प्रेस के समक्ष इसकी घोषणा भी की।
वैसे, मोदी सरकार द्वारा #शरद_यादव की #राज्य_सभा सदस्य्ता समाप्त करने की मुहीम और नवम्बर 1978 में #इंदिरा_गाँधी की #लोक_सभा सदस्य्ता समाप्त किए जाने में एक बात कॉमन है:
दोनों बार मुहीम में पूरी सरकार लगी हुई थी।
नेहरु अपने विरोधियों को भी संसद में रखते थे ! शरद यादव (Sharad Yadav) जी से आप इतना डर गए?
उनकी सदस्यता का 'खात्मा' आपके शासन में आखरी कील ठोकेगा!!
यह भी समझना होगा की गुजरात में अगर भाजपा को शिकस्त दी जाती है, तो वह अकेले कांग्रेस से संभव नहीं है। दलित, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों के उभरते नए नेतृत्व को साथ रख कर होगा, जिसे एक मंच पर लाने में शरद यादव महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इसके लिए ज़रूरी है कि शरद यादव को मोदी सरकार द्वारा किये जा रहे अपमान का जवाब संसद और सड़क दोनों जगह दिए जाएँ।
हम अपील करते हैं की 30 अक्टूबर, 2017 को जनाब अली अनवर और शरद यादव को हाज़िर होने की नोटिस का जवाब सभी विपक्षी दल दें और इस प्रकरण को संसद की एथिक्स, प्रिविलेज या अन्य कमिटी को रेफेर किये जाने के लिए बाध्य करें।


