About Me

My photo
New Delhi, NCR of Delhi, India
I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....

Thursday, May 19, 2011

क्या आप राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे रहते हैं ? राजमार्ग यानि ग्रामीणों के लिए फंदा और मकरजाल.



राजमार्ग यानि ग्रामीणों के लिए फंदा और मकरजाल.
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण , इस देश में अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मार्ग बनाने तथा जनसाधारण के जीवन स्तर में व्यापक सुधार लाने हेतु अपने क्रियाकलाप में व्यस्त है. प्राधिकरण अपने उद्देश्य के बारे में कहती है कि "To meet the nation’s need for the provision and maintenance of National Highways network to global standards and to meet user’s expectations in the most time bound and cost effective manner, within the strategic policy framework set by the Government of India and thus promote economic well being and quality of life of the people."

परन्तु कुछ बातें गले से नहीं उतरती. जिन लोगों के ज़मीन से ये सडकें गुजरती हैं, उस सड़क का प्रयोग के लिए उन्हें कम से कम १० की मी का चक्कर लगाना पड़ता है. टी वी में इस विषय पर एक प्रतिक्रिया देख रहा था. श्री झा कह रहे थे की सड़क किनारे की मेरी ज़मीन इस राजमार्ग के लिए ले ली गयी, मुआवजा तो मिला लेकिन सरकारी रेट पर, और चूकी राजमार्ग लगभग ६ से ८ फीट ऊँची है तो उसका प्रयोग तो दूर उसके पर अपने लोगों से मिलने जाने के लिए गाड़ी को ८ से १० की मी का चक्कर लगाना पड़ता है. जिस कालेज में मैं पढाता हूँ वहां भी येही स्तिथि है. दिल्ली से सोनीपत, चंडीगढ़ राजमार्ग पर अपने कालेज जाने के लिए या तो मैं राजमार्ग का इस्तेमाल नहीं करूँ या फिर लगभग २ की मी आगे जा कर वापस आना पड़ता है.
और टोल (Toll) का क्या किस्सा है, यह बताने वाला कोई नहीं. कितना सरकार को प्राप्त हो चूका और लोगों से फिर भी उसूला जा रहा है. मैं दिल्ली से अजमेर गया और मैंने ३७५ रूपये टोल दिए. भट्टा -परसौल प्रकरण पर मेरे एक सहयोगी कह रहे थे कि गौड़ साहब ( जे पी ग्रुप के मालिक) को नॉएडा एक्सप्रेस वे का ९९ साल का लीज है. वे सरकार से अलग भी किसानो को पैसे बाँट सकते हैं. कहने का अर्थ है कि इतना रुपया फायदा होगा कि उनके कई पुश्त ऐश करंगे! और ये पैसे कि आमदनी अधिकतर टोल से ही होना है!!
कहने का अर्थ यह है की विकास के नाम पर आम आदमी और साधारण जगहों से सरकारी योजनाकारों को कोई सरोकार नहीं. दरअसल सांसदों का हाल भी यह है की अफसर उनसे सलाह वगैरह करना भी तौहीनी समझते हैं. क्यों नहीं राजमार्ग के किनारे बसने वाले और इस समस्या से पीड़ित जनसाधारण इस विषय पर ज़मीन अधिग्रहण नीति में सारकार को सुझाव दें? शायद जनता की बात सुन ली जाये.

No comments:

Post a Comment