Lobsang Sangay next PM of exiled Tibetan govt
My comments -
Congratulations Lobsang. We were together in the Department of Chinese & Japanese Studies (now called Department of Far East Studies), University of Delhi. Lobsang was in International Student House (Hostel) and took keen interest in Delhi University Students Union Activities, along with me. I am so happy for you, Lobsang, and our best wishes to you.
"There is equality only among equals. To equate unequals is to perpetuate inequality." ~ Bindheshwari Prasad Mandal "All epoch-making revolutionary events have been produced not by written but by spoken word."-~ADOLF HITLER.
About Me
- Suraj Yadav
- New Delhi, NCR of Delhi, India
- I am an Indian, a Yadav from (Madhepura) Bihar, a social and political activist, a College Professor at University of Delhi and a nationalist.,a fighter,dedicated to the cause of the downtrodden.....
Wednesday, April 27, 2011
Friday, April 15, 2011
Ambedkar Jatyanti at Delhi University - Poem recital by ADAM GONDVI


Ambedkar Jayanti celebrated at Delhi University.
15th April, New Delhi.
Several teachers, students, University Professors, few Principals, professionals and journalist gathered at Hindu College Teachers lodge, residence of Dr Ratan Lal, on the evening of 14th April, 2011 to celebrate 120th Birth Anniversary of Baba Saheb Bhim Rao Ambedkar. Remembering Baba Saheb the speakers recalled that " Bhimrao Ramji Ambedkar: डॉ.भीमराव रामजी आंबेडकर [b 14 April 1891 — 6 December 1956), also known as Babasaheb, was an Indian jurist, political leader, Buddhist activist, philosopher, thinker, anthropologist, historian, orator, prolific writer, economist, scholar, editor, revolutionary and a revivalist for Buddhism in India. He was also the Chairman of the Drafting Committee of Indian Constitution. Ambedkar was posthumously awarded the Bharat Ratna, India's highest civilian award, in 1990." What was unique in this tribute to Baba Saheb was the poem recital by revolutionary, rustic hindi poet Adam Gondvi, known for his popular masterpieces depicting the concern for common man in the present political set up.
The programme was chaired by Prof D N Jha, former Head, Department of History, University of Delhi. Dr Suchitra Gupta, Associate Professor, Hindu College anchored the programme. Dr Rajendra Prasad, Principal, Ramjas College, Dr D N Gupta, Hindu College, Dr Manoj Jha, associate Professor, Delhi School of Social Work, Dr Suraj Yadav, associate Professor, SSN College, Dr Sanjay Verma, Associate Professor, Kirori Mal College and several others attended the programme.
The vote of thanks was presented by the host and Social Justice activist Dr Ratan Lal, Associate Professor, Hindu College.
Some poems of Adam Gondvi -
ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में
ग़ज़ल को ले चलो अब गाँव के दिलकश नज़ारों में
मुसल्सकल फ़न का दम घुटता है इन अदबी इदारों में
न इनमें वो कशिश होगी, न बू होगी, न रानाई
खिलेंगे फूल बेशक लॉन की लम्बीा क़तारों में
अदीबों! ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ
मुलम्मे के सिवा क्याी है फ़लक़ के चाँद-तारों में
रहेम मुफ़लिस गुज़रते बे-यक़ीनी के तज़रबे से
बदल देंगे ये इन महलों की रंगीनी मज़ारों में
कहीं पर भुखमरी की धूप तीखी हो गई शायद
जो है संगीन के साये की चर्चा इश्तशहारों में.
हिन्दूज़ या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए -
हिन्दूज़ या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िए
अपनी कुरसी के लिए जज्बाित को मत छेड़िए
हममें कोई हूण, कोई शक, कोई मंगोल है
दफ़्न है जो बात, अब उस बात को मत छेड़िए
ग़र ग़लतियाँ बाबर की थी; जुम्ममन का घर फिर क्योंम जले
ऐसे नाज़ुक वक़्त में हालात को मत छेड़िए
काजू भुने प्लेट में विस्की गिलास में -
काजू भुने प्लेट में विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विधायक निवास में
पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत
इतना असर है खादी के उजले लिबास में
Tuesday, April 12, 2011
रास नहीं आया - भ्रष्टाचार के विरुद्ध जंग या उसे लड़ने वाले -


बात शुरू हुई अन्ना हजारे के जन लोकपाल विधेयक को सरकारी कानून बनाये जाने की मुहीम में नई दिल्ली के जंतर मंतर पर अमरण अनशन पर बैठने के बाद. वैसे इससे पहले बाबा रामदेव ने विदेशों में भारत के डेढ़ खरब अमरीकी डालर की काले धन को वापस भारत लाने पर भी कुछ ऐसी ही बहस हुई थी. हमारे कुछ साथी जिनके विचारों से अक्सर मैं बहुत प्रभावित रहता हूँ वे इस मुहीम को हर तरह से नकारने लगे. तो इस पर मैं भी अपनी राय देने का प्रयास क़र रहा हूँ. वैसे तो मैं भी आदतन आलोचक हूँ परन्तु आधे गिलास के पानी को आधे भरे हुए पानी के रूप में देखने की दुस्साहस भी करता हूँ. परन्तु मेरे मित्रों के अप्पतियों में कुछ तो वजन रखते हैं और कुछ में उनके अहम् की छाया नज़र आ रही है.
मुद्दा ये है की भारत में भ्रष्टाचार से लोग त्रस्त हैं. राजनैतिक व नौकरशाहों के भ्रष्टाचार सबसे अधिक चिंता जनक हैं. अंतर्राष्ट्रीय संस्थi Transparency International के अनुसार भारत के १५ प्रतिशत जनता ने किसी सरकारी कामकाज करने के लिए स्वयं रिश्वत दिए या दिलवाए. इसी संस्था का आंकलन है की ट्रक चालक लगभग ५ अरब अमरीकी डालर प्रति वर्ष रिश्वत देते हैं. भ्रष्टाचार के मापने के इंडेक्स में १७८ देशों में भारत का स्थान ८७ वाँ है. जहाँ भारत विश्व के भ्रष्टतम देशों में है वहीँ दक्षिण एशिया में इससे भी भ्रष्ट कई देश हैं.
प्रश्न है कि इस समस्या से निजात पाने के लिए आप क्या उपाय सुझाते हैं. बाबा रामदेव का मानना है की काले धन की वापसी से इस मुहीम को बल मिलेगा. अन्ना हजारे एवम उनके साथियों ने एक विधेयक तैयार किया - जन लोकपाल विधेयक - जिससे उन्हें लगता है कि भ्रष्टाचार करने वालों को इस बेहतर कानून से बांधा जा सकता है. इस पर शंका और बहस जायज है. यह भी आवश्यक है कि हमारे नज़र में इससे बेहतर क्या उपाय हैं वह भी कहें.
परन्तु बहस यह है "अन्ना हजारे तुम इतने टेढ़े क्यों हो?" जगदीश्वर चतुर्वेदी - अन्ना ने लोकतंत्र व्यवस्था के विरुद्ध टिपण्णी की !;"सावधान अन्ना! पीछे छिपे खेल से" अमलेंदु उपाध्याय - कानून बनाना संसद का काम है, इसे कोई अन्ना,केजरीवाल या अग्निवेश बंधक नहीं बना सकते;"भ्रष्टाचार और अन्ना हजारे की मृग-मरीचिका" जगदीश्वर चतुर्वेदी - इस दौर का संघर्ष मीडिया इवेंट है!; रजनीश के झा - आम गरीब किसान मजदूर का नदारद होना और सिर्फ सो काल्ड सिविल सोसायटी का होना अन्ना पर प्रश्न चिन्ह है और मीडिया पर भी. फिर प्रश्न उठा की अन्ना ने राज ठाकरे को समर्थन दिया था, वह भूतकाल में क्या-क्या किया था. यह भी सामने आया की दो toilet के बीच चल रहा था अन्ना का आन्दोलन. अब सरकार ने धरने के लिए toilet के बीच का स्थान दिया है, तो लोग जायेंगे कहाँ?
सिविल सोसाइटी के नुमाइंदे कौन हो सकते थे. आन्दोलन करने वाले ही बनेंगे या बुलाक़र ले जायेंगेकिसी पत्रकार या विद्वान को.
इन सभी आपत्तियों में भ्रष्टाचार का प्रश्न व उससे लड़ने की बात कहीं नहीं है. अगर यह आन्दोलन नहींथा तो टिप्पणीकार स्वयं कोई आन्दोलन क्यों नहीं शुरू किये.
भ्रष्टाचार से लोहा लेने के लिए न समाजवादी, न मार्क्सवादी, न सामाजिक न्याय के पक्षधर और न ही सामाजिक अन्यायकर्ता कोई सामने नहीं आये.
मैंने यह प्रश्न पहले भी उठाया जब मुझे लगा की यह बताने का प्रयास किया जा रहा की भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन सामाजिक न्याय के विरुद्ध है.
व्यक्ति अगर परिस्थितियों में बंध कर कोई कदम उठाता है तो फ़िलहाल उसी कदम का विश्लेषण होना चाहिए.
जहाँ तक प्रश्न भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष का है, भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय के तथाकथित कौन योद्धा है जिसमे यह नैतिक साहस हो कि वे ऐसा आन्दोलन करें? भ्रष्ट तंत्र के वैसे ही अभिन्न अंग हैं जैसे मनुवादी नेता. और भ्रष्टाचार से अगर देश के आम नागरिक त्रस्त हैं तो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग , अल्पसंख्यक समुदाय सभी उतने ही प्रभावित हैं. अगर कोई नेता भ्रष्टाचार के विरुद्ध थोडा भी कदम बढ़ाता है तो उसका हौसला अफजाई होना चाहिए, भले वो आरक्षण के लिए उसी प्रतिबद्धता से कोई आन्दोलन न किये हों और न आगे करें.
अन्ना के आन्दोलन में शंकाएं हो सकते हैं , खास तौर से जब देश की जातिवादी,सूदखोर और बड़े उद्योगपतियों के कठपुतली मीडिया इसमें साथ ही नहीं दें बल्कि ढोल बजा-बजा क़र करें. इसका कारण का विश्लेषण करना भी आवश्यक है, परन्तु इससे आन्दोलन के चरित्र और अन्ना की प्रतिबद्धता पर प्रश्न नहीं उठते हैं.
अगर किसी गरीब व्यक्ति को बेवजह पीटा जा रहा है और मैं हस्तक्षेप करूँ और यह कहा जाय की क्या अपने कभी किसी पर हाथ नहीं उठाया है तब ही आप इसे बच सकतें हैं, तो दरअसल वह उस व्यक्ति के पीटे जाने का पक्षधर है.
बाबा रामदेव ने भी जब विदेशों में जमा काले धन का मुद्दा छेड़ा तो उनके संपत्ति का प्रश्न उठा कार उन्हें बचाओ की मुद्रा में ले आया गया. तो जिसने 'पाप न किया हो और पापी न हो' तर्क पर तो न्यायधीश भी नहीं मिल पाएंगे.
मेरा यह निवेदन है सार्थक बहस के लिए आलोचना में यह भी बात उठे की भ्रष्टाचार स निपटने के लिए और क्या उपाय हो सकतें हैं.
Symester System at Delhi University - mindless copying of rejected US system.


The HRD Minister Mr Kapil Sibal's, quite known for his slavish following of US, son who had done his 2 year LLB and 9 months LLM from American University under Symester System, was facing problems in getting enrolled as Advocate with Bar Council of India. This is the background of Mr Sibal's mindless pushing of Symester System in Indian Universities, especially at University of Delhi. He manipulated things at High Court. It is strange that views of teachers who have to teach and have experience was totally ignored.
Those who compare JNU and Jamia to Delhi University just forget that JNU has atotal strength of nearly 5000 students, a strength equal to the average of just two of nearly 72 colleges of DU. It is naive to expect system working well at JNU to be valid for Delhi University also.
Let us now know how does the examination system in American Universities work. In America, mostly there is nothing called as external examinations. The very same professor who teaches the student evaluates the examination performance. Usually a student has to appear in two major examinations- final and mid-term. As the name suggests, mid-term examinations are held half way through the course. The final examinations are given at the end of the course/semester. Both the examinations are usually written. The final examinations last from 2-3 hours while mid-term examinations last for an hour only.
At Delhi University which has a strength of more than 1.5 lakh and twice the number in Open School category this sort of thing is simply not possible.
Therefore, looking objectively, it is clear that the Symester System should be rejected at DU.
Saturday, April 9, 2011
Mahatma Gandhi on Corruption.

…It is the duty of all leading men, whatever their persuasion or party, to safeguard the dignity of India. That dignity can’t be saved if misgovernment and corruption flourish. Misgovernment and corruption always go together. I have it from very trustworthy sources that corruption is increasing in our country. Is everyone then going to think only of himself, and not al all of India?….(Hindu. 16/12/1947).
Friday, April 8, 2011
मधेपुरा में अन्ना के समर्थन में अमरण अनशन शुरू.Fast unto death begins at Madhepura in support of Anna Hazare's movement.


इस जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी सियाह समंदर से नूर निकलेगा
गिरा दिया है तो साहिल पे इंतज़ार न कर
अगर वोह डूब गया है तो दूर निकलेगा
अन्ना हजारे के समर्थन में मधेपुरा में मेरे कुछ साथी अमरण अनशन पर आज से बैठ गए हैं. कल मैंने मधेपुरा टाइम्स में अपील भी की थी. अंगद यादव, मधेपुरा के जाने-माने RTI तथा राजनैतिक कार्यकर्त्ता के साथ कई प्रमुख नागरिक भी इस अनशन में शामिल हुए हैं. दरअसल यह सिर्फ अन्ना के लिए समर्थन ही नहीं बल्कि मधेपुरा में व्याप्त भ्रष्टाचार से परेशान नागरिकों के लिए यह एक मौका है जब वे अपनी कुंठा को व्यक्त कर रहें हैं. मजेदार बात है की बिहार के मुख्यमंत्री ने अन्ना के अनशन को समर्थन दिए हैं. ध्यान देने की बात है की जन लोकपाल के प्रस्तावित विधेयक की प्रति सभी मुख्य मंत्रियों को भी दी गयी है. अच्छा है की बिहार में इस प्रस्तावित विधेयक को हु बी हु नितीश जी लागू करें.
वैसे आशा करता हूँ की केन्द्रीय सरकार बगैर देरी किये इस पर समिति की अधिसूचना जरी कर दें. भ्रष्टाचार तो तुरंत दूर नहीं होगा, परन्तु भ्रष्टाचार को समाप्त करने की दिशा में यह एक प्रभावशाली कदम होगा. जय हिंद.
Fast unto death begins at Madhepura in support of Anna Hazare's movement.
Citizens of Madhepura have joined Anna Hazre's protest movement against corruption by beginning 'fast unto death'. Several activists including RTI and social, political activists Angad Yadav was joined by other citizens. This is not merely a support for Anna but an occassion to express total rejection of corruption by the people which has plagued Madhepura among other places in Bihar and India. This is also an expression of the fruatration of people in dealing with this menace of corruption.
It is interesting thta Bihar Chief Minister has supported Anna'a fast. it should be noted that a copy of the proposed Jan Lokal Bill has been given to all Chief Ministers of India. They can go ahead with this version in their states and all of us will welcome if iNitish Kumar implements it in Bihar.
Nevertheless, every moment delayed by the Cemtral Government in issuing a notification on draft of new Lokpal Bill, will prove to be costly for UPA, and will definitely will be a bane of frustration for it later.
Wednesday, April 6, 2011
भ्रष्टाचार के विरुद्ध और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष - एक ही या अलग- अलग ?
इस जुनूँ का नतीजा ज़रूर निकलेगा
इसी सियाह समंदर से नूर निकलेगा
गिरा दिया है तो साहिल पे इंतज़ार न कर
अगर वोह डूब गया है तो दूर निकलेगा.
क्या भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष दो विपरीत परिस्थितयां हैं? मेरे कई साथियों के उठाये गए सवाल इस ओर इशारा कर रहें हैं. यह कुछ उसी तरह का सवाल है, जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग के अनुशंसाओं को आंशिक रूप से लागू किये थे. कई लोगों ने कहा कि वी पी ने अपने मुख्य मंत्रित्व कल में डकैतों के नाम पर कई पिछड़े वर्ग और एक खास जाति के लोगों का नरसंहार किये थे. मेरे समझ में एक ही व्यक्ति विभिन्न परिस्थियों में अलग अलग तरह से निर्णय ले सकते हैं. मुझे गाइड फिल्म में देव आनंद का किरदार याद आ रहा है जिसमें मूल रूप से वे एक धोकेबाज हैं और गाँव वाले उन्हें पूजने लगते हैं. अंत में उन्हें लोगों के विश्वास के अनुरूप ढलना पड़ता है और वर्षा के लिए वे उपवास रखतें हैं और फिर बारिश भी होती है, परन्तु उनकी जान चली जाति है. मैं समझता हूँ कि व्यक्ति अगर परिस्थितियों में बंध कर कोई कदम उठाता है तो फ़िलहाल उसी कदम का विश्लेषण होना चाहिए.
जहाँ तक प्रश्न भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष का है, भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय के तथाकथित कौन योद्धा है जिसमे यह नैतिक साहस हो कि वे ऐसा आन्दोलन करें? भ्रष्ट तंत्र के वैसे ही अभिन्न अंग हैं जैसे मनुवादी नेता. और भ्रष्टाचार से अगर देश के आम नागरिक त्रस्त हैं तो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग , अल्पसंख्यक समुदाय सभी उतने ही प्रभावित हैं. अगर कोई नेता भ्रष्टाचार के विरुद्ध थोडा भी कदम बढ़ाता है तो उसका हौसला अफजाई होना चाहिए, भले वो आरक्षण के लिए उसी प्रतिबद्धता से कोई आन्दोलन न किये हों और न आगे करें.
अन्ना के आन्दोलन में शंकाएं हो सकते हैं , खास तौर से जब देश की जातिवादी,सूदखोर और बड़े उद्योगपतियों के कठपुतली मीडिया इसमें साथ ही नहीं दें बल्कि ढोल बजा करें. इसका कारण का विश्लेषण करना भी आवश्यक है, परन्तु इससे आन्दोलन के चरित्र और अन्ना की प्रतिबद्धता पर प्रश्न नहीं उठते हैं. आरक्षण की लड़ाई हमारी जिम्मेवारी है, कोई अन्ना आये या न आये, फर्क नहीं पड़ता. लेकिन देश के अरबों रूपये को लूटने वालों के विरुद्ध अगर कानून बनाये जाने में रोड़ा डाला जाता है, और कोई संघर्ष होता है, तो सामाजिक न्याय के समर्थकों को भी उसमे शामिल होना लाजिमी है. दिक्कत है की पप्पू यादव जैसे नेता इस मुहीम में शामिल होते हैं, तो हम जैस लोगों को भी थोड़ी शंका होती है.
इसी सियाह समंदर से नूर निकलेगा
गिरा दिया है तो साहिल पे इंतज़ार न कर
अगर वोह डूब गया है तो दूर निकलेगा.
क्या भ्रष्टाचार के विरुद्ध आन्दोलन और सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष दो विपरीत परिस्थितयां हैं? मेरे कई साथियों के उठाये गए सवाल इस ओर इशारा कर रहें हैं. यह कुछ उसी तरह का सवाल है, जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग के अनुशंसाओं को आंशिक रूप से लागू किये थे. कई लोगों ने कहा कि वी पी ने अपने मुख्य मंत्रित्व कल में डकैतों के नाम पर कई पिछड़े वर्ग और एक खास जाति के लोगों का नरसंहार किये थे. मेरे समझ में एक ही व्यक्ति विभिन्न परिस्थियों में अलग अलग तरह से निर्णय ले सकते हैं. मुझे गाइड फिल्म में देव आनंद का किरदार याद आ रहा है जिसमें मूल रूप से वे एक धोकेबाज हैं और गाँव वाले उन्हें पूजने लगते हैं. अंत में उन्हें लोगों के विश्वास के अनुरूप ढलना पड़ता है और वर्षा के लिए वे उपवास रखतें हैं और फिर बारिश भी होती है, परन्तु उनकी जान चली जाति है. मैं समझता हूँ कि व्यक्ति अगर परिस्थितियों में बंध कर कोई कदम उठाता है तो फ़िलहाल उसी कदम का विश्लेषण होना चाहिए.
जहाँ तक प्रश्न भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष का है, भारतीय राजनीति में सामाजिक न्याय के तथाकथित कौन योद्धा है जिसमे यह नैतिक साहस हो कि वे ऐसा आन्दोलन करें? भ्रष्ट तंत्र के वैसे ही अभिन्न अंग हैं जैसे मनुवादी नेता. और भ्रष्टाचार से अगर देश के आम नागरिक त्रस्त हैं तो अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग , अल्पसंख्यक समुदाय सभी उतने ही प्रभावित हैं. अगर कोई नेता भ्रष्टाचार के विरुद्ध थोडा भी कदम बढ़ाता है तो उसका हौसला अफजाई होना चाहिए, भले वो आरक्षण के लिए उसी प्रतिबद्धता से कोई आन्दोलन न किये हों और न आगे करें.
अन्ना के आन्दोलन में शंकाएं हो सकते हैं , खास तौर से जब देश की जातिवादी,सूदखोर और बड़े उद्योगपतियों के कठपुतली मीडिया इसमें साथ ही नहीं दें बल्कि ढोल बजा करें. इसका कारण का विश्लेषण करना भी आवश्यक है, परन्तु इससे आन्दोलन के चरित्र और अन्ना की प्रतिबद्धता पर प्रश्न नहीं उठते हैं. आरक्षण की लड़ाई हमारी जिम्मेवारी है, कोई अन्ना आये या न आये, फर्क नहीं पड़ता. लेकिन देश के अरबों रूपये को लूटने वालों के विरुद्ध अगर कानून बनाये जाने में रोड़ा डाला जाता है, और कोई संघर्ष होता है, तो सामाजिक न्याय के समर्थकों को भी उसमे शामिल होना लाजिमी है. दिक्कत है की पप्पू यादव जैसे नेता इस मुहीम में शामिल होते हैं, तो हम जैस लोगों को भी थोड़ी शंका होती है.
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